Monday 13 May 2013

405. माँ

 माँ 

*******

1.
जिससे सीखा 
सहनशील होना, 
वो है मेरी माँ ! 

2.
माँ-सी है छवि 
मुझमें बसी है माँ  
माँ देती रूप ! 

3.
स्त्री है जननी 
रच दिया संसार 
पर लाचार ! 

4.
हर नारी माँ 
हर बेटी होती माँ 
मुझमें भी माँ ! 

5.
हर माँ देती 
सूरज-सी रोशनी 
निःस्वार्थ भाव ! 

6.
रचा संसार 
मानी गई बेकार 
जाने क्यों नारी ? 

7.
धरा-सी धीर 
बन कोख की ढ़ाल 
प्रेम लुटाती !

8.
माँ की ममता 
ब्रह्मांड है समाया 
ओर न छोर ! 

9.
प्यार लुटाती  
प्यार को तरसती  
पीर लिए माँ ! 

10.
उसने छला 
जिसके लिए मिटी
उसकी वो माँ ! 

11.
एक ही दिन 
क्यों याद आती है वो ?
जो जन्म देती ! 

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2013)

(मातृ दिवस पर ) 

________________________________

Sunday 5 May 2013

404. तुम्हारा 'कहा'


तुम्हारा 'कहा'

******* 

जानती हूँ 
तुम्हारा 'कहा' 
मुझसे शुरू होकर 
मुझ पर ही ख़त्म होता है, 
उस कहा में 
क्या कुछ शामिल नहीं होता 
प्यार 
मनुहार 
जिरह 
आरोप 
सरोकार 
संदेह 
शब्दों के डंक,
तुम जानते हो 
तुम्हारी इस सोच ने 
मुझे तोड़ दिया है 
खुद से भी नफरत करने लगी हूँ
और  
सिर्फ इस लिए मर जाना चाहती हूँ 
ताकि 
मेरे न होने पर 
तुम्हारा ये 'कहा'
तुम किसी से कह न पाओ 
और  
तुमको घुटन हो  
तुम्हारी सोच 
तुमको ही बर्बाद करे 
तुम रोओ  
किसी 'उस' के लिए 
जिसे अपना 'कहा' सुना सको 
जानती हूँ 
मेरी जगह कोई न लेगा 
तुम्हारा 'कहा' 
अनकहा बनकर तुमको दर्द देगा 
और तब आएगा मुझे सुकून,
जब भी मैंने तुमसे कहा कि
तुम्हारा ये 'कहा' मुझे चुभता है 
न बोलो 
न सोचो ऐसे 
हमेशा तुम कहते हो - 
तुम्हें न कहूँ तो भला किससे 
एक तुम ही तो हो 
जिस पर मेरा अधिकार है 
मेरा मन 
प्रेम करूँ 
या जो मर्जी 
कहा करूँ !

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2013)

_________________________________

Wednesday 1 May 2013

403. औकात देखो...


औकात देखो...

*******

पिछला जन्म  
पाप की गठरी   
धरती पर बोझ  
समाज के लिए पैबंद   
यह सब सुन कर भी  
मुँह उठाए  
तुम्हें ही अगोरा 
मन टूटा  
पर तुम्हें ही देखा  
असाध्य तुम  
पर जीने की सहूलियत तुमसे 
मालूम है मुझे    
मेरी पैदाइश हुई ही है 
उन कामों को करने के लिए   
जो निकृष्ट हैं  
जिसे करना  
तुम अपनी शान के ख़िलाफ़ मानते हो  
या तुम्हारी औकात से परे हैं  
काम करना मेरा स्वभाव है  
मेरी पूँजी भी है  
और मेरा धर्म भी  
फिर भी  
मैं भाग्यहीन 
मैं बेगैरत 
मैं कृतघ्न 
मैं फ़िज़ूल 
जान लो तुम   
मैंने अपना सारा वक़्त दिया है तुम्हें 
ताकि तुम चैन से आँखें मूँद सो सको  
हर प्रहार को अपने सीने पर झेला है 
ताकि तुम सुरक्षित रह सको   
पसीने से लिजबिज मेरा बदन 
चौबीसों पहर  
सिर्फ तुम्हारे लिए खटा है  
ताकि तुम मनचाही ज़िंदगी जी सको     
कभी चैन के पल नहीं ढूँढ़े मैंने  
कभी नहीं कहा कि 
ज़रा देर को रुकने दो 
होश संभालने से लेकर  
जिस्म की ताकत खोने तक 
दुनिया का बोझ उठाया है मैंने  
अट्टालिकएँ मुझे जानती हैं  
मेरे बदन का खून चखा है उसने  
लहलहाती फसलें मेरी सखा है  
मुझसे ही पानी पीती हैं   
फुलवारी के फूल  
अपनी सुगंध की उत्कृष्टता  
मुझसे ही पूछते हैं  
मेरे बिना तुम सब  
अपाहिज हो 
तुम बेहतर जानते हो   
एक पल को अगर रुक जाऊँ 
दुनिया थम जाएगी      
चंद मुट्ठी भर तुम सब  
मेरे ही बल पर शासन करते हो  
फिर भी कहते - 
''अपनी औकात देखो...!'' 

- जेन्नी शबनम (मई 1, 2013) 
(मजदूर दिवस पर) 

__________________________________

Friday 26 April 2013

402. जन्म का खेल

जन्म का खेल 

*******

1.
हर जन्म में 
तलाशती ही रही 
ज़रा-सी नेह !

2.
प्रतीक्षारत 
एक नए युग की 
कई जन्मों से !

3.
परे ही रहा 
समझ से हमारे 
जन्म का खेल !

4.
जन्म के साथी 
हो ही जाते पराए
जग की रीत !

5.
रोज़ जन्मता 
पल-पल मर के 
है वो इंसान !

6.
शाश्वत खेल 
न चाहें पर खेलें 
जन्म-मरण !

7.
जितना सच 
है जन्म, मृत्यु भी है 
उतना सच !

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2013)

_____________________________
  

Wednesday 24 April 2013

401. अब तो जो बचा है...

अब तो जो बचा है...

*******

दो राय नहीं 
अब तक कुछ नहीं बदला था  
न बदला है 
न बदलेगा, 
सभ्यता का उदय 
और संस्कार की प्रथाएँ 
युग परिवर्तन और उसकी कथाएँ
आज़ादी का जंग और वीरता की गाथाएँ 
एक-एक कर सब बेमानी 
शिक्षा-संस्कार-संस्कृति 
घर-घर में दफ़न, 
क्रान्ति-गीत 
क्रान्ति की बातें 
धर्म-वचन 
धार्मिक-प्रवचन 
जैसे भूखे भेड़ियों ने खा लिए
और उनकी लाश को
मंदिर मस्जिद पर लटका दिया, 
सामाजिक व्यवस्थाएँ 
जो कभी व्यवस्थित हुई ही नहीं 
सामाजिक मान्यताएँ
चरमरा गई 
नैतिकता 
जाने किस सदी की बात थी 
जिसने शायद किसी पीर के मज़ार पर 
दम तोड़ दिया था, 
कमजोर क़ानून 
खुद ही जैसे हथकड़ी पहन खड़ा है 
अपनी बारी की प्रतीक्षा में 
और कहता फिर रहा है  
आओ और मुझे लूटो खसोटो
मैं भी कमजोर हूँ  
उन स्त्रियों की तरह 
जिन पर बल प्रयोग किया गया
और दुनिया गवाह है
सज़ा भी स्त्री ने ही पाई, 
भरोसा 
अपनी ही आग में लिपटा पड़ा है
बेहतर है वो जल ही जाए 
उनकी तरह जो हार कर खुद को मिटा लिए 
क्योंकि उम्मीद का एक भी सिरा न बचा था
न जीने के लिए 
न लड़ने के लिए,
निश्चित ही  
पुरुषार्थ की बातें 
रावण के साथ ही ख़त्म हो गई 
जिसने छल तो किया
लेकिन अधर्मी नहीं बना  
एक स्त्री का मान तो रखा,
अब तो जो बचा है
विद्रूप अतीत  
विक्षिप्त वर्तमान 
और 
लहुलुहान भविष्य 
और इन सबों की साक्षी 
हमारी मरी हुई आत्मा ! 

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2013)

____________________________________

Sunday 21 April 2013

400. रात

रात

*******

1.
चाँद न आया 
रात की बेकरारी
बहुत भारी !

2.
रात शर्माई 
चाँद का आलिंगन 
पूरनमासी ! 

3.
रोज़ जागती 
तन्हा रात अकेली 
दुनिया सोती !

4.
चन्दा के संग
रोज़ रात जागती 
सब हैं सोए ! 

5.
जाने किधर  
भटकती रही नींद 
रात गहरी !

6. 
चाँद जो सोया 
करवट ले कर 
रात है रूठी !

7.
चाँद को जब  
रात निगल गई 
चाँदनी रोई !
8.
हिस्से की नींद 
सदियों बाद मिली 
रात है सोई !

9.
रात जागती 
सोई दुनिया सारी 
मन है भारी !

10.
अँधेरी रात 
है चाँद सितारे की 
बैठक आज ! 

11.
काला-सा टीका 
रात के माथे पर 
कृष्ण पक्ष में !

- जेन्नी शबनम (2. 4. 2013)

________________________

Wednesday 17 April 2013

इलज़ाम न दो...


इलज़ाम न दो...

*******

आरोप निराधार नहीं 
सचमुच तटस्थ हो चुकी हूँ 
संभावनाओं की सारी गुंजाइश मिटा रही हूँ 
जैसे रेत पे ज़िंदगी लिख रही हूँ
मेरी नसों का लहू आग में लिपटा पड़ा है 
पर मैं बेचैन नहीं
जाने किस मौसम का इंतज़ार है मुझे?
आग के राख में बदल जाने का 
या बची संवेदनाओं से 
प्रस्फुटित कविता का
कराहती हुई 
इंसानी हदों से दूर चली जाने का
शायद इंतज़ार है 
उस मौसम का जब 
धरती के गर्भ की रासायनिक प्रक्रिया 
मेरे मन में होने लगे 
तब न रोकना मुझे न टोकना 
क्या मालूम 
राख में कुछ चिंगारी शेष हो 
जो तुम्हारे जुनून की हदों से वाकिफ हों
और ज्वालामुखी-सी फट पड़े 
क्या मालूम मुझ पर थोपी गई लाँछन की तहरीर 
बदल दे तेरे हाथों की लकीर
बेहतर है 
मेरी तटस्थता को इलज़ाम न दो
मेरी ख़ामोशी को आवाज़ न दो
एक बार 
अपने गिरेबान में झाँक लो ! 

- जेन्नी शबनम (फरवरी 21, 2013)

_______________________________________________

Friday 5 April 2013

माहिया

माहिया 
(माहिया लिखने की पहली कोशिश)

*******

1.
जाने क्या लाचारी   
कोई ना समझे    
मन फिर भी है भारी !  

2.
सन्देशा आज मिला  
उनके आने का 
मन में है फूल खिला !

3.
दुनिया भरमाती है  
है अजब पहेली   
समझ नहीं आती है !

4.
मैंने दीप जलाया   
जब भी तू आया 
मन ने झूमर गाया  ! 

5.
चुपचाप हवा आती 
थपकी यूँ देती  
ज्यों लोरी है गाती !

- जेन्नी शबनम (3. 4. 2013)

____________________________