विचित्र वक़्त
***
1.
ख़ूब नचाता
साँसें न लेने देता
वक़्त का ये पहिया
वक़्त का ये पहिया
सब बेज़ार,
ख़ुद पर भरोसा
सबका बेड़ा पार।
ख़ुद पर भरोसा
सबका बेड़ा पार।
2.
वक़्त की बेड़ी
पुरज़ोर जकड़
ठहरी-सी ज़िन्दगी
बँधे हैं पाँव,
स्व-सम्बल बनना
टूटेगी फिर बेड़ी।
बँधे हैं पाँव,
स्व-सम्बल बनना
टूटेगी फिर बेड़ी।
3.
मन की पीर
वक़्त का मलहम
वक़्त का मलहम
जीवन होता सुखी,
वक़्त का रुख़
कैक्टस-सा कँटीला
घायल होती आत्मा।
घायल होती आत्मा।
4.
घाव भी देता
फिर ख़ुद भरता
वक़्त बड़ा विचित्र,
जब वो चाहे
बन जाए औषधि
कभी बने औज़ार।
-जेन्नी शबनम (20.9.2026)
____________________
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें