शनिवार, 14 जुलाई 2012

355. बनके प्रेम-घटा (4 सेदोका)

बनके प्रेम-घटा 


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1.
मन की पीड़ा 
बूँद-बूँद बरसी
बदरी से जा मिली  
तुम न आए 
साथ मेरे रो पड़ीं  
काली घनी घटाएँ। 

2.
तुम भी मानो 
मानती है दुनिया-
ज़िन्दगी है नसीब
ठोकरें मिलीं  
गिर-गिर सँभली
ज़िन्दगी है अजीब।  

3.
एक पहेली 
उलझनों से भरी 
किससे पूछूँ हल? 
ज़िन्दगी है क्या 
पूछ-पूछके हारी  
ज़िन्दगी है मुश्किल।  

4.
ओ प्रियतम!
बनके प्रेम-घटा 
जीवन पे छा जाओ 
प्रेम की वर्षा 
निरन्तर बरसे
जीवन में आ जाओ। 

-जेन्नी शबनम (13.7.2012)
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