सोमवार, 15 जुलाई 2019

620. वर्षा (10 ताँका)

वर्षा (10 ताँका)   

*******   

1.
तपती धरा   
तन भी तप उठा   
बदरा छाए   
घूम-घूम गरजे   
मन का भौंरा नाचे।   

2.   
कूकी कोयल   
नाचे है पपीहरा   
देख बदरा   
चहके है बगिया   
नाचे घर अँगना।   

3.   
ओ रे बदरा   
कितना तड़पाया   
अब तू माना   
तेरे बिना अटकी   
संसार की मटकी।   

4.   
गाए मल्हार   
घनघोर घटाएँ   
नभ मुस्काए   
बूँदें खूब झरती   
रिमझिम फुहार।   

5.   
बरसा पानी   
याद आई है नानी   
है अस्त व्यस्त   
जीवन की रफ्तार   
जलमग्न सड़कें।   

6.   
पौधे खिलते   
किसान हैं हँसते   
वर्षा के संग   
मन मयूरा नाचे   
बूंदों के संग-संग।   

7.   
झूमती धरा   
झूमता है गगन   
आई है वर्षा   
लेकर ठंडी हवा   
खिल उठा चमन।   

8.   
घनी प्रतीक्षा   
अब जाकर आया   
मेघ पाहुन   
चाय संग पकौड़ी   
पहुना संग खाए।   

9.   
पानी बरसा   
झर-झर झरता   
जैसे झरना,   
सुन मेरे बदरा   
मन हुआ बावरा।   

10.   
हे वर्षा रानी   
यूँ रूठा मत करो   
आ जाया करो   
रवि से लड़कर   
बरसो जमकर।   

- जेन्नी शबनम (6. 7. 2019)   

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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

619. जीवन-पथ (चोका)

जीवन-पथ (चोका)   

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जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से   
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अन्धेरा   
डर-डर के   
कदम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
खुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता !   

- जेन्नी शबनम (8. 6. 2019) 

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सोमवार, 1 जुलाई 2019

618. सरमाया

सरमाया   

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ये कैसा दौर आया है   
पहर-पहर भरमाया है   
कुछ माँगू तो ईमान मरे   
न माँगू तो ख़्वाब मरे   
किस्मत से धक्का मुक्की   
पोर-पोर घबराया है   
जद्दोज़हद में युग बीते   
यही मेरा सरमाया है।   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2019)   

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सोमवार, 17 जून 2019

617. कड़ी

कड़ी   

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अतीत की एक कड़ी   
मैं खुद हूँ   
मन के कोने में, सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने पिता को जीवित रखा है   
जब-जब हारती हूँ   
जब-जब अपमानित होती हूँ   
अँधेरे में सुबकते हुए, पापा से जा लिपटती हूँ   
खूब रोती हूँ, खूब गुस्सा करती हूँ   
जानती हूँ पापा कहीं नहीं   
थक कर ख़ुद ही चुप हो जाती हूँ   
यह भूलती नहीं, कि रोना मेरे लिए गुनाह है   
चेहरे पे मुस्कान, आँखों पर चश्मा   
सब छुप जाता है जमाने से   
पर हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा   
सिमटती जा रही हूँ, मिटती जा रही हूँ   
जीने की आरज़ू, जीने का हौसला   
सब शेष हो चुका है   
न रिश्ते साथ देते हैं, न रिश्ते साथ चलते हैं   
दर्द की ओढ़नी, गले में लिपटती है   
पिता की बाँहें, कभी रोकने नहीं आतीं   
नितांत अकेली मैं   
अपनों द्वारा कतरे हुए परों को, सहलाती हूँ   
कभी-कभी चुपचाप   
फेविकोल से परों को चिपकाती हूँ   
जानती हूँ, यह खेल है, झूठी आशा है   
पर मन बहलाती हूँ   
हार अच्छी नहीं लगती मुझे   
इसलिए जोर से ठहाके लगाती हूँ   
जीत का झूठा सच सबको बताती हूँ   
बस अपने पापा को सब सच बताती हूँ   
जोर से ठहाके लगाती हूँ   
मन बहलाती हूँ!   

- जेन्नी शबनम (17. 6. 2019)   
(पितृ-दिवस पर) 
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गुरुवार, 13 जून 2019

616. यूँ ही आना यूँ ही जाना

यूँ ही आना यूँ ही जाना   

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अपनी पीर छुपाकर जीना   
मीठे कह के आँसू पीना   
ये दस्तूर निभाऊँ कैसे   
जिस्म है घायल छलनी सीना।   

रिश्ते नाते निभ नहीं पाते   
करें शिकायत किस की किस से   
गली चौबारे खुद में सिमटे   
दरख़्त हुए सब टुकड़े-टुकड़े।   

मृदु भावों की बली चढ़ाकर   
मतलबपरस्त हुई ये दुनिया   
खिदमत में मिट जाओ भी गर   
कहेगी किस्मत सोई ये दुनिया।   

बेगैरत हूँ कहेगी दुनिया   
खिदमत न कर खुद को सँवारा   
साथ नहीं कोई ब्रम्ह या बाबा   
पीर पैगम्बर नहीं सहारा।   

पीर पराई कोइ न समझे   
मर-मर के छोड़े कोई जीना   
ख़त्म करो अब हर ताल्लुक को   
मंत्र ये जीवन का दोहराना   
यूँ ही अब दुनिया में रहना   
यूँ ही अब दुनिया से जाना   
ख़त्म करो अब हर ताल्लुक को   
मंत्र ये जीवन का दोहराना।   

- जेन्नी शबनम (12. 6. 2019)   

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शुक्रवार, 7 जून 2019

615. नहीं आता

नहीं आता   

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ग़ज़ल नहीं कहती   
यूँ कि मुझे कहना नहीं आता   
चाहती तो हूँ मगर   
मन का भेद खोलना नहीं आता।   

बसर तो करनी है पर   
शहर की आवो हवा बेगानी लगती   
रूकती हूँ समझती हूँ   
पर दम भर कर रोना नहीं आता।   

सफर में अब जो भी मिले   
मुमकिन है मंजिल मिले न मिले   
परवाह नहीं पाँव छिल गए   
दमभर भी हमें ठहरना नहीं आता।   

मायूसी मन में पलती रही   
अपनों से जख्म जब भी गहरे मिले   
कोशिश की थी कि तन्हा चलूँ   
पर अपने साथ जीना नहीं आता।   

यादों के जंजाल में उलझ के   
बिसुराते रहे हम अपने आज को   
हँस-हँस के गम को पीना होता   
पर 'शब' को यूँ हँसना नहीं आता।   

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2019)   

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शनिवार, 1 जून 2019

614. नज़रबंद

नज़रबंद   

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ज़िन्दगी मुझसे भागती रही   
मैं दौड़ती रही, पीछा करती रही   
एक दिन आख़िर वो पकड़ में आई   
खुद ही जैसे मेरे घर में आई   
भागने का सबब पूछा मैंने   
झूठ बोल बहला दिया मुझे,   
मैं अपनी खामी ढूँढती रही   
आख़िर ऐसी क्या कमी थी   
जो जिन्दगी मुझसे कह गई   
मेरी सोच मेरी उम्र या फिर जीने का शऊर   
हाँ! भले मैं बेशऊरी   
पर वक्त से जो सीखा वैसे ही तो जिया मैंने   
फिर अब ?   
आजीज आ गई ज़िन्दगी   
एक दिन मुझे प्रेम से दुलारा, मेरे मन भर मुझे पुचकारा   
हाथों में हाथ लिए मेरे, चल पड़ी झील किनारे   
चाँद तारों की बात, फूल और खूश्बू थी साथ   
भूला दिया मैंने उसका छल   
आँखें मूँद काँधे पे उसके रख दिया सिर   
मैं जिन्दगी के साथ थी   
नहीं-नहीं मैं अपने साथ थी   
फिर हौले से उसने मुझे झिंझोड़ा   
मैंने आँख मूँदे मुस्कुरा कर पूछा -   
बोलो ज़िन्दगी, अब तो सच बताओ   
क्यों भागती रहीं तुम तमाम उम्र   
मैं तुम्हारा पीछा करती रही ताउम्र   
जब भी तुम पकड में आई   
तुमने स्वप्नबाग दिखा मुझसे पीछा छुड़ाया,   
फिर ज़िन्दगी ने मेरी आँखों में देखा   
कहा कि मैं झील की सुन्दरता देखूँ   
अपना रूप उसमें निहारूँ,   
मैं पागल फिर से छली गई   
आँखें खोल झील में खुद को निहारा   
मेरी ज़िन्दगी ने मुझे धकेल दिया   
सदा के लिए उस गहरी झील में   
बहुत प्रेम से बड़े धोखे से,   
अब मैं झील में नज़रबंद हूँ   
ज़िन्दगी की बेवफाई से रंज हूँ   
अब न ज़िन्दगी का कारोबार होगा   
न ज़िन्दगी से मुलाकात होगी   
अब कौन सुनेगा मुझको कभी   
न किसी से बात होगी !   

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2019)   

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बुधवार, 1 मई 2019

613. अधिकार और कर्त्तव्य

अधिकार और कर्त्तव्य   

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अधिकार है तुम्हें   
कर सकते हो तुम   
हर वह काम जो जायज नहीं है   
पर हमें इजाजत नहीं कि   
हम प्रतिरोध करें,   
कर्तव्य है हमारा   
सिर्फ वह बोलना   
जिससे तुम खुश रहो   
भले हमारी आत्मा मर जाए,   
इस अधिकार और कर्तव्य को   
परिभाषित करने वाले तुम   
हमें धर्म का वास्ता देते हो   
और स्वयं अधर्म करते रहते हो।   
तुम्हारे अहंकार के बाण से   
हमारी साँसें छलनी हो चुकी हैं   
हमारी रगों का रक्त   
जमकर काला पड़ गया है   
तुम्हारा पेट भरने वाले हम   
तुम्हारे सामने हाथ जोड़े, भूख से मर रहे हैं   
और तुम हो कि हमसे धर्म-धर्म खेल रहे हो   
हमें आपस में लड़ा कर सत्ता-सत्ता खेल रहे हो।   
तुमने बतलाया था कि   
मुक्ति मिलेगी हमें, पूर्व जन्म के पापों से   
गर मंदिर मस्जिद को हम, अपना देह दान करें   
तुम्हारे बताए राहों पर चलकर, तुम्हारा सम्मान करें।   
अब हमने सब कुछ है जाना   
सदियों बाद तुम्हें है पहचाना   
हमें मुक्ति नहीं मिली   
न रावण वध से   
न गीता दर्शन से   
न तुम्हारे सम्मान से   
न अपने आत्मघात से।   
युगों-युगों से त्रासदी झेलते हम   
तुम्हारे बतलाए धर्म को अब नकार रहे हैं   
तुमने ही सारे विकल्प छीने हैं हमसे   
अब हम अपना रुख़ मोड़ रहे हैं,   
बहुत सहा है अपमान हमने   
नहीं है अब कोई फरियाद तुमसे   
तुम्हारे हर वार का अब जवाब होगा   
जुड़े हाथों से अब वार होगा।   
हमारे बल पर जीने वाले   
अब अपना तुम अंजाम देखो   
तुम होशियार रहो, तुम तैयार रहो   
अब आर या पार होगा   
जो भी होगा सरेआम होगा।   
इंकलाब का नारा है   
सिर्फ तुम्हारा नहीं   
हिन्दुस्तान हमारा है।   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2019)   
(मज़दूर दिवस)
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रविवार, 31 मार्च 2019

612. प्रकृति (20 हाइकु)

प्रकृति 
(20 हाइकु)   

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1.   
प्यार मिलता   
तभी खिलखिलाता   
प्रकृति-शिशु।   

2.   
अद्भुत लीला   
प्रकृति प्राण देती   
संस्कृति जीती।   

3.   
प्रकृति हँसी   
सुहावना मौसम   
खिलखिलाया।   

4.   
धोखा पाकर   
प्रकृति यूँ ठिठकी   
मानो लड़की।   

5.   
कृत संकल्प   
प्रकृति का वंदन   
स्वस्थ जीवन।   

6.   
मत रूलाओ,   
प्रकृति का रूदन   
ध्वस्त जीवन।   

7.   
प्रकृति क्रुद्ध,   
प्रलय है समीप   
हमारा कृत्य।   

8.   
रंग बाँटती   
प्रकृति रंगरेज़   
मनभावन।   

9.   
मौसमी हवा   
नाचती गाती चली   
प्रकृति ख़ुश।   

10.   
घना जंगल   
लुभावना मौसम   
प्रकृति नाची।   

11.   
धूल व धुआँ   
थकी हारी प्रकृति   
बेदम साँसें।   

12.   
साँसें उखड़ी   
अधमरी प्रकृति,   
मानव दैत्य।   

13.   
खंजर भोंका   
मर गई प्रकृति   
मानव खूनी।   

14.   
खेत बेहाल   
प्रकृति का बदला   
सूखा तालाब।   

15.   
सुकून देती   
गहरी साँस देती   
प्रकृति देवी।   

16.   
बड़ा सताया   
कलंकित मानव,   
प्रकृति रोती।   

17.   
सखी सहेली   
ऋतुएँ व प्रकृति   
दुख बाँटती।   

18.   
हरी ओढ़नी   
भौतिकता ने छीनी   
प्रकृति नंगी।   

19.   
किससे बाँटें   
मुरझाई प्रकृति   
अपनी व्यथा।   

20.
जी भरके लूटा
प्रकृति को दुत्कारा
लोभी मानव।   

- जेन्नी शबनम (29. 3. 2019)   

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गुरुवार, 28 मार्च 2019

611. जीवन मेरा (चोका)

जीवन मेरा (चोका)   

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मेरे हिस्से में   
ये कैसा सफ़र है   
रात और दिन   
चलना जीवन है,   
थक जो गए   
कहीं ठौर न मिला   
चलते रहे   
बस चलते रहे,   
कहीं न छाँव   
कहीं मिला न ठाँव   
बढते रहे   
झुलसे मेरे पाँव,   
चुभा जो काँटा   
पीर सह न पाए   
मन में रोए   
सामने मुस्कुराए,   
किसे पुकारें   
मन है घबराए   
अपना नहीं   
सर पे साया नहीं,   
सुख व दु:ख   
आँखमिचौली खेले   
रोके न रुके   
तंज हमपे कसे,   
अपना सगा   
हमें छला हमेशा   
हमारी पीड़ा   
उसे लगे तमाशा,   
कोई पराया   
जब बना अपना   
पीड़ा सुन के   
संग-संग वो चला,   
किसी का साथ   
जब सुकून देता   
पाँव खींचने   
जमाना है दौड़ता,   
हमसफर   
काश ! कोई होता   
राह आसान   
सफर पूरा होता,   
शाप है हमें   
कहीं न पहुँचना   
अनवरत   
चलते ही रहना।   
यही जीवन मेरा।   

- जेन्नी शबनम (26. 3. 2019)   

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