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बुधवार, 17 जून 2026

806. क्षणभंगुर जीवन

क्षणभंगुर जीवन 

***

कितने बहाने
कितने दलील
सब फ़िज़ूल
ठगाया जीवन। 

सोचा समझा
सब बिखरा
आघात मिला
व्यर्थ जीवन। 

उपाय नहीं
समझौता सही
नासमझ नहीं
यही जीवन। 

सोच बदलो
जीवन समझो
अमर नहीं
क्षणभंगुर जीवन।

-जेन्नी शबनम (17.6.2026)
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

797. सफ़र का क़िस्सा

सफ़र का क़िस्सा 

***

मेरे सफ़र की हर शय ग़ुलाम है    
मन के कफ़स में हर लम्हा क़ैद है 
तन की ज़रूरत कब बढ़ी-घटी
मन से मन की बात कब कही
यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं 
पिघलते रहे मन के जज़्बात
छुप न सकी कोई भी बात
सन्नाटे में बैठी रही आँखें मूँद
लरजती रही आँसुओं की बूँद
कौन समझे ग़ैरों के एहसास
अब रहा नहीं कोई आस-पास
मेरे जीवन के सफ़र का क़िस्सा
ज़माने का बना अब रोचक हिस्सा।

-जेन्नी शबनम (26.2.2026)
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शनिवार, 8 मार्च 2025

789. एक सवाल

एक सवाल 

***

भार्या होने का दण्ड 
बार-बार भोगती रही
अपमान का घूँट पीती रही
और तुम सभी नज़रें झुकाए 
कायर बने बैठे तमाशा देखते रहे
तुम सभी के पुरुष होने पर
तुम सभी के योद्धा होने पर 
ऐसे वचन पर
ऐसे धर्म पर 
लानत है 
एक सवाल है मेरा  
मेरी जगह तुम्हारी पुत्री होती तो?
क्या फिर भी उसे दाँव पर लगा देते?
क्या उसे भी पाँच पुरुषों में बाँट देते?
भरी सभा में निर्वस्त्र होने देते?
मेरी हँसी नाजाएज़ सही
पर क्या ये जाएज़ है?
पाँच पतियों के होते हुए मैं असहाय रही   
रक्षा करने धर्म-भाई आया 
क्या तुम में से कोई वचन तोड़ नहीं सकता था?
पति का धर्म निभा नहीं सकता था?
पत्नी की रक्षा न कर सकने वाले तुम पाँचों पुरुष  
तुम सभी पर लानत है। 

-जेन्नी शबनम (8.3.25)
(महिला दिवस)
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मंगलवार, 24 दिसंबर 2024

784. सूरज किसका चाँद किसका

सूरज किसका चाँद किसका 

***

हम चाँद हैं तुम्हारे  
तुम सूरज हो हमारे 
हम भी तनहा, तुम भी तनहा 
संसार में हम दोनों तनहा 
पर साथ-साथ हम चलते हैं
अपना कर्त्तव्य निभाते हैं। 

सारे दिन जलकर
जब तुम सोने जाते हो
तुमसे लेकर उजाला
हम देते हैं जग को उजाला
बस एक रात होती है
हमारे मिलन की रात
वह है अमावस की रात
हाँ! यह भी बहुत है
हमारे अनन्त जीवन में
हर माह होती है हमारी रात। 

कभी-कभी मन सोचता है
मिली ऐसी ज़िन्दगी क्यों
पिया हमने अमृत क्यों
युगों-युगों से चलते हुए
हर रोज़ जलते हुए
क्या पाएँगे हम
कब तक यूँ जलेंगे हम
उफ़ ये क्या कर लिया हमने
अमरत्व का वरदान
अब लगता है अभिशाप। 

हम दोनों अपने पथ पर
बिना थके चलते दम भर
करते रहे कर्त्तव्य का पालन
नहीं किया कोई उल्लंघन
पर जग की रीत देखकर
मन चाहता छोड़ दें सब बन्धन। 
 
कोई कहता सूरज है उसका
कोई कहता चाँद है उसका
नहीं पूछता कोई हमसे
क्या इच्छा है हमारे मन में
युगों-युगों से हम साथ रहे
युगों-युगों तक यों ही रहेंगे
मन दुखता है सुनकर
जग हँसता जब हमें बाँटकर। 

अब चाहते आ जाए प्रलय
जग में नहीं रहा कोई लय
या मिल जाए विष कहीं
या उगल दें अमृत सभी
कर विषपान हम करें विश्राम
या अमरत्व का मिटे विधान। 

सूरज बिना मिट जाएगी दुनिया
अँधेरे में कब तक टिकेगी दुनिया
फिर बाँटते रहना जगवालों
सूरज था किसका
चाँद था किसका।

-जेन्नी शबनम (24.12.2024)
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बुधवार, 1 मई 2024

775. वक़्त आ गया है

वक़्त आ गया है 

***

अक्सर सोचती हूँ 

हर बार, बार-बार 

मैं चुप क्यों हो जाती हूँ?

जानती हूँ 

मेरी चुप्पी हर किसी को भा रही है

पर मुझे भीतर से खोखला कर रही है

अन्दर-ही-अन्दर खा रही है। 

 

मैं अनभिज्ञ नहीं किसी सरोका से

स्वयं का हो या संसार का

पर मेरी चुप्पी मुझे धकेल देती है गुमनाम दुनिया में

जहाँ मेरे अस्तित्व का सवाल पैदा हो जाता है

मैं हर बार अपनी खाल में चुपचाप समा जाती हूँ 

अपनी चुप्पी से अपनी ही आहुति देती जाती हूँ 

कोई इससे बाहर नहीं निकालता है

सब छोड़ देते हैं मुझे, मेरी क़िस्मत कहकर। 


पर मैं क्यों ऐसी हूँ?

मन-मस्तिष्क का लावा मुझे जलाता है 

पर यह आग दिखती क्यों नहीं?

क्यों मैं जलती रहती हूँ?

अंगारों पर चलती रहती हूँ 

ख़ुद को आग में जलाती रहती हूँ 

सभी के सामने मुस्कुराती रहती हूँ 

मेरे जलने-रोने से संसार प्रभावित नहीं होता

मैं ही धीरे-धीरे मिटती जाती हूँ

अपने सवाल का जवाब ख़ुद को देती जाती हूँ 

जो निरर्थक है और व्यर्थ भी। 


मुझे अब अपना जवाब सभी को बताना होगा

अपनी चुप्पी को तोड़ना होगा

हर उस सवाल पर लावा उगलना होगा

जो मुझे मिटाता हैजलाता है

अपनी चुप्पी का एहसास मुझे नहीं चाहिए 

मेरी चुप्पी का अर्थ मुझे जतलाना होगा

मुझे क्या-क्या कहना है, समझाना होगा 

मेरी चुप्पी को ज्वालामुखी में बदलना होगा 

अन्यथा मैं जलती रहूँगी, लोग जलाते रहेंगे

मैं मिटती रहूँगी, लोग मिटाते हेंगे। 


अब बस!

चुप्पी को तोड़ने का वक़्त  गया है

अपने मनमाफ़िक जीने का वक़्त  या है

संसार से क़दम ताल मिलाने का वक़्त  गया है।


-जेन्नी शबनम (1.5.2024)

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शुक्रवार, 8 मार्च 2024

772. स्त्री जानती है

स्त्री जानती है 

***

उलझनें मिलती हैं, पर कम उलझती है 
स्त्री ये जानती है, स्त्री सब समझती है 
कब कहाँ कितना बोलना है
कब कहाँ कितना छुपाना है
क्या दिल में दफ़्न करना है 
क्या दुनिया को कहना है 
बेबाक़ बातें स्त्री नहीं कर सकती
मन की हर बात नहीं कह सकती
लग जाएँगे बेहयाई के इल्ज़ाम 
हो जाएगी अपने ही घर में बदनाम
जान चली जाए पर मन खोल सकती नहीं  
झूठ कहती नहीं, सच अक्सर बोल सकती नहीं  
उम्र बीत जाए पर मनचाहा नहीं कर सकती
फूल उगा सकती है, पर तितलियाँ नहीं पकड़ सकती 
अपने मन की बातें अपने मन तक
अपने दुख अपने एहसास अपने तक
रिश्ते समेटते-समेटते ख़ुद बिखरती है
कोई नहीं समझता स्त्री कितना टूटती है, मरती है 
हज़ारों शोक, मगर स्त्री के आँसू नापसन्द हैं
हँसती-खिलखिलाती स्त्री सबकी पसन्द है
जन्म से मिली इस विरासत को ढोना है
स्त्री को इन्सान नहीं केवल स्त्री होना है 
और स्त्री की स्त्री होने की यह अकथ्य पीड़ा है।

-जेन्नी शबनम (8.3.2024)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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मंगलवार, 30 जनवरी 2024

771. अन्तिम लक्ष्य

अन्तिम लक्ष्य 

***

यूँ लगता है
मैं बाढ़ में ज़मीन से उखड़ा हुआ कोई दरख़्त हूँ
नदी के पानी पर चल रही हूँ
चल नहीं रही, फिसल रही हूँ
जाने कहाँ टकराऊँ, कहाँ पार लगूँ
या किसी भँवर में फँसकर डूब जाऊँ। 

क्या मेरे अस्तित्व का कोई निशान होगा?
किसी को परवाह होगी?
कहाँ दफ़्न होना है, कहाँ क़ब्रगाह होगी
मुमकिन है मेरे मिटने के बाद नयी कहानी हो
यही अच्छा है मगर
न कोई निशानी हो, न कोई कहानी हो।

और भी लोग जीवन भर पानी में रह रहे हैं
जानती हूँ, मेरी तरह हज़ारों पेड़ बह रहे हैं
कोई-कोई पेड़ कहीं किसी साहिल से टकराकर
एक नई ज़मीन को पकड़कर ख़ुद को बचा लेगा
ख़ुद को लहरों की प्रलय से दूर हटा लेगा
जाने वह दरख़्त ख़ुशनसीब होगा या बदनसीब होगा
या मेरी ही तरह अनकही कहानियों के साथ
जीने को विवश होगा। 

उफ! ये पानी क्यों नहीं समझता अपनी ताक़त
जबरन बहाए लिए जाता है
मुझे शक्तिहीनता का बोध कराता है
जानती हूँ मेरी ज़ात शक्तिहीन हो जाती है
अक्सर लाचार हो जाती है
कभी तन से कभी मन से
कभी दायित्व से कभी ममत्व से।

पानी पर फिसलते-फिसलते
मैं अब थक गई हूँ
मेरे रास्ते में न साहिल है न भँवर
न ज़मीं है न सहर
न आसमाँ न रात का क़मर
एक बाँध है जिसने रास्ता रोक रखा है
कहीं मिल न जाए समुन्दर।

अँधेरे के सफ़र पर पानी में बहती-उपटती हूँ
कई बार ख़ुद को ही दबोच लेने का मन होता है
किसी तरह बाँध की झिर्रियों से बहकर
दूर निकल जाने का मन करता है
समुन्दर अन्तिम लक्ष्य
समुन्दर अन्तिम सत्य है
समुन्दर में समा जाने का मन करता है।

राह में जो बाँध हाथ बाँधे खड़ा है
काश! वह मेरी राह न रोके
या फिर मुझे ऊपर खींच ले
और किसी बगान के कोने में
ज़रा-सी ज़मीन में मुझे रोप दे।

तन-मन मृत हो रहा है
आस लेकिन जीवित है।

-जेन्नी शबनम (30.1.24)
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गुरुवार, 16 नवंबर 2023

768. जीकर देखना है

जीकर देखना है   

***


जीवन तो जी लिया 

कभी अपने लिए जीकर देखा क्या? 

सच ही है 

जीते-जीते जीना कब कोई भूल जाता है

कुछ पता नहीं चलता

तभी तो कोई पूछता है- 

कभी अपने लिए जीकर देखा है?

यह तो यूँ है जैसे कोई नदी से पूछे- तुमने बहकर देखा है 

बादलों से पूछे- तुमने बारिश में नहाकर देखा है 

आग से पूछे- तुमने जलकर देखा है 

सूरज से पूछे- तुमने उगकर-डूबकर देखा है 

सबकी फ़ितरत एक जैसी है 

अनवरत नियमों के साथ रहना

पर मैं क्यों प्रकृति के विरुद्ध? 

साँसें का चलना, दिल का धड़कना

यही तो नियम है

पर मैं प्रफुल्लित क्यों नहीं?

नदी-बादल-आग-सूरज 

वे तल्लीन हैं अपने बहाव में

अकेले होकर भी ख़ुश 

प्रकृति के नियमों से बँधे, सिर्फ़ अपने साथ

 कोई हड़बड़ी,  घबराहट

 कुछ छूटने का डर,  कुछ पाने की लालसा 

शायद यही जीवन है

फ़लसफ़ा भले कुछ भी हो

पर सत्य तो यही है

ये प्रवाहमय होकर दूसरों को सुख पहुँचाते हैं 

स्वयं भी आह्लादित रहते हैं। 

प्रवाहमान तो मैं भी हूँ 

पर  मैं ख़ुश हूँ,  कोई मुझसे

यह कैसा जीवन?

 अपने लिए है,  किसी के लिए

मैंने कभी जीकर क्यों  देखा?

शायद जीकर देखा होता

सिर्फ़ अपने लिए जीकर देखा होता

तो बात ही कुछ और होती 

प्रकृति ने हँसने को कहा 

मैंने जबरन हँसी ओढ़ी 

मुझसे कहा गया कि नाचूँ-गाऊँ

मैंने सिनेमा का कोई दृश्य चला दिया

सबने कहा फ़र्ज़ निभाओ

ख़ामोशी से फ़र्ज़ निभा दिया

इन सब में मैं कहाँ?

यह यायावर मन  अपना,  किसी का

शहर के बियाबान में भटककर

आकाश में एक चिनगारी ढूँढता। 

अब भी समय है

आस है तो प्राण है

प्राण है तो जीवन है

भले कुछ भी अपना नहीं 

 सगा  सखा

पर जीवन तो है

एक बार अपने लिए जीकर देखना है


-जेन्नी शबनम (16.11.2023)
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मंगलवार, 12 सितंबर 2023

762. पहली या अन्तिम बार

पहली या अन्तिम बार

***


याद करने के लिए कुछ ख़ास ज़रूरी होता है   

मसलन पहली या अन्तिम बार मिलना। 

   

किसी ख़ास वक़्त में किसी ख़ास जगह पर मिलना   

चाय-कॉफ़ी पर चर्चा करना   

प्यार की बातें करनासंसार की बातें करना   

सुख-दुःख बाँटना   

बिना बात किए चुपचाप चलना   

बेवजह मुस्कुरानाकिसी बात पर आँखें भर जाना   

या और भी बहुत कुछ जो साझा किया जाता है   

पहली या अन्तिम बार।  

 

कोई भी बात   

दूसरी बार के बाद विस्मृत हो जाती है   

पहली और अन्तिम के बीच का वक़्त   

 मुट्ठी में टिकता है  ज़ेहन में   

सब कुछ सपाट व सरपट भाग जाता है   

जाने ऐसा क्यों है?   

निशान तो होता है समय के पास   

पर दिखता कुछ नहीं   

हाँख़ुद को याद दिलाना होता है   

पहली और अन्तिम के बीच   

कुछ बहुत ख़ास जो गुज़रा होता है

   

जीवन के वे सभी पल जो बीत चुके होते हैं   

उस वक्त को मुठ्ठी में समेटना   

और ज़ेहन में भरना ज़रूरी है   

क्या मालूम   

कालचक्र पहली और अन्तिम यादें मिटा दे   

फिर कुछ तो रह जाएगा यादों में   

जीवन के संध्या में मुस्कुराने के लिए   

या अन्तिम क्षणों में सब जी लेने के लिए।   


-जेन्नी शबनम (11.9.2023)

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