मंगलवार, 2 जून 2026

803. यात्री सूरज (चोका- 20)

यात्री सूरज


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यात्री सूरज 

करके रोज़ यात्रा 

थकता होगा 

चलना ही है धर्म 

कोई हो ऋतु

कहीं  पहुँचता,

उसके पाँव

ज़ख़्मी तो होते होंगे

कौन लगाये 

मरहम  पट्टी

दर्द छुपाके

जीवन का सन्देश  

रोज़ ही देता

पर कौन सुनता

जल-जल के

उजाला पसारता,

बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता

एक दिन लो तुम   

सोने का मज़ा

फिर चल पड़ना

बिन ठहरे

हँसते व जलते,

घुमंतू सूर्य!

बात सुन रहा 

 साथ बैठ

ज़रा तो गप्पे लड़ा     

चाय भी पी ले

फिर तू निकलना     

अपनी यात्रा पर।


-जेन्नी शबनम (18.10.2022)

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3 टिप्‍पणियां:

Sweta sinha ने कहा…

सुंदर, मनमोहक अभिव्यक्ति।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ५ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर

हरीश कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर