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रविवार, 25 मई 2025

793. किरदार

किरदार

***

थक गई हूँ अपने किरदार से
इस किरदार को बदलना होगा
ढेरों शिकायत है वक़्त से
कुछ तो उपाय करना होगा
वक़्त न लौटता है, न थमता है
मुझे ख़ुद को अब रोकना होगा
ज़मीन-आसमान हासिल नही
नसीब से कब तक लड़ना होगा?
न अपनों से उम्मीद, न ग़ैरों से
हदों को मुझे ही समझना होगा
बेइख़्तियार रफ़्तार ज़िन्दगी की
अब ज़िन्दगी को रुकना होगा
थक गई हूँ अपने किरदार से 
इस किरदार को अब मरना होगा  
'शब' का किरदार ख़त्म हुआ 
इस किरदार को मिटना होगा। 

-जेन्नी शबनम (25.5.2025)
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शुक्रवार, 7 जून 2019

615. नहीं आता (अनुबन्ध/तुकान्त)

नहीं आता   

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ग़ज़ल नहीं कहती   
यूँ कि मुझे कहना नहीं आता   
चाहती तो हूँ मगर   
मन का भेद खोलना नहीं आता।   

बसर तो करनी है पर   
शहर की आबोहवा बेगानी लगती   
रूकती हूँ समझती हूँ   
पर दमभरकर रोना नहीं आता।   

सफ़र में अब जो भी मिले   
मुमकिन है मंज़िल मिले न मिले   
परवाह नहीं पाँव छिल गए   
दमभर भी हमें ठहरना नहीं आता।   

मायूसी मन में पलती रही   
अपनों से ज़ख़्म जब भी गहरे मिले   
कोशिश की थी कि तन्हा चलूँ   
पर अपने साथ जीना नहीं आता।   

यादों के जंजाल में उलझके   
बिसुराते रहे हम अपने आज को   
हँस-हँसके ग़म को पीना होता   
पर 'शब' को यूँ हँसना नहीं आता।   

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2019)   
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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

111. ख़ुशबयानी कहो (अनुबन्ध/तुकान्त) / khushbayaani kaho (Anubandh/Tukaant)

ख़ुशबयानी कहो

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ख़ुशनुमा यादें आज कोई पुरानी कहो
क्षितिज में हो उत्सव बात रूहानी कहो  

सतरंगी किरणों-सी हो सबकी सुबह
दुनिया नई, सूरज की मेहरबानी कहो  

तल्ख़ वक़्त का, ज़िक्र न करो सब से
बस गुज़रे हयात की ख़ुशबयानी कहो  

क्यों दिल में हो बसाते कोई एक रब
हर मज़हब का सार दिल-ज़ुबानी कहो  

फ़िक्र फ़क़त अपनी ज़िन्दगानी का क्यों
फ़ख्र तो तब जब हर रूह इन्सानी कहो  

दर्द-ए-हिज्र की दास्ताँ न कहो 'शब'
ख़याल ही सही, वस्ल की कहानी कहो  

-जेन्नी शबनम (31. 12. 2009)
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Khushbayaani kaho

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khushnuma yaadein aaj koi puraani kaho
kshitij mein ho utsav baat ruhaani kaho.

satrangi kirnon-si ho sabki subah
duniya nayi, suraj ki meharbaani kaho.

talkh waqt ka zikrra na karo sab se
bas guzre hayaat ki khushbayaani kaho.

kyon dil mein ho basaate koi ek rab
har mazhab ka saar dil-zubaani kaho.

fikra faqat apni zindgaani ka kyun
fakhra to tab jab har rooh, insaani kaho.

dard-e-hijrr kee daastaan na kaho 'shab'
khayal hi sahi, wasl ki kahani kaho.

-Jenny Shabnam (31. 12 2009)
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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

110. तड़पाते क्यों हो (अनुबन्ध/तुकान्त) / Tadpaate kyon ho (Anubandh/Tukaant)

तड़पाते क्यों हो

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बेइन्तिहा इश्क़ मुझसे जतलाते क्यों हो
मेरी आशिक़ी ग़ैरों को बतलाते क्यों हो?

अनसुलझे सवालों से घिरी है ज़िन्दगी
और सवालों से मुझे उलझाते क्यों हो?

बेहिसाब कुछ माँगा ही नहीं कभी मैंने
चाहत ज़रा-सी देकर तड़पाते क्यों हो?

तुम भी चाहो मुझे ये कब कहा तुमसे
यूँ बेमन से इश्क़ मुझसे फ़रमाते क्यों हो?

तुम मुझमें बसे, चर्चा फ़रिश्तों ने किया
इश्क़ नेमत है, तुम ये झुठलाते क्यों हो?

इबादत होता है, कोई तजुर्बा नहीं इश्क़
मिलता बामुश्किल, दिल बहलाते क्यों हो?

तुम्हारी सलामती की दुआ करती है 'शब'
इश्क़ का सलीका, मुझे समझाते क्यों हो?

-जेन्नी शबनम (28. 12. 2009)
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Tadpaate kyon ho

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beintiha ishq mujhse jatlaate kyon ho
meri aashiqi gairon ko batlaate kyon ho?

ansuljhe sawaalon se ghiri hai zindagi
aur sawaalon se mujhe uljhaate kyon ho?

behisaab kuchh maanga hi nahin kabhi maine
chaahat zara-see dekar tadpaate kyon ho?

tum bhi chaaho mujhe ye kab kaha tumse
yun beman se ishq mujhse farmaate kyon ho?

tum mujhmein base, charchaa farishton ne kiya
ishq nemat hai, tum ye jhuthlaate kyon ho?

ibaadat hota hai, koi tajurbaa nahin ishq
milta baamushkil, dil bahlaate kyon ho?

tumhaari salaamati ki dua karti hai 'shab'
ishq ka saleeka, mujhe samjhaate kyon ho?

-Jenny Shabnam (28. 12. 2009)
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गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

105. मेरा अल्लाह मेरा राम (अनुबन्ध/तुकान्त) / Mera Allah Mera Ram (Anubandh/Tukaant)

मेरा अल्लाह मेरा राम

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आँतें सिकुड़ी भूख से, मासूम जानो की बढ़ती क़तार
तुम कहते हो, हम हैं लाचार, देता अल्लाह देता राम

दुनिया एक छोटी सी, हैं सबने किए टुकड़े कई हज़ार,
ख़ुदा को भी बाँटा, किसी का अल्लाह किसी का राम

हो अनुरागी या चाहे बैरागी, गुहार लगाते दर्शन की
मन में ढूँढ़ो वहीं बैठा, तुम्हारा अल्लाह तुम्हारा राम

जितनी ही नफ़रत पालोगे, और बहेगा ख़ून का दरिया
वो है सबका पालनहारा, किसका अल्लाह किसका राम

जाने कितने सहमे हम सब, रोज़ उठाते इतनी आफ़त
नया बवाल क्यों बढ़ाते, जिसका अल्लाह जिसका राम

कर गुनाह हरदम भटकते, वास्ते माफ़ी के दैरो-हरम
होती नहीं माफ़ी जितना जपो, मेरा अल्लाह मेरा राम

फूलों की ख़ुशबू में पाओ, या काँटों की चुभन में देखो
है एक वो मगर सर्वव्यापी, सबका अल्लाह सबका राम

तुम भटको मन्दिर-मस्जिद, मिलेगा न कोई तारणहार
'शब' से पूछो मन में बसा, उसका अल्लाह उसका राम

-जेन्नी शबनम (26. 11. 2009)
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Mera Allah Mera Ram

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aante sikudi bhookh se, maasoom jaano ki badhti qataar
tum kahte ho, hum hain laachaar, deta allah deta ram.

duniya ek chhoti see, hain sabne kiye tukde kai hazaar
khuda ko bhi baanta, kisi ka allah kisi ka ram.

ho anuraagi ya chaahe bairaagi, guhaar lagaate darshan ki
man mein dhundho wahin baitha, tumhara allah tumhara ram.

jitni hi nafrat paaloge, aur bahega khoon ka dariya
wo hai sabka paalanhaara, kiska allah kiska ram.

jaane kitne sahme hum sab, roz uthaate itni aafat
nayaa bawaal kyun badhaate, jiska allah jiska ram.

kar gunaah hardam bhatakte, waaste maafi ke dairo-haram
hoti nahin maafi jitna japo, mera allah mera ram.

phoolon ki khushboo mein paao, ya kaanton ki chubhan mein dekho
hai ek wo magar sarwavyaapi, sabka allah sabka ram.

tum bhatko mandir-masjid, milega na koi taaranhaar
'shab' se puchho man mein basaa, uska allah uska ram.

-Jenny Shabnam (26. 11. 2009)
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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

104. राह मुकम्मल करनी है (अनुबन्ध/तुकान्त) / Raah mukammal karni hai (Anubandh/Tukaant)

राह मुकम्मल करनी है

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साथी छूटे कि राहें भूलें, ये ज़िन्दगी तो चलनी है
मन हारे कि तन हारे, हर राह मुकम्मल करनी है 

आँखों के सागर में डूबी, प्यासी रूह भटकती अब 
उससे दूर जीएँ हम कैसे, साँस मगर तो भरनी है 

ज़ख़्म दे मरहम भी दे, अजब है उसकी आदत ये 
हँस-हँसकर सहते हैं लेकिन, दिल मेरा तो छलनी है 

ऐ ख़ुदा उसे बख़्श भी दे, है बड़ी हुकूमत ये तेरी 
दरकार तो हमें बुला, ये ज़ीस्त तो यूँ भी कब कटनी है 

वादा तो किया था उसने भी, जन्मों तक साथ निभाने का
तोड़ा वादा इस जीवन का, अब ख़्वाहिश भी मरनी है 

लेंगे साथ जन्म दोबारा, फिर दूर कभी न होंगे हम
इस उम्र की साध सभी हमने, मन में जतन से रखनी है 

तन्हाई से घबराकर, पनाह माँगती 'शब' उससे 
शब की फ़ितरत, हर शब को तन्हा-तन्हा जलनी है 

-जेन्नी शबनम (1. 12. 2009)
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Raah mukammal karni hai

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saathi chhute ki raahen bhoolen, ye zindagi to chalni hai
man haare ki tan haare, har raah mukammal karni hai.

aankhon ke saagar mein doobi, pyaasi rooh bhatakti ab
usase door jiyen hum kaise, saans magar to bharni hai.

zakham de marham bhi de, ajab hai uski aadat 
hans-hanskar sahte hain lekin, dil mera to chhalni hai.

ae khuda use bakhsh bhi de, hai badi hukumat ye teri
darkaar to hamein bulaa, ye zist to yun bhi kab katni hai.

waada to kiya tha usne bhi, janmon tak saath nibhaane ka
toda waada is jiwan ka, ab khwaahish bhi marni hai.

lenge saath janm dobaara, fir door kabhi na honge hum
is umrr ki saadh sabhi humne, man mein jatan se rakhni hai.

tanhaai se ghabrakar, panaah maangti 'shab' usase
shab ki fitrat, har shab ko tanha-tanha jalni hai.

 -Jenny Shabnam (1. 12. 2009)
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बुधवार, 25 नवंबर 2009

102. मुझे जीना नहीं आता (अनुबन्ध/तुकान्त) / Mujhe jeena nahin aata (Anubandh/Tukaant)

मुझे जीना नहीं आता

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मुझे जीना नहीं आता, मुझे रहना नहीं आता    
दुनिया के रिवाजों पे मुझे चलना नहीं आता 

ज़माने के दुःखों पे, अब कभी मैं हँस नहीं पाती         
सच है, बेरहमी से अब मुझे हँसना नहीं आता           

इक शोहरत की चाह नहीं, न ऐसी कोई ख़्वाहिश है
ज़िन्दगी कर लूँ बसर, मुझे इतना नहीं आता  

छलक जाते हैं सौ आँसू, किसी के बिछुड़ने पर
सच है, रोना आता है पर मुझे मरना नहीं आता

यूँ तो हज़ारों रस्ते हैं, मंज़िल तक पहुँचने के
यक़ीनन अभी तक भी तो मुझे बढ़ना नहीं आता   

अपने दे जाएँ दग़ा, तो सह लूँगी ये दर्द मगर
बेवफ़ाई दोस्तों से, मुझे करना नहीं आता 

क्यों नहीं देखती आईना, सब पूछते यहाँ मुझसे 
सच है, ख़ुद से प्यार मुझे करना नहीं आता      

इक तस्वीर ही माँगी थी, तक़दीर नहीं माँगी थी 
या ख़ुदा! मुझे तुमसे कुछ कहना नहीं आता  

क्या-क्या ज़ब्त करे अब बोलो 'शब' अपने सीने में  
सच है, जो-जो ग़म मिलता है, मुझे सहना नहीं आता      

-जेन्नी शबनम (25. 11. 2009)
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Mujhe jeena nahin aataa

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mujhe jeena nahin aataa, mujhe rahna nahin aataa
duniya ke riwaajon pe mujhe chalna nahin aataa.

zamaane ke dukhon pe, ab kabhi main hans nahin paati
sach hai, berahmi se ab mujhe hansna nahin aataa.

ik shohrat ki chaah nahin, na aisi koi khwaahish hai
zindgi kar loon basar, mujhe itna nahin aataa.

chhalak jaate hain sau aansoo, kisi ke bhi bichhudne par
sach hai, ronaa aataa par mujhe marna nahin aataa.

yun to hazaaron raste hain, manzil tak pahunchne ke
yakinan abhi tak bhi to mujhe badhnaa nahin aataa.

apne de jaayen daghaa, to sah loongi ye dard magar
bewafaai doston se, mujhe karna nahin aataa.

kyon nahin dekhti aaina, sab puchhte yahaan
sach hai, khud se pyar mujhe karnaa nahin aataa.

ek tasweer hi maangi thee, taqdeer nahin maangi thee
yaa khudaa! mujhe tumse kahna nahin aataa.

kya-kya zabt kare ab bolo 'shab' apne is seene mein
sach hai, jo-jo gham milta hai, mujhe sahna nahin aataa. 

-Jenny Shabnam (25. 11. 2009)
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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

97. इन्सानियत मरती है (अनुबन्ध/तुकान्त) / Insaaniyat martee hai (Anubandh/Tukaant) (पुस्तक- नवधा)

इन्सानियत मरती है

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गुनहगारों को आजकल राहत मिलती है
बेगुनाही सज़ा और ज़िल्लत से घिरती है 

किसी की मासूमियत का कैसे हो फ़ैसला 
आजकल मासूमियत सरे-आम बिकती है 

इन्सानी मनसूबे की परख कुछ मुमकिन नहीं
हर चेहरे पे हज़ार पर्द-पोशी दिखती है 

दुनिया के दश्त में हर शख़्स है भटकता
सबकी तक़दीर में ज़मीन कहाँ टिकती है 

मतलब-परस्ती भर है सियासी बाज़ीगरी
टुकड़ों में बँटती मादरे-वतन सिसकती है 

अजब इत्तेफ़ाक एक राष्ट्र में महाराष्ट्र बसा
तंगदिल इतना जहाँ राष्ट्रभाषा पिटती है 

दहशतगर्दों ने ख़ुदा को न बख़्शा 'शब'
बज़्मे-ऐश देखो जब इन्सानियत मिटती है 
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बज़्मे-ऐश- ख़ुशी का जलसा
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-जेन्नी शबनम (15. 8. 2009)
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Insaaniyat martee hai

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gunahgaaron ko aajkal raahat miltee hai
begunaahi saza aur zillat se ghirtee hai.

kisi ki maasoomiyat ka kaise ho faisla 
aajkal maasoomiyat sare-aam biktee hai.

insaani mansoobe kee parakh kuchh mumkin nahin
har chehre pe hazaar pard-poshi dikhtee hai.

duniya ke dasht mein har shakhs hai bhataktaa
sabkee taqdeer mein zameen kahaan tikatee hai.

matlab-parasti bhar hai siyaasi baazigari
tukadon mein bantatee maadare-watan sisakatee hai.

ajab ittefaaq ek raashtra mein maharashtra basaa
tang dil itnaa jahaan rashtrabhasha pitatee hai.

dahshatgardon ne khuda ko na bakhsha 'shab'
bazme-aish dekho jab insaaniyat mitatee hai.
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bazme-aish- khushi ka jalsaa
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-Jenny Shabnam (15. 8. 2009)
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बुधवार, 11 नवंबर 2009

96. नाम तुम्हारा कभी लिया नहीं (अनुबन्ध/तुकान्त) / Naam tumhara kabhi liya nahin (Anubandh/Tukaant) (पुस्तक- नवधा)

नाम तुम्हारा कभी लिया नहीं

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उँगली के पोरों से मन में, नाम कभी लिखा नहीं
शून्य में न जा ठहरे, नाम तुम्हारा कभी लिया नहीं 

आस्था का दीप न जलता, न मन कोई राग बुनता
मन की पीर प्रतिमा क्या जाने, उसने कभी जिया नहीं 

कविताओं के छन्द में, क्षण-क्षण प्रतीक्षित मन में
भ्रम देता स्वप्न सदा, पर जाने क्यों कभी टिका नहीं 

व्यथा की घोर घटा और उस पर कर्त्तव्यों का ऋण बड़ा
विह्वल मन को ठौर तनिक, तुमने भी कभी दिया नहीं 

बूँद-बूँद स्वयं को पीकर, 'शब' की होती रातें नम
राह निहारती नमी पी ले, ऐसा कोई कभी मिला नहीं 

-जेन्नी शबनम (9. 11. 2009)
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Naam tumhara kabhi liya nahin

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ungli ke poron se man mein, naam kabhi likha nahin
shoonya mein n ja thahare, naam tumhara liya nahin.

aastha kaa deep na jalta, na man koi raag bunta
man kee peer pratima kya jaane, usne kabhi jiya nahin.

kavitaaon ke chhand mein, kshan-kshan prateekshit man mein
bhram deta है swapn sada, par jaane kyun kabhi tika nahin.

vyatha kee ghor ghata aur us par kartavyon ka rin bada
vihwal man ko thaur tanik, tumne bhi kabhi diya nahin.

boond-boond swayam ko pikar, 'shab' kee hoti raaten nam
raah nihaarti namee pee le, aisa koi kabhi mila nahin.

-Jenny Shabnam (9. 11. 2009)
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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

71. कोई बात बने (अनुबन्ध/तुकान्त) (पुस्तक- नवधा)

कोई बात बने

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ज़ख़्म गहरा हो औ ताज़ा मिले, तो कोई बात बने
थोड़ी उदासी से, न कोई ग़ज़ल न कोई बात बने

दस्तूर-ए-ज़िन्दगी, अब मुझको न बताओ यारो
एक उम्र जो फिर मिल जाए, तो कोई बात बने 

मौसम की तरह हर रोज़, बदस्तूर बदलते हैं वो
गर अब के जो न बदले मिज़ाज, तो कोई बात बने 

रूठने-मनाने की उम्र गुज़र चुकी, अब मान भी लो
एक उम्र में जन्म दूजा मिले, तो कोई बात बने 

उनके मोहब्बत का फ़न, बड़ा ही तल्ख़ है यारो
फ़क़त तसव्वुर में मिले पनाह, तो कोई बात बने 

रख आई 'शब' अपनी ख़ाली हथेली उनके हाथ में
भर दें वो लकीरों से तक़दीर, तो कोई बात बने

-जेन्नी शबनम (15. 7. 2009)
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रविवार, 5 जुलाई 2009

69. 'शब' की मुराद (अनुबन्ध/तुकान्त)

'शब' की मुराद

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'शब' जब 'शव' बन जाए, उसको कुछ वक़्त रहने देना
बेदस्तूर सही, सहर होने तक ठहरने देना

उम्र गुज़ारी है 'शब' ने अँधेरों में
रोशनी की एक नज़र पड़ने देना

डरती है बहुत 'शब' आग में जलने से
दुनियावालो, उसे दफ़न करने देना 

मज़हब का सवाल जो उठने लगे तो
सबको वसीयत 'शब' की पढ़ने देना 

ढक देना माँग की सिन्दूरी लाली को
वजह-ए-वहशत 'शब' को न बनने देना

जगह नहीं दे मज़हबी जब दफ़नाने को
घर में अपने, 'शब' की क़ब्र बनने देना

तमाम ज़िन्दगी बसर हुई तन्हा 'शब' की
जश्न भारी औ मजमा भी लगने देना

अश्क़ नहीं फूलों से सजाना 'शब' को
'शब' के मज़ार को कभी न ढहने देना

'शब' की मुराद, पूरी करना मेरे हमदम
'शब' के लिए, कोई मर्सिया न पढ़ने देना

-जेन्नी शबनम (नवम्बर, 1998)
('ज़ख़्म' फ़िल्म से प्रेरित)  
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शनिवार, 4 जुलाई 2009

68. आज़माया हमको (अनुबन्ध/तुकान्त)

आज़माया हमको

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बेख़याली ने कहाँ-कहाँ न भटकाया हमको
होश आया तो तन्हाई ने तड़पाया हमको

इस बाज़ार की रंगीनियाँ लुभाती नहीं हैं अब  
नन्ही आँखों की उदासी ने रुलाया हमको

उन अनजान-सी राहों पर यूँ चल तो पड़े हम  
असूफ़ों और फ़रिश्तों ने आज़माया हमको

वज़ह-ए-निख़्वत उनकी दूर जो गए हम
मिले कभी फिर तो गले भी लगाया हमको

रुसवाइयों से उनकी तरसते ही रहे हम
इश्क़ की हर शय ने बड़ा सताया हमको

दर्द दुनिया का देखके घबराई बहुत 'शब'
ऐ ख़ुदा ऐसा ज़माना क्यों दिखाया हमको

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असूफ़- दुष्ट
वजह-ए-निख़्वत- अंहकार के कारण
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-जेन्नी शबनम (4. 7. 2009)
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

67. मुमकिन नहीं है (अनुबन्ध/तुकान्त)

मुमकिन नहीं है

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परों को कतर देना अब तो ख़ुद ही लाज़िमी है
वरना उड़ने की ख़्वाहिश, कभी मरती नहीं है। 

कोई अपना कहे, ये चाहत तो बहुत होती है
पर अपना कोई समझे, तक़दीर ऐसी नहीं है। 

अपना कहूँ, ये ज़िद तुम्हारी बड़ा तड़पाती है
अब मुझसे मेरी ज़िन्दगी भी, सँभलती नहीं है। 

तुम ख़फा होकर चले जाओ, मुनासिब तो है
मैं तुम्हारी हो सकूँ कभी, मुमकिन ही नहीं है

ग़ैरों के दर्द में, सदा रोते उसे है देखा 
'शब' अपनी व्यथा, कभी किसी से कहती नहीं है।

-जेन्नी शबनम (3. 7. 2009)
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गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

53. क्या बात करें (अनुबन्ध/तुकान्त)

क्या बात करें

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सफ़र ज़िन्दगी का कटता नहीं
एक रात की क्या बात करें 

हाल पूछा नहीं कभी किसी ने
ग़मे-दिल की क्या बात करें 

दर्द का सैलाब है उमड़ता
एक आँसू की क्या बात करें

इक पल ही सही क़रीब तो आओ
तमाम उम्र की क्या बात करें

मिल जाओ कभी राहों में कहीं
तुम्हारी सही अपनी क्या बात करें

एक उम्र तो नाकाफ़ी है
जीवन-पार की क्या बात करें

तुम आ जाओ या कि ख़ुदा
फ़रियाद है 'शब' की, अभी क्या बात करें

-जेन्नी शबनम (मई, 1998)
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रविवार, 1 मार्च 2009

32. अपनी हर बात कही (अनुबन्ध/तुकान्त)

अपनी हर बात कही

***

समेट ख़ुद को सीने में उसके, अपने सारे हालात कही
तर कर उसका सीना, अपने मन की बात कही। 

शाया किया अपने सुख-दुःख, उसके ईमान पर
पढ़ ले मेरा हर ग़म, बिना शब्द हर बात कही। 

आस भरी नज़रें उठीं जब, उसकी बाहें थामने को
अपने सीने से लिपटी, ख़ुद से अपनी हर बात कही। 

अच्छा है कोई न जाना, ये मेरा अपना संसार 
आस-पास नहीं है कोई, ख़ुद से अपनी हर बात कही। 

बिन सरोकार सुने क्यों कोई, एक उम्र की बात नहीं
जवाब से परे हर सवाल है, फिर भी अपनी हर बात कही। 

जन्मों का हिसाब है करना, जाने क्या-क्या और है कहना
रोज़ लिपटती, रोज़ सुबकती, 'शब' ख़ुद से ही हर बात कही। 

-जेन्नी शबनम (17. 9. 2008)
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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

18. मेरी आज़माइश करते हो (अनुबन्ध/तुकान्त) (पुस्तक-नवधा)

मेरी आज़माइश करते हो

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ग़ैरों के सामने इश्क़ की नुमाइश करते हो
क्यों भला ज़िन्दगी की फ़रमाइश करते हो

इश्क़ करते नहीं ईमान से तुम कभी 
और ख़ुद ही उस ख़ुदा से नालिश करते हो

ग़ैरों की जमात के तुम मुसाफ़िर हो
अपनों में आशियाँ की गुंजाइश करते हो 

ज़ख़्म गहरा देते हो हर मुलाक़ात के बाद
और फिर भी मिलने की गुज़ारिश करते हो 

इक पहर का साथ तो मुमकिन नहीं
मुक़म्मल ज़िन्दगी की ख़्वाहिश करते हो 

तुम्हें तो आदत है बेवफ़ाई करने की
और 'शब' की वफ़ा की आज़माइश करते हो 

-जेन्नी शबनम (16. 2. 2009)
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बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

14. तुमने सब दे दिया (अनुबन्ध/तुकान्त) (पुस्तक- नवधा))

तुमने सब दे दिया

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एक इम्तिहान-सा था, कल जो आकर गुज़र गया
वक़्त भी मुस्कुराया, जब तुमने मुझे जिता दिया 

एक वादा था तुम्हारा, कि सँभालोगे तुम मुझे 
लड़खड़ाए थे क़दम मेरे, तुमने निभा दिया 

रिश्ते ये कह गए, कि हम नहीं इस सदी के
इक ख़्वाब था जो साझा, वो मुझको दे दिया 

एक दिन होगा जब आएगी ज़रूर क़यामत 
उससे पहले तुमने हर क़यामत बरपा दिया। 

दहकता रहा मेरा जिस्म, पर तुम न जल सके
भरोसा तुमने 'शब' का, बस पुख़्ता कर दिया 

-जेन्नी शबनम (9. 2. 2009)
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