लम्हों का सफ़र

मन की अभिव्यक्ति का सफ़र

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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

88. शब ने पाले ही नहीं थे (तुकान्त) / shab ne paale hi nahin theye (tukaant)

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शब ने पाले ही नहीं थे ******* कुछ लम्हे ऐसे रूठ गए हैं, जैसे साथ कभी हम जिए ही नहीं थे यूँ कि कोई साथी छूट जाए, जैसे साथ कभी हम चले ही...
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डॉ. जेन्नी शबनम
नई दिल्ली / भागलपुर / कोठियाँ (शिवहर), दिल्ली / बिहार, India
'ये मन की अभिव्यक्ति का सफ़र है, जो प्रति-पल मन में उपजता है...' -जेन्नी शबनम
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