ताँका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ताँका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 5 जून 2026

804. नौतपा दैत्य (10 ताँका)

नौतपा दैत्य


***

1.
नौतपा दैत्य
किसी को न छोड़ेगा
बचके रहो
घर में छुप जाओ
पानी पी के भगाओ।

2.
होगा बचना
सूरज बना आग
सब हैं डरे
कैसे करें उपाय
ग़रीब असहाय।

3.
जीव बेचैन
गर्मी से हैं बेहाल
बिजली गुल
घमण्डी बना सूर्य
रौद्र रूप दिखाए।

4.
हवा है शांत
बैठी है समाधिस्थ
धूप से जली
समाधि नहीं टूटी
हवा बनी है संत।

5.
हरता प्राण
सूर्य है मृत्यु-देव
नहीं बख़्शता
जीव-जंतु या नदी
पोखर या बावड़ी।

6.
जेठ महीना
बड़ा है तड़पाता
वह निगोड़ा
खुलेआम घूमता
जीव-जंतु छुपता।

7.
सूर्य बेशर्म
ज़रा नहीं है शर्म
लू का गोला
फेंकके ख़ुश होता
चोटिल है दुनिया।

8.
नौतपा शत्रु
लू लेकर दौड़ता
चुनौती देता,
छाता-पानी हारते 
जीव-जंतु हाँफते।

9.
ओह गरमी
ज़रा करो नरमी
जीव बेहाल
जिसका नहीं घर
उसकी पीड़ा हर।

10.
आषाढ़ आओ
जेठ है तड़पाए
नीर बहाओ
सूर्य को समझाओ
ठण्डक को लौटाओ।

-जेन्नी शबनम (4.6.2026)
__________________

बुधवार, 20 नवंबर 2024

782. ज़िन्दगी

ज़िन्दगी


1. 
ज़िन्दगी चली
बिना सोचे-समझे
किधर मुड़े?
कौन बताए दिशा
मंज़िल मिले जहाँ। 

2. 
मालूम नहीं 
मिलती क्यों ज़िन्दगी
बेइख़्तियार,
डोर जिसने थामे
उड़ने से वो रोके। 

3. 
अब तो चल 
ऐ ठहरी ज़िन्दगी!
किसका रस्ता
तू देखे है निगोड़ी
तू है तन्हा अकेली। 

4. 
चहकती है  
खिली महकती है
ज़िन्दगी प्यारी
जीना तो है जीभर
यह सारी उमर। 

5. 
बनी जो कड़ी
ज़िन्दगी की ये लड़ी
ख़ुशबू फैली,
मन होता बावरा
ख़ुशी जब मिलती। 

6. 
फिर है खिली
ज़िन्दगी की सुबह
शाम सुहानी,
मन नाचे बारहा
सौग़ात जब मिली। 

7. 
नहीं है जानी  
नहीं है पहचानी
राह जो चली,
ज़िन्दगी अनजानी
पर नहीं कहानी।

-जेन्नी शबनम (19.10.24)
__________________ 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

780. कुछ ताँका (28 ताँका)

बच्चे 

1.
बच्चों के बिना 
फीका है पकवान 
सूना घर-संसार,
लौटते ही बच्चों के 
होता पर्व-त्योहार।
  
2. 
तोतली बोली
माँ-बाबा को पुकारे
वो नौनिहाल,
बोली सुन-सुनके 
माँ-बाबा हैं निहाल।   

3. 
नींद से जाग 
मचाते हर भोर
बहुत शोर,
तूफ़ान साथ जाए
जाते जब वे स्कूल। 

4. 
गुंजित घर  
बच्चे की किलकारी
माँ जाती वारी
नित सुबह-शाम
बिना लिए विराम। 

5. 
सुबह-शाम
होता बड़ा उधम,
ढेरों हैं बच्चे
संयुक्त परिवार
रौशन घर-बार। 

6. 
बच्चों की अम्मा
व्यस्त रहती सदा
काम का टीला 
धीरे-धीरे ढाहती 
ज़रा भी न थकती।  

7. 
जीव या जन्तु 
सबकी माँ करती 
बच्चों की चिन्ता,  
प्रकृति की रचना  
स्त्री अद्भुत स्वरूपा।  
-0-

बेटियाँ

1. 
नन्ही-सी परी
खेले आँख-मिचौली,
माँ-बाबा हँसे
देखे थे जो सपने
हुए वे सब पूरे। 

2. 
छोटी-सी कली
अम्मा छोड़ जो चली
हो गई बड़ी,
अब बिटिया नन्हीं
सबकी अम्मा बनी। 

3. 
नाज़ुक प्यारी
माँ-बाबा की दुलारी
होती है बेटी,
जाए पिया के घर
कर सूना आँगन। 

4. 
आँखों का तारा
होती सब बिटिया,
माँ-बाबा रोए 
विदा हुई बिटिया  
जाए पी के अँगना। 

5. 
घर का दर्जा 
देती सब बेटियाँ
दरो-दीवार,
जाएँ कहीं, सृजन 
करती हैं बेटियाँ। 

6. 
बेटी की अम्मा
रहती घबराई
बेटी जो जन्मी,
किस घर वो जाए
हर सुख वो पाए। 

7. 
रौशन घर
करती हैं बेटियाँ
जहाँ भी जाए,
मायका होता सूना
चहके वर-अँगना। 
-0-

ईश्वर

1. 
हूँ पुजारिन
नाथ सिर्फ़ तुम्हारी
तू बिसराया
सुध न ली हमारी
क्यों समझा पराया?

2. 
ओ रे विधाता!
तू क्यों न समझता
जग की पीर,
आस जब से टूटा
सब हुए अधीर। 

3. 
गर तू थामे
जो मेरी पतवार
देखे संसार,
भव सागर पार
पहुँचूँ तेरे पास। 

4. 
हे मेरे नाथ!
कुछ करो निदान
हो जाऊँ पार
जीवन है सागर
कोई न खेवनहार।  

5. 
तू साथ नहीं
डगर अँधियारा
अब मैं हारी,
तू है पालनहारा
फैला दे उजियारा। 

6. 
मैं हूँ अकेली
साथ देना ईश्वर
दुर्गम पथ
चल-चलके हारी
अन्तहीन सफ़र। 

7. 
भाग्य-विधाता
तू जग का निर्माता 
पालनहारा,
सुन ले, हे ईश्वर!
तेरे भक्तों की व्यथा। 
-0-

कृष्ण

1. 
रोई है आत्मा
तू ही है परमात्मा
कर विचार,
तेरी जोगन हारी
मेरे कृष्ण मुरारी। 

2. 
चीर-हरण
हर स्त्री की कहानी
बनी द्रौपदी,
कृष्ण! लो अवतार
करो स्त्री का उद्धार। 

3. 
माखन चोरी
करते सीनाजोरी
कृष्ण कन्हाई,
डाँटे यशोदा मैया
फिर करे बड़ाई। 

4. 
कर्म-ही-कर्म
बस यही है धर्म
तेरा सन्देश,
फ़ैल रहा अधर्म
आके दो उपदेश। 

5. 
तू हरजाई
की मुझसे ढिठाई,
ओ मोरे कान्हा!
गोपियों संग रास
मुझे माना पराई। 

6. 
रास रचाया
सबको भरमाया
नन्हा मोहन,
देके गीता का ज्ञान
किया जग-कल्याण। 

7. 
तेरी जोगन
तुझमें ही समाई,
बड़ी बावरी
सहके सब पीर
बनी मीरा दीवानी।

-जेन्नी शबनम (27.9.2024)
____________________

रविवार, 30 जून 2024

778. ज़िन्दगी बौनी (10 ताँका)

ज़िन्दगी बौनी 

*** 


1.
दहलीज़ पे
बैठा राह रोकके 
औघड़ चाँद 
न आ सका वापस 
मेरा दर्द या प्रेम।

2.
ज़िन्दगी बौनी
आकाश पे मंज़िल
पहुँचे कैसे?
चारों खाने चित है
मन मेरा मृत है।

3.
गहन रात्रि
सुनसान डगर
किधर चला?
मेरा मन ठहर
थम जा तू इधर।

4.
तुम्हारा स्पर्श
मानो जादू की छड़ी
छूकर आई
बादलों को प्यार से 
ऐसी ठण्डक पाई।

5.
ग़ायब हुए
सिरहाने से ख़्वाब
छुपाया तो था
काल की नज़रों से,
चोरी हो गए ख़्वाब 

6.
कोई न सगा 
सब देते हैं दग़ा
नहीं भरोसा,
अपना या पराया
दिल मत लगाना। 

7.
मैंने कुतरे
अपने बुने ख़्वाब
होके लाचार,   
पल-पल मरके
मैंने रचे थे ख़्वाब।  
   
8.
मैं गुम हुई
मन की कंदराएँ
बेवफ़ा हुईं,
कोई तो होगी युक्ति   
जो मुझे मिले मुक्ति।  

9. 
मेरे सपने 
आसमाँ में जा छुपे 
मैं कैसे ढूँढूँ? 
पाखी से पंख लिए  
सूर्य ने है जलाए।  

10. 
मेरी तिजोरी
जिसे छुपाया वर्षों
हो गई चोरी
जहाँ ख़ुशियाँ मेरी
छुपी रही बरसों।

-जेन्नी शबनम (20.6.2024)
____________________

गुरुवार, 16 नवंबर 2023

767. जन्मदिन (10 ताँका)

जन्मदिन 

***

1.
उम्र की तीली
धीरे-धीरे सुलगी
कुछ है शेष
कब होगा अशेष
समय ही जानता।

2.
जन्म की तिथि
बताने बढ़ी उम्र
फिर से आई,
उम्र का लेखा-जोखा
क्यों करना है भाई।

3.
खोजती हूँ मैं
अब भी बच्ची हूँ मैं
बाबा व अम्मा,
छोड़ चले गए वे
यादों में जन्मदिन।

4.
ख़ूब मिलता
जन्मदिन जो आता
शुभकामना
आँचल में भरके
सौग़ात है मिलती।

5.
मैं अलबेली
जन्मदिन मनाती
भले अकेली
खाकर होती तृप्त
खीर-पूरी-मिठाई।

6.
पिघली ओस
जन्मदिन के दिन
हँसके देती
ठण्डक का आशीष
बोली- फूल-सा खिलो।

7.
सूर्य कहता-
बस चलती रहो
कैसा भी पल
हारना न रुकना
सीखो मुझ-सा जीना।

8.
सूरज उगा
भरता उजियारा
मन में मेरे
सन्देश है भेजता
सदा जलो मुझ-सा।

9.
वक़्त ने कहा-
उम्र का लेखा-जोखा
मत करना।
जब तक हैं साँसें
जीभरकर जीना।

10.
सुन्दर दिन
मेरा है जन्मदिन
चहकती मैं,
अनुभव का रंग
मुझे करे रंगीन।

-जेन्नी शबनम (16.11.2023)
_____________________

सोमवार, 15 जुलाई 2019

619. हे वर्षा रानी (10 ताँका)

हे वर्षा रानी    

***   

1.
तपती धरा   
तन भी तप उठा   
बदरा छाए   
घूम-घूम गरजे   
मन का भौंरा नाचे।   

2.   
कूकी कोयल   
नाचे है पपीहरा   
देख बदरा   
चहके है बगिया   
नाचे घर-अँगना।   

3.   
ओ रे बदरा   
कितना तड़पाया   
अब तू माना   
तेरे बिना अटकी   
संसार की मटकी।   

4.   
गाए मल्हार   
घनघोर घटाएँ   
नभ मुस्काए   
बूँदें ख़ूब झरतीं    
रिमझिम फुहार।   

5.   
बरसा पानी   
याद आई है नानी   
है अस्त व्यस्त   
जीवन की रफ़्तार    
जलमग्न सड़कें।   

6.   
पौधे खिलते   
किसान हैं हँसते   
वर्षा के संग   
मन-मयूर नाचे   
बूँदों के संग खेले।   

7.   
झूमती धरा   
झूमता है गगन   
आई है वर्षा   
लेकर ठण्डी हवा   
खिल उठा चमन।   

8.   
घनी प्रतीक्षा   
अब जाकर आया   
पाहुन मेघ    
चाय और पकौड़ी   
पाहुना ख़ूब खाये।   

9.   
पानी बरसा   
झर-झर झरता   
जैसे झरना,   
सुन मेरे बदरा   
मन हुआ बावरा।   

10.   
हे वर्षा रानी   
यूँ रूठा मत करो   
आ जाया करो   
रवि से लड़कर   
बरसो जमकर।   

-जेन्नी शबनम (6.7.2019)   
__________________

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

590. वर्षा (5 ताँका)

वर्षा    

***   

1.   
वर्षा की बूँदें   
उछलती-गिरती   
ठौर न पातीं    
मौसम बरसाती   
माटी को तलाशती।   

2.   
ओ रे बदरा   
इतना क्यों बरसे   
सब डरते   
अन्न-पानी दूभर   
मन रोए जीभर।   

3.   
मेघ दानव   
निगल गया खेत,   
आया अकाल   
लहू से लथपथ   
खेत व खलिहान।   

4.   
बरखा रानी   
झम-झम बरसी   
मस्ती में गाती   
खिल उठा है मन   
नाचता उपवन।   

5.   
प्यासी धरती   
अमृत है चखती   
सोंधी ख़ुशबू    
मन को है लुभाती   
बरखा तू है रानी।   

-जेन्नी शबनम (9.9.2018)
_____________

रविवार, 22 जुलाई 2018

579. तपता ये जीवन (10 ताँका)

तपता ये जीवन 

***   

1.   
अँजुरी भर   
सुख की छाँव मिली   
वह भी छूटी   
बच गया है अब   
तपता ये जीवन।   

2.   
किसे पुकारूँ   
सुनसान जीवन   
फैला सन्नाटा,   
आवाज़ घुट गई   
मन की मौत हुई।   

3.   
घरौंदा बसा   
एक-एक तिनका   
मुश्किल जुड़ा,   
हर रिश्ता विफल   
ये मन असफल।   

4.   
क्यों नहीं बनी   
क़िस्मत की लकीरें   
मन है रोता,   
पग-पग पे काँटे   
आजीवन चुभते।   

5.   
सावन आया   
पतझर-सा मन   
नहीं हर्षाया,   
जीवन होता, काश!    
गुलमोहर-गाछ।   

6.   
नहीं विवाद   
मालूम है, जीवन   
क्षणभंगुर   
कैसे न दिखे स्वप्न   
मन नहीं विपन्न।   

7.   
हवा के संग   
उड़ता ही रहता   
मन-तितली   
मुर्झाए सभी फूल   
कहीं मिला न ठौर।   

8.   
तड़प रहा   
प्रेम की चाहत में   
मीन-सा मन,   
प्रेम लुप्त हुआ, ज्यों   
अमावस का चाँद।   

9.   
जो न मिलता   
सिरफिरा ये मन   
वही चाहता   
हाथ पैर मारता   
अंतत: हार जाता।   

10.   
स्वप्न-संसार   
मन पहरेदार   
टोकता रहा,   
जीवन से खेलता 
दिमाग अलबेला।   

-जेन्नी शबनम (25.5.2018) 
_____________________

रविवार, 17 सितंबर 2017

559. कैसी ज़िन्दगी? (10 ताँका)

कैसी ज़िन्दगी?    

***  

1.  
हाल बेहाल  
मन में है मलाल  
कैसी ज़िन्दगी?  
जहाँ धूप न छाँव  
न तो अपना गाँव।   

2.  
ज़िन्दगी होती  
हरसिंगार फूल,  
रात खिलती  
सुबह झर जाती,  
ज़िन्दगी फूल होती।   

3.  
बोझिल मन  
भीड़ भरा जंगल  
ज़िन्दगी गुम,  
है छटपटाहट  
सर्वत्र कोलाहल। 

4.  
दीवार गूँगी  
सारा भेद जानती,  
कैसे सुनाती?  
ज़िन्दगी है तमाशा  
दीवार जाने भाषा। 

5.  
कैसी पहेली?  
ज़िन्दगी बीत रही  
बिना सहेली,  
कभी-कभी डरती  
ख़ामोशियाँ डरातीं।   

6.  
चलती रही  
उबड-खाबड़ में  
हठी ज़िन्दगी,  
ख़ुद में ही उलझी  
निराली ये ज़िन्दगी।  

7.  
फुफकारती  
नाग बन डराती  
बाधाएँ सभी,  
मगर रूकी नहीं,  
डरी नहीं, ज़िन्दगी।  

8.  
थम भी जाओ,  
ज़िन्दगी झुँझलाती  
और कितना?  
कोई मंज़िल नहीं  
फिर सफ़र कैसा?  

9.  
कैसा ये फ़र्ज़   
निभाती है ज़िन्दगी  
साँसों का क़र्ज़,  
ग़ुस्साती है ज़िन्दगी  
जाने कैसा मरज़।   

10.  
चीख़ती रही  
बिलबिलाती रही  
ज़िन्दगी ख़त्म,  
लहू बिखरा पड़ा  
बलि पे जश्न मना।   

-जेन्नी शबनम (17.9.2017) 
___________________

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

452. बहुरुपिया (5 ताँका)

बहुरुपिया 


***

1.
हवाई यात्रा
करता ही रहता
मेरा सपना
न पहुँचा ही कहीं
न रुकता ही कभी। 

2.
बहुरुपिया
कई रूप दिखाए
सच छुपाए
भीतर में जलता
जाने कितना लावा। 

3.
कभी न जला
अंतस् बसा रावण
बड़ा कठोर
हर साल जलाया
झुलस भी न पाया। 

4.
कहीं डँसे न
मानव-केंचुल में
छुपे हैं नाग
मीठी बोली बोलके
करें विष-वमन। 

5.
साथ हमारा 
धरा-नभ का नाता  
मिलते नहीं  
मगर यूँ लगता-
आलिंगनबद्ध हों। 

-जेन्नी शबनम (16.4.2014)
___________________

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

397. अद्भुत रूप (5 ताँका)

अद्भुत रूप  

***

1.
नीले नभ से
झाँक रहा सूरज, 
बदली खिली 
भीगने को आतुर
धरा का कण-कण।  

2.
झूमती नदी 
बतियाती लहरें
बलखाती है 
ज्यों नागिन हो कोई  
अद्भुत रूप लिए। 

3.
मैली-कुचैली 
रोज़-रोज़ है होती
पापों को धोती, 
किसी को न रोकती 
बेचारी नदी रोती।  

4.
जल उठा है 
फिर से एक बार 
बेचारा चाँद 
जाने क्यों चाँदनी है 
रूठी अबकी बार। 

5.
उठ गया जो 
दाना-पानी उसका 
उड़ गया वो,
भटके वन-वन 
परिन्दों का जीवन। 

-जेन्नी शबनम (1.4.2013)
__________________

रविवार, 23 सितंबर 2012

372. मन छुहारा (10 ताँका)

मन छुहारा 

***

1.
अपनी आत्मा 
रोज़-रोज़ कूटती 
औरत ढेंकी  
पर आस सँजोती
अपनी पूर्णता की। 

2.
मन पिंजरा
मुक्ति की आस लगी   
उड़ना चाहे 
जाए तो कहाँ जाए
दुनिया तड़पाए। 

3.
न देख पीछे 
सब अपने छूटे
यही रिवाज
दूरी है कच्ची राह 
मन के नाते पक्के। 

4.
ज़िन्दगी सख्त
रोज़-रोज़ घिसती
मगर जीती 
पथरीली राहों पे 
निशान है छोड़ती। 

5. 
मन छुहारा
ज़ख़्म सह-सहके
बनता सख़्त
रो-रोकर हँसना 
जीवन का दस्तूर।   

6.
मन जुड़ाता 
गर अपना होता 
वो परदेसी 
उमर भले बीते 
पर आस न टूटे।  

7.
लहलहाते 
खेत औ खलिहान 
मन हर्षित  
झूमझूम के गाता
ख़ुशहाली के गीत।


8.
मन का दर्द 
तुम अब क्या जानो 
क्यों पहचानो,
हुए जो परदेसी 
छूटे हैं नाते देसी। 

9.
मन बेचारा 
समझ नहीं सका 
वक़्त का खेला 
वे मेहरबानियाँ 
उम्र की नादानियाँ। 

10.
मन की व्यथा 
कोई कैसे समझे,
देखे सबने 
महल की दीवार 
जहाँ रंग हज़ार। 

-जेन्नी शबनम (10.9.2012)
___________________

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

361. रक्षा बन्धन (राखी पर10 ताँका)

रक्षा बन्धन 

***

1.
पावन पर्व 
दुलारा भैया आया 
रक्षा बन्धन 
बहन ने दी दुआ 
बाँध रेशमी धागा। 

2.
राखी त्योहार  
सुरक्षा का वचन 
भाई ने दिया 
बहना चहकती 
उपहार माँगती। 

3.
राखी का पर्व 
सावन का महीना 
पीहर आई 
नन्हे भाई की दीदी 
स्नेह का धागा बाँधा। 

4.
आँखों में पानी 
बहन है पराई 
सूनी कलाई
कौन सजाए अब 
भाई के माथे रोली। 

5.
पूरनमासी 
सावन का महीना 
राखी त्योहार 
रक्षा-सूत्र ने बाँधा 
भाई-बहन नेह।  

6.
घर परिवार
स्वागत में तल्लीन 
मंगल पर्व
राखी-रोली-मिठाई 
बहनों ने सजाई।   

7.
शोभित राखी 
भाई की कलाई पे
बहन बाँधी  
नेह जो बरसाती 
नेग भी है माँगती। 

8.
प्यारा बन्धन 
अनोखा है स्पंदन 
भाई-बहन
खुशियाँ हैं अपार
आया राखी त्योहार।  

9.
चाँद चिंहुका 
सावन का महीना 
पूरा जो खिला
भैया, दीदी के साथ 
राखी मनाने आया। 

10.
बहन-भाई 
बड़े ही आनन्दित 
नेग जो पाया
बहन से भाई ने     
राखी जो बँधवाई। 

-जेन्नी शबनम (2.8.2012)
__________________

सोमवार, 26 मार्च 2012

335. शब्द-महिमा (शब्द पर 10 ताँका)

शब्द-महिमा
(शब्द पर 10 ताँका)

***

1.
प्रेम-चाशनी
शब्द को पकाकर
सबको बाँटो,
सब छूट जाएगा
ये याद दिलाएगा। 

2.
शब्दों ने तोड़ी
सम्बन्धों की मर्यादा
रिश्ते भी टूटे,
यत्न से लगी गाँठ
मन न जुड़ पाया। 

3.
तुमसे जाना
शब्दों की वाचालता,
मूक-बधिर
बस एक उपाय
मन यही सुझाए। 

4.
शब्द-जाल ने
बहुत उलझाया
जन-समूह 
अब नेता को जाना-
कितना भरमाया। 

5.
शब्द-महिमा
ऋषियों ने थी मानी,
दिया सन्देश
ग्रन्थों में उपदेश
शब्द नहीं अशेष। 

6.
सरल शब्द
सहज अभिव्यक्ति
भाव गम्भीर,
उत्तेजित भाषण
खरोंच की लकीर। 

7.
प्रेम व पीर
अपने व पराये
शब्द के खेल,
मन के द्वार खोलो
शब्द तौलो तो बोलो। 

8.
शब्दों के शूल
कर देते छलनी
कोमल मन,
निरर्थक जतन
अपने होते दूर। 

9.
अपार शब्द
कराहते ही रहे,
कौन समझे
निहित भाषा-भाव
नासमझ इंसान। 

10.
बिना शब्द के
अभिव्यक्ति कठिन
सबने माना,
मूक सम्प्रेषण है
बिना शब्दों की भाषा। 

-जेन्नी शबनम (16.3.2012)
__________________

शुक्रवार, 27 मई 2011

247. बच्चे (5 ताँका)

पहली बार ताँका लिखने का प्रयास किया है, प्रतिक्रिया अपेक्षित है। 

बच्चे

***

1.
नन्ही-सी परी
लिए जादू की छड़ी
बच्चों को दिए
खिलौने और टॉफ़ी 
फिर उड़ वो चली। 

2.
उनके हाथ
मंझा और पतंग
बच्चे चहके
सब ख़ूब मचले
उड़ी जब पतंग।  

3.
उछले-कूदे
बड़ा शोर मचाएँ
ये नन्हें बच्चे
राज दुलारे बच्चे
ये प्यारे-प्यारे बच्चे। 

4.
दुनिया खिले
आसमान चमके
चाँद-तारों से
घर-अँगना सजे
छोटे-छोटे बच्चों से। 

5.
प्यारी बिटिया
रुनझुन नाचती
खेल दिखाती
घर-आँगन गूँजे
अम्मा-बाबा हँसते। 

-जेन्नी शबनम (10.5.2011)
____________________