गुरुवार, 13 अगस्त 2020

681. विदा

विदा 

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उम्र के बेहिसाब लम्हे   
जाने कैसे ख़र्च हो गए    
बदले में मिले ज़िन्दगी के छल   
एकांत के अनेकों कठोर पल   
जब न सुनने वाला कोई, न समझाने वाला कोई   
न पास आने वाला, न दूर जाने वाला कोई   
न संगी न साथी, न रिश्ते न रिश्तेदारी   
अपनी नीरवता में ख़ुद के साथ   
सिमटे हुए दोनों खुले हाथ   
और यूँ धीरे-धीरे   
विदा हो रही है ज़िन्दगी।   

- जेन्नी शबनम (12. 8. 2020) 
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रविवार, 26 जुलाई 2020

680. पहचाना जाएगा

पहचाना जाएगा

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वक़्त मुट्ठी से फिसलता, जीवन कैसे पहचाना जाएगा   
कौन किसको देखे यहाँ, कोई कैसे पहचाना जाएगा!   

ज़मीर कब कहाँ मरा, ये अब दिखाएगा कौन भला   
हर शीशे में कालिख पुता, चेहरा कैसे पहचाना जाएगा!   

कौन किसका है सगा, भला यह कौन किसको बताएगा   
आईने में अक्स जब, ख़ुद का ही न पहचाना जाएगा!   

टुकड़ों-टुकड़ों में ज़िन्दगी बीती, किस्त-किस्त में साँसें   
पुरसुकून जीवन भला, अब कैसे ये पहचाना जाएगा!   

रूठ गए सब अपने-पराए, हर ठोकर याद दिलाएगी   
अपने पराए का भेद अब, 'शब' से न पहचाना जाएगा! 

- जेन्नी शबनम (26. 7. 2020) 
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सोमवार, 20 जुलाई 2020

679. चिड़िया फूल या तितली होती (चोका - 13)

चिड़िया फूल या तितली होती 

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अक्सर पूछा   
खुद से ही सवाल   
जिसका हल   
नहीं किसी के पास,   
मैं ऐसी क्यों हूँ ?   
मैं चिड़िया क्यों नहीं   
या कोई फूल   
या तितली ही होती,   
यदि होती तो   
रंग-बिरंगे होते   
मेरे भी रूप   
सबको मैं लुभाती   
हवा के संग   
डाली-डाली फिरती   
खूब खिलती   
उड़ती औ नाचती,   
मन में द्वेष   
खुद पे अहंकार   
कड़वी बोली   
इन सबसे दूर   
सदा रहती   
प्रकृति का सानिध्य   
मिलता मुझे   
बेख़ौफ़ मैं भी जीती   
कभी न रोती   
बेफ़िक्री से ज़िन्दगी   
खूब जीती   
हँसती ही रहती   
कभी न मुरझाती !

- जेन्नी शबनम (20. 7. 2020)
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बुधवार, 8 जुलाई 2020

678. इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

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दो चार फ़िक्र हैं जीवन के   
मिले गर कोई राह, चले जाओ   
बेफ़िक्री लौटा लाओ   
कह तो दिया कि दूर जाओ   
निदान के लिए सपने न देखो   
राह पर बढ़ो, बढ़ते चले जाओ   
वहाँ तक जहाँ पृथ्वी का अंत है   
वहाँ तक जहाँ कोई दुष्ट है या संत है   
बस इंसान नहीं है, प्यार से कोई पहचान नहीं है   
या वहाँ जहाँ क्षितिज पर आकाश से मिलती है धरा   
या वहाँ जहाँ गुम हो जाए पहचान, न हो कोई अपना   
मत सोचो देस परदेस   
भूल जाओ सब तीज-त्योहार   
बिसरा दो सब प्यार-दुलार   
लौट न पाओ कभी   
मिल न पाओ अपनों से कभी   
यह पीर मन में बसा कर रखना   
पर हिम्मत कभी न हारना   
यायावर-सा न भटकना तुम   
दिग्भ्रमित न होना तुम   
अकारण और नहीं रोना तुम   
एक ठोस ठौर ढूँढ कर   
सपनों में हमको सजा लेना   
मन में लेकर अपनों की यादें   
पूरी करना बुनियादी जरूरतें   
आस तो रहेगी तुम्हें   
अपने उपवन की झलक पाने की   
कुटुम्बों संग जीवन बीताने की   
वंशबेल को देखने की   
प्रियतमा के संग-साथ की   
मिलन की किसी रात की   
पर समय की दरकार है   
तकदीर की यही पुकार है   
कोई उम्मीद नहीं कोई आस नहीं   
किसी पल पर कोई विश्वास नहीं   
रहा सहा सब पिछले जन्म का भाग्य है   
इस जनम का इतना ही इंतजाम है   
बाकी सब अगले जन्म का ख्वाब है   
निपट जाए जीवन-भँवर   
बस इतना ही हिसाब है   
चार दिन का जीवन   
दो जून की रोटी   
बदन पर दो टुक चीर   
फूस का अक्षत छप्पर   
बस इतनी-सी दरकार है   
बस इतनी-सी तो बात है।   

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2020) 
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बुधवार, 1 जुलाई 2020

677. सँवरने नहीं देती

सँवरने नहीं देती

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दर्द की ज़ुबान मीठी है बहकने नहीं देती   
लहू में डूबी है ज़िन्दगी सँवरने नहीं देती !   

इक रूह है जो जिस्म में तड़पती रहती है   
कमबख्त साँस हैं जो निकलने नहीं देती !   

मसला तो हल न हुआ बस चलते ही रहे   
थक गए पर ये ज़िन्दगी थमने नहीं देती !   

वक़्त के ताखे पे रखी रही उम्र की बाती   
किस्मत गुनहगार ज़िन्दगी जलने नहीं देती !   

अब रूसवाई क्या और भला किससे करना   
चाक-चाक दिल मगर आँसू बहने नहीं देती !   

मेरे वास्ते अपनों की भीड़ ने कजा को पुकारा   
शब से रूठी है कजा उसको मरने नहीं देती !   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2020) 
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शुक्रवार, 26 जून 2020

676. रीसेट

रीसेट

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हयात के लम्हात, दर्द में सने थे   
मेरे सारे दिन-रात, आँसू से बने थे   
नाकामियों, नादानियों और मायूसियों के तूफ़ान   
मन में लिए बैठे थे   
वक़्त से सुधारने की गुहार लगाते-लगाते   
बेज़ार जिए जा रहे थे   
हम थे पागल, जो माजी से प्यार किए जा रहे थे   
कल वक़्त ने कान में चुपके से कहा -   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो   
जितनी बची है, उतनी ज़िन्दगी भरपूर जी लो   
दर्द को खा लो, आँसू को पी लो   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो !   

- जेन्नी शबनम (26. 6. 2020) 
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मंगलवार, 23 जून 2020

675. ईनार

ईनार

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मन के किसी कोने में   
अब भी गूँजती हैं कुछ धुनें   
रस्सी का एक छोर पकड़   
छपाक से कूदती हुई बाल्टी   
ईनार पर लगी हुई चकरी से   
एक सुर में धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती बाल्टी   
टन-टन करती बड़ी बाल्टी छोटी बाल्टी   
लोटा-कटोरा और बाल्टी-बटलोही   
सब करते रहते खूब बतकही   
दाँत माँजना बर्तन माँजना   
कपड़ा फींचना दुख-सुख गुनना   
ननद-भौजाई की हँसी ठिठोली   
सास-पतोह की नोक झोंक   
बाबा-दादी के आते ही   
घूँघट काढ़ करती हड़बड़ी   
चिल्ल-पों करते बच्चों का नहाना   
तुरहा-तुरहिन का आकर साँसे भरना   
प्यासे बटोही की अँजुरी में   
बाल्टी से पानी उड़ेल-उड़ेल पिलाना   
लोटा में पानी भरकर सूरज को अर्घ्य देना   
रोज-रोज वही दृश्य पर ईनार चहकता हर दिन   
भोर से साँझ प्यार लुटाता रुके बिन   
एक सामूहिक सहज जीवन   
समय के साथ बदला मन   
दुख-सुख का साथी ईनार, अब मर गया है   
चापाकल घर-घर आ गया है   
परिवर्तन जीवन का नियम है   
पर कुछ बदलाव टीस दे जाता है   
आज भी ईनार बहुत याद आता है। 

- जेन्नी शबनम (23. 6. 2020) 
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रविवार, 21 जून 2020

674. बोनसाई

बोनसाई 

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हज़ारों बोनसाई उग गए हैं   
जो छोटे-छोटे ख़्वाबों की पौध हैं 
ये पौधे अब दरख़्तों में तब्दील हो चुकें हैं 
ये सदा हरे भरे नहीं रहते 
मुरझा जाने को होते ही हैं 
कि रहम की ज़रा-सी बदली बरसती है 
वे ज़रा-ज़रा हरियाने लगते हैं 
फिर कुनमुना कर सब जीने लगते हैं   
वे अक्सर अपने बौनेपन का प्रश्न करते हैं   
आख़िर वे सामान्य क्यों न हुए, क्यों बोनसाई बन गए   
ये कैसा रहस्य है   
ये ऐसे दरख़्त क्यों हुए, जो किसी को छाँव नहीं दे सकते   
फलने-फूलने-जीने के लिए हज़ार मिन्नतें करते हैं   
फिर मौसम को तरस आता है   
वे ज़रा-सी धूप और पानी दे देते हैं 
आख़िर ऐसा क्यों है   
क्यों बिन माँगे मौसम उन्हें कुछ न देता   
क्यों लोग हँसते हैं उसके ठिगनेपन पर   
बोनसाई होना उनकी चाहत तो न थी   
सब तक़दीर के तमाशे हैं   
जो वे भुगतते हैं   
रोज़ मर-मर कर जीते है   
पर ख़्वाबों के ये बोनसाई 
कभी-कभी तन्हाई में हँसते भी हैं!   

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2020) 
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मंगलवार, 16 जून 2020

673. ख़ाली हाथ जाना है

ख़ाली हाथ जाना है 

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ख़ाली हाथ हम आए थे   
ख़ाली हाथ ही जाना है !  

तन्हा-तन्हा रातें गुज़री   
तन्हा दिन भी बिताना है !  

समझ-समझ के समझे क्यों   
समझ से दिल कब माना है !  

कतरा-कतरा जीवन छूटा   
कतरा-कतरा सब पाना है !  

बूँद-बूँद बिखरा लहू   
बूँद-बूँद मिट आना है !  

झम-झम बरसी आँखें उसकी   
झम-झम जल ये चखाना है !  

'शब' को याद मत करो तुम   
उसका गया जमाना है !  

- जेन्नी शबनम (16. 6. 2020)
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मंगलवार, 9 जून 2020

672. आईना और परछाई

आईना और परछाई 

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आईना मेरा सखा   
जो मुझसे कभी झूठ नहीं बोलता   
परछाई मेरी सखी   
जो मेरा साथ कभी नहीं छोड़ती   
इन दोनों के साथ मैं   
जीवन के धूप-छाँव का खेल खेलती   
आईना मेरे आँसू पोछता   
बिना थके मुझे सदा हँसाता   
परछाई मेरे संग-संग घूमती   
अँधियारे से मैं जब-जब डरती   
मेरा हाथ पकड़ वो रोशनी में भागती   
हाँ ! यह अलग बात   
आजकल आईना मुझसे रूठा है   
मैं उससे मिलने नहीं जाती   
उसका सच मैं देखना नहीं चाहती   
आजकल मेरी परछाई मुझसे लड़ती है   
मैं अँधेरों से बाहर नहीं निकलती   
जाने क्यों रोशनी मुझे नहीं सुहाती।   
जानती हूँ, ये दोनों साथी   
मेरे हर वक्त के राज़दार हैं   
मेरा आईना मेरा मन   
मेरी परछाई मेरी साँसें   
ये कभी न छोड़ेंगे मेरा दामन । 

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2020) 
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