Saturday 12 May 2012

कैसे बनूँ शायर...

कैसे बनूँ शायर...

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मैं नहीं हूँ शायर
जो शब्दों को पिरोकर 
कोई ख्वाब सजाऊँ
नज्मों और गज़लों में 
दुनिया बसाऊँ,
मुझको नहीं दिखता 
चाँद में महबूब
चाँद दीखता है यूँ   
जैसे रोटी हो गोल 
मैं नहीं हूँ शायर 
जो बस गीत रचूँ   
सारी दुनिया को भूल 
प्रियतम की बाहों को जन्नत कहूँ.

मुझको दिखती है 
जिंदगी की लाचारियाँ 
पंक्तिबद्ध खड़ी दुश्वारियाँ 
क़त्ल होती कोख की बेटियाँ
सरे आम बिक जाती 
मिट जाती 
किसी माँ की दुलारियाँ
खुद को महफूज़ रखने में नाकामयाब कलियाँ,
मुझे दिखता है 
सूखे सीने से चिपका मासूम
और भूख से कराहती उसकी माँ
वैतरणी पार कराने के लिए 
क़र्ज़ में डूबा 
किसी बेवा का बेटा
और वो भी 
जिसे आरक्षण नाम के दैत्य ने कल निगल लिया   
क्योंकि उसकी जाति उसका अभिशाप थी  
और हर्जाने में उसे अपनी जिंदगी देनी पड़ी.

कैसे सोचूँ कि जिंदगी एक दिन 
सुनहरे रथ पर चलकर 
पाएगी सपनों की मंजिल  
जहां दुःख दर्द से परे कोई संसार है,
दिखता है मुझे  
किसी बुज़ुर्ग की झुर्रियों में 
वक्त की नाराजगी का दंश  
अपने कोख-जाए से मिले दुत्कार 
और निर्भरता का अवसाद
दिखता है मुझे 
उनका अतीत और वर्तमान 
जो अक्सर मेरे वर्तमान और भविष्य में 
तब्दील हो जाता है.

मन तो मेरा भी चाहता है 
तुम्हारी तरह शायर बन जाऊं
प्रेम-गीत रचूँ और 
जिंदगी बस प्रेम ही प्रेम हो  
पर 
तुम्हीं बताओ 
कैसे लिखूँ तुम्हारी तरह शायरी 
तुमने तो प्रेम में हज़ारों नज़्में लिख डाली  
प्रेम की परकाष्ठा के गीत रच डाले 
निर्विरोध 
अपना प्रेम-संसार बसा लिया
मैं किसके लिए लिखूं प्रेम-गीत?
नहीं सहन होता 
बार बार हारना 
सपनों का टूटना 
छले जाने के बाद फिर से 
उम्मीद जगाना
डरावनी दुनिया को देखकर 
आँखें मूँद सो जाना 
और सुन्दर सपनों में खो जाना.

मेरी जिंदगी तो बस यही है कि 
लोमड़ी और गिद्धों की महफ़िल से 
बचने के उपाय ढूँढूँ 
अपने अस्तित्व के बचाव के लिए 
साम दाम दंड भेद 
अपनाते हुए 
अपनी आत्मा को मारकर 
इस शरीर को जीवित रखने के उपक्रम में
रोज रोज मरूँ,
मैं शायर नहीं 
बन पाना मुमकिन भी नहीं  
तुम ही बताओ 
कैसे बनूँ मैं शायर 
कैसे लिखूँ 
प्रेम या जिंदगी?

- जेन्नी शबनम ( मई 12, 2012)

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Sunday 6 May 2012

चाँद का दाग...


चाँद का दाग...

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ऐ चाँद 
तेरे माथे पर जो दाग है 
क्या मैंने तुम्हें मारा था ? 
अम्मा कहती है 
मैं बहुत शैतान थी 
और कुछ भी कर सकती थी !

- जेन्नी शबनम (मई 6, 2012)

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Wednesday 25 April 2012

कोई एक चमत्कार...

कोई एक चमत्कार...

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जिंदगी, सपने और हकीकत 
हर वक्त   
गुत्थम-गुत्था होते हैं 
साबित करने के लिए 
अपना-अपना वर्चस्व
और हो जाते हैं
लहू लुहान, 
और इन सबके बीच 
हर बार जिंदगी को हारते देखा है  
सपनों को टूटते देखा है
हकीकत को रोते देखा है, 
हकीकत का अट्टहास 
जिंदगी को दुत्कारता है 
सपनों की हार को चिढ़ाता है 
और फिर खुद के ज़ख़्म से छटपटाता है !   
जिंदगी है कि 
बेसाख्ता नहीं भागती 
धीरे धीरे खुद को मिटाती है 
सपनों को रौंदती है 
हकीकत से इत्तेफ़ाक रखती है 
फिर भी उम्मीद रखती है   
कि शायद 
कहीं किसी रोज 
कोई एक चमत्कार 
और वो सारे सपने पूरे हों 
जो हकीकत बन जाए
फिर जिंदगी पाँव पर नहीं चले 
आसमान में उड़ जाए !
न किसी पीर-पैगम्बर में ताकत
न किसी देवी-देवता में शक्ति
न परमेश्वर के पुत्र में कुवत 
जो इनके जंग में    
मध्यस्थता कर 
संधि करा सके
और कहे कि 
जाओ 
तीनों साथ मिल कर रहो
आपसी रंजिश से सिर्फ विफल होगे 
जाओ 
जिंदगी और सपने मिलकर 
खुद अपनी हकीकत बनाओ !
इन सभी को देखता वक्त  
ठठाकर हँसता है...
बदलता नहीं क़ानून 
किसी के सपनों की ताबीर के लिए
कोई संशोधन नहीं
बस सज़ा मिल सकती है 
इनाम का कोई प्रावधान नहीं
कुछ नहीं कर सकते तुम 
या तो जंग करो या फिर
पलायन
सभी मेरे अधीन  
बस एक मैं सर्वोच्च हूँ !
सच है सभी का गुमान 
बस कोई तोड़ सकता है 
तो वो 
वक्त है !

जेन्नी शबनम (अप्रैल 25, 2012)

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Saturday 21 April 2012

कोई हिस्सेदारी नहीं...

कोई हिस्सेदारी नहीं...

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मेरे सारे तर्क 
कैसे एक बार में 
एक झटके से 
खारिज़ कर देते हो 
और कहते कि 
तुम्हें समझ नहीं,
जाने कैसे 
अर्थहीन हो जाता है 
मेरा जीवन 
जबकि परस्पर 
हर हिस्सेदारी बराबर होती है,
सपने देखना 
और जीना 
साथ ही तो शुरू हुआ 
रास्ते के हर पड़ाव भी साथ मिले 
साथ ही हर तूफ़ान को झेला 
जब भी हौसले पस्त हुए 
एक दूसरे को सहारा दिया,
अब ऐसा क्यों 
कि मेरी सारी साझेदारी बोझ बन गई 
मैं एक नाकाम 
जिसे न कोई शऊर है 
न तमीज़ 
जिसका होना 
तुम्हारे लिए 
शायद जिंदगी की सबसे बड़ी भूल है,
बहरहाल 
जिंदगी है 
सपने हैं 
शिकवे हैं 
पंख है 
परवाज़ है 
मगर अब 
हमारे बीच 
कोई हिस्सेदारी नहीं !

_ जेन्नी शबनम (अप्रैल 21, 2012)

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Wednesday 18 April 2012

अंतिम परिणति...

अंतिम परिणति...

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बाबू तुम दूर जो गए
सपनों से भी रूठ गए
कर जोड़ गुहार मेरी
तनिक न ली सुध मेरी
लोर बहते नहीं अकारण
जानते हो तुम भी कारण
हर घड़ी है अंतिम पल
जाने कब रुके समय-चक्र

बाबू तुम क्यों नही समझते
पीर मेरी जो मन दुखाते
तुम्हारे जाने यही उचित
पर मेरा मन करता भ्रमित
एक बार तुम आ जाना
सपने मेरे तुम ले आना
तुम्हारी प्रीत मन में बसी
भले जाओ तुम रहो कहीं

बाबू देखो जीवन मेरा
छवि मेरी छाया तुम्हारा
संग-संग भले हैं दीखते
छाया को भला कैसे छूते
दर्पण देख ये भान होता
नहीं विशेष जो तुम्हें खींचता
बिछोह-रुदन बन गई नियति
प्रेम-कथा की अंतिम परिणति !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 16, 2012)

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Sunday 15 April 2012

आम आदमी के हिस्से में...

आम आदमी के हिस्से में...

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सच है
पेट के आगे हर भूख
कम पड़ जाती है
चाहे मन की हो
या तन की,
और ये भी सच है
इश्क करता
तो ये सब कहाँ कर पाता
इश्क में कितने दिन खुद को
ज़िंदा रख पाता,
वक्त से थका-हारा
दिन भर पसली घिसता
रोटी जुटाए
या दिल में फूल उपजाए
देह में जान कहाँ बचती
जो इश्क फरमाए,
सच है
आम आदमी के हिस्से में
इश्क भी नहीं !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 15, 2012)

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Thursday 12 April 2012

बेसब्र इंतज़ार...

बेसब्र इंतज़ार...

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कितने सपने कितने इम्तहान
अगले जन्म का बेसब्र इंतज़ार,
कमबख्त ये जन्म तो खत्म हो !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 12, 2012)

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Friday 6 April 2012

फूल कुमारी उदास है...

फूल कुमारी उदास है...

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एक था राजा एक थी रानी
उसकी बेटी थी फूल कुमारी
फूल कुमारी जब उदास होती...
पढ़ते सुनते
बरस बीत गए
कहानी में
फूल कुमारी उदास होती है
और फिर उसकी हँसी लौट आती है,
सच की दुनिया में
फूल कुमारी की उदासी
आज भी कायम है
कोई नहीं आता जो उसकी हँसी लौटाए,
कहानी की फूल कुमारी को हँसाने के लिए
समस्त प्रदेश तत्पर है
फूल कुमारी की हँसी में देश की हँसी शामिल है
फूल कुमारी की उदासी से
पेड़ पौधे भी उदास हो जाते हैं
जीव-जंतु भी
और समस्त प्रजा भी,
वक़्त ने करवट ली
दुनिया बदल गई
हंसाने वाले रोबोट आ गए
पर एक वो मसखरा न आया
जो उस फूलकुमारी की तरह हँसा जाए,
कहानी वाला मसखरा
क्यों जन्म नहीं लेता?
आखिर कब तक फूल कुमारी उदास रहेगी
कब तक राजा रानी
अपनी फूलकुमारी के लिए उदास रहेंगे,
अब की फूलकुमारी
उदास होती है तो
कोई और दुखी नहीं होता
न कोई हँसाने की चेष्टा करता है,
सच है
कहानी सिर्फ पढ़ने के लिए होती है
जीवन में नहीं उतरती
कहानी कहानी है
जिंदगी जिंदगी !
कहानी की फूलकुमारी
खूबसूरत अल्फ़ाज़ से गढ़ी गई थी
जिसके जीवन की घटनाएं
मन माफिक मोड़ लेती है,
सांस लेती हाड़ मांस की फूलकुमारी
जिसके लिए पूर्व निर्धारित मानदंड हैं
जिसके वश में न हँसना है न उदास होना
न उम्मीद रखना
उसकी उदासी की परवाह कोई नहीं करता,
फूल कुमारी उदास थी
फूल कुमारी उदास है !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 2, 2012)

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