बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

373. नया घोसला (चोका - 3)

नया घोसला 

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प्यारी चिड़िया 
टुक-टुक देखती  
टूटा घोसला 
फूटे जो सारे अण्डे 
सारे के सारे 
मरे अजन्मे चूजे, 
चीं-चीं करके
फिर चिड़िया रोती
सहमी हुई  
हताश निहारती  
अपनी पीड़ा 
वो किससे बाँटती
धीर धरती।
जोड़-जोड़ तिनका
बसेरा बसा 
बरस व मौसम 
कितने बीते
अब सब बिखरा 
कुछ न बचा 
जिसे कहे आशियाँ,
बचे न निशाँ
झरोखा व मकान 
पुराना, टूटा 
अब घोसला कहाँ?
चिड़िया सोचे-
चिड़ा जब आएगा 
वो भी रोएगा 
अपनी चिड़िया का
दर्द सुनेगा
मनुष्य की क्रूरता 
चुप सहेगा 
संवेदना का पाठ 
वो सिखाएगा!
चिड़ा आया दौड़के 
चीं-चीं सुनके
फिर सिसकी लेके 
आँसू पोंछके 
चिड़ी बोली चिड़े से-
चलो बसाएँ 
आओ तिनके लाएँ 
नया घोसला 
हम फिर सजाएँ
ठिकाना खोजें 
शहर से दूर हो 
जंगल क़रीब हो। 

-जेन्नी शबनम (29.9.2012)
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