रविवार, 23 सितंबर 2012

372. मन छुहारा (10 ताँका)

मन छुहारा 

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1.
अपनी आत्मा 
रोज़-रोज़ कूटती 
औरत ढेंकी  
पर आस सँजोती
अपनी पूर्णता की। 

2.
मन पिंजरा
मुक्ति की आस लगी   
उड़ना चाहे 
जाए तो कहाँ जाए
दुनिया तड़पाए। 

3.
न देख पीछे 
सब अपने छूटे
यही रिवाज
दूरी है कच्ची राह 
मन के नाते पक्के। 

4.
ज़िन्दगी सख्त
रोज़-रोज़ घिसती
मगर जीती 
पथरीली राहों पे 
निशान है छोड़ती। 

5. 
मन छुहारा
ज़ख़्म सह-सहके
बनता सख़्त
रो-रोकर हँसना 
जीवन का दस्तूर।   

6.
मन जुड़ाता 
गर अपना होता 
वो परदेसी 
उमर भले बीते 
पर आस न टूटे।  

7.
लहलहाते 
खेत औ खलिहान 
मन हर्षित  
झूमझूम के गाता
ख़ुशहाली के गीत।


8.
मन का दर्द 
तुम अब क्या जानो 
क्यों पहचानो,
हुए जो परदेसी 
छूटे हैं नाते देसी। 

9.
मन बेचारा 
समझ नहीं सका 
वक़्त का खेला 
वे मेहरबानियाँ 
उम्र की नादानियाँ। 

10.
मन की व्यथा 
कोई कैसे समझे,
देखे सबने 
महल की दीवार 
जहाँ रंग हज़ार। 

-जेन्नी शबनम (10.9.2012)
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