शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

813. निशानी (4 सेदोका)

निशानी 


***


1.
मेरी निशानी
पुस्तक में पिरोई,
उम्र की साँझ ढली
वक़्त जो बीता
चाहूँ तो कहाँ खोजूँ
कबाड़ में पुस्तक।

2.
सोच दानव
मुझमें भर क्रोध
मुझे बनाया हंता
वापसी नहीं
अपराध जो हुआ
रब का है फ़ैसला।

3.
काल मानव
मुझमें ढूँढ कमी
मुझे बताया व्यर्थ
लाख कोशिश
असफल ही रही
सदैव रही व्यर्थ।

4.
करे गुहार
अब कौन किससे
सब ख़ुद बेहाल
इंसानियत
घुट-घुटके जीती
कैसी यह नियति।


-जेन्नी शबनम (18.9.2026)
___________________

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें