गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

797. सफ़र का क़िस्सा

सफ़र का क़िस्सा 

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मेरे सफ़र की हर शय ग़ुलाम है    
मन के कफ़स में हर लम्हा क़ैद है 
तन की ज़रूरत कब बढ़ी-घटी
मन से मन की बात कब कही
यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं 
पिघलते रहे मन के जज़्बात
छुप न सकी कोई भी बात
सन्नाटे में बैठी रही आँखें मूँद
लरजती रही आँसुओं की बूँद
कौन समझे ग़ैरों के एहसास
अब रहा नहीं कोई आस-पास
मेरे जीवन के सफ़र का क़िस्सा
ज़माने का बना अब रोचक हिस्सा।

-जेन्नी शबनम (26.2.2026)
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4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर | होली शुभ हो |

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 1 मार्च 2026 को लिंक की गयी है....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

!

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

बहुत ही सुंदर। अनुभूतियों को अपने अच्छी अभिव्यक्ति दी है।

Admin ने कहा…

आपने अपनी कविता में अंदर के कैद एहसासों को बहुत साफ शब्दों में रख दिया। आप सीधे दिल की बात करते हो, इसलिए हर लाइन चुभती भी है और छूती भी। आख़िरी पंक्ति तो खास लगी, जहाँ आप अपना किस्सा दुनिया के सामने रख देते हो।