शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

814. विचित्र वक़्त (4 सेदोका)

विचित्र वक़्त 

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1.  

ख़ूब नचाता 
साँसें न लेने देता 
वक़्त का ये पहिया
सब बेज़ार,
ख़ुद पर भरोसा
सबका बेड़ा पार। 

2. 
वक़्त की बेड़ी 
पुरज़ोर जकड़
ठहरी-सी ज़िन्दगी  
बँधे हैं पाँव,
स्व-सम्बल बनना
टूटेगी फिर बेड़ी। 

3.
मन की पीर
वक़्त का मलहम
जीवन होता सुखी,
वक़्त का रुख़ 
कैक्टस-सा कँटीला 
घायल होती आत्मा।

4.
घाव भी देता 
फिर ख़ुद भरता 
वक़्त बड़ा विचित्र, 
जब वो चाहे  
बन जाए औषधि 
कभी बने औज़ार। 

-जेन्नी शबनम (20.9.2026)
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