भाषा व भाव
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भाषा-भाव का
आपसी नाता ऐसे
शरीर-आत्मा
पूरक होते जैसे,
भाषा व भाव
ज्यों धरती-गगन
चाँद-चाँदनी
सूरज की किरणें
फूल-ख़ुशबू
दीपक और बाती
तन व आत्मा
एक दूजे के बिना
सब अधूरे,
भाव की अभिव्यक्ति
दूरी मिटाती
निकटता बढ़ाती,
भाव के बिना
सम्बन्ध हैं अधूरे
बोझिल रिश्ते
सदा कसक देते
फिर भी जीते
शब्द होते पत्थर
लगती चोट
घुटते ही रहते,
भाषा के भाव
हृदय का स्पंदन
होते हैं प्राण
बिन भाषा भी जीता
मधुर रिश्ता
हों भावप्रवण तो
बिन कहे ही
सब कह सकता
गुन सकता,
भाव-भाषा संग जो
प्रेम पगता
हृदय भी जुड़ता
गरिमा पाता
नज़दीकी बढ़ती
अनकहा भी
मन समझ जाता
रिश्ता अटूट होता।
-जेन्नी शबनम (18.10.2012)
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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार 07-07-2018) को "उन्हें हम प्यार करते हैं" (चर्चा अंक-3025) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर ...
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