आत्मा होती अमर
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1.
छिड़ी है जंग
सच-झूठ के बीच
होगी किसकी जीत?
हारता झूठ
भले देर-सबेर
सच होता विजयी।
2.
दिल बेज़ार
रो-रोकर पूछता
क्यों बनी ये दुनिया?
ऐसी दुनिया-
जहाँ नहीं अपना
रोज़ तोड़े सपना।
3.
कुण्ठित सोच
भयानक है रोग
सर्वनाश की जड़,
खोखले होते
मष्तिष्क के जो पुर्ज़े
बदलाव कठिन।
4.
नश्वर नहीं
फिर भी है मरती
टूट के बिखरती
हमारी आत्मा,
कहते धर्म-ज्ञानी-
अमर होती आत्मा।
5.
अपनी पीड़ा
सदैव लगी छोटी,
ग़ैरों की पीड़ा बड़ी,
ख़ुद को भूल
जी चाहता हर लूँ
सारे जग की पीड़ा।
6.
फड़फड़ाते
पर-कटे पक्षी-से
ख़्वाहिशों के सम्बन्ध,
उड़ना चाहे
पर उड़ न पाएँ
नियत अनुबन्ध।
7.
नहीं विकल्प
मंज़िल की डगर
मगर लें संकल्प
बहुत दूर
विपरीत सफ़र
न डिगेंगे क़दम।
8.
एक पहेली
बूझ-बूझ के हारी
मगर अनजानी,
ये ज़िन्दगानी
निरन्तर चलती
जैसे नदी बहती।
9.
सम्भावनाएँ
सफलता की सीढ़ी
कई राह खोलतीं
जीवित हों तो,
मरने मत देना
सम्भावना जीवन।
10.
पुनरुद्धार
अपनी सोच का हो
अपनी आत्मा का हो
तभी तो होगा
जीवन गतिमान
मंज़िल भी आसान।
11.
मन हवा-सा
बहता ही रहता
गिरता व पड़ता,
अँखियाँ रोके
गुपचुप भागता
चाहे आसमाँ छूना।
12.
चलते जाओ
ज़रा थमो, सँभलो
हिचकोले ज़िन्दगी
हार न मानो,
बढ़ते ही रहना
जब तक हो साँसें।
-जेन्नी शबनम (7.8.2012)
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