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बुधवार, 9 सितंबर 2026

811. जीवन जाल (10 सेदोका)

जीवन जाल 

***

1. 
जीवन जाल 
जो सुलझे न कभी  
ऐसा यह जंजाल 
मिलता नहीं 
कोई ओर या छोर 
न रास्ता किसी ओर।

2.
तमाम उम्र 
अभिनय में बीता
सच कोई न जाना, 
मुख पे हँसी 
मन में व्याप्त पीड़ा  
कौन समझ पाया?

3. 
जीवन स्वाँग
पल-पल गँवाया  
जीवन हुआ व्यर्थ 
जी नहीं सकी  
अंत समय आया 
मन है पछताया।  

4.
वक़्त देखता  
टकटकी लगाए 
अपना हर खेल, 
उसे है पता 
किसी का न चलता 
उसपे कोई ज़ोर।    

5. 
चौसठ कला 
लगे चौसठ दिन  
गुरु संदीपनी ने 
सिखाई कला 
कृष्ण और सुदामा 
बलराम भी साथ।  
  
6.
मेरी सहेली  
नहीं है तू अकेली 
साथ है छाया तेरी  
साहस रख  
मत छोड़ना आस 
रखना तू विश्वास।  

7. 
सुन्दर जग 
बेजोड़ शिल्पकारी 
किसने कब की थी? 
धरा-गगन 
नदिया व पहाड़ 
अजब कलाकारी। 

8.
वक़्त प्रहरी 
चौकीदारी करता 
रात हो या दिन हो, 
पर झेलता 
सबका रंजो-ग़म 
मगर न थकता। 

9.
भेष बदले  
वक़्त बहुरूपिया  
सबको भय दिखा 
ठठाके हँसे 
ये नहीं नादानी  
उसकी मनमानी। 

10. 
सब्र के फल 
दुःख के पकवान 
मैंने जीभर खाए 
अंततः हारी  
जीवन बना ख़ार  
मन है तार-तार। 

-जेन्नी शबनम (8.9.2026)
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शनिवार, 27 जून 2026

807. बनूँ गुलमोहर (8 सेदोका)

बनूँ गुलमोहर 

***

1.
ज़िन्दगी हँसी
लिपटके रंगों से
खिले फूल हसीन,
मन चाहता
ओढ़कर रंगीनी
बनूँ गुलमोहर।

2.
पसरा हुआ
उदासी का मंज़र 
रेगिस्तानी है फ़िज़ा 
मन सहमा
हर शय ग़ुलाम
कैसा वक़्त है आया।

3. 
लगती भारी
मन में जो है बंद    
सपनों की गठरी
मन चाहता
खोलकर गठरी
सपनों को उड़ाती।

4.
सुनता नहीं 
बेपरवाह मन
करता मनमानी
जग से टूटा
पर नाता न छूटा
ये जगत् मोह-माया। 

5.

हे सूर्य देव!

ज़रा रहम करो 

धरती को बचाओ 

मेघ को भेजो  

तपते जीव-जन्तु

करुणा दिखलाओ। 


6.

बाण व बात
हैं तीव्र हथियार

छूटे तो लौटे नहीं

माने न हार 

करें क्रूर प्रहार
तन-मन छलनी। 


7.
भले अबेर
मिलती है मंज़िल 
देर हो या सबेर
जीवन-पथ 
सूर्य-सा या चाँद-सा 
चलना निरन्तर।

8.
जीवन-तप 
राह में लाखों काँटे
कठिन है चलना 
यही कर्त्तव्य   
न कभी घबराना    
न कभी ठहरना

-जेन्नी शबनम (26.6.2026)
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शुक्रवार, 12 मार्च 2021

712. रिश्ते (रिश्ते पर 20 सेदोका)

रिश्ते  

*** 

1. 
रिश्ते हैं फूल   
भौतिकता ने छीने   
रिश्तों के रंग-गन्ध    
मुरझा गए,   
नहीं कोई उपाय   
कैसे लौटे सुगन्ध।   

2. 
रिश्ते हैं चाँद   
समय है बादल   
ओट में जाके छुपा   
समय स्थिर   
ओझल हुए रिश्ते   
अमावस पसरी।   

3. 
पावस रिश्ते   
वक़्त ने किया छल   
छिन्न-भिन्न हो गए   
मिटी है आस   
मन का प्रदूषण   
मारता तिल-तिल।   

4. 
कुण्ठित मन   
रिश्ते हो गए ध्वस्त   
धीरे-धीरे अभ्यस्त   
वापसी कैसे?   
जेठ की धूप जैसे   
कठोर ज़िद्दी मन।   

5. 
रिश्तों का क़त्ल    
रक्त बिखरा पड़ा   
क़ातिल हैं अपने,   
रोते ही रहे   
कैसे दे पाते सज़ा   
अपराधी अपने।   

6. 
टोना-टोटका   
किसी ने तो है किया   
मृतप्राय है रिश्ता,   
ओझा भी हारा   
झाड़-फूँक है व्यर्थ   
हम हैं असमर्थ।   

7. 
मन आहत   
वक़्त का काला जादू   
रिश्ते बने बोझिल,   
वक़्त मिटाए   
नज़र का दिठौना   
औघड़ निरूपाए।   

8. 
बावरा मन   
रिश्तों की बाट जोहे   
देकर के दुहाई,   
आस का पंछी   
अब भी है जीवित   
शायद प्राण लौटें।   

9. 
रिश्ते पखेरू   
उड़के चले गए   
दाना-पानी न मिला   
खो गए रिश्ते,   
नहीं आते चुगने    
कितना भी बुलाओ।   

10. 
जिलाके रखो   
मन भर दुलारो   
कभी खोए न रिश्ते   
मर जो गए   
कितने भी जतन   
लौटते नहीं रिश्ते।   

11. 
वाणी का तीर   
मन हुआ छलनी   
घायल हुए रिश्ते   
मन की पीर   
कोई कहे किससे   
दिल गया है छील।   

12. 
दुर्गम रास्ते   
चल सको अगर   
सँभलकर चलो   
रिश्ते सँभालो,   
पाँव छिले, लगा लो   
रिश्तों के मलहम।   

13. 
घायल रिश्ता   
लहूलुहान पड़ा   
ज्यों पर-कटा पक्षी,   
छटपटाए   
पर उड़ न पाए   
आजीवन तड़पे।   

14. 
अजब दौर   
बँट गई दीवारें   
ज्यों रिश्ते हों कटारें,   
भेज न पाएँ   
मन की पीर-पाती   
बन्द हो गए द्वारे।   

15. 
रिश्ते दरके   
रिस-रिसके बहे   
नस-नस के आँसू,   
मन घायल   
संवेदना है मौन   
समझे भला कौन?   

16. 
बादल रिश्ते   
जमकर बरसे   
प्रेम के फूल खिले,   
मन भँवरा   
प्रेम की फूलवारी   
सुगन्ध से अघाए।   

17. 
मौसम स्तब्ध   
रिश्ते की मौत हुई   
आसमाँ भी रो पड़ा,   
नज़र लगी   
हँसी भी रूठ गईं   
मातम है पसरा।   

18. 
खिलते रिश्ते   
साथ जो हैं चलते   
खनकती है हँसी   
साथ जो रहें   
कोई कभी न तन्हा   
आए आँधी या तूफाँ।   

19. 
गाछ-से रिश्ते   
कभी तो हरियाए   
कभी तो मुरझाए   
प्रीत-बरखा   
बरसते जो रहे   
गाछ उन्मुक्त जिए।   

20. 
रिश्तों की डोर   
कभी मत तू छोड़   
रख मुट्ठी में जोड़   
हाथ से छूटे   
कटी गुड्डी-से रिश्ते   
साबुत नहीं मिले।   

-जेन्नी शबनम (29.1.2021)   
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शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

580. प्रकृति (प्रकृति पर 12 सेदोका)

प्रकृति
   

***  

1.   
अपनी व्यथा   
गुमसुम प्रकृति   
किससे वो कहती   
बेपरवाह   
कौन समझे दर्द   
सब स्वयं में व्यस्त।   

2.   
पर्वत, वन    
सूर्य, नदी, पवन   
सब हुए बेहाल   
लड़खड़ाती   
साँसें सबकी डरी   
प्रकृति है लाचार।   

3.   
कौन है दोषी?   
काट दिए हैं वन   
उगा कंक्रीट-वन   
मानव दोषी,   
मगर है कहता-   
प्रकृति अपराधी।   

4.   
दोषारोपण   
जग की यही रीत   
कोई न जाने प्रीत   
प्रकृति तन्हा   
किस-किस से लड़े   
कैसे वो ज़ख़्म सिले।   

5.   
नदियाँ प्यासी   
दुनिया ने है छीनी    
उसका मीठा पानी,   
करो विचार   
प्रकृति है लाचार   
कैसे बुझाए प्यास।   

6.   
बाँझ निगोड़ी   
कुम्हलाई धरती   
नि:संतान मरती   
सूखा व बाढ़   
प्रकृति का प्रकोप   
ओह! धरा बेचारी।   

7.   
सब रोएँगे   
साँसें जब घुटेंगी   
प्रकृति भी रोएगी,   
वक़्त है अभी   
प्रकृति को बचा लो   
दुनिया को बसा लो।   

8.   
विषैले नाग   
ये कल-कारखाना   
ज़हर उगलते   
साँसें उखड़ी   
ज़हर पी-पीकर   
प्रकृति है मरती।   

9.   
लहूलुहान   
खेत व खलिहान   
माँगता बलिदान   
रक्त पिपासु   
ख़ुद मानव बना   
धरा का ख़ून पिया।   

10.   
प्यासी नदियाँ   
प्यासी तड़पे धरा   
प्यासी है प्रकृति भी  
छाई उदासी,   
अभिमानी मानव   
विध्वंस को आतुर।

11.
दानी सूरज 
सदाव्रत बाँटता 
फिर भी न घटता 
उसका तेज 
जगमग करता 
जगत को जगाता। 

12.
प्रकृति रोती 
नोचता-खसोटता 
बदन उघारता 
मानव लोभी,
प्रकृति का है दोषी 
मानव असंवेदी। 
   

-जेन्नी शबनम (23.5.2018)
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शनिवार, 18 जून 2016

516. मन-आँखों का नाता (4 सेदोका)

मन-आँखों का नाता  

***  

1.
गहरा नाता  
मन-आँखों ने जोड़ा  
जाने दूजे की भाषा,  
मन जो सोचे-  
अँखियों में झलके  
कहे सम्पूर्ण गाथा।   

2.
मन ने देखे  
झिलमिल सपने  
सारे के सारे अच्छे,  
अँखियाँ बोलें-  
सपने तो सपने  
नहीं होते अपने।   

3.  
बावरा मन  
कहा नहीं मानता  
मनमर्ज़ी करता,  
उड़ता जाता  
आकाश में पहुँचे  
अँखियों को चिढ़ाए।   

4.  
आँखें ही होती  
यथार्थ हमजोली  
देखे अच्छी व बुरी,  
मन बावरा  
आँखों को मूर्ख माने  
धोखा तभी तो खाए।  
 
-जेन्नी शबनम (18.6.2016)
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शनिवार, 23 मार्च 2013

394. आत्मा होती अमर (12 सेदोका)

आत्मा होती अमर 

***

1.
छिड़ी है जंग 
सच-झूठ के बीच 
होगी किसकी जीत?
हारता झूठ   
भले देर-सबेर  
सच होता विजयी।   

2.
दिल बेज़ार 
रो-रोकर पूछता
क्यों बनी ये दुनिया?
ऐसी दुनिया-
जहाँ नहीं अपना 
रोज़ तोड़े सपना। 

3.
कुण्ठित सोच 
भयानक है रोग 
सर्वनाश की जड़,
खोखले होते 
मष्तिष्क के जो पुर्ज़े  
बदलाव कठिन। 

4.
नश्वर नहीं
फिर भी है मरती 
टूट के बिखरती 
हमारी आत्मा, 
कहते धर्म-ज्ञानी-
अमर होती आत्मा। 

5.
अपनी पीड़ा 
सदैव लगी छोटी,
ग़ैरों की पीड़ा बड़ी,
ख़ुद को भूल  
जी चाहता हर लूँ 
सारे जग की पीड़ा। 

6.
फड़फड़ाते
पर-कटे पक्षी-से
ख़्वाहिशों के सम्बन्ध,
उड़ना चाहे  
पर उड़ न पाएँ  
नियत अनुबन्ध। 

7.
नहीं विकल्प 
मंज़िल की डगर 
मगर लें संकल्प 
बहुत दूर 
विपरीत सफ़र 
न डिगेंगे क़दम। 

8.
एक पहेली 
बूझ-बूझ के हारी 
मगर अनजानी, 
ये ज़िन्दगानी 
निरन्तर चलती 
जैसे नदी बहती। 

9.
सम्भावनाएँ
सफलता की सीढ़ी 
कई राह खोलतीं
जीवित हों तो,
मरने मत देना 
सम्भावना जीवन।  

10.
पुनरुद्धार 
अपनी सोच का हो
अपनी आत्मा का हो  
तभी तो होगा 
जीवन गतिमान 
मंज़िल भी आसान। 

11.
मन हवा-सा  
बहता ही रहता  
गिरता व पड़ता,  
अँखियाँ रोके
गुपचुप भागता  
चाहे आसमाँ छूना।

12.
चलते जाओ
ज़रा थमो, सँभलो 
हिचकोले ज़िन्दगी 
हार न मानो,
बढ़ते ही रहना 
जब तक हो साँसें।  

-जेन्नी शबनम (7.8.2012)
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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

384. यादें जो है ज़िन्दगी (8 सेदोका)

यादें जो है ज़िन्दगी 

***

1.
वर्षा की बूँदें 
टप-टप बरसे 
मन का कोना भींगे, 
सींचती रही 
यादें खिलती रही  
यादें जो है ज़िन्दगी। 

2.
जी ली जाती है 
कुछ लम्हें समेट
पूरी यह ज़िन्दगी,
पूर्ण भले हो  
मगर टीसती है 
लम्हे-सी ये ज़िन्दगी। 

3.
महज़ नहीं
हाथ की लकीरों में 
ज़िन्दगी के रहस्य,
बतलाती हैं 
माथे की सिलवटें 
ज़िन्दगी के रहस्य। 

4.
सीली ज़िन्दगी 
वक़्त के थपेड़ों से 
जमती चली गई 
कैसे पिघले?
हल्की-सी तपिश भी 
ज़िन्दगी लौटाएगी। 

5.
शैतान हवा 
पलट दिया पन्ना 
खुल गई किताब 
थी अधपढ़ी
ज़माने से थी छुपी 
ज़िन्दगी की कहानी। 

6.
जीवन लघु 
पानी का बुलबुला
दो पल का न पता  
क्षणभंगुर,
कर्म न्यायसंगत 
यादें होंगी अमर। 

7.
पानी-सा मन 
बह जाता उधर 
होता ढाल जिधर,
यादों का पानी   
वक़्त की थाप पर 
थिरकता मगर। 

8.
बड़ी कोमल 
बहुत ही हसीन 
छुई-मुई ज़िन्दगी 
इसे न छेड़ो 
गर रूठ जो गयी 
बस यादें बचेंगी। 

-जेन्नी शबनम (24.9.2012)
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शनिवार, 14 जुलाई 2012

355. बनके प्रेम-घटा (4 सेदोका)

बनके प्रेम-घटा 


*** 

1.
मन की पीड़ा 
बूँद-बूँद बरसी
बदरी से जा मिली  
तुम न आए 
साथ मेरे रो पड़ीं  
काली घनी घटाएँ। 

2.
तुम भी मानो 
मानती है दुनिया-
ज़िन्दगी है नसीब
ठोकरें मिलीं  
गिर-गिर सँभली
ज़िन्दगी है अजीब।  

3.
एक पहेली 
उलझनों से भरी 
किससे पूछूँ हल? 
ज़िन्दगी है क्या 
पूछ-पूछके हारी  
ज़िन्दगी है मुश्किल।  

4.
ओ प्रियतम!
बनके प्रेम-घटा 
जीवन पे छा जाओ 
प्रेम की वर्षा 
निरन्तर बरसे
जीवन में आ जाओ। 

-जेन्नी शबनम (13.7.2012)
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