Saturday 10 December 2016

533. जग में क्या रहता है (9 माहिया)

जग में क्या रहता है  
(9 माहिया)

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1.  
जीवन ये कहता है  
काहे का झगड़ा  
जग में क्या रहता है!  

2.  
तुम कहते हो ऐसे  
प्रेम नहीं मुझको  
फिर साथ रही कैसे!  

3.  
मेरा मौन न समझे  
कैसे बतलाऊँ  
मैं टूट रही कबसे!  

4.  
तुम सब कुछ जीवन में  
मिल न सकूँ फिर भी  
रहते मेरे मन में!  

5.  
मुझसे सब छूट रहा  
उम्र ढली अब तो  
जीवन भी टूट रहा!  

6.  
रिश्ते कब चलते यूँ  
शिकवे बहुत रहे  
नाते जब जलते यूँ!  

7.  
सपना जो टूटा है  
अँधियारा दिखता  
अपना जो रूठा है!  

8.  
दुनिया का कहना है  
सुख-दुख जीवन है  
सबको ही बहना है!  

9.  
कहती रो के धरती  
न उजाड़ो मुझको  
मैं निर्वसना मरती!  

- जेन्नी शबनम (6. 12. 2016)  

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Sunday 27 November 2016

532. मानव नाग...

मानव नाग...   

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सुनो   
अगर सुन सको तो   
ओ मानव केंचुल में छुपे नाग   
डँसने की आज़ादी तो मिल गई तुम्हें   
पर जीत ही जाओगे   
यह भ्रम क्यों   
केंचुल की ओट में छुपकर   
नाग जाति का अपमान   
करते हो क्यों   
नाग बेवजह नहीं डँसता   
पर तुम?  
धोखे से कबतक   
धोखा दोगे   
बिल से बाहर आकर   
पृथक होना ही होगा   
छोड़ना ही होगा केंचुल तुम्हें   
कौन नाग कौन मानव   
किसका केंचुल किसका तन   
बीन बजाता संसार सारा   
वक़्त के खेल में सब हारा   
ओ मानव नाग   
कबतक बच पाओगे   
नियति से आख़िर हार जाओगे   
समय रहते   
मानव बन जाओ   
या फिर वह होगा   
जो होता है   
ज़हरीले नाग का अंत   
सदैव क्रूर ही होता है।   

- जेन्नी शबनम (27. 11. 2016) 
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Monday 14 November 2016

531. बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...

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बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,   
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

देस परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

जाने कितने ख्वाब संजोता   
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से खुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2016)   

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Friday 4 November 2016

530. पुकार...

पुकार...

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हाँ, मुझे मालूम है  
एक दिन तुम याद करोगे  
मुझे पुकारोगे  
पर मैं नहीं आऊँगी  
चाह कर भी न आ पाऊँगी  
इसलिए जब तक हूँ  
करीब रहो
ताकि उस पुकार में  
ग्लानि न हो  
महज़ दूरी का गम हो !

- जेन्नी शबनम (4. 11. 2016)

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Wednesday 14 September 2016

529. हिन्दी खिलेगी (हिन्दी दिवस पर 9 हाइकु)

हिन्दी खिलेगी
(हिन्दी दिवस पर 9 हाइकु)

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1.   
मन की बात   
कह पाएँ सबसे   
हिन्दी के साथ।   

2.   
हिन्दी रूठी है   
अंग्रेज़ी मातृभाषा   
बन ऐंठी है।   

3.   
सपना दिखा   
हिन्दी अब भी रोती   
आज़ादी बाद।   

4.   
हिन्दी की बोली   
मात खाती रहती   
पढ़े लिखों से।   

5.   
हिन्दी दिवस   
एक दिन का जश्न   
फिर अँधेरा ।   

6.   
हमारी हिन्दी   
हमारा अभिमान   
सब दो मान।   

8.   
है इन्कलाब   
सब जुट जाएँ तो   
हिन्दी की शान।   

9.   
हिन्दी हँसती   
राजभाषा तो बनी,   
कहने भर।   

10.   
सुबह होगी   
देश के ललाट पे   
हिन्दी खिलेगी।   

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2016)

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Friday 9 September 2016

528. देर कर दी...

देर कर दी...   

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हाँ ! देर कर दी मैंने   
हर उस काम में जो मैं कर सकती थी   
दूसरों की नज़रों में   
ख़ुद को ढालते-ढालते   
सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने सारे हुनर   
दराज में बटोर कर रख दी   
दुनियादारी से फ़ुर्सत पाकर   
करूँगी कभी मन का।   

अंतत: अब   
मैं बेफिजुल साबित हो गई   
रिश्ते सहेजते-सहेजते   
ख़ुद बिखर गई   
साबुत कुछ नहीं बचा   
न रिश्ते न मैं न मेरे हुनर।   

मेरे सारे हुनर   
चीख़ते-चीख़ते दम तोड़ गए    
बस एक दो जो बचे हैं   
उखड़ी-उखड़ी साँसें ले रहे हैं   
मर गए सारे हुनर के क़त्ल का   
इल्ज़ाम मुझको दे रहे है   
मेरे क़ातिल बन जाने का सबब   
वे मुझसे पूछ रहे हैं।   

हाँ ! बहुत देर कर दी मैंने   
दुनिया को समझने में   
ख़ुद को बटोरने में   
अर्धजीवित हुनर को   
बचाने में।   

हाँ ! देर तो हो गई   
पर सुबह का सूरज   
अपनी आँच मुझे दे रहा है   
अंधेरों की भीड़ से   
खींच कर मुझे   
उजाला दे रहा है।   

हाँ ! देर तो हो गई मुझसे   
पर अब न होगी   
नहीं बचा वक़्त   
मेरे पास अब   
जो भी बच सका है   
रिश्ते या हुनर   
सबको एक नई उम्र दूँगी   
हाँ ! अब देर न करूँगी।   

- जेन्नी शबनम (9. 9. 2016)

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Wednesday 31 August 2016

527. शबनम...

शबनम...   

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रात चाँदनी में पिघलकर   
यूँ मिटी शबनम   
सहर को ये ख़बर नहीं थी   
कब मिटी शबनम !   

दर्द की मिट्टी का घर   
फूलों से सँवरा   
दर्द को ढ़कती रही पर   
दर्द बनी शबनम !   

अपनों के शहर में   
है कोई अपना नहीं   
ठुकराया आसमां और   
उफ़्फ़ कही शबनम !   

चाँद तारों के नगर में   
हुई जो तकरार   
आसमान से टूटकर   
तब ही गिरी शबनम !   

शब व सहर की दौड़ से   
थकी तो बहुत मगर   
वक्त के साथ चली   
अब भी है वही शबनम !   

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2016)   

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Wednesday 24 August 2016

526. प्रलय...

प्रलय...   

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नहीं मालूम कौन ले गया   
रोटी को और सपनों को   
सिरहाने की नींद को   
और तन के ठौर को   
राह दिखाते ध्रुव तारे को   
और दिन के उजाले को    
मन की छाँव को   
और अपनो के गाँव को    
धधकती धरती और दहकता सूरज   
बौखलाई नदी और चीखता मौसम   
बाट जोह रहा है   
मेरे पिघलने का   
मेरे बिखरने का   
मैं ढहूँ तो एक बात हो   
मैं मिटूँ तो कोई बात हो !   

- जेन्नी शबनम (24. 8. 2016)   

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Thursday 18 August 2016

525. चहकती है राखी (राखी पर 15 हाइकु)

चहकती है राखी   

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1.   
प्यारी बहना   
फूट-फूट के रोई   
भैया न आया !   

2.   
राखी है रोई   
सुने न अफ़साना   
कैसा ज़माना !   

3.   
रिश्तों की क्यारी   
चहकती है राखी   
प्यार जो शेष !   

4.   
संदेशा भेजो   
आया राखी त्यौहार   
भैया के पास !   

5.   
मन की पीड़ा   
भैया से कैसे कहें?   
राखी तू बता !   

6.   
कह न पाई   
व्याकुल बहना,   
राखी निभाना !   

7.   
संदेशा भेजो   
मचलती बहना   
आएगा भैया !   

8.   
बहना रोए   
प्रेम का धागा लिये,   
रिश्ते दरके !   

9.   
सावन आया   
नैनों से नीर बहे   
नैहर छूटा !   

10.   
मन में पीर   
मत होना अधीर   
आज है राखी !   

11.   
भाई न आया   
पर्वत-सा ये मन   
फूट के रोया !   

12.   
राखी का थाल   
बहन का दुलार   
राह अगोरे !   

13.   
रेशमी धागा   
जोड़े मन का नाता   
नेह बढ़ाता !   

14.   
सूत है कच्चा   
जोड़ता नाता पक्का   
आशीष देता !   

15.   
रक्षा-कवच   
बहन ने है बाँधी   
राखी जो आई !   

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2016)   

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Monday 15 August 2016

524. जय भारत ! (स्वतंत्रता दिवस पर 10 हाइकु)

जय भारत !

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1.   
तिरंगा झूमा    
देख आज़ादी का जश्न,   
जय भारत !   

2.   
मुट्ठी में झंडा   
पाई-पाई माँगता  
देश का लाल !   

3.   
भारत माता  
सरेआम लुटती,   
देश आज़ाद !   

4.   
जिन्हें सौंप के   
मर मिटे थे बापू,   
देश लूटते !   

5.   
महज़ नारा   
हम सब आज़ाद,   
सोच गुलाम !   

6.   
रंग भी बँटा   
हरा व केसरिया   
देश के साथ !   

7.   
मिटा न सका   
प्राचीर का तिरंगा   
मन का द्वेष !   

8.   
सबकी चाह -  
अखंड हो भारत,   
देकर प्राण !   

9.   
लगाओ नारे   
आज़ाद है वतन   
अब न हारे !   

10.   
कैसे मनाए   
आज़ादी का त्यौहार,   
भूखे लाचार !   

- जेन्नी शबनम (14. 8. 2016)

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