Wednesday 24 August 2016

526. प्रलय...

प्रलय...   

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नहीं मालूम कौन ले गया   
रोटी को और सपनों को   
सिरहाने की नींद को   
और तन के ठौर को   
राह दिखाते ध्रुव तारे को   
और दिन के उजाले को    
मन की छाँव को   
और अपनो के गाँव को    
धधकती धरती और दहकता सूरज   
बौखलाई नदी और चीखता मौसम   
बाट जोह रहा है   
मेरे पिघलने का   
मेरे बिखरने का   
मैं ढहूँ तो एक बात हो   
मैं मिटूँ तो कोई बात हो !   

- जेन्नी शबनम (24. 8. 2016)   

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Thursday 18 August 2016

525. चहकती है राखी (राखी पर 15 हाइकु)

चहकती है राखी   

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1.   
प्यारी बहना   
फूट-फूट के रोई   
भैया न आया !   

2.   
राखी है रोई   
सुने न अफ़साना   
कैसा ज़माना !   

3.   
रिश्तों की क्यारी   
चहकती है राखी   
प्यार जो शेष !   

4.   
संदेशा भेजो   
आया राखी त्यौहार   
भैया के पास !   

5.   
मन की पीड़ा   
भैया से कैसे कहें?   
राखी तू बता !   

6.   
कह न पाई   
व्याकुल बहना,   
राखी निभाना !   

7.   
संदेशा भेजो   
मचलती बहना   
आएगा भैया !   

8.   
बहना रोए   
प्रेम का धागा लिये,   
रिश्ते दरके !   

9.   
सावन आया   
नैनों से नीर बहे   
नैहर छूटा !   

10.   
मन में पीर   
मत होना अधीर   
आज है राखी !   

11.   
भाई न आया   
पर्वत-सा ये मन   
फूट के रोया !   

12.   
राखी का थाल   
बहन का दुलार   
राह अगोरे !   

13.   
रेशमी धागा   
जोड़े मन का नाता   
नेह बढ़ाता !   

14.   
सूत है कच्चा   
जोड़ता नाता पक्का   
आशीष देता !   

15.   
रक्षा-कवच   
बहन ने है बाँधी   
राखी जो आई !   

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2016)   

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Monday 15 August 2016

524. जय भारत ! (स्वतंत्रता दिवस पर 10 हाइकु)

जय भारत !

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1.   
तिरंगा झूमा    
देख आज़ादी का जश्न,   
जय भारत !   

2.   
मुट्ठी में झंडा   
पाई-पाई माँगता  
देश का लाल !   

3.   
भारत माता  
सरेआम लुटती,   
देश आज़ाद !   

4.   
जिन्हें सौंप के   
मर मिटे थे बापू,   
देश लूटते !   

5.   
महज़ नारा   
हम सब आज़ाद,   
सोच गुलाम !   

6.   
रंग भी बँटा   
हरा व केसरिया   
देश के साथ !   

7.   
मिटा न सका   
प्राचीर का तिरंगा   
मन का द्वेष !   

8.   
सबकी चाह -  
अखंड हो भारत,   
देकर प्राण !   

9.   
लगाओ नारे   
आज़ाद है वतन   
अब न हारे !   

10.   
कैसे मनाए   
आज़ादी का त्यौहार,   
भूखे लाचार !   

- जेन्नी शबनम (14. 8. 2016)

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Monday 8 August 2016

523. उसने फ़रमाया है

उसने फ़रमाया है   

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ज़िल्लत का ज़हर कुछ यूँ वक़्त ने पिलाया है   
जिस्म की सरहदों में ज़िन्दगी दफ़नाया है !   

सेज पर बिछी कभी भी जब लाल सुर्ख कलियाँ   
सुहागरात की चाहत में मन भरमाया है !   

हाथ बाँधे गुलाम खड़ी हैं खुशियाँ आँगन में   
जाने क्यूँ तक़दीर ने उसे आज़ादी से टरकाया है !   

हज़ार राहें दिखती किस डगर में मंज़िल किसकी   
डगमगाती किस्मत से हर इंसान घबराया है !   

'शब' के सीने में गढ़ गए हैं इश्क के किस्से  
कहूँ कैसे कोई ग़ज़ल जो उसने फ़रमाया है !   

- जेन्नी शबनम (8. 8. 2016)

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Thursday 4 August 2016

522. चलो चलते हैं...

चलो चलते हैं...

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सुनो साथी  
चलो चलते हैं
नदी के किनारे
ठंडी रेत पर
पाँव को ज़रा ताज़गी दे
वहीं ज़रा सुस्ताएँगे
अपने-अपने हिस्से का
अबोला दर्द  
रेत से बाँटेंगे  
न तुम कुछ कहना  
न हम कुछ पूछेंगे  
अपने-अपने मन की गिरह  
ज़रा-सी खोलेंगे  
मन की गाथा  
जो हम रचते हैं  
काग़ज़ के सीने पर  
सारी की सारी पोथियाँ  
वहीं आज बहा आएँगे  
अँजुरी में जल ले  
संकल्प दोहराएँगे  
और अपने-अपने रास्ते पर  
बढ़ जाएँगे  
सुनो साथी  
चलते हैं  
नदी के किनारे  
ठंडी रेत पर  
वहीं ज़रा सुस्ताएँगे !  

- जेन्नी शबनम (4. 8. 2016)  

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Tuesday 2 August 2016

521. खिड़की मर गई है...

खिड़की मर गई है...  

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खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
वह अब बाहर नहीं झाँकती  
ताज़े हवा से नाता टूट गया  
सूरज अब दिखता नही  
पेड़ पौधे ओट में चले गए  
बिचारी खिड़की  
उमस से लथपथ  
घुट रही है  
मानव को कोस रही है  
जिसने  
उसके आसमान को ढँक दिया है  
खिड़की उजाले से ही नहीं  
अंधेरों से भी नाता तोड़ चुकी है  
खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
गोया खिड़की मर गई है ।  

- जेन्नी शबनम (2. 8. 2016)

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Thursday 28 July 2016

520. अजब ये दुनिया (चोका)

अजब ये दुनिया (चोका)  

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यह दुनिया  
ज्यों अजायबघर  
अनोखे दृश्य  
अद्भुत संकलन  
विस्मयकारी  
देख होते हत्प्रभ !  
अजब रीत  
इस दुनिया की है  
माटी की मूर्ति  
देवियाँ पूजनीय  
निरपराध  
बेटियाँ हैं जलती  
जो है जननी  
दुनिया ये रचती !  
कहीं क्रंदन  
कहीं गूँजती हँसी  
कोई यतीम  
कोई है खुशहाल  
कहीं महल  
कहीं धरा बिछौना  
बड़ी निराली  
गज़ब ये दुनिया !  
भूख से मृत्यु  
वेदना है अपार  
भरा भण्डार  
संपत्ति बेशुमार  
पर अभागा  
कोई नहीं अपना  
सब बेकार !  
धरती में दरार  
सूखे की मार  
बहा ले गया सब  
तूफानी जल  
अपनी आग में ही  
जला सूरज  
अपनी रौशनी से  
नहाया चाँद  
हवा है बहकती  
आँखें मूँदती  
दुनिया चमत्कार  
रूप-संसार !  
हम इंसानों की है  
कारगुजारी  
हरे-घने जंगल  
हुए लाचार  
कट गए जो पेड़,  
हुए उघार  
चिड़िया बेआसरा  
पानी भी प्यासा  
चेत जाओ मानव !  
वरना नष्ट  
हो जाएगी दुनिया  
मिट जाएगी  
अजब ये दुनिया  
गजब ये दुनिया !  

- जेन्नी शबनम (28. 7. 2016)  

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Thursday 21 July 2016

519. भरोसा...

भरोसा...

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ढ़ेरों तकनीक है
भरोसा जताने
और भरोसा तोड़ने की
सारी की सारी 
इस्तेमाल में लाई जाती है 
पर
भरोसा जताने या
तोड़ने के लिए
लाज़िमी है कि
भरोसा हो ।

- जेन्नी शबनम (21. 7. 2016)

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Thursday 7 July 2016

518. मैं स्त्री हूँ...

मैं स्त्री हूँ...  

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मैं स्त्री हूँ  
मुझे जिंदा रखना उतना ही सहज है जितना सहज  
मुझे गर्भ में मार दिया जाना  
मेरा विकल्प उतना ही सरल है जितना सरल  
रंग उड़े वस्त्र को हटा कर नया परिधान खरीदना  
मैं उतनी ही बेज़रूरी हूँ  
जिसके बिना दुनिया अपूर्ण नहीं मानी जाती  
जबकि इस सत्य से इंकार नहीं कि  
पुरुष को जन्म मैं ही दूँगी  
और हर पुरुष अपने लिए स्त्री नहीं   
धन के साथ मेनका चाहता है,  
मैं स्त्री हूँ  
उन सभी के लिए जिनके रिश्ते के दायरे में नहीं आती  
ताकि उनकी नज़रें  
मेरे जिस्म को भीतर तक भेदती रहे  
और मैं विवश होकर  
किसी एक के संरक्षण के लिए गिड़गिड़ाऊँ  
और हर मुमकिन  
ख़ुद को स्थापित करने के लिए  
किश्त-किश्त में क़र्ज़ चुकाऊँ,  
मैं स्त्री हूँ  
जब चाहे भोगी जा सकती हूँ  
मेरा शिकार  
हर वो पुरुष करता है  
जो मेरा सगा भी हो सकता है  
और पराया भी  
जिसे मेरी उम्र से कोई सरोकार नहीं  
चाहे मैंने अभी-अभी जन्म लिया हो  
या संसार से विदा होने की उम्र हो  
क्योंकि पौरुषता की परिभाषा बदल चुकी है,  
मैं स्त्री हूँ  
इस बात की शिनाख्त
हर उस बात से होती है  
जिसमें स्त्री बस स्त्री होती है  
जिसे जैसे चाहे इस्तेमाल में लाया जा सके  
मांस का ऐसा लोथड़ा  
जिसे सूंघ कर बौखलाया भूखा शेर झपटता है  
और भागने के सारे द्वार  
स्वचालित यन्त्र द्वारा बंद कर दिए जाते हैं,  
मैं स्त्री हूँ  
पुरुष के अट्टहास के नीचे दबी  
बिलख भी नहीं सकती  
क्योंकि मेरी आँखों में तिरते आँसू  
बेमानी माने जा सकते हैं  
क्योंकि मेरे अस्तित्व के एवज़ में  
एक पूरा घर मुझे मिल सकता है  
या फिर  
जिंदा रहने के लिए  
कुछ रिश्ते और चंद सपने  
चक्रवृद्धि ब्याज से शर्त  
और एहसानों तले घुटती साँसें  
क्योंकि  
मैं स्त्री हूँ !  
- जेन्नी शबनम (7. 7. 2016)

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Wednesday 29 June 2016

517. अनुभव

अनुभव  

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दोराहे  
निश्चित ही द्वन्द पैदा करते हैं  
एक राह छलावा का  
दूसरा जीवन का  
कौन सही  
इसका पता दोनों राहों पर चलकर ही होता है  
फिर भी  
कई बार  
अनुभव धोखा दे जाता है  
और कोई पूर्वाभास भी नहीं होता !  

- जेन्नी शबनम (29. 6. 2016)  

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