बुधवार, 17 जून 2026

806. क्षणभंगुर जीवन

क्षणभंगुर जीवन 

***

कितने बहाने
कितने दलील
सब फ़िज़ूल
ठगाया जीवन। 

सोचा समझा
सब बिखरा
आघात मिला
व्यर्थ जीवन। 

उपाय नहीं
समझौता सही
नासमझ नहीं
यही जीवन। 

सोच बदलो
जीवन समझो
अमर नहीं
क्षणभंगुर जीवन।

-जेन्नी शबनम (17.6.2026)
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गुरुवार, 11 जून 2026

805. वृद्ध का दुःख (10 हाइकु)

वृद्ध का दुःख 


***

1.
वृद्ध की आस
कोई तो हो पास
बाँटें वे दुःख।

2.
वृद्ध का दुःख
मन में समाहित
सोचके हित।

3.
वृद्ध का कोना
रिश्तों की राह ताके
रहता सूना।

4.
वृद्ध जीवन
अनुभवों का कोष
लो निःसंकोच।

5.
कोई न सुने
विलाप और रोना,
वृद्ध अकेला।

6.
वृद्ध बेचारा
कोई न सहारा
आँखें सजल।

7.
जवानी पूनो
वृद्ध जीवन अमा
मन बेचैन।

8.
बहते लोर
पोंछे न कोई और
वृद्ध अकेला।

9.
वृद्ध जीवन
अनुभव की आँखें
रखते मूँदे।

10.
जीवनभर
कर्मयोगी था वृद्ध,
अब बेकार।

-जेन्नी शबनम (26.9.2024)
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शुक्रवार, 5 जून 2026

804. नौतपा दैत्य (10 ताँका)

नौतपा दैत्य


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1.
नौतपा दैत्य
किसी को न छोड़ेगा
बचके रहो
घर में छुप जाओ
पानी पी के भगाओ।

2.
होगा बचना
सूरज बना आग
सब हैं डरे
कैसे करें उपाय
ग़रीब असहाय।

3.
जीव बेचैन
गर्मी से हैं बेहाल
बिजली गुल
घमण्डी बना सूर्य
रौद्र रूप दिखाए।

4.
हवा है शांत
बैठी है समाधिस्थ
धूप से जली
समाधि नहीं टूटी
हवा बनी है संत।

5.
हरता प्राण
सूर्य है मृत्यु-देव
नहीं बख़्शता
जीव-जंतु या नदी
पोखर या बावड़ी।

6.
जेठ महीना
बड़ा है तड़पाता
वह निगोड़ा
खुलेआम घूमता
जीव-जंतु छुपता।

7.
सूर्य बेशर्म
ज़रा नहीं है शर्म
लू का गोला
फेंकके ख़ुश होता
चोटिल है दुनिया।

8.
नौतपा शत्रु
लू लेकर दौड़ता
चुनौती देता,
छाता-पानी हारते 
जीव-जंतु हाँफते।

9.
ओह गरमी
ज़रा करो नरमी
जीव बेहाल
जिसका नहीं घर
उसकी पीड़ा हर।

10.
आषाढ़ आओ
जेठ है तड़पाए
नीर बहाओ
सूर्य को समझाओ
ठण्डक को लौटाओ।

-जेन्नी शबनम (4.6.2026)
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मंगलवार, 2 जून 2026

803. यात्री सूरज (चोका- 20)

यात्री सूरज


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यात्री सूरज 

करके रोज़ यात्रा 

थकता होगा 

चलना ही है धर्म 

कोई हो ऋतु

कहीं  पहुँचता,

उसके पाँव

ज़ख़्मी तो होते होंगे

कौन लगाये 

मरहम  पट्टी

दर्द छुपाके

जीवन का सन्देश  

रोज़ ही देता

पर कौन सुनता

जल-जल के

उजाला पसारता,

बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता

एक दिन लो तुम   

सोने का मज़ा

फिर चल पड़ना

बिन ठहरे

हँसते व जलते,

घुमंतू सूर्य!

बात सुन रहा 

 साथ बैठ

ज़रा तो गप्पे लड़ा     

चाय भी पी ले

फिर तू निकलना     

अपनी यात्रा पर।


-जेन्नी शबनम (18.10.2022)

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मंगलवार, 26 मई 2026

802. प्रचण्ड गर्मी (10 हाइकु)

प्रचण्ड गर्मी

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1.
प्रचण्ड गर्मी
धरा उबल रही
सूर्य अलाव।

2.
तपती धरा
हाहाकार है मचा
सूर्य अंगारा।

3.
लू के थपेड़े
सूर्य आग उगले 
सब झुलसे।

4.
रहम करो
प्रकृति पुकारती
सूर्य बहरा।

5.
पड़ा महँगा
प्रकृति से खेलना
क्रूर सूरज।

6.
खेत झुलसा
जीवन का बन्धन
साथ ही टूटा।

7.
प्यासे बेहाल
जीव-जंतु तड़पें 
पानी है खोजें।

8.
पी गया सूर्य
धरा हुई निर्जल 
मृत तलैया।

9.
साँसें ले आईं
खिला गुलमोहर
गरम हवा।

10.
शैतान सूर्य
आग है बरसाता
गर्मी का राजा।

-जेन्नी शबनम (24.5.2026)

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शुक्रवार, 1 मई 2026

801. लाले-लाल

लाले-लाल

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लग रही है बेलगाम बोली 
राजपथ असहाय है
आज़ादी पूर्व का एहसास हो रहा
राजपथ बेचैन है
चंद सरमायेदारों की क्रूरता से घिरा 
राजपथ ज़ख़्मी है।

राजपथ स्वतंत्र हुआ था अनगिनत बलिदानों से
आज उसे फिर शुद्ध लहू की दरकार है
नाम बदला पर कर्त्तव्य पथ न बन सका
राजपथ पर पसरा बड़ा व्यापार है
राजपथ पर हिंसकों का क़ब्ज़ा  
बेग़ैरत हर सरकार है
हर आज़ादी वापस मिले
बेबस जनता की करुण पुकार है
किसानों-श्रमिकों-मज़लूमों एक हो
अब इन्क़िलाब की दरकार है।

राजपथ को आज़ादी चाहिए 
हमें 1947 वाली आज़ादी चाहिए 
ग़रीबी-बेरोज़गारी से आज़ादी चाहिए 
जाति-धर्म से आज़ादी चाहिए 
साम्प्रदायिकता से आज़ादी चाहिए 
सम्पूर्ण देश का विकास चाहिए 
ज्ञान का प्रकाश चाहिए।

आओ नौजवानों बिखेर दो लहू 
हर तरफ़ अब लाले-लाल चाहिए
झंडा लाल, लहू लाल, लाले-लाल 
राजपथ पर हर निशान लाल चाहिए
हर हाथ में क्रांति की मशाल  
खेत हरा और पगड़ी लाल चाहिए
धरा-आसमान सब लाले-लाल 
हर तरफ़ अब लाले-लाल चाहिए।

-जेन्नी शबनम (1.5.2026)
(श्रमिक दिवस)
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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

800. युद्ध जारी है

युद्ध जारी है 


***

युद्ध जारी है
विश्व संकट में है
मिसाइल्स की आतिशबाज़ी गूँज रही है
ध्वस्त हो रही हैं विशाल इमारतें
नष्ट हो रहे हैं देश की सुरक्षा के संसाधन
विधवा हो रही हैं सैनिक की पत्नियाँ
मर रहे हैं नागरिक
अनाथ हो रहे हैं बच्चे।

युद्ध जारी है
अपने अपने दृष्टिकोण से
हर लोग निर्णायक बने हुए हैं
कौन सही, कौन गलत
किसका पक्ष लें, किसे दुत्कारें
किसका साथ दें, किसके ख़िलाफ़ बोलें।

युद्ध जारी है
हर तरफ़ दहशत, ख़ून-ख़राबे
चिथड़े-चिथड़े जिस्म की पहचान नहीं
किसी का अपना शहीद हुआ
न जाने कितनी जानें क़ुर्बान हुईं
इस ख़ौफ़नाक मंज़र पर
कोई जश्न मना रहा
तो कोई छाती पीट रहा।

युद्ध ख़त्म होगा
बेवाओं और अनाथ बच्चों की फ़ौज  
तमाम उम्र मन में युद्ध को जिएँगे
भले असहाय हों, पर नफ़रत करेंगे
युद्धरत देश नए नेता लाएँगे
युद्ध के नए तकनीक लाएँगे
ताकि अगला युद्ध और पुरज़ोर हो सके।

हर युद्ध दुनिया के ख़त्म होने का ज़रिया है
कौन हारा, कौन जीता
किसकी कितनी क्षति हुई
इस पर विवेचना होगी
अपने-अपने पक्ष के देश के साथ
दुनिया खेमों में बँटेगी
अगले युद्ध के इंतज़ार में।

-जेन्नी शबनम (2.4.2026)
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रविवार, 8 मार्च 2026

799. स्त्रियाँ (10 हाइकु)

स्त्रियाँ

*** 

1.
स्त्रियों के हिस्से
परख-आकलन
यही चलन।

2.
स्त्रियाँ हैं फूल
दामन में हैं काँटें
दुःख क्या बाँटे।

3.
स्त्रियाँ-अंगार
आजीवन चलती
नहीं जलती।

4.
स्त्री के बिना
सूना है घर-बार
माने संसार।

5.
स्वयं सींचती
आजीवन पालती
जीव के पौधे।

6.
थाती में मिली
बेबसी व घुटन
स्त्री है बेचारी।

7.
स्त्रियाँ हैं काली
ज़रूरत पड़े तो
करे विध्वंस।

8.
फ़र्ज़ निभाती
मिला कंधे से कन्धा
पुरुष की स्त्री।

9.
आँचल गीला
हँसके पिए पीड़ा
स्त्री का जीवन।

10.
भूखी होती स्त्री
प्यार व सम्मान की
नहीं धन की।

-जेन्नी शबनम (8.3.2026)
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 
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बुधवार, 4 मार्च 2026

798. होली-त्योहार

होली-त्योहार

***

1.
रंगों के संग
फागुन की बयार
होली तैयार।

2.
फूलों की क्यारी
प्रकृति पिचकारी
रंग खेलती।

3.
सूखे गुलाल
लज़ीज़ पकवान
होली त्योहार।

4.
भाँग पीकर
मदमस्त नाचते
रंग-अबीर।

5.
निकली टोली
भूल गिले-शिकवे
सभी हैं रँगे।

6.
रंग क्या चढ़े
आर्टिफ़िशियल है
रंग व रिश्ते।

7.
अपने घर
खींचकर ले आया
होली का रंग।

8.
रंगीली होली
तन ही रँग सकी
मन उदास।

9.
नहीं सुहाता
अब कोई भी रंग
मन बेरंग।

10.
होली हकीम
मिटाए दुःख-दर्द
सुख असीम।

11.
आया अबीर
घोलके पी ली पीर
मन रंगीन।

12.
सबको रँगे
भेदभाव भूलके
बौराई होली।

-जेन्नी शबनम (4.3.2026)
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

797. सफ़र का क़िस्सा

सफ़र का क़िस्सा 

***

मेरे सफ़र की हर शय ग़ुलाम है    
मन के कफ़स में हर लम्हा क़ैद है 
तन की ज़रूरत कब बढ़ी-घटी
मन से मन की बात कब कही
यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं 
पिघलते रहे मन के जज़्बात
छुप न सकी कोई भी बात
सन्नाटे में बैठी रही आँखें मूँद
लरजती रही आँसुओं की बूँद
कौन समझे ग़ैरों के एहसास
अब रहा नहीं कोई आस-पास
मेरे जीवन के सफ़र का क़िस्सा
ज़माने का बना अब रोचक हिस्सा।

-जेन्नी शबनम (26.2.2026)
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

796. पाँव तैयार नहीं

पाँव तैयार नहीं

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राह सामने है, चलने को पाँव तैयार नहीं
खड़े रहने, अड़े रहने को पाँव मददगार नहीं 
पाँव ज़ख़्मी हो गए, अब वे ठहरे रहेंगे
न ज़मीन न स्वर्ग की सीढ़ी पर ये बढ़ेंगे
अब कोई डर नहीं, कहीं जाना नहीं
कहीं पहुँचने की आतुरता नहीं
यह आराम का समय है
तनिक विश्राम का समय है
अपने ठहराव पर खिलखिलाना है
समय के साथ समय बिताना है।

-जेन्नी शबनम (1.1.2026)
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