गुरुवार, 19 सितंबर 2019

628. तमाशा

तमाशा 

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सच को झूठ और झूठ को सच कहती है दुनिया   
इसी सच-झूठ के दरमियाँ रहती है दुनिया   
खून के नाते हों या किस्मत के नाते   
फ़रेब के बाज़ार में सब ख़रीददार ठहरे   
सहूलियत की पराकाष्ठा है   
अपनों से अपनों का छल   
मन के नातों का कत्ल   
कोखजायों की बदनीयती   
सरेबाजार शर्मसार है करती   
दुनिया को सिर्फ नफ़रत आती है   
दुनिया कब प्यार करती है   
धन-बल के लोभ में इंसानियत मर गई है   
धन के बाजार में सबकी बोली लग गई है   
यकीन और प्रेम गौरैया-सी फ़ुर्र हुई   
तमाम जंगल झुलस गए   
कहाँ नीड़ बसाए परिन्दा   
कहाँ तलाशे प्रेम की बगिया   
झूठ-फरेब के चीनी माँझे में उलझ के   
लहूलुहान हो गई है ज़िन्दगी   
ऐसा लगता है खो गई है ज़िन्दगी   
देखो मिट रही है ज़िन्दगी   
मौत की बाहों में सिमट रही है ज़िन्दगी   
आओ-आओ तमाशा देखो  
रिश्ते नातों का तमाशा देखो   
पैसों के खेल का तमाशा देखो   
बिन पैसों का तमाशा देखो।   

- जेन्नी शबनम (19. 9. 2019)   

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शनिवार, 14 सितंबर 2019

627. क्षणिक बहार

क्षणिक बहार   

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आज वह खूब चहक रही है   
मन ही मन में बहक रही है 
साल भर से जो वो कच्ची थी 
उस का दिन है तो पक रही है। 

आज वह निरीह नहीं सबल है 
आज वह दुखी नहीं मगन है 
आज उस के नाम धरती है 
आज उस का ही ये गगन है। 

जहाँ देखो सब उसे बुला रहे हैं 
हर महफ़िल में उसे सजा रहे हैं 
किसी ने क्या खूब वरदान दिया है 
एक पखवारा उसके नाम किया है। 

आज सज धज के निकलेगी 
आज बहुरिया-सी दमकेगी 
हर तरफ होगी जय जयकार 
हर कोई दिखाए अपना प्यार 
हर किसी को इस का ख्याल 
परम्परा मनेगी सालों साल। 

पखवारा बीतने पर मलीन होगी 
धीरे-धीरे फिर गमगीन होगी 
मंच पर आज जो बैठी है 
फर्श पर तब आसीन होगी 
क्षणिक बहार आज आई है 
फिर साल भर अँधेरी रात होगी। 

हर साल आता है यह त्योहार 
एक पखवारे का जश्ने बहार 
उस हिन्दी की परवाह किसे है 
राजभाषा तक सिकोड़ा जिसे है 
जो भी अब संगी साथी इसके हैं 
सालों भर साथ-साथ चलते हैं। 

भले अंग्रेजी सदा अपमान करे 
हिन्दी का साथ हमसे न छूटे 
प्रण लो हिन्दी बनेगी राष्ट्रभाषा 
यह है हमारा अधिकार और भाषा 
हिन्दी को हम से है बस यही आशा 
हम देंगे नया जीवन नयी परिभाषा। 

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2019) 

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मंगलवार, 3 सितंबर 2019

626. परम्परा (क्षणिका)

परम्परा   

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मन के अवसाद को   
चूड़ियों की खनक, बिन्दी के आकार   
होठों की लाली और मुस्कुराहट में दफन कर 
खिलखिलाकर दूर करना 
परम्परा है   
स्त्रियाँ परम्परा को   
बड़े मन से निभाती हैं।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2019)   

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शनिवार, 31 अगस्त 2019

625. कश

कश   

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"मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया   
हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया" 
रफी साहब ने बस गा दिया 
देवानंद ने चित्रपट पर निभा दिया 
पर मैं ? मैं क्या करूँ ? 
कैसे जियूँ ?  कैसे मरुँ ? 
हर कश में एक-एक फ़िक्र को फेंकती हूँ 
मैं ऐसे ही मेरे ज़ख्मों को सेंकती हूँ   
मेरी फ़िक्र तो धुँए के छल्ले के साथ 
मेरे पास वापस लौट आती है 
जाने क्यों धुएँ के साथ आसमान में नहीं जाती है 
मेरी ज़िन्दगी का साथी है फ़िक्र 
और फ़िक्र को भगाने का जरिया है 
जलती सिगरेट और धुँए का जो छल्ला है 
जो बादलों-सा होठों से निकलता है 
हवाओं में गुम होकर मेरे पास लौटता है 
साँस लेने का सबब भी है और साँस लेने से रोकता है 
हाँ मालूम है हर छल्ले के साथ   
वक़्त और उम्र का चक्र भी घूम रहा है 
मुझे नशा नहीं हुआ और लम्हा-लम्हा झूम रहा है   
जल्दी ही धुँआ लील लेगा मेरी ज़िन्दगी 
ज़िन्दगी लम्बी न सही छोटी सही 
हर साँस में नई कसौटी सही   
मैं हर फ़िक्र को धुँए में समेट बुलाती रही 
इस तरह ज़िन्दगी का साथ निभाती रही ! 

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2019) 

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मंगलवार, 27 अगस्त 2019

624. अकेले हम (5 हाइकु)

अकेले हम (5 हाइकु)   

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1.
ज़िन्दगी यही   
चलना होगा तन्हा   
अकेले हम।   

2.
राहें ख़ामोश   
सन्नाटा है पसरा   
अकेले हम।   

3.
हज़ारों बाधा   
थका व हारा मन   
अकेले हम।   

4.   
किरणें फूटीं   
भले अकेले हम   
नहीं संशय।   

5.   
उबर आए,   
गुमराह अँधेरा   
अकेले हम।   

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2019)   

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मंगलवार, 20 अगस्त 2019

623. क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)

क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)   

1.
चुटकी   

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एक चुटकी नमक   
एक चुटकी सिन्दुर   
एक चुटकी ज़हर   
मुझे औरत करते रहे   
ज़िन्दगी भर।   


2. 
विद्रोही औरतें   

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यूँ मुस्कुराना   
ख़ुद से विद्रोह सा लगता है   
पर समय के साथ चुपचाप   
विद्रोही बन जाती हैं औरतें   
अपने उन सवालों से घिरी हुई   
जिनके जवाब वे जानती हैं   
और वक्त पर देती हैं   
विद्रोही औरतें।   


3. 
समीकरण   

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जीवन का समीकरण   
अनुभवों का जोड़   
उम्र का घटाव   
भावनाओं का गुना भाग   
अंतत: जीवन शून्य।   


4.
ताना-बाना   

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जीवन का ताना-बाना   
उल्टा पुल्टा चलता रहा 
समय यूँ ही सधता रहा   
कभी कुछ उलझा 
कभी कुछ सुलझा 
कभी कुछ टूट कर गिरता रहा   
समय सब समझता रहा।   


5. 
मैना   

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महल का एक अदना खिलौना   
सोने का एक पिंजरा   
पिंजरे में रहती थी एक मैना   
वो रूठे या हँसे परवाह किसे   
दाना पानी मिलता था जीभर   
फुर्र फुर्र उड़कर करतब दिखाती   
इतनी ही है बस उसकी कहानी   
सब कहते वह बड़ी तकदीरवाली।   


6.
बेशऊर   

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छोटी छोटी डिब्बियों में भर कर   
सीलबंद कर दिए सारे हुनर   
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी   
पर अब संतोष है   
सारा हुनर ओझल है सबसे   
अब उसका अपमान नहीं होता।   


7.
दिठौना   

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दिठौना तो हर रोज लगाई   
भूले से भी कभी न चूकी   
नजरें तो झुकी ही रही   
औरतपना कभी न बिसरी   
फिर ये काली परछाईं कैसी   
काला जादू हुआ ये कैसे   
ओह! मर्द औरत में   
दिठौने ने फर्क किया।  


8.
शाइस्ता   

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कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ वो शाइस्ता   
जो खिदमत करे मगर शिकवा नहीं   
बेशअउरी, बेअदबी तुम्हे पसंद नहीं   
और अदब में रह कर जुल्म सहना   
इस जमाने की फितरत नहीं।   

(शाइस्ता - सभ्य / सुसंकृत)   


9.
पिछली रोटी   

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पहली रोटी भैया की   
अंतिम रोटी अम्मा की   
यही हमारी रीत है भैया   
यही मिली इक सीख है भैया   
बहुत पुराना वादा है   
कूल की ये मर्यादा है   
ये बेटी का सत है भैया   
ये औरतों का पथ है भैया।   


10.
वापसी   

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खुदा जाने क्या हो   
चीजो को भूलते भूलते   
कहीं खुद को न भूला बैठूँ   
यूँ किसी ने मुझे याद रखा भी नहीं   
अपनी याद तो खुद ही रखी अबतक   
अब जो खुद को भुला दिया   
फिर वापसी कैसे?   


- जेन्नी शबनम (20. 8. 2019)

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गुरुवार, 1 अगस्त 2019

622. उधार

उधार   

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कुछ रंग जो मेरे हिस्से में नहीं थे   
मैंने उधार लिए मौसम से   
पर न जाने क्यों ये बेपरवाह मौसम मुझसे लड़ रहा है   
और माँग रहा है अपना उधार वापस   
जिसे मैंने खर्च दिया उन दिनों   
जब मेरे पास जीने को कोई रंग न था   
सफेद स्याह रंगों का जो एक कोलाज बचा था मेरे पास   
वह भी धुक-धुक साँसें ले रहा था   
ज़िन्दगी से रूठा वह कोलाज   
मुझे भी जीवन से पलायन के रास्ते बता रहा था   
पर मुझे जीना था, अपने लिए जीना था   
बहुत ज्यादा जीना था, हद से ज्यादा जीना था   
हाँ, जानती हूँ उधार लेना और उधार पर जीना गैर वाज़िब है   
जानती हूँ कि मैं कर्ज़दार हूँ और चुकाने में असमर्थ भी   
फिर भी मैं शर्मसार नहीं !   

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2019)

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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

621. जीवन-युद्ध

जीवन-युद्ध   

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यादों के गलियारे से गुज़रते हुए   
मुमकिन है यादों को धकेलते हुए   
पार तो आ गई जीवन के   
पर राहों में पड़ी छोटी-छोटी यादें   
मायूसी-से मेरी राह तकती दिखीं कि  
ज़रा थम कर याद कर लो उन लम्हों को   
जो दुबारा नहीं आएँगे।   

जब एक नन्ही बच्ची ने   
पहली बार छोटी-छोटी रोटी बना   
अपने पापा को खिलाई थी   
उस बच्ची ने माँ को देखकर   
झाड़ू की सींक पर पहली बार   
ऊन से फंदा डालना सीखा था   
उसने दादी से सीखा था   
सिलबट्टे पर हल्दी पीसना और जाँता पर दाल दरना   
भैया के साथ खेले बचपन के खेल थे -   
डॉक्टर-डॉक्टर, लुका-छिपी   
राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न   
लूडो, पिट्टो और बैडमिन्टन   
उसने भैया से सीखा था साइकिल चलाना   
भैया से कभी जो झगड़ लेती   
फिर उसे खूब मारती और भैया हँसकर मार खाता   
रूठ जाती थी वो बच्ची अक्सर   
उसके पापा बड़े प्यार से उसे गोद में बिठाकर मनाते   
कैसे-कैसे प्यारे-प्यारे दिन थे जीवन में जो गुज़रे।   

जाने अतीत पीछा क्यों करता है   
फिर से बच्ची बन पापा की गोद में बैठने का मन करता है   
गाँव की पगडंडियों पर हवाई चप्पल पहन बेवज़ह भागना   
बोरिंग की तेज़ धार पर हौज़ में कूदना   
बाढ़ में सारा दिन पानी में घुसकर   
पापा के साथ गाँव भर की खबर लेना   
बीमार होने पर मिट्टी की पट्टी   
मट्ठा, सूप और नीम्बू पानी पीना   
पथ्य में उबले आटे की रोटी और घिऊरा की तरकारी खाना   
सुबह चार बजे से पापा की गोदी में बैठकर   
दुनिया भर की जानकारी पाना।   

माँ से सीखा घर चलाना   
घर का बजट बनाना, कम पैसे में जीवन जीना   
पापा के जाने के बाद माँ का कमजोर पड़ना   
और धीरे-धीरे समाज से कटना   
फिर आत्मविश्वास का थोड़ा जगना   
दादी का संबल   
और फिर हमारा जीवन- युद्ध से भिड़ना।   

सारे लम्हे याद आते हैं   
हर एक बात पर याद आते हैं   
पर ठहरना नही चाहती वहाँ पर   
जब भी रुकी हूँ, आँखें नम होती है   
फिर तलाशती हूँ कोई कोना अपना   
जहाँ निर्बाध हँस सकूँ, रो सकूँ   
पापा की यादों को जी सकूँ   
किसी से कुछ कह सकूँ 
थोड़ा-सा मन का कर सकूँ   
खुद के साथ थोड़ा रह सकूँ।   

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2019)   
(पापा की 41 वीं पुण्यतिथि पर)
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सोमवार, 15 जुलाई 2019

620. वर्षा (10 ताँका)

वर्षा (10 ताँका)   

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1.
तपती धरा   
तन भी तप उठा   
बदरा छाए   
घूम-घूम गरजे   
मन का भौंरा नाचे।   

2.   
कूकी कोयल   
नाचे है पपीहरा   
देख बदरा   
चहके है बगिया   
नाचे घर अँगना।   

3.   
ओ रे बदरा   
कितना तड़पाया   
अब तू माना   
तेरे बिना अटकी   
संसार की मटकी।   

4.   
गाए मल्हार   
घनघोर घटाएँ   
नभ मुस्काए   
बूँदें खूब झरती   
रिमझिम फुहार।   

5.   
बरसा पानी   
याद आई है नानी   
है अस्त व्यस्त   
जीवन की रफ्तार   
जलमग्न सड़कें।   

6.   
पौधे खिलते   
किसान हैं हँसते   
वर्षा के संग   
मन मयूरा नाचे   
बूंदों के संग-संग।   

7.   
झूमती धरा   
झूमता है गगन   
आई है वर्षा   
लेकर ठंडी हवा   
खिल उठा चमन।   

8.   
घनी प्रतीक्षा   
अब जाकर आया   
मेघ पाहुन   
चाय संग पकौड़ी   
पहुना संग खाए।   

9.   
पानी बरसा   
झर-झर झरता   
जैसे झरना,   
सुन मेरे बदरा   
मन हुआ बावरा।   

10.   
हे वर्षा रानी   
यूँ रूठा मत करो   
आ जाया करो   
रवि से लड़कर   
बरसो जमकर।   

- जेन्नी शबनम (6. 7. 2019)   

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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

619. जीवन-पथ (चोका)

जीवन-पथ (चोका)   

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जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से   
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अन्धेरा   
डर-डर के   
कदम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
खुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता !   

- जेन्नी शबनम (8. 6. 2019) 

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