मंगलवार, 3 मार्च 2015

488. स्त्री की डायरी (क्षणिका)

स्त्री की डायरी

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स्त्री की डायरी उसका सच नहीं बाँचती    
स्त्री की डायरी में उसका सच अलिखित छपा होता है  
इसे वही पढ़ सकता है, जिसे वो चाहेगी   
भले दुनिया अपने मनमाफ़िक  
उसकी डायरी में हर्फ़ अंकित कर ले।    

- जेन्नी शबनम (3. 3. 2015)
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6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ... सच लिखा है ... स्त्री के नाम की बात उसको समझने वाला और जिसे वो चाहे वाही जान सकता है ...

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  2. बहुत मार्मिक विचार , मन का सच यही है । गागर में सागर !!

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 5-3-2015 को चर्चा मंच पर हम कहाँ जा रहे हैं { चर्चा - 1908 } पर दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. इस डायरी की अंकन-लिपि पढ़ना प्रत्याक के बस की बात नहीं!

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