शनिवार, 18 मार्च 2017

539. रेगिस्तान

रेगिस्तान

*******  

मुमकिन है यह उम्र  
रेगिस्तान में ही चुक जाए  
कोई न मिले उस जैसा  
जो मेरी हथेलियों पर  
चमकते सितारों वाला  
आसमान उतार दे।   

यह भी मुमकिन है  
एक और रेगिस्तान  
सदियों-सदियों से  
बाँह पसारे मेरे लिए बैठा हो  
जिसकी हठीली ज़मीन पर  
मैं ख़ुशबू के ढाई बोल उगा दूँ।   

कुछ भी हो सकता है  
अनदेखा अनचाहा  
अनकहा अनसुना  
या यह भी कि तमाम ज़माने के सामने  
धड़धड़ाता हुआ कँटीला मौसम आए  
और मेरे पेशानी से लिपट जाए।  

यह भी तो मुमकिन है  
मैं रेगिस्तान से याराना कर लूँ  
शबो-सहर उसके नाम गुनगुनाऊँ  
साथ जीने मरने की कस्में खाऊँ  
और एक दूसरे के माथे पर  
अपने लहू से ज़िन्दगी लिख दूँ।   

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2017)
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सोमवार, 13 मार्च 2017

538. जागा फागुन (होली के 10 हाइकु)

जागा फागुन 

***  

1.  
होली कहती-  
खेलो रंग गुलाल  
भूलो मलाल   

2.  
जागा फागुन  
एक साल के बाद,  
खिलखिलाता   

3.  
सब हैं रँगे  
फूल, तितली, भौंरे  
होली के रंग   

4.  
खेल तो ली है  
रंग-बिरंगी होली  
रँगा न मन   

5.  
छुपती नहीं  
होली के रंग से भी  
मन की पीर   

6.  
रंग-अबीर  
तन को रँगे, पर  
मन फ़क़ीर  

7.  
रंगीली होली  
इठलाती आई है  
मस्ती छाई है   

8.  
उड़के आता  
तन-मन रँगता  
रंग-गुलाल   

9.  
मुर्झाए रिश्ते  
किसकी राह ताके  
होली बेरंग  

10.  
रंग-अबीर  
फगुनाहट लाया  
मन बौराया   

-जेन्नी शबनम (12.3.2017)
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बुधवार, 1 मार्च 2017

537. हवा बसन्ती (बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु) पुस्तक 83,84

हवा बसन्ती  

*******  

1.  
हवा बसन्ती  
लेकर चली आई  
रंग-बहार   

2.  
पीली ओढ़नी  
लगती है सोहणी  
धरा ने ओढ़ी   

3.  
पीली सरसों  
मस्ती में झूम रही,  
आया बसन्त   

4.  
कर शृंगार  
बसन्त ऋतु आई  
जग मोहित   

5.  
कोयल कूकी-  
आओ सखी बसन्त   
साथ में नाचें   

6.  
धूप सुहानी  
छटा है बिखेरती  
झूला झूलती   

7.  
पात झरते,  
जीवन होता यही,  
सन्देश देते   

8.  
विदा हो गया  
ठिठुरता मौसम,  
रुत सुहानी   

9.  
रंग फैलाती  
कूदती-फाँदती ये,  
बसन्ती हवा   

10.  
मधुर तान  
चहूँ ओर छेड़ती  
हवा बसन्ती   

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2017)
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सोमवार, 23 जनवरी 2017

536. मुआ ये जाड़ा (ठंड के हाइकु 10) पुस्तक 82, 83

मुआ ये जाड़ा  

*******

1.  
रज़ाई बोली-  
जाता क्यों नहीं जाड़ा,
अब मैं थकी   

2.  
फिर क्यों आया  
सबको यूँ कँपाने,  
मुआ ये जाड़ा   

3.  
नींद से भागे
रजाई मे दुबके  
ठंडे सपने   

4.  
सूरज भागा  
थर-थर काँपता,  
माघ का दिन   

5.  
मुँह तो दिखा-  
कोहरा ललकारे,  
सूरज छुपा   

6.  
जाड़ा! तू जा न-  
करती है मिन्नतें,
काँपती हवा   

7.  
रवि से डरा  
दुम दबा के भागा  
अबकी जाड़ा   

8.  
धुंध की शाल  
धरती ओढ़े रही  
दिन व रात   

9.  
सबको देती  
ले के मुट्ठी में धूप,  
ठंडी बयार   

10.  
पछुआ हवा  
कुनमुनाती गाती  
सूर्य शर्माता   

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2017)  
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सोमवार, 16 जनवरी 2017

535. तुम भी न बस कमाल हो

तुम भी न बस कमाल हो  

*******  

धत्त!
तुम भी न बस कमाल हो!  
न सोचते न विचारते  
सीधे-सीधे कह देते  
जो भी मन में आए  
चाहे प्रेम या गुस्सा  
और नाराज़ भी तो बिना बात ही होते हो  
जबकि जानते हो  
मनाना भी तुम्हें ही पड़ेगा  
और ये भी कि  
हमारी ज़िन्दगी का दायरा  
बस तुम तक  
और तुम्हारा बस मुझ तक  
फिर भी अटपटा लगता है  
जब सबके सामने  
तुम कुछ भी कह देते हो  
तुम भी न बस कमाल हो!  

- जेन्नी शबनम (16. 1. 2017)
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रविवार, 1 जनवरी 2017

534. जीवन को साकार करें (क्षणिका)

जीवन को साकार करें 

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अति बुरी होती है  
साँसों की हो या संयम की  
विचलन की हो या विभोर की  
प्रेम की हो या परित्याग की  
जीवन सहज, निरंतर और मंगल है  
अतियों का त्यागकर, सीमित को अपनाकर  
जीवन के लय में बहकर  
जीवन का सत्कार करें, जीवन को साकार करें  

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2017)
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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

533. जग में क्या रहता है (9 माहिया)

जग में क्या रहता है  
(9 माहिया)

*******  

1.  
जीवन ये कहता है  
काहे का झगड़ा  
जग में क्या रहता है!  

2.  
तुम कहते हो ऐसे  
प्रेम नहीं मुझको  
फिर साथ रही कैसे!  

3.  
मेरा मौन न समझे  
कैसे बतलाऊँ  
मैं टूट रही कबसे!  

4.  
तुम सब कुछ जीवन में  
मिल न सकूँ फिर भी  
रहते मेरे मन में!  

5.  
मुझसे सब छूट रहा  
उम्र ढली अब तो  
जीवन भी टूट रहा!  

6.  
रिश्ते कब चलते यूँ  
शिकवे बहुत रहे  
नाते जब जलते यूँ!  

7.  
सपना जो टूटा है  
अँधियारा दिखता  
अपना जो रूठा है!  

8.  
दुनिया का कहना है  
सुख-दुख जीवन है  
सबको ही बहना है!  

9.  
कहती रो के धरती  
न उजाड़ो मुझको  
मैं निर्वसना मरती!  

- जेन्नी शबनम (6. 12. 2016)  

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रविवार, 27 नवंबर 2016

532. मानव-नाग

मानव-नाग  
 
*** 

सुनो! अगर सुन सको    
ओ मानव केंचुल में छुपे नाग!
   
डसने की आज़ादी मिल गई तुम्हें   
पर जीत ही जाओगे 
यह भ्रम क्यों? 
केंचुल की ओट में छुपकर   
नाग जाति का अपमान क्यों करते हो?  
नाग बेवजह नहीं डसता 
पर तुम?
  
धोखे से कब तक धोखा दोगे   
बिल से बाहर आकर पृथक होना होगा   
छोड़ना होगा केंचुल तुम्हें   
कौन नाग, कौन मानव   
किसका केंचुल, किसका तन   
बीन बजाता संसार सारा   
वक़्त के खेल में सब हारा। 
   
ओ मानव-नाग!
कब तक बच पाओगे?   
नियति से आख़िर हार जाओगे   
समय रहते मानव बन जाओ   
अन्यथा वह होगा, जो होता है 
ज़हरीले नाग का अन्त   
सदैव क्रूर होता है।

-जेन्नी शबनम (27.11.2016)
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सोमवार, 14 नवंबर 2016

531. बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज

*******   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,  
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

देस परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

जाने कितने ख़्वाब सँजोता    
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से ख़ुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2016) 
(बाल दिवस)  
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शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

530. पुकार (क्षणिका)

पुकार

*******

हाँ! मुझे मालूम है  
एक दिन तुम याद करोगे  
मुझे पुकारोगे पर मैं नहीं आऊँगी  
चाहकर भी न आ पाऊँगी  
इसलिए जब तक हूँ क़रीब रहो
ताकि उस पुकार में ग्लानि न हो  
महज़ दूरी का गम हो

- जेन्नी शबनम (4. 11. 2016)
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बुधवार, 14 सितंबर 2016

529. हिन्दी खिलेगी (हिन्दी दिवस पर 9 हाइकु)

हिन्दी खिलेगी

***   

1.   
मन की बात   
कह पाएँ सबसे   
हिन्दी के साथ।   

2.   
हिन्दी रूठी है   
अँग्रेज़ी मातृभाषा   
बन ऐंठी है।   

3.   
सपना दिखा   
हिन्दी अब भी रोती   
आज़ादी बाद।   

4.   
हिन्दी की बोली   
मात खाती रहती   
पढ़े लिखों से।   

5.   
हिन्दी दिवस   
एक दिन का जश्न   
फिर अँधेरा।   

6.   
हमारी हिन्दी   
हमारा अभिमान   
सब दो मान।   

7.   
है इन्क़िलाब     
सब जुट जाएँ तो   
हिन्दी की शान।   

8.   
हिन्दी हँसती   
राजभाषा तो बनी,   
कहने भर।   

9.   
सुबह होगी   
देश के ललाट पे   
हिन्दी खिलेगी।   

-जेन्नी शबनम (14.9.2016)
(हिन्दी दिवस) 
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

528. देर कर दी

देर कर दी   

*******   

हाँ! देर कर दी मैंने   
हर उस काम में जो मैं कर सकती थी   
दूसरों की नज़रों में ख़ुद को ढालते-ढालते
सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने सारे हुनर दराज़ में बटोरकर रख दी   
दुनियादारी से फ़ुर्सत पाकर   
करूँगी कभी मन का।

अंतत: अब   
मैं फ़िजूल साबित हो गई
रिश्ते सहेजते-सहेजते ख़ुद बिखर गई
साबुत कुछ नहीं बचा
न रिश्ते न मैं न मेरे हुनर।

मेरे सारे हुनर   
चीख़ते-चीख़ते दम तोड़ गए  
बस एक दो जो बचे हैं   
उखड़ी-उखड़ी साँसें ले रहे हैं   
मर गए सारे हुनर के क़त्ल का
इल्ज़ाम मुझको दे रहे है
मेरे क़ातिल बन जाने का सबब
वे मुझसे पूछ रहे हैं।

हाँ! बहुत देर कर दी मैंने
दुनिया को समझने में
ख़ुद को बटोरने में
अर्धजीवित हुनर को बचाने में।   

हाँ! देर तो हो गई
पर सुबह का सूरज
अपनी आँच मुझे दे रहा है
अँधेरों की भीड़ से खींचकर मुझे
उजाला दे रहा है।

हाँ! देर तो हो गई मुझसे
पर अब न होगी   
नहीं बचा वक़्त मेरे पास अब
जो भी बच सका है रिश्ते या हुनर   
सबको एक नई उम्र दूँगी   
हाँ! अब देर न करूँगी।   

- जेन्नी शबनम (9. 9. 2016)
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बुधवार, 31 अगस्त 2016

527. शबनम (तुकांत)

शबनम   

*******   

रात चाँदनी में पिघलकर   
यूँ मिटी शबनम   
सहर को ये ख़बर नहीं थी   
कब मिटी शबनम।    

दर्द की मिट्टी का घर   
फूलों से सँवरा   
दर्द को ढकती रही पर   
दर्द बनी शबनम।     

अपनों के शहर में   
है कोई अपना नहीं   
ठुकराया आसमाँ और   
उफ़ कही शबनम।     

चाँद तारों के नगर में   
हुई जो तकरार   
आसमान से टूटकर   
तब ही गिरी शबनम।     

शब व सहर की दौड़ से   
थकी तो बहुत मगर   
वक़्त के साथ चली   
अब भी है वही शबनम।     

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2016)   
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

526. प्रलय (क्षणिका)

प्रलय   

*******   
नहीं मालूम कौन ले गया रोटी और सपनों को   
सिरहाने की नींद और तन के ठौर को   
राह दिखाते ध्रुव तारे और दिन के उजाले को    
मन की छाँव और अपनों के गाँव को,    
धधकती धरती और दहकता सूरज   
बौखलाई नदी और चीखता मौसम 
बाट जोह रहा है, मेरे पिघलने और बिखरने का   
मैं ढहूँ तो एक बात हो, मैं मिटूँ तो कोई बात हो। 

- जेन्नी शबनम (24. 8. 2016)   
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गुरुवार, 18 अगस्त 2016

525. चहकती है राखी (राखी पर 15 हाइकु) पुस्तक 80, 81

चहकती है राखी   

*******   

1.   
प्यारी बहना   
फूट-फूट के रोई   
भैया न आया   

2.   
राखी है रोई   
सुने न अफ़साना   
कैसा ज़माना   

3.   
रिश्तों की क्यारी   
चहकती है राखी   
प्यार जो शेष   

4.   
संदेशा भेजो   
आया राखी त्योहार    
भैया के पास   

5.   
मन की पीड़ा   
भैया से कैसे कहें?   
राखी तू बता    

6.   
कह न पाई   
व्याकुल बहना,   
राखी निभाना   

7.   
संदेशा भेजो   
मचलती बहना   
आएगा भैया   

8.   
बहना रोए   
प्रेम का धागा लिये,   
रिश्ते दरके   

9.   
सावन आया   
नैनों से नीर बहे   
नैहर छूटा    

10.   
मन में पीर   
मत होना अधीर   
आज है राखी   

11.   
भाई न आया   
पर्वत-सा ये मन   
फूट के रोया    

12.   
राखी का थाल   
बहन का दुलार   
राह अगोरे    

13.   
रेशमी धागा   
जोड़े मन का नाता   
नेह बढ़ाता   

14.   
सूत है कच्चा   
जोड़ता नाता पक्का   
आशीष देता    

15.   
रक्षा-कवच   
बहन ने है बाँधी   
राखी जो आई   

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2016)   
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सोमवार, 15 अगस्त 2016

524. जय भारत (स्वतंत्रता दिवस पर 10 हाइकु) पुस्तक 79, 80

जय भारत

*******   

1.   
तिरंगा झूमा    
देख जश्ने-आज़ादी,   
जय भारत!   

2.   
मुट्ठी में झंडा   
पाई-पाई माँगता  
देश का लाल।    

3.   
भारत माता  
सरेआम लुटती,   
देश आज़ाद।    

4.   
जिन्हें सौंपके   
मर मिटे थे बापू,   
देश लूटते।    

5.   
महज़ नारा   
हम सब आज़ाद,   
सोच ग़ुलाम   

6.   
रंग भी बँटा   
हरा व केसरिया   
देश के साथ    

7.   
मिटा न सका   
प्राचीर का तिरंगा   
मन का द्वेष    

8.   
सबकी चाह-  
अखंड हो भारत,   
देकर प्राण   

9.   
लगाओ नारे   
आज़ाद है वतन   
अब न हारे   

10.   
कैसे मनाए   
आज़ादी का त्यौहार,   
भूखे लाचार    

- जेन्नी शबनम (14. 8. 2016)
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सोमवार, 8 अगस्त 2016

523. उसने फ़रमाया है (तुकांत)

उसने फ़रमाया है   

*******   

ज़िल्लत का ज़हर कुछ यूँ वक़्त ने पिलाया है   
जिस्म की सरहदों में ज़िन्दगी दफ़नाया है। 

सेज पर बिछी कभी भी जब लाल सुर्ख कलियाँ   
सुहागरात की चाहत में मन भरमाया है। 

हाथ बाँधे ग़ुलाम खड़ी हैं खुशियाँ आँगन में   
जाने क्यूँ तक़दीर ने उसे आज़ादी से टरकाया है। 

हज़ार राहें दिखतीं किस डगर में मंज़िल किसकी   
डगमगाती क़िस्मत से हर इंसान घबराया है।    

'शब' के सीने में गढ़ गए हैं इश्क़ के किस्से  
कहूँ कैसे कोई ग़ज़ल जो उसने फ़रमाया है।    

- जेन्नी शबनम (8. 8. 2016)
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

522. चलो चलते हैं

चलो चलते हैं

***  

सुनो साथी!  
चलो चलते हैं नदी के किनारे ठण्डी रेत पर
पाँव को ज़रा ताज़गी दे वहीं ज़रा सुस्ताएँगे
अपने-अपने हिस्से का अबोला दर्द रेत से बाँटेंगे  
न तुम कुछ कहना न हम कुछ पूछेंगे  
अपने-अपने मन की गिरह ज़रा-सी खोलेंगे।
 
मन की गाथा  
जो हम रचते हैं काग़ज़ के सीने पर  
सारी-की-सारी पोथियाँ वहीं बहा आएँगे  
अँजुरी में जल ले संकल्प दोहराएँगे  
और अपने-अपने रास्ते पर बढ़ जाएँगे। 
  
सुनो साथी!  
चलते हैं नदी के किनारे  
ठण्डी रेत पर वहीं ज़रा सुस्ताएँगे    

-जेन्नी शबनम (4.8.2016)  
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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

521. खिड़की मर गई है (क्षणिका)

खिड़की मर गई है 

*******  

खिड़की बंद हो गई, वह बाहर नहीं झाँकती
आसमान और ताज़ी हवा से नाता टूट गया  
सूरज दिखता नही पेड़ पौधे ओट में चले गए
बेचारी खिड़की उमस से लथपथ घुट रही है
मानव को कोस रही है
खिड़की अब अँधेरों से भी नाता तोड़ चुकी है
खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
गोया खिड़की मर गई है।  

- जेन्नी शबनम (2. 8. 2016)
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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

520. अजब ये दुनिया (चोका - 8)

अजब ये दुनिया   

***  

यह दुनिया  
ज्यों अजायबघर
अनोखे दृश्य  
अद्भुत संकलन  
विस्मयकारी  
देख होते हैं स्तब्ध।   
अजब रीत  
है इस दुनिया की   
माटी की मूर्ति  
देवियाँ पूजनीय  
निरपराध  
बेटियाँ हैं जलती  
ये हैं जननी  
दुनिया जो रचती।  
कहीं क्रन्दन   
कहीं गूँजती हँसी  
कोई यतीम  
कोई है ख़ुशहाल  
कहीं महल  
कहीं धरा बिछौना  
बड़ी निराली  
गज़ब ये दुनिया।   
भूख से मृत्यु  
वेदना है अपार  
भरा भण्डार  
सम्पत्ति बेशुमार  
पर अभागा  
कोई नहीं अपना  
सब बेकार।   
धरती में दरार  
सूखे की मार  
बहा ले गया सब  
तूफ़ानी जल  
अपनी आग में ही  
जला सूरज  
अपनी रोशनी से  
नहाया चाँद  
हवा है बहकती  
आँखें मूँदती  
दुनिया चमत्कार  
रूप-संसार।   
हम इंसानों की है  
कारगुज़ारी  
हरे-घने जंगल  
हुए लाचार  
कट गए जो पेड़  
हुए उघार  
चिड़िया बेआसरा  
पानी भी प्यासा  
चेत जाओ मानव  
वरना नष्ट  
हो जाएगी दुनिया  
मिट जाएगी  
अजब ये दुनिया  
गज़ब ये दुनिया।   

-जेन्नी शबनम (28.7.2016)  
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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

519. भरोसा (क्षणिका)

भरोसा

*******

ढेरों तकनीक हैं, भरोसा जताने और तोड़ने की
सारी की सारी इस्तेमाल में लाई जाती हैं  
पर भरोसा जताने या तोड़ने के लिए
लाज़िमी है कि भरोसा हो।

- जेन्नी शबनम (21. 7. 2016)
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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

518. मैं स्त्री हूँ (पुस्तक 63)

मैं स्त्री हूँ 

*******  

मैं स्त्री हूँ  
मुझे ज़िंदा रखना उतना ही सहज है जितना सहज  
मुझे गर्भ में मार दिया जाना  
मेरा विकल्प उतना ही सरल है जितना सरल  
रंग उड़े वस्त्र को हटाकर नया परिधान खरीदना  
मैं उतनी ही बेज़रूरी हूँ  
जिसके बिना, दुनिया अपूर्ण नहीं मानी जाती  
जबकि इस सत्य से इंकार नहीं कि  
पुरुष को जन्म मैं ही दूँगी  
और हर पुरुष अपने लिए स्त्री नहीं   
धन के साथ मेनका चाहता है।    

मैं स्त्री हूँ  
उन सभी के लिए, जिनके रिश्ते के दायरे में नहीं आती  
ताकि उनकी नज़रें, मेरे जिस्म को भीतर तक भेदती रहें  
और मैं विवश होकर  
किसी एक के संरक्षण के लिए गिड़गिड़ाऊँ  
और हर मुमकिन  
ख़ुद को स्थापित करने के लिए  
किस्त-किस्त में क़र्ज़ चुकाऊँ। 
   
मैं स्त्री हूँ  
जब चाहे भोगी जा सकती हूँ  
मेरा शिकार, हर वो पुरुष करता है  
जो मेरा सगा भी हो सकता है, और पराया भी  
जिसे मेरी उम्र से कोई सरोकार नहीं  
चाहे मैंने अभी-अभी जन्म लिया हो  
या संसार से विदा होने की उम्र हो  
क्योंकि पौरुष की परिभाषा बदल चुकी है। 
   
मैं स्त्री हूँ  
इस बात की शिनाख़्त, हर उस बात से होती है  
जिसमें स्त्री बस स्त्री होती है  
जिसे जैसे चाहे इस्तेमाल में लाया जा सके  
मांस का ऐसा लोथड़ा  
जिसे सूँघकर, बौखलाया भूखा शेर झपटता है  
और भागने के सारे द्वार  
स्वचालित यन्त्र द्वारा बंद कर दिए जाते हैं
   
मैं स्त्री हूँ  
पुरुष के अट्टहास के नीचे दबी, बिलख भी नहीं सकती  
मेरी आँखों में तिरते आँसू, बेमानी माने जा सकते हैं  
क्योंकि मेरे अस्तित्व के एवज़ में, एक पूरा घर मुझे मिल सकता है  
या फिर, ज़िंदा रहने के लिए, कुछ रिश्ते और चंद सपने  
चक्रवृद्धि ब्याज से शर्त और एहसानों तले घुटती साँसें।    
क्योंकि  
मैं स्त्री हूँ।    

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2016)
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बुधवार, 29 जून 2016

517. अनुभव (क्षणिका)

अनुभव  

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दोराहे, निश्चित ही द्वन्द्व पैदा करते हैं  
एक राह छलावा का, दूसरा जीवन का  
इनमें कौन सही  
इसका पता दोनों राहों पर चलकर ही होता है  
फिर भी, कई बार अनुभव धोखा दे जाता है  
और कोई पूर्वाभास भी नहीं होता   

- जेन्नी शबनम (29. 6. 2016)  
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शनिवार, 18 जून 2016

516. मन-आँखों का नाता (4 सेदोका)

मन-आँखों का नाता  

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1.
गहरा नाता  
मन-आँखों ने जोड़ा  
जाने दूजे की भाषा,  
मन जो सोचे-  
अँखियों में झलके  
कहे सम्पूर्ण गाथा।   

2.
मन ने देखे  
झिलमिल सपने  
सारे के सारे अच्छे,  
अँखियाँ बोलें-  
सपने तो सपने  
नहीं होते अपने।   

3.  
बावरा मन  
कहा नहीं मानता  
मनमर्ज़ी करता,  
उड़ता जाता  
आकाश में पहुँचे  
अँखियों को चिढ़ाए।   

4.  
आँखें ही होती  
यथार्थ हमजोली  
देखे अच्छी व बुरी,  
मन बावरा  
आँखों को मूर्ख माने  
धोखा तभी तो खाए।  
 
-जेन्नी शबनम (18.6.2016)
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गुरुवार, 16 जून 2016

515. तय नहीं होता (तुकांत)

तय नहीं होता

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कोई तो फ़ासला है जो तय नहीं होता  
सदियों का सफ़र लम्हे में तय नहीं होता   

अजनबी से रिश्तों की गवाही क्या  
महज़ कहने से रिश्ता तय नहीं होता 

गगन की ऊँचाइयों पर सवाल क्यों  
यूँ शिकायत से रास्ता तय नहीं होता   

कुछ तो दरमियाँ दूरी रही अनकही-सी  
उम्र भर चले पर फ़ासला तय नहीं होता  

तक़दीर मिली मगर ज़रा तंग रही  
कई जंग जन्मों में तय नहीं होता   

बाख़बर भ्रम में जीती रही 'शब' हँसके  
मन की गुमराही से जीवन तय नहीं होता   

- जेन्नी शबनम (16. 6. 2016)  
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शनिवार, 4 जून 2016

514. सूरज नासपिटा (चोका - 7)

सूरज नासपिटा   

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सूरज पीला  
पूरब से निकला  
पूरे रौब से  
गगन पे जा बैठा,  
गोल घूमता  
सूरज नासपिटा  
आग बबूला  
क्रोधित हो घूरता,  
लावा उगला  
पेड़-पौधा जलाए  
पशु-इंसान  
सब छटपटाए  
हवा दहकी  
धरती भी सुलगी  
नदी बहकी  
कारे बदरा ने ज्यों  
ली अँगड़ाई  
सावन घटा छाई  
सूरज चौंका  
''मुझसे बड़ा कौन?  
मुझे जो ढका'',  
फिर बदरा हँसा  
हँस के बोला-  
''सुनो, सावन आया  
मैं नहीं बड़ा  
प्रकृति का नियम  
तुम जलोगे  
जो आग उगलोगे  
तुम्हें बुझाने  
मुझे आना ही होगा'',  
सूरज शांत  
मेघ से हुआ गीला  
लाल सूरज  
धीमे-धीमे सरका  
पश्चिम चला  
धरती में समाया  
गहरी नींद सोया।  

-जेन्नी शबनम (20.5.2016)  
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शुक्रवार, 20 मई 2016

513. इश्क़ की केतली

इश्क़ की केतली

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इश्क़ की केतली में  
पानी-सी औरत 
और चाय पत्ती-सा मर्द  
जब साथ-साथ उबलते हैं
चाय की सूरत  
चाय की सीरत  
नसों में नशा-सा पसरता है  
पानी-सी औरत का रूप  
बदल जाता है चाय पत्ती-से मर्द में  
और मर्द घुलकर  
दे देता है अपना सारा रंग  
इश्क़ ख़त्म हो जाए  
मगर हर कोशिशों के बावजूद  
पानी-सी अपनी सीरत   
नहीं बदलती औरत  
मर्द अलग हो जाता है  
मगर उसका रंग खो जाता है  
क्योंकि इश्क़ की केतली में  
एक बार  
औरत मर्द मिल चुके होते हैं।  

- जेन्नी शबनम (20. 5, 2016)
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रविवार, 8 मई 2016

512. माँ (मातृ दिवस पर 5 हाइकु) पुस्तक 79

माँ

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1.  
छोटी-सी परी  
माँ का अँचरा थामे  
निडर खड़ी   

2.  
पराई कन्या  
किससे कहे व्यथा  
लाचार अम्मा   

3.  
पीड़ा भी पाता  
नेह ही बरसाता  
माँ का हृदय    

4.  
अम्मा की गोद  
छूमंतर हो जाता  
सारा ही सोग   

5.  
अम्मा लाचार  
प्यार बाँटे अपार  
देख संतान   

- जेन्नी शबनम (8. 5. 2016)
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रविवार, 1 मई 2016

511. कैसी ये तक़दीर (क्षणिका)

कैसी ये तक़दीर

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बित्ते भर का जीवन कैसी ये तक़दीर
नन्ही-नन्ही हथेली पर भाग्य की लकीर
छोटी-छोटी ऊँगलियों में चुभती है हुनर की पीर
बेपरवाह दुनिया में सब ग़रीब सब अमीर
आख़िर हारी आज़ादी बँध गई मन में ज़ंजीर
कहाँ कौन देखे दुनिया मर गए सबके ज़मीर 

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2016)
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