रविवार, 20 जनवरी 2019

601. फ़रिश्ता (क्षणिका)

फ़रिश्ता     

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सुनती हूँ कि कोई फ़रिश्ता है 
जो सब का हाल जानता है 
पर मेरा? 
ना-ना मेरा नहीं है वह 
मुझे नहीं जानता वह 
पर तुम? 
तुम मुझे जानते हो 
जीने का हौसला देते हो 
जाने किस जन्म में, तुम मेरे कौन थे 
जो अब मेरे फ़रिश्ते हो! 

- जेन्नी शबनम (19. 1. 2019)   

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बुधवार, 9 जनवरी 2019

600. अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ)

अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ) 

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1.   
मेरे अंतर्मन में पड़ी हैं   
ढेरों अनकही कविताएँ   
तुम मिलो कभी   
तो फ़ुर्सत में सुनाऊँ तुम्हें।   

2.   
हजारों सवाल हैं मेरे अंतर्मन में   
जिनके जवाब तुम्हारे पास हैं   
तुम आओ गर कभी   
फ़ुर्सत में जवाब बताना।   

3.   
मेरा अंतर्मन   
मुझसे प्रश्न करता है -   
आख़िर कैसे कोई भूल जाता है   
सदियों का नाता 
पल भर में   
उसके लिए   
जो कभी अपना नहीं था   
न कभी होगा।   

4.   
हमारे फ़ासले की मियाद   
जाने किसने तय की है   
मैंने तो नहीं,   
क्या तुमने?   

5.   
क्षण-क्षण कण-कण   
तुम्हें ढूँढ़ती रही   
जानती हूँ   
मैं अहल्या नहीं कि   
तुमसे मिलना तय हो।   

6.   
कुछ तो हुआ ऐसा    
जो दरक गया मन   
गर वापसी भी हो तुम्हारी   
टूटा ही रहेगा तब भी यह मन।   

7.   
रात का अँधेरा   
अब नहीं डराता मुझे   
उसकी सारी कारस्तानियाँ   
मुझसे हार गई   
मैंने अकेले जीने की   
आदत जो पाल ली।   

8.   
ढूँढ़कर थक चुकी   
दिन का सूरज   
रात का चाँद   
दोनों के साथ   
लुकाचोरी खेल रही थी   
वे दगा दे गए   
छल से मुझे तन्हा छोड़ गए।   

9.   
अब आओ, तो चलेंगे   
उन यादों के पास   
जिसे हमने छुपाया था   
समय से माँगी हुई तिजोरी में   
शायद कई जन्मों पहले।   

10.   
सोचा न था   
ऐसे तजुर्बे भी होंगे   
दुनिया की भीड़ में   
सदा हम तन्हा ही रहेंगे।   

11.   
चुप-से दिन   
चुप-सी रातें   
चुप-से नाते   
चुप-सी बातें   
चुप है ज़िन्दगी   
कौन करे बातें   
कौन तोड़े सघन चुप्पी !   

12.   
तुमसे मिलकर जाना   
यह जीवन क्या है   
बेवजह गुस्सा थी   
खुद को ही सता रही थी   
तुम्हारी एक हँसी   
तुम्हारा एक स्पर्श   
तुम्हारे एक बोल   
मैं जीवन को जान गई।   

13.   
वक्त बस एक क्षण देता है   
बन जाएँ या बिगड़ जाएँ   
जी जाएँ या मर जाएँ,   
उस एक क्षण को   
मुट्ठी में समेटना है   
वर्तमान भी वही   
भविष्य भी वही,   
बस एक क्षण   
जो हमारा है   
सिर्फ हमारा !   

14.   
नजदीकियाँ   
पाप-पुण्य से परे होती हैं   
फिर भी   
कभी-कभी   
फ़ासलों पे रहकर   
जीनी होती है ज़िन्दगी।   

15.   
चाहती हूँ   
धूप में घुसकर   
तुम आ जाओ छत पर   
बडे दिनों से   
मुलाकात न हुई   
जीभर कर बात न हुई   
यूँ भी सुबह की धूप   
देह के लिए जरूरी है   
और तुम   
मेरे मन के लिए।   

- जेन्नी शबनम (9. 1. 2019)  

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मंगलवार, 8 जनवरी 2019

599. हे नव वर्ष (नव वर्ष पर 5 हाइकु)

हे नव वर्ष (नव वर्ष पर 5 हाइकु)   

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1.   
हे नव वर्ष   
आखिर आ ही गए,   
पर जल्दी क्यों?   

2.   
उम्मीद जगी -   
अच्छे दिन आएँगे   
नव वर्ष में।   

3.   
मन से करो   
इस्तकबाल करो   
नव वर्ष का।   

4.   
पिछला साल   
भूलना नहीं कभी,   
मिली जो सीख।   

5.   
प्रेम ही प्रेम   
नव वर्ष कामना,   
सब हों सुखी।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2019)

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रविवार, 30 दिसंबर 2018

598. वृद्ध जीवन (वृद्धावस्था पर 20 हाइकु)

वृद्ध जीवन 

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1.   
उम्र की साँझ   
बेहद डरावनी   
टूटती आस।   

2.   
अटकी साँस   
बुढापे की थकान   
मन बेहाल।   

3.   
वृद्ध की कथा   
कोई न सुने व्यथा   
घर है भरा।   

4.   
दवा की भीड़   
वृद्ध मन अकेला   
टूटता नीड़।   

5.   
अकेलापन   
सबसे बड़ी पीर   
वृद्ध जीवन।   

6.   
उम्र जो हारी   
एक पेट है भारी   
सब अपने।   

7.
धन के नाते   
मन से हैं बेगाने   
वृद्ध बेचारे।   

8.   
वृद्ध से नाता   
अपनों ने था छोड़ा   
धन ने जोड़ा।   

9.   
बदले कौन   
मखमली चादर   
बुढ़ापा मौन।   

10.   
बहता नीर   
यही जीवन रीत   
बुढ़ापा भारी।   

11.   
उम्र का चूल्हा   
आजीवन सुलगा   
अब बुझता।   

12.   
किससे कहें?   
जीवन-साथी छूटा   
ढेरों शिकवा।   

13.   
बुढ़ापा खोट   
अपने भी भागते   
कोई न ओट।   

14.   
वृद्ध की आस   
शायद कोई आए   
टूटती साँस।   

15.   
ग़म का साया   
बुजुर्ग का अपना   
यही है सच।   

16.   
जीवन खिले   
बुजुर्गों के आशीष   
खूब जो मिले।   

17.   
टूटा सपना   
कौन सुने दुखड़ा   
वृद्ध अकेला।   

18.   
वक्त ने कहा -   
याद करो जवानी   
भूल अपनी।   

19.   
वक्त है लौटा   
बुजुर्ग का सपना   
सब हैं साथ।   

20.
वृद्ध की लाठी
बस गया विदेश
भूला वो माटी। 

- जेन्नी शबनम (24. 12. 2018)

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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

597. बातें (क्षणिका)

बातें 

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रात के अँधेरे में   
मैं ढेरों बातें करती हूँ 
जानती हूँ मेरे साथ 
तुम कहीं नहीं थे   
तुम कभी नहीं थे 
पर सोचती रहती हूँ 
तुम सुन रहे हो 
और खुद से बातें करती हूँ।   

- जेन्नी शबनम (25. 12. 2018)   

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बुधवार, 19 दिसंबर 2018

596. दुःख (दुःख पर 10 हाइकु)

दुःख (10 हाइकु)   

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1.   
दुःख का पारा 
सातवें आसमाँ पे   
मन झुलसा !   

2.   
दुःख का लड्डु   
रोज-रोज यूँ खाना   
बड़ा ही भारी !   

3.   
दुःख की नदी 
बेखटके दौड़ती   
बे रोक-टोक !   

4.   
साथी है दुःख   
साथ है हरदम 
छूटे न दम !   

5.   
दुःख की वेला 
कभी तो गुजरेगी   
मन में आस !   

6.   
दुःख की रोटी 
भरपेट है खाई   
फिर भी बची !   

7.   
दुःख अतिथि 
जाने की नहीं तिथि   
बड़ा बेहया !   

8.   
दुख की माला 
काश ये टूट जाती   
सुकून पाती !   

9.   
मस्त झूमता 
बड़ा ही मतवाला   
दुःख है योगी !   

- जेन्नी शबनम (28. 9. 2018)   

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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

595. अर्थ ढूँढ़ता (10 हाइकु)

अर्थ ढूँढ़ता 
(10 हाइकु)   

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1.   
मन सोचता -   
जीवन है क्या ?   
अर्थ ढूँढता।   

2.   
बसंत आया   
रिश्तों में रंग भरा   
मिठास लाया।   

3.   
याद-चाशनी   
सुख की है मिठाई   
मन को भायी।   

4.   
फिक्र व चिन्ता   
बना गए दुश्मन,   
रोगी है काया।   

5.   
वक्त की धूप   
शोला बन बरसी   
झुलसा मन।   

6.   
सुख व दुख   
यादों का झुरमुट   
अटका मन।   

7.   
खामोश बही   
गुमनाम हवाएँ   
ज्यों मेरा मन।   

8.   
मैं सूर्यमुखी   
तुम्हें ही निहारती   
तुम सूरज।   

9.   
मेरी वेदना   
सर टिकाए पड़ी   
मौन की छाती।   

10.   
छटपटाती   
साँस लेने को   
बीमार हवा।   

- जेन्नी शबनम (23. 11. 2018)   

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गुरुवार, 22 नवंबर 2018

594. रूठना (क्षणिका)

रूठना   

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जब भी रूठी   
खो देने के भय से   
खुद ही मान गई,   
रूठने की आदत तो
बिदाई के वक्त   
खोइँछा से निकाल   
नईहर छोड़ आई। 

- जेन्नी शबनम (22. 11. 18)   

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शनिवार, 17 नवंबर 2018

593. लौट जाऊँगी...

लौट जाऊँगी...   

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कब कहाँ खो आई ख़ुद को   
कब से तलाश रही हूँ ख़ुद को   
बात-बात पर कभी रूठती थी   
अब रूठूँ तो मनाएगा कौन   
बार-बार पुकारेगा कौन   
माँ की पुकार में दुलार का नाम   
अब भी आँखों में ला देता नमी   
ठहर गई है मन में कुछ कमी,   
अब तो यूँ जैसे मैं बेनाम हो गई   
अपने रिश्तों के परवान चढ़ गई   
कोई पुकारे तो यूँ महसूस होता है   
गर्म सीसे का ग़ुब्बारा ज़ोर से मारा है   
कभी मेरी हँसी और ठहाके गूँजते थे   
अब ख़ुद से ही बतियाते मौसम बदलते हैं   
टी वी की शौक़ीन कृषि दर्शन तक देखती थी   
अब टी वी तो चलता है मगर क्या देखा याद नहीं   
वक्त ने एक-एक कर मुझसे मुझको छीन लिया   
ख़ुद को तलाशते-तलाशते वक्त यूँ ही गुज़र गया   
सारे शिकवे शिकायत गंगा से कह आती हूँ   
आँखों का पानी सिर्फ़ गंगा ही देखती है   
वह भी ढाढ़स बँधाने बदली को भेज देती है   
मेरी आँखों-सी बदली भी जब तब बरसती है   
वो मंज़र जाने कब आएगा   
वो सुखद पल जाने कब आएगा   
सारे नातों से घिरी हुई मैं   
एक झूठ के चादर से लिपटी मैं   
सबको ख़ुशामदीद कह जाऊँगी   
तन्हा सफ़र पर लौट जाऊँगी   
खो आई थी कभी ख़ुद को   
ख़ुद से मिल कर   
ख़ुद के साथ चली जाऊँगी   
ख़ुद के साथ लौट जाऊँगी। 

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2018)   

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बुधवार, 7 नवंबर 2018

592. रंगीली दिवाली (दिवाली पर 10 हाइकु)

रंगीली दिवाली
(दिवाली पर 10 हाइकु)

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1.
छबीला दीया
ये रंगीली दिवाली
बिखेरे छटा। 

2.
साँझ के दीप
अँधेरे से लड़ते
वीर सिपाही।

3.
दीये नाचते
ये गुलाबी मौसम
खूब सुहाते। 

4.
झूमती धरा
अमावस की रात
खूब सुहाती। 

5.
दीप-शिखाएँ
जगमग चमके
दीप मालाएँ। 

6.
धूम धड़ाका
बेजुबान है डरा
चीखे पटाखा। 

7.
ज्योत फैलाता
नन्हा बना सूरज
दिवाली रात। 

8.
धरती ने ओढ़ी
जुगनुओं की चुन्नी
रात है खिली। 

9.
सत्य की जीत
दिवाली देती सीख
समझो जरा। 

10.
पेट है भूखा
गरीब की कुटिया,
कैसी दिवाली?

- जेन्ना शबनम (7. 11. 2018)

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