नया घोसला
प्यारी चिड़िया
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टुक-टुक देखती
टूटा घोसला
फूटे जो सारे अण्डे
सारे के सारे
मरे अजन्मे चूजे,
चीं-चीं करके
फिर चिड़िया रोती
सहमी हुई
हताश निहारती
अपनी पीड़ा
वो किससे बाँटती
धीर धरती।
जोड़-जोड़ तिनका
बसेरा बसा
बरस व मौसम
कितने बीते
अब सब बिखरा
कुछ न बचा
जिसे कहे आशियाँ,
बचे न निशाँ
झरोखा व मकान
पुराना, टूटा
अब घोसला कहाँ?
चिड़िया सोचे-
चिड़ा जब आएगा
वो भी रोएगा
अपनी चिड़िया का
दर्द सुनेगा
मनुष्य की क्रूरता
चुप सहेगा
संवेदना का पाठ
वो सिखाएगा!
चिड़ा आया दौड़के
चीं-चीं सुनके
फिर सिसकी लेके
आँसू पोंछके
चिड़ी बोली चिड़े से-
चलो बसाएँ
आओ तिनके लाएँ
नया घोसला
हम फिर सजाएँ
ठिकाना खोजें
शहर से दूर हो
जंगल क़रीब हो।
-जेन्नी शबनम (29.9.2012)
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