गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

736. मरजीना (10 क्षणिका)

मरजीना 
*******

1.
मरजीना
***
मन का सागर दिन-ब-दिन और गहरा होता जा रहा
दिल की सीपियों में क़ैद मरजीना बाहर आने को बेकल
मैंने बिखेर दिया उन्हें कायनात के वरक़ पर।
-0- 

2.
कुछ
***
सब कुछ पाना
ये सब कुछ क्या?
धन दौलत, इश्क़ मोहब्बत
या कुछ और?
जाने इस कुछ का क्या अर्थ है।
-0-

3.
मौसम 
***
बात-बात में गुज़रा है मौसम
आँखों में रीत गया है मौसम
देखो बदल गया है मौसम
हिज्र का आ गया है मौसम। 

4.
हाथ नहीं आता
***
समय असमय टटोलती रहती हूँ
अतीत के किस्सों की परछाइयाँ
नींद को बुलाने की जद्दोजहद जारी रहती है
सब कुछ गडमगड हो जाता है
रात बीत जाती है
कुछ भी हाथ नहीं आता
न सपने न सुख के हिस्से के किस्से।

5..
विलीन 
***
ऐतिहासिक सुख प्रागैतिहासिक दुख
सब के सब विलीन हो रहे हैं वर्तमान में
घोर पीड़ा-पराजय घोर उमंग-आनंद
क्या सचमुच विलीन हो सकते हैं वर्तमान की आगोश में?
नहीं नहीं
वे दफन हैं जेहन में
साँसों की सलामती और
महज खुद के साथ होने तक।

6..
युद्धरत
***

युद्धरत मन में
तलवारें जाने कहाँ कहाँ किधर किधर
घुसती है धँसती हैं
लहू नहीं बहता सिर्फ़ लोर बहता है
अपार पीड़ा के बावजूद युद्धरत मन हारता नहीं
ज़्यादा तीव्र वार किसका
सोचते सोचते
मुट्ठी में कस जाती है तलवार की मूठ।

7.
जला सूरज
***

उस रोज़ चाँद को ग्रहण लगा
बौखलाया जाने क्यों सूरज
सूर्ख लाल लहू से लिपट गई रात
दिन की चीख़ से टूट गया सूरज
शरद के मौसम में
धू धू कर जला सूरज

8.
कर्ज और फर्ज...

*******

कर्ज और फर्ज चुकाने के लिए
जाने कितने जन्म लिए 
कंधों पर से बोझ उतरता नहीं
कर्ज जो अनजाने में मिला
फर्ज जो जन्म से मिला
कुछ भी चुक न सका 
यह उम्र भी यूँ ही गुजर गई
अब फिर से एक और जन्म
वही कर्ज वही फर्ज
आह! अब और नहीं.

9.
समझौता
*******
वर्जनाओं को तोड़ना
कई बार कठिन नहीं लगता
कठिन लगता है
उनका पालन या अनुसरण करना
परन्तु करना तो होता ही है
यही समझौता है
ख़ुद का जीवन से
आजीवन। 
-०- 

10. 
जिजीविषा 
*** 
सपनों और उम्मीदों का मरना   
जिजीविषा का ख़त्म होना है   
पर कभी-कभी ज़िन्दा रहने के लिए   
सपनों और उम्मीदों को मारना होता है   
और जीवन जीना होता है।   
जीवित रहना और दिखते रहना   
दोनों लाज़िमी है।

- जेन्नी शबनम (2. 12. 2021)
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मंगलवार, 16 नवंबर 2021

735. हाँ! मैं बुरी हूँ

हाँ! मैं बुरी हूँ 

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मैं बुरी हूँ   
कुछ लोगों के लिए बुरी हूँ   
वे कहते हैं-   
मैं सदियों से मान्य रीति-रिवाजों का पालन नहीं करती   
मैं अपनी सोच से दुनिया समझती हूँ   
अपनी मनमर्ज़ी करती हूँ, बड़ी ज़िद्दी हूँ।   
हाँ! मैं बुरी हूँ   
मुझे हर मानव एक समान दिखता है   
चाहे वह शूद्र हो या ब्राह्मण   
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान   
मैं तथाकथित धर्म का पालन नहीं करती   
मुझे किसी धर्म पर न विश्वास है न आस्था   
मुझे महज़ एक ही धर्म दिखता है- इंसानी प्यार।   
मैं औरत होकर वह सब करती हूँ जो पुरुषों के लिए जायज़ है   
मगर औरतों के लिए नाजायज़   
जाने क्यों मुझे मित्रता में औरत मर्द अलग नहीं दिखते   
किसी काम में औरत मर्द के दायित्व का बँटवारा उचित नहीं लगता।   
मैं अपने मन का करती हूँ   
घर परिवार को छोड़कर अकेले सिनेमा देखती हूँ   
अकेले कॉफी पीने चाली जाती हूँ   
अपने साथ के लिए किसी से गुज़ारिश नहीं करती।   
भाग-दौड़ में मेरा दुपट्टा सरक जाता है   
मैं दुपट्टे को सही से ओढ़ने की तहजीब नहीं जानती   
दुपट्टे या आँचल में शर्म कैद है यह सोचती ही नहीं।   
समय-चक्र के साथ मैं घूमती रही   
न चाहकर भी वह काम करती रही, जो समाज के लिए सही है   
भले इसे मानने में हज़ारों बार मैं टूटती रही।   
औरतें तो अंतरिक्ष तक जाती हैं   
मैं घर-बच्चों को जीवन मान बैठी   
ये ही मेरे अंतरिक्ष, मेरे ब्रह्माण्ड, मेरी दुनिया   
यही मेरा जीवन और यही हूँ मैं।   
जीवन में कभी कुछ किया नहीं   
सिर्फ़ अपने लिए कभी जिया नहीं   
धन उपार्जन किया नहीं   
किसी से कुछ लिया नहीं।   
जीवन से जो खोया-पाया लिखती हूँ   
अपनी अनुभूतियों को शब्दों में पिरोती हूँ   
जो हूँ बस यही हूँ   
यही मेरी धरोहर है और यही मेरा सरमाया है।   
मैं भले बुरी हूँ   
पर, रिश्ते या ग़ैर, जो प्रेम दें, वही अपने लगते हैं   
मुझे कोई स्वीकार करे या इनकार   
मैं ऐसी ही हूँ।   
जानती हूँ, मेरे अपने मुझसे बदलने की उम्मीद नहीं करते   
जो चाहते हैं कि मैं ख़ुद को पूरा बदल लूँ   
वे मेरे अपने हो नहीं सकते   
जिसके लिए मैं 
बुरी हूँ, तों हूँ।  
अपने और अपनों के लिए 
अच्छी हूँ, तो हूँ।   
मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मेरे अपने हज़ारों हैं   
उन्हीं के लिए शायद मैं इस जग में आई   
बस उन्हीं के लिए मेरी यह सालगिरह है। 

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2021)
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मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

734. हथेली गरम-गरम

हथेली गरम-गरम 

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रात हो मतवाली-सी   
सपने पके नरम-नरम   
सुबह हो प्यारी-सी   
दिन हो रेशम-रेशम   
मन में चाहे ढेरों संशय   
रस्ता दिखे सुगम-सुगम   
सुख-दुःख दोनों जीवन है   
मन समझे सहज-सहज   
जीवन में बना रहे भरम   
खुशियाँ हों सब सरल-सरल   
कम न पड़े कोई भी छाँव   
रिश्ते सँभालो सँभल-सँभल   
चाहे गुज़रे कोई पहर   
हाथ में एक हथेली गरम-गरम।   

- जेन्नी शबनम (12. 10. 2021) 
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गुरुवार, 2 सितंबर 2021

733. बेअख्तियार हूँ (8 क्षणिका)

बेअख्तियार हूँ 

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1.
बेअख्तियार हूँ 
*** 
भावनाएँ और संवेदनाएँ   
अपनी राह से भटक चुकी हैं   
अब शब्दों में पनाह नहीं लेती   
आँखों में घर कर चुकी है   
कभी बदली बन तैरती है   
कभी बारिश बन बरसती है   
बेअख्तियार हूँ   
वक़्त, रिश्ते और ख़ुद पर   
हर नियंत्रण खो चुकी हूँ।


2.
नाजुक टहनी 
***
हम सपने बीनते रहे   
जो टूटकर गिरे थे आसमान की शाखों से   
जिसे बुनकर हम ओढ़ा आए थे कभी   
आसमान को    
ज़रा-सी धूप, हवा, पानी के वास्ते,   
आसमान की नाज़ुक टहनी   
सँभाल न सकी थी मेरे सपनों को। 


3.
हदबन्दी
***
मन की हदबन्दी, ख़ुद की मैंने   
जिस्म की हदबन्दी, ज़माने ने सिखाई   
कुल मिलाकर हासिल- अकेलापन   
परिणाम- जीवन की हदबन्दी   
जो तब टूटेगी जब साँसें टूटेगी   
और टूट जाएँगे वे तमाम हद   
जो जन्म के साथ हमारी जात को   
पूरी निगरानी के साथ तोहफ़े में मिलते हैं।


4.
इंकार 
***
मेरी ख़ामोशियाँ चीखकर मुझे बुलाती हैं   
सन्नाटे के कोलाहल से व्यथित मेरा मन   
ख़ुद तक पहुँचने से इंकार कर रहा है   
नहीं चाहता मुझ तक कुछ भी पहुँचे।


5.
लम्बी ज़िन्दगी 
***
यह दर्द ठहरता क्यों नहीं?   
मुझसे ज़्यादा लम्बी ज़िन्दगी   
शायद दर्द को मिली है। 


6.
ताकीद 
***
बढ़ती उम्र ने ताकीद की-   
वक़्त गुज़र रहा है   
पर जाने क्यों ठहरा हुआ-सा लगता है   
सिर्फ़ मैं दौड़ती हूँ अकेली भागती हूँ   
चलो, तुम भी दौड़ो मेरे साथ   
मेरे बिना तुम कहाँ?


7.
मीठी 
******* 
मैं इतनी मीठी बन गई    
कि मेरी नसों में मिठास भर गई   
और ज़िन्दगी तल्ख़ हो गई। 


8.
नींद
*** 
सपने आकार द्वार खटखटाते   
नींद न जाने किधर चल देती   
सारी दुनिया की सैर कर आती   
मुझसे नज़रें रोज़ चुराती   
न दवा की सुनती न मिन्नतें सुनती   
अहंकारी नींद जब मर्ज़ी तब ही आती   
सपनो से मैं मिल ना पाती।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2021)
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रविवार, 18 जुलाई 2021

732. पापा

पापा 

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ख़ुशियों में रफ़्तार है इक   
सारे ग़म चलते रहे   
तुम्हारे जाने के बाद भी   
यह दुनिया चलती रही और हम चलते रहे   
जीवन का बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुके   
एक उम्र में कई सदियों का सफ़र कर चुके   
अब मम्मी भी न रही   
तमाम पीड़ाओं से मुक्त हो गई   
तुमसे ज़रूर मिली होगी   
बिलख-बिलखकर रोई होगी   
मम्मी ने मेरा हाल बताया होगा   
ज़माने का व्यवहार सुनाया होगा   
जाने के बाद तुम तो हमको भूल गए   
जाने क्यों मेरे सपने से भी रूठ गए   
बस एक बार आए फिर कभी न आए   
न बुलाने के लिए कहकर चले गए   
पर जानते हो पापा   
एक सप्ताह पहले   
तुम, मम्मी, दादी, मेरे सपने में आए   
पापा, तुम मेरे सपने में फिर से मरे   
मम्मी ने तुम्हारा दाह-संस्कार किया   
पर तब भी जाने क्यों तुम हमको न दिखे   
आग ने भी तुम्हारे नाम न लिखे   
जैसे सच में मरने के बाद हम तुमको न देख सके थे   
तुमसे लिपटकर रो न सके थे   
जाने कैसा रहस्य है   
मम्मी-दादी सपने में सदा साथ रहती है   
पर मेरी परेशानियों के लिए कोई राह नहीं बताती है   
किससे कुछ भी कहें पापा   
तुम ही कुछ तो बताओ पापा   
जानती हूँ हमसे भी अधिक भाग्यहीनों से संसार भरा है   
दुनिया का दर्द शायद मेरे दर्द से भी बड़ा है   
हमसे भी अधिक बहुतों की पीड़ा है   
फिर भी मन की छटपटाहट कम नहीं होती   
ज़ख़्मों को तौलने की इच्छा नहीं होती   
जीने की वजह नहीं मिलती   
मन रोता है तड़पता है   
दुःख में तुमको ही खोजता है   
बस एक बार सपने में आकर   
कुछ तो कह जाओ   
न कहो एक बार बस दिख जाओ   
जानती हूँ   
समय चक्र का यही हिसाब-किताब है   
हमको आज भी तुमसे उतना ही प्यार है   
पापा, तुम्हारी बेटी को तुम्हारे एक सपने का इन्तिज़ार है। 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2021)
(पापा की 43 वीं पुण्यतिथि पर) 
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रविवार, 4 जुलाई 2021

731. प्यारी नदियाँ

प्यारी नदियाँ 

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1. 
नद से मिली   
भोरे-भोरे किरणें   
छटा निराली।   

2. 
गंगा पवित्र   
नहीं होती अपवित्र   
भले हो मैली।   

3. 
नदी की सीख -   
हर क्षण बहना   
नहीं थकना।   

4. 
राजा या रंक   
सबके अवशेष   
नदी का अंक।   

5. 
सदा हरती   
गंगा पापहरणी   
जग के पाप।   

6. 
नदी का धैर्य   
उसकी विशालता,   
देती है सीख।   

7. 
दुःखहरणी   
गंगा निर्झरनी   
पापहरणी।   

8. 
अपना प्यार   
बाँटती धुआँधार   
प्यारी नदियाँ।   

9. 
सरिता-घाट   
तन अग्नि में भस्म   
अंतिम सत्य।   

10. 
सबके छल   
नदी है समेटती   
कोई न भेद।   

11. 
सरजू तीरे   
महाकाव्य-सर्जन   
तुलसीदास।   

12. 
तड़पी नदी   
सागर से मिलने,   
मानो हो पिया।   

13. 
बेपरवाह   
मिलन को बेताब   
नदी बावरी।   

14. 
सिंधु से मिली   
सर्प-सी लहराती   
नदी लजाती।   

15. 
नदियाँ प्यासी   
प्रकृति का दोहन   
इंसान पापी।   

16. 
तीन नदियाँ   
पुराना बहनापा   
साथ फिरतीं।   

17. 
बढ़ी आबादी   
कहाँ से लाती पानी   
नदी बेचारी।   

18. 
नदी का तट   
सभ्यता व संस्कृति   
सदियाँ जीती।   

19. 
मीन झाँकती,   
पारदर्शी लिबास   
नदी की कोख।   

20. 
खूब निभाती   
वर्षा से बहनापा   
साथ नहाती।   

21. 
बूझो तो कौन?   
खाती, ओढ़ती, जल   
नदी और क्या!   

22. 
कोई न सुना   
बिलखती थी नदी   
पानी के बिना।   

23. 
नदी के तीरे   
देवताओं का घर   
अमृत भर।   

24. 
नदी बहना!   
साथ लेके चल ना   
घूमने जग।   

25. 
बाढ़ क्यों लाती?   
विकराल बनके   
काहे डराती?   

26. 
चंदा-सूरज   
नदी में नहाकर   
काम पे जाते।   

27.   
मिट जाएगा   
तुम बिन जीवन,   
न जाना नदी!   

28. 
दूर न जाओ   
नदी, वापस आओ   
मत गुस्साओ।   

29. 
डूबा जो कोई   
निरपराध नदी   
फूटके रोई।   

30. 
हो गईं मैली   
बेसहारा नदियाँ   
कैसे नहाए।   

31. 
बहती नैया   
गीत गाए खेवैया   
शांत दरिया।   

32. 
पानी दौड़ता   
तटबन्ध तोड़के,   
क्रोधित नदी।   

33. 
तुझमें डूबे   
सोहनी महिवाल   
प्यार का अंत।   

34. 
नदियाँ सूखी,   
बदरा बरस जा   
उनको भिगा।   

35. 
अपनी पीर   
सिर्फ़ सागर से क्यों   
मुझे भी कह।   

36. 
मीन मरती   
पी ज़हरीला पानी   
नदियाँ रोती।   

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2021)
('अप्रमेय' (2021), डॉ. भीकम सिंह जी द्वारा संपादित पुस्तक में प्रकाशित मेरे हाइकु) 
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शुक्रवार, 25 जून 2021

730. पखेरू (8 हाइकु)

पखेरू 

(8 हाइकु) 

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1. 
नील गगन   
पुकारता रहता -   
पाखी, तू आ जा!   

2. 
उड़ती फिरूँ   
हवाओं संग झूमूँ   
बन पखेरू।   

3. 
कतरे पंख   
पर नहीं हारूँगी,   
फिर उडूँगी।   

4. 
चकोर बोली -   
चन्दा छूकर आएँ   
चलो बहिन।   

5. 
मन चाहता,   
स्वतंत्र हो जीवन   
मुट्ठी में विश्व।   

6. 
उड़ना चाहे   
विस्तृत गगन में   
मन पखेरू।   

7. 
छूना है नभ   
कामना पहाड़-सी   
हौसला पंख।   

8. 
झूमता मन,   
अनुपम प्रकृति   
संग खेलती।   

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2021)
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सोमवार, 21 जून 2021

729. योग

योग 

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जीवन जीना सरल बहुत   
अगर समझ लें लोग   
करें सदा मनोयोग से   
हर दिन थोड़ा योग।   

हजारों सालों की विद्या   
क्यों लगती अब ढोंग   
आओ करें मिलकर सभी   
पुनर्जीवित ये योग।   

साँसे कम होतीं नहीं   
जो करते रहते योग   
हमको करना था यहाँ   
अपना ही सहयोग।   

इस शतक के रोग से   
क्यों जाते इतने लोग   
अगर नियम से देश में   
घर-घर होता योग।   

दे गया गहरा ज्ञान भी   
कोरोना का यह सोग   
औषधि लेते रहते पर   
संग करते हम सब योग।   

चमत्कार ये योग बना   
दूर भगा दे रोग   
तन अपना मंदिर बना   
पूजा अपना योग।   

जीवन के अवलम्ब हैं   
प्रकृति, ध्यान व योग   
तन का मन का हो नियम   
सरल साधना जोग।   

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2021) 
(अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21. 6. 21) 
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रविवार, 20 जून 2021

728. ओ पापा!

ओ पापा! 

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ओ पापा!   
तुम गए   
साथ ले गए   
मेरा आत्मबल   
और छोड़ गए मेरे लिए   
कँटीले-पथरीले रास्ते   
जिसपर चलकर   
मेरा पाँव ही नहीं मन भी   
छिलता रहा।   
तुम्हारे बिना   
जीवन की राहें बहुत कठिन रहीं   
गिर-गिरकर ही सँभलना सीखा   
कुछ पाया बहुत खोया   
जीवन निरर्थक चलता रहा।   
तुम्हारी यादें   
और चिन्तन-धारा को   
मन में संचितकर   
अब भरना है स्वयं में आत्मविश्वास   
और उतरना है   
जीवन-संग्राम में।   
भले अब   
जीवन के अवसान पर हूँ   
पर जब तक साँस तब तक आस।   

- जेन्नी शबनम (20. 6. 2021) 
(पितृ दिवस)
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शुक्रवार, 18 जून 2021

727. एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है 


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उम्र के सारे वसंत वार दिए   
रेगिस्तान में फूल खिला दिए   
जद्दोजहद चलती रही एक अदद घर की   
रिश्तों को सँवारने की   
हर डग पर चाँदनी बिखराने की   
हर कण में सूरज उगाने की   
अंततः मकान तो घर बना   
परन्तु किसी कोने पर मेरा कोई रंग न चढ़ा   
कोई भी कोना महफूज़ न रहा   
न मेरे मन का न घर का   
कोई कोना नहीं जहाँ सुकून बरसे   
सूरज चाँद सितारे आकर बैठें   
हमसे बतकहियाँ करते हुए जीवन को निहारे   
धीरे-धीरे हर रिश्ता दरकता गया   
घर मकान में बदलता रहा   
सब बिखरा और पतझर आकर टिक गया   
अब यहाँ न फूल है न पक्षियों के कलरव   
न हवा नाचती है न गुनगुनाती है   
कभी भटकते हुए आ जाए   
तो सिर्फ़ मर्सिया गाती है   
अब न सपना कोई न अपना कोई   
मन में पसरा अकथ्य गाथा का वादा कोई   
धीरे-धीरे वीरानियों से बहनापा बढ़ा   
जीवन पार से बुलावा आया   
पर न जाने क्यों   
न इस पार न उस पार   
कहीं कोई कोना शेष न रहा   
जाने की आतुरता को किसी ने बढ़कर रोक लिया   
और मेरा गुलमोहर भी गुम हो गया   
जो हौसला देता था विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का   
साहस और हौसला को ख़ाली मन में भरने का   
अब न रिश्ते न घर न गुलमोहर   
न इस पार न उस पार कोई ठौर   
जीवन के इस पतझर में   
एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है।   

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2021)
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