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मंगलवार, 2 जून 2026

803. यात्री सूरज (चोका- 20)

यात्री सूरज


***


यात्री सूरज 

करके रोज़ यात्रा 

थकता होगा 

चलना ही है धर्म 

कोई हो ऋतु

कहीं  पहुँचता,

उसके पाँव

ज़ख़्मी तो होते होंगे

कौन लगाये 

मरहम  पट्टी

दर्द छुपाके

जीवन का सन्देश  

रोज़ ही देता

पर कौन सुनता

जल-जल के

उजाला पसारता,

बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता

एक दिन लो तुम   

सोने का मज़ा

फिर चल पड़ना

बिन ठहरे

हँसते व जलते,

घुमंतू सूर्य!

बात सुन रहा 

 साथ बैठ

ज़रा तो गप्पे लड़ा     

चाय भी पी ले

फिर तू निकलना     

अपनी यात्रा पर।


-जेन्नी शबनम (18.10.2022)

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गुरुवार, 21 दिसंबर 2023

770. हँसती हुई नारी (चोका- 19)

हँसती हुई नारी 

***

लगती प्यारी
हँसती हुई नारी
घर-संसार
समृद्धि भरमार
रिश्तों की गूँज
पसरी अनुगूँज
चहके घर
सुवासित आँगन
बच्चों का प्यार
पुरुष से सम्मान
पाकर के स्त्री
चहकती रहती,
खिलखिलाती
सम्बन्धों की फ़सल
लहलहाती
नाचती हैं ख़ुशियाँ
प्रेम-बग़िया
फूलती व फलती,
पाकर प्रेम
पाके अपनापन
भर उमंग
करती निछावर
तन व मन
सूरज-सा करती
निश्छल कर्म
स्त्री सदैव बनती
मददगार
अपने या पराए
चाँद-सी बन
ठण्डक बरसाती
नहीं सोचती
सिर्फ़ अपने लिए
करती पूर्ण
वह हर कर्तव्य
ममत्व-भरा
नारी है अन्नपूर्णा
बड़ी संयमी
मान-प्यार-दुलार
नारी-मन का सार।

-जेन्नी शबनम (7.12.2023)
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शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

765. चहुँ ओर उल्लास (चोका- 18)

चहुँ ओर उल्लास 

***

शहर छीने
गाँव का माटी-घर
मिटती रही
देहरी पर हँसी,
मिट गया है
गाछ का चबूतरा,
जो सुनता था
बच्चों-बूढ़ों की कथा
भोर की बेला,
मिटता गया अब
माटी का दीया
भले आए दीवाली
चारो तरफ़
जगमग बिजली।
कोई न पारे
अँखियाों का काजल
कोने में पड़ा
कजरौटा उदास
बाट जोहता
अबकी दीवाली में
कोई तो पारे।
तरसती रहती
गाँव की धूप
कोई न आता पास
सेंकता धूप
न कोई है बनाता
बड़ी-अचार
बाज़ार ने है छीने
देसी मिठास।
विदेशी पकवान
छीने सुगन्ध
खीर-पूरी-मिठाई
बिसरे सब
भूले त्योहारी गंध
फैला मार्केट
केक व चॉकलेट।
नहीं दिखतीं
वह बुढ़िया दादी
सूप मारतीं
दरिद्दर भगातीं,
दुलारी अम्मा
पकवान बनातीं
ओल का चोखा
आलू का है अचार
अहा! क्या स्वाद!
भूले हम संस्कृति
अतीत बनी
पुरानी सब रीति
सारा त्योहार
अब बना व्यापार।
कैसी दीवाली
अपने नहीं पास!
बिसरो दुःख
सजो और सँवरो
दीप जलाओ
मन में भरो आस
चहुँ ओर उल्लास।

-जेन्नी शबनम (10.11.2023)
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सोमवार, 6 नवंबर 2023

764. शहर के पाँ (चोका- 17)

शहर के पाँ 

***

शहर के पाँ
धीरे-धीरे से चले
चल न सके
पगडंडियों पर
गाड़ी से चले
पहुँच गए गाँव।
दिखा है वहाँ
मज़दूर-किसान
सभी हैं व्यस्त
कर्मों में नियमित
न थके-रुके
कर खेती-किसानी।
शहर सोचे-
अजीब हैं ये लोग
नहीं चाहते
बहुमंज़िला घर
नहीं है चाह
करोड़पति बनें 
संतुष्ट बड़े
जीवन से हैं ख़ुश।
धूर्त शहर
नौजवानों को चुना
भेजा शहर
चकाचौंध शहर
निगल गया
नौजवानों का तन
हारा है मन।
आलीशान मकान
सड़कें पक्की
जगमग हैं रातें
ठौर-ठिकाना
अब कहाँ वे खोजें?
कहाँ रहते?
फुटपाथ है घर
यही ठिकाना। 
गाँव रहता दुःखी
पीड़ा जानता
पर कहता किसे 
बना है गाँव
कंक्रीट का शहर
कंक्रीट रोड
जगमग बिजली।
राह ताकती
गाँव की बूढ़ी आँखें
गुम जवानी
आस से हैं बुलातीं-
वापस आओ
नहीं चाहिए धन
नहीं चाहिए
कंक्रीट का महल
अपनी मिट्टी
सब ख़त्म हो गई
ख़त्म हो गई 
वो पुश्तैनी ज़मीन।
अंततः आया
वह आख़िरी पल
आया जवान
बेचके नौजवानी
गाँव की मिट्टी
लगती अनजानी
घर है सूना
अब न दादी-दादा 
न अम्मा-बाबा
कई पुश्त गुज़रे
नहीं निशानी
लगातार चलते
नहीं थकते
लगातार ढूँढते
फिर से नया गाँव।

-जेन्नी शबनम (6.11.2023)
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सोमवार, 2 अक्टूबर 2023

763. काँच के ख़्वाब (चोका- 16)

काँच के ख़्वाब 

 ***


काँच के ख़्वाब 

फेरे जो करवट

चकनाचूर 

हुए सब-के-सब,

काँच के ख़्वाब 

दूसरा करवट

लगे पलने

फेरे जो करवट

चकनाचूर

फिर सब-के-सब,

डर लगता

कहीं नींद जो आई

काँच के ख़्वाब 

पनपने  लगे,

ख़्वाब देखना

हर पल टूटना

अनवरत

मानो टूटता तारा

आसमाँ रोता

मन यूँ ही है रोता,

ख़्वाब देखता

करता नहीं नागा

मन बेचारा

ज्यों सूरज उगता,

हे मन मेरा!

समझ तू ये खेला

काँच का ख़्वाब 

यही नसीब तेरा

 देख ख़्वाब 

जिसे होना  पूरा,

चकोर ताके 

चन्दा है मुस्कुराए

मुँह चिढ़ाए

पहुँच नहीं पाए

जान गँवाए

यूँ ही काँच के ख़्वाब 

मन में पले

उम्मीद है जगाए,

पूरे  होते

फेरे जो करवट 

चकनाचूर 

होते सब-के-सब

मेरे काँच के ख़्वाब। 


-जेन्नी शबनम (25.9.2023)

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गुरुवार, 3 अगस्त 2023

761. बिछड़े खेत (चोका- 15)

बिछड़े खेत

*** 


खेत बेचारे   

एक दूजे को देखें   

दुख सुनाएँ   

भाई-भाई से वे थे   

सटे-सटे-से   

मेड़ से जुड़े हुए,   

बिछड़े खेत   

बिक गए जो खेत   

वे रोते रहे   

मेड़ बना बाउंड्री   

कंक्रीट बिछे   

खेत से उपजेंगे   

बहुमंज़िला   

पत्थर-से मकान,   

खेत के अन्न   

शहर ने निगले   

बदले दिए   

कंक्रीट के जंगल,   

खेत का दर्द   

कोई  समझता   

धन की माया   

समझे सरमाया,   

खेत-किसान   

बेबस  लाचार   

हो रहे ख़त्म   

अन्नखेतकिसान   

खेत  बचा   

अन्न कहाँ उपजे?   

कौन क्या खाए?   

 सरमायादार   

अब तू पत्थर खा।  


- जेन्नी शबनम (2.8.2023)

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रविवार, 18 अक्टूबर 2020

690. चलते ही रहना (चोका - 14)

चलते ही रहना 

*** 

जीवन जैसे   
अनसुलझी हुई   
कोई पहेली   
उलझाती है जैसे   
भूलभूलैया,   
क़दम-क़दम पे   
पसरे काँटें   
लहूलुहान पाँव   
मन में छाले   
फिर भी है बढ़ना   
चलते जाना,   
जब तक हैं साँसें   
है तब तक   
दुनिया का तमाशा   
खेल दिखाए   
संग-संग खेलना   
सब सहना,   
इससे पार जाना   
सम्भव नहीं   
सारी कोशिशें व्यर्थ   
कठिन राह   
मन है असमर्थ,   
मगर हार   
कभी मानना नहीं   
थकना नहीं   
कभी रुकना नहीं   
झुकना नहीं   
चलते ही रहना   
न घबराना   
जीवन ऐसे जीना   
जैसे तोहफ़ा   
कुदरत से मिला   
बड़े प्यार से   
बड़ी हिफाज़त से   
सँभाल कर जीना।    

-जेन्नी शबनम (18.10.2020)
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सोमवार, 20 जुलाई 2020

678. तितली होती (चोका - 13)

तितली होती 

*** 

अक्सर पूछा   
ख़ुद से ही सवाल   
जिसका हल   
नहीं किसी के पास,   
मैं ऐसी क्यों हूँ?   
मैं चिड़िया क्यों नहीं   
या कोई फूल   
या तितली ही होती,   
यदि होती तो   
रंग-बिरंगे होते   
मेरे भी रूप   
सबको मैं लुभाती   
हवा के संग   
डाली-डाली फिरती   
ख़ूब खिलती   
उड़ती व नाचती,   
मन में द्वेष   
ख़ुद पे अहंकार   
कड़वी बोली   
इन सबसे दूर   
सदा रहती   
प्रकृति का सानिध्य   
मिलता मुझे   
बेख़ौफ़ मैं भी जीती   
कभी न रोती   
बेफ़िक्री से ज़िन्दगी   
ख़ूब मैं जीती   
हँसती ही रहती   
कभी न मुरझाती। 

-जेन्नी शबनम (20.7.2020)
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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

618. जीवन-पथ (चोका - 12)

जीवन-पथ    

***   

जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से 
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अँधेरा   
डर-डर के   
क़दम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
ख़ुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता।    

-जेन्नी शबनम (8.6.2019) 
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गुरुवार, 28 मार्च 2019

611. जीवन मेरा (चोका - 11)

जीवन मेरा    

***   

मेरे हिस्से में   
ये कैसा सफ़र है   
रात व दिन   
चलना जीवन है,   
थक जो गए   
कहीं ठौर न मिला   
चलते रहे   
बस चलते रहे,   
कहीं न छाँव   
कहीं मिला न ठाँव   
बढ़ते रहे   
झुलसे मेरे पाँव,   
चुभा जो काँटा   
पीर सह न पाए   
मन में रोए   
सामने मुस्कुराए,   
किसे पुकारें   
मन है घबराए   
अपना नहीं   
सर पे साया नहीं,   
सुख व दु:ख   
आँखमिचौली खेले   
रोके न रुके   
तंज हमपे कसे,   
अपना सगा   
हमें छला हमेशा   
हमारी पीड़ा   
उसे लगे तमाशा,   
कोई पराया   
जब बना अपना   
पीड़ा सुनके   
संग-संग वो चला,   
किसी का साथ   
जब सुकून देता   
पाँव खींचने   
ज़माना है दौड़ता,   
हमसफ़र   
काश! कोई तो होता   
राह आसान   
सफ़र पूरा होता,   
शाप है हमें   
कहीं न पहुँचना   
अनवरत   
चलते ही रहना   
यही जीवन मेरा।   

-जेन्नी शबनम (26.3.2019)   
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सोमवार, 28 जनवरी 2019

603. वक़्त की मर्ज़ी (चोका - 10)

वक़्त की मर्ज़ी    

***   

वक़्त की गति   
करती निर्धारित   
मन की दशा   
हो मन प्रफुल्लित   
वक़्त भागता   
सूर्य की किरणों-सा   
मनमौजी-सा   
पकड़ में न आता   
मन में पीर   
अगर बस जाए   
बीतता नहीं   
वक़्त थम-सा जाता   
जैसे जमा हो   
हिमालय पे हिम   
कठोरता से   
पिघलना न चाहे,   
वक़्त सजाता   
तोहफ़ों से ज़िन्दगी   
निर्ममता से   
कभी देता है सज़ा   
बिना कुसूर   
वक़्त है बलवान   
वक़्त की मर्ज़ी   
जिधर लेके चले   
जाना ही होता   
बिना किए सवाल   
बिना दिए जवाब।    

-जेन्नी शबनम (28.1.2019)   
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

588. नमन बापू (चोका - 9)

नमन बापू    

***   

जन्म तुम्हारा   
सौभाग्य है हमारा   
तुमने दिया   
जग को नया ज्ञान   
हारे-पिछड़े   
थे वक़्त के जो मारे   
दुःख उनका   
सह न पाए तुम   
तुमने किया   
अहिंसात्मक जंग   
तुमने कहा-   
सत्य और अहिंसा   
सच्चे विचार   
स्वयं पर विजय   
यही था बस   
तुम्हारा हथियार   
तुम महान   
लाए नया विहान   
दूर भगाया   
विदेशी सरमाया   
मगर देखो   
तुम्हारा उपकार   
भूला संसार   
छल से किया वार   
दिया आघात   
जो अपने तुम्हारे   
सीना छलनी   
हुई लहूलुहान   
तुम्हारी भूमि   
प्राण पखेरू उड़े   
तुम निष्प्राण   
जग में कोहराम   
ओह! हे राम!   
यह क्या हुआ राम!   
हिंसा से हारा   
अहिंसा का पुजारी      
अच्छा ही हुआ   
न देखा यह सब   
देख न पाते   
तुम्हारी कर्मभूमि   
खण्डों में टूटी   
तुम्हारा बलिदान   
हुआ है व्यर्थ   
तुम्हारे अपने ही   
छलते रहे   
खंजर भोंक रहे   
अपनों को ही   
तुम्हारी शिक्षा भूल   
तुम्हारा सोच    
दर्शन-मत, त्याग   
घिनौने कार्य   
तुम्हारे नाम पर   
ओह! दुःखद!   
हम नहीं भूलेंगे   
अपनाएँगे   
तुमसे सीखा पाठ   
नमन बापू   
पूजनीय हो तुम   
अमर रहो तुम!   

-जेन्नी शबनम (2.10.2018)
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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

577. रंगरेज़ हमारा (चोका - 2)

रंगरेज़ हमारा   

***  

सुहानी संध्या   
डूबने को सूरज   
देखो नभ को 
नारंगी रंग फैला   
मानो सूरज   
एक बड़ा संतरा,   
साँझ की वेला   
दीया-बाती जलाओ   
गोधूली-वेला 
देवता को जगाओ   
ऋचा सुनाओ   
अपनी संस्कृति को   
न बिसराओ,   
शाम होते ही जब   
लौटते घर   
विचरते परिन्दे    
गलियाँ सूनी   
जगमग रोशनी   
वो देखो चन्दा   
हौले-हौले मुस्काए   
साँझ ढले तो   
सूरज सोने जाए   
तारे चमके   
टिम-टिम झलके   
काली स्याही से   
गगन रंग देता   
बड़ा सयाना   
रंगरेज़ हमारा   
सबका प्यारा   
अनोखी ये दुनिया   
किसने रची!  
हर्षित हुआ मन   
घर-आँगन   
देख सुन्दर रूप   
चकित निहारते।   

-जेन्नी शबनम (13.8.2012)
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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

576. भाषा व भाव (चोका - 4)

भाषा व भाव   

***  

भाषा-भाव का   
आपसी नाता ऐसे   
शरीर-आत्मा   
पूरक होते जैसे,   
भाषा व भाव   
ज्यों धरती-गगन   
चाँद-चाँदनी   
सूरज की किरणें   
फूल-ख़ुशबू    
दीपक और बाती   
तन व आत्मा   
एक दूजे के बिना   
सब अधूरे,      
भाव की अभिव्यक्ति   
दूरी मिटाती    
निकटता बढ़ाती,   
भाव के बिना   
सम्बन्ध हैं अधूरे   
बोझिल रिश्ते   
सदा कसक देते   
फिर भी जीते   
शब्द होते पत्थर   
लगती चोट   
घुटते ही रहते,   
भाषा के भाव   
हृदय का स्पंदन   
होते हैं प्राण   
बिन भाषा भी जीता   
मधुर रिश्ता   
हों भावप्रवण तो   
बिन कहे ही   
सब कह सकता   
गुन सकता,   
भाव-भाषा संग जो   
प्रेम पगता   
हृदय भी जुड़ता   
गरिमा पाता   
नज़दीकी बढ़ती   
अनकहा भी   
मन समझ जाता   
रिश्ता अटूट होता।  

-जेन्नी शबनम (18.10.2012)
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