तितली होती
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अक्सर पूछा
ख़ुद से ही सवाल
जिसका हल
नहीं किसी के पास,
मैं ऐसी क्यों हूँ?
मैं चिड़िया क्यों नहीं
या कोई फूल
या तितली ही होती,
यदि होती तो
रंग-बिरंगे होते
मेरे भी रूप
सबको मैं लुभाती
हवा के संग
डाली-डाली फिरती
ख़ूब खिलती
उड़ती व नाचती,
मन में द्वेष
ख़ुद पे अहंकार
कड़वी बोली
इन सबसे दूर
सदा रहती
प्रकृति का सानिध्य
मिलता मुझे
बेख़ौफ़ मैं भी जीती
कभी न रोती
बेफ़िक्री से ज़िन्दगी
ख़ूब मैं जीती
हँसती ही रहती
कभी न मुरझाती।
-जेन्नी शबनम (20.7.2020)
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