प्यार
लम्हों का सफ़र
मन की अभिव्यक्ति का सफ़र
सोमवार, 7 सितंबर 2026
810. प्यार (10 हाइकु)
शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
809. तो मिले उपहार (5 ताँका)
तो मिले उपहार
***
भाई है शर्मसार
जेब है ख़ाली
मँहगाई की मार।
शनिवार, 15 अगस्त 2026
808. आज़ादी मिले
आज़ादी मिले
मृत्यु तक मिलती है
साँस लेने की आज़ादी
पलक झपकाने की आज़ादी
सोचने की आज़ादी
वैसे ही हर इंसान को मिले
समान शिक्षा और स्वास्थ्य की आज़ादी
धार्मिक पाखण्ड और कुरीतियों से आज़ादी
अपने अस्तित्व, अधिकार और आत्मसम्मान को
देश का हर नागरिक बराबर हो!
स्वतंत्रता दिवस मुबारक हो!
शनिवार, 27 जून 2026
807. बनूँ गुलमोहर (8 सेदोका)
बनूँ गुलमोहर
1.
लिपटके रंगों से
खिले फूल हसीन,
मन चाहता
ओढ़कर रंगीनी
बनूँ गुलमोहर।
2.
पसरा हुआ
उदासी का मंज़र
रेगिस्तानी है फ़िज़ा
मन सहमा
हर शय ग़ुलाम
कैसा वक़्त है आया।
मन चाहता
खोलकर गठरी
सपनों को उड़ाती।
4.
सुनता नहीं
बेपरवाह मन
करता मनमानी
जग से टूटा
पर नाता न छूटा
हे सूर्य देव!
ज़रा रहम करो
धरती को बचाओ
मेघ को भेजो
तपते जीव-जन्तु
करुणा दिखलाओ।
6.
बाण व बात
हैं तीव्र हथियार
छूटे तो लौटे नहीं
माने न हार
करें क्रूर प्रहार
तन-मन छलनी।
बुधवार, 17 जून 2026
806. क्षणभंगुर जीवन
क्षणभंगुर जीवन
कितने बहाने
कितने दलील
सब फ़िज़ूल
ठगाया जीवन।
सोचा समझा
सब बिखरा
आघात मिला
व्यर्थ जीवन।
उपाय नहीं
समझौता सही
नासमझ नहीं
यही जीवन।
सोच बदलो
जीवन समझो
अमर नहीं
क्षणभंगुर जीवन।
गुरुवार, 11 जून 2026
805. वृद्ध का दुःख (10 हाइकु)
वृद्ध का दुःख
1.
वृद्ध की आस
कोई तो हो पास
बाँटें वे दुःख।
2.
वृद्ध का दुःख
मन में समाहित
सोचके हित।
3.
वृद्ध का कोना
रिश्तों की राह ताके
रहता सूना।
4.
वृद्ध जीवन
अनुभवों का कोष
लो निःसंकोच।
5.
कोई न सुने
विलाप और रोना,
वृद्ध अकेला।
6.
वृद्ध बेचारा
कोई न सहारा
आँखें सजल।
7.
जवानी पूनो
वृद्ध जीवन अमा
मन बेचैन।
8.
बहते लोर
पोंछे न कोई और
वृद्ध अकेला।
9.
वृद्ध जीवन
अनुभव की आँखें
रखते मूँदे।
10.
जीवनभर
कर्मयोगी था वृद्ध,
अब बेकार।
-जेन्नी शबनम (26.9.2024)
शुक्रवार, 5 जून 2026
804. नौतपा दैत्य (10 ताँका)
नौतपा दैत्य
1.
नौतपा दैत्य
किसी को न छोड़ेगा
बचके रहो
घर में छुप जाओ
पानी पी के भगाओ।
2.
होगा बचना
सूरज बना आग
सब हैं डरे
कैसे करें उपाय
ग़रीब असहाय।
3.
जीव बेचैन
गर्मी से हैं बेहाल
बिजली गुल
घमण्डी बना सूर्य
रौद्र रूप दिखाए।
4.
हवा है शांत
बैठी है समाधिस्थ
धूप से जली
समाधि नहीं टूटी
हवा बनी है संत।
5.
हरता प्राण
सूर्य है मृत्यु-देव
नहीं बख़्शता
जीव-जंतु या नदी
पोखर या बावड़ी।
6.
जेठ महीना
बड़ा है तड़पाता
वह निगोड़ा
खुलेआम घूमता
जीव-जंतु छुपता।
7.
सूर्य बेशर्म
ज़रा नहीं है शर्म
लू का गोला
फेंकके ख़ुश होता
चोटिल है दुनिया।
8.
नौतपा शत्रु
लू लेकर दौड़ता
चुनौती देता,
छाता-पानी हारते
जीव-जंतु हाँफते।
9.
ओह गरमी
ज़रा करो नरमी
जीव बेहाल
जिसका नहीं घर
उसकी पीड़ा हर।
10.
आषाढ़ आओ
जेठ है तड़पाए
नीर बहाओ
सूर्य को समझाओ
ठण्डक को लौटाओ।
मंगलवार, 2 जून 2026
803. यात्री सूरज (चोका- 20)
यात्री सूरज
***
यात्री सूरज
करके रोज़ यात्रा
थकता होगा
चलना ही है धर्म
कोई हो ऋतु
कहीं न पहुँचता,
उसके पाँव
ज़ख़्मी तो होते होंगे
कौन लगाये
मरहम व पट्टी
दर्द छुपाके
जीवन का सन्देश
रोज़ ही देता
पर कौन सुनता
जल-जल के
उजाला पसारता,
बिन बैटरी
रोबोट बना सूर्य
रात व दिन
चकरघिन्नी बन
मन न चाहे
चलता ही रहता,
हे यायावर!
एक दिन तो करो
ज़रा विश्राम
तुमसे ही तो जग
सोता-जागता
एक दिन लो तुम
सोने का मज़ा
फिर चल पड़ना
बिन ठहरे
हँसते व जलते,
घुमंतू सूर्य!
बात सुन रहा न
आ साथ बैठ
ज़रा तो गप्पे लड़ा
चाय भी पी ले
फिर तू निकलना
अपनी यात्रा पर।
-जेन्नी शबनम (18.10.2022)
____________________
मंगलवार, 26 मई 2026
802. प्रचण्ड गर्मी (10 हाइकु)
1.
प्रचण्ड गर्मी
धरा उबल रही
सूर्य अलाव।
2.
तपती धरा
हाहाकार है मचा
सूर्य अंगारा।
3.
लू के थपेड़े
सूर्य आग उगले
सब झुलसे।
4.
रहम करो
प्रकृति पुकारती
सूर्य बहरा।
5.
पड़ा महँगा
प्रकृति से खेलना
क्रूर सूरज।
6.
खेत झुलसा
जीवन का बन्धन
साथ ही टूटा।
7.
प्यासे बेहाल
जीव-जंतु तड़पें
पानी है खोजें।
8.
पी गया सूर्य
धरा हुई निर्जल
मृत तलैया।
9.
साँसें ले आईं
खिला गुलमोहर
गरम हवा।
10.
शैतान सूर्य
आग है बरसाता
गर्मी का राजा।
__________________
शुक्रवार, 1 मई 2026
801. लाले-लाल
लग रही है बेलगाम बोली
राजपथ असहाय है
आज़ादी पूर्व का एहसास हो रहा
राजपथ बेचैन है
चंद सरमायेदारों की क्रूरता से घिरा
राजपथ ज़ख़्मी है।
राजपथ स्वतंत्र हुआ था अनगिनत बलिदानों से
आज उसे फिर शुद्ध लहू की दरकार है
नाम बदला पर कर्त्तव्य पथ न बन सका
राजपथ पर पसरा बड़ा व्यापार है
राजपथ पर हिंसकों का क़ब्ज़ा
बेग़ैरत हर सरकार है
हर आज़ादी वापस मिले
अब इन्क़िलाब की दरकार है।
राजपथ को आज़ादी चाहिए
हमें 1947 वाली आज़ादी चाहिए
ग़रीबी-बेरोज़गारी से आज़ादी चाहिए
सम्पूर्ण देश का विकास चाहिए
आओ नौजवानों बिखेर दो लहू
हर तरफ़ अब लाले-लाल चाहिए
झंडा लाल, लहू लाल, लाले-लाल
हर हाथ में क्रांति की मशाल
हर तरफ़ अब लाले-लाल चाहिए।
गुरुवार, 2 अप्रैल 2026
800. युद्ध जारी है
युद्ध जारी है
विश्व संकट में है
मिसाइल्स की आतिशबाज़ी गूँज रही है
ध्वस्त हो रही हैं विशाल इमारतें
नष्ट हो रहे हैं देश की सुरक्षा के संसाधन
विधवा हो रही हैं सैनिक की पत्नियाँ
मर रहे हैं नागरिक
अनाथ हो रहे हैं बच्चे।
युद्ध जारी है
अपने अपने दृष्टिकोण से
हर लोग निर्णायक बने हुए हैं
कौन सही, कौन गलत
किसका पक्ष लें, किसे दुत्कारें
किसका साथ दें, किसके ख़िलाफ़ बोलें।
युद्ध जारी है
हर तरफ़ दहशत, ख़ून-ख़राबे
चिथड़े-चिथड़े जिस्म की पहचान नहीं
किसी का अपना शहीद हुआ
न जाने कितनी जानें क़ुर्बान हुईं
इस ख़ौफ़नाक मंज़र पर
कोई जश्न मना रहा
तो कोई छाती पीट रहा।
युद्ध ख़त्म होगा
बेवाओं और अनाथ बच्चों की फ़ौज
तमाम उम्र मन में युद्ध को जिएँगे
भले असहाय हों, पर नफ़रत करेंगे
युद्धरत देश नए नेता लाएँगे
युद्ध के नए तकनीक लाएँगे
ताकि अगला युद्ध और पुरज़ोर हो सके।
हर युद्ध दुनिया के ख़त्म होने का ज़रिया है
कौन हारा, कौन जीता
किसकी कितनी क्षति हुई
इस पर विवेचना होगी
अपने-अपने पक्ष के देश के साथ
दुनिया खेमों में बँटेगी
अगले युद्ध के इंतज़ार में।
रविवार, 8 मार्च 2026
799. स्त्रियाँ (10 हाइकु)
स्त्रियाँ
1.
स्त्रियों के हिस्से
परख-आकलन
यही चलन।
2.
स्त्रियाँ हैं फूल
दामन में हैं काँटें
दुःख क्या बाँटे।
3.
स्त्रियाँ-अंगार
आजीवन चलती
नहीं जलती।
4.
स्त्री के बिना
सूना है घर-बार
माने संसार।
5.
स्वयं सींचती
आजीवन पालती
जीव के पौधे।
6.
थाती में मिली
बेबसी व घुटन
स्त्री है बेचारी।
7.
स्त्रियाँ हैं काली
ज़रूरत पड़े तो
करे विध्वंस।
8.
फ़र्ज़ निभाती
मिला कंधे से कन्धा
पुरुष की स्त्री।
9.
आँचल गीला
हँसके पिए पीड़ा
स्त्री का जीवन।
10.
भूखी होती स्त्री
प्यार व सम्मान की
नहीं धन की।
बुधवार, 4 मार्च 2026
798. होली-त्योहार
1.
रंगों के संग
फागुन की बयार
होली तैयार।
2.
फूलों की क्यारी
प्रकृति पिचकारी
रंग खेलती।
3.
सूखे गुलाल
लज़ीज़ पकवान
होली त्योहार।
4.
भाँग पीकर
मदमस्त नाचते
रंग-अबीर।
5.
निकली टोली
भूल गिले-शिकवे
सभी हैं रँगे।
6.
रंग क्या चढ़े
आर्टिफ़िशियल है
रंग व रिश्ते।
7.
अपने घर
खींचकर ले आया
होली का रंग।
8.
रंगीली होली
तन ही रँग सकी
मन उदास।
9.
नहीं सुहाता
अब कोई भी रंग
मन बेरंग।
10.
होली हकीम
मिटाए दुःख-दर्द
सुख असीम।
11.
आया अबीर
घोलके पी ली पीर
मन रंगीन।
12.
सबको रँगे
भेदभाव भूलके
बौराई होली।
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026
797. सफ़र का क़िस्सा
तन की ज़रूरत कब बढ़ी-घटी
मन से मन की बात कब कही
यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं
पिघलते रहे मन के जज़्बात
छुप न सकी कोई भी बात
सन्नाटे में बैठी रही आँखें मूँद
लरजती रही आँसुओं की बूँद
कौन समझे ग़ैरों के एहसास
अब रहा नहीं कोई आस-पास
मेरे जीवन के सफ़र का क़िस्सा
ज़माने का बना अब रोचक हिस्सा।
शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
796. पाँव तैयार नहीं
खड़े रहने, अड़े रहने को पाँव मददगार नहीं
न ज़मीन न स्वर्ग की सीढ़ी पर ये बढ़ेंगे
अब कोई डर नहीं, कहीं जाना नहीं
कहीं पहुँचने की आतुरता नहीं
यह आराम का समय है
तनिक विश्राम का समय है
अपने ठहराव पर खिलखिलाना है
समय के साथ समय बिताना है।
रविवार, 16 नवंबर 2025
795. जश्न जारी है
जश्न जारी है
***
तिनके के लिए भी राह न बची
खिड़की ने अपने पल्ले ठेलकर
निश्चित किया कि प्रवेश निषिद्ध रहे।
दरवाज़े व खिड़की की झिरी से
ठण्डी-स्वच्छ हवा आती है
यहाँ की ऊबन से घबराकर
थकी-उदास लौट जाती है।
उम्मीद की राहें बंद हुईं
पर फ़रियाद दिल की मिटी नहीं
साँसों की गिनती घटती रही
पर ख़्वाहिशें कभी मिटी नहीं।
प्रारब्ध अटल है चुकाना ही होगा
नियम तय है चलना ही होगा
समझना-समझाना सब फ़िज़ूल
हर कर्म यहाँ भुगतना ही होगा।
जीवन और साँसों का बोझ भारी है
उम्मीद हारी है पर जीवन जारी है
जाने जीने की ये कैसी लाचारी है
साँसें घटीं पर दुःख का जश्न जारी है।
बंद दरवाज़े व खिड़की के पीछे
आह की नदी एक बहती है
जब भी मन हो आकर डूब जाना
मुझसे बार-बार यह कहती है।
बंद दरवाज़े व खिड़की के पीछे
मेरी प्यासी रूह भटकती है
उम्मीद हारी है अब जीवन की बारी है
सोमवार, 21 जुलाई 2025
794. ज़िन्दगी की लकीर
ज़िन्दगी की लकीर
हथेली में सिर्फ़ सुख की लकीरें थीं
कब किसने दुःख की लकीरें उकेर दीं
जो ज़िन्दगी की लकीर से भी लम्बी हो गई,
अब उम्मीद की वह पतली डोर भी टूट गई
जिसे सँजोए रखती थी तमाम झंझावतों में
और हथेली की लकीरों में तलाशती थी।
रविवार, 25 मई 2025
793. किरदार
किरदार
***
इस किरदार को बदलना होगा
ढेरों शिकायत है वक़्त से
कुछ तो उपाय करना होगा
वक़्त न लौटता है, न थमता है
मुझे ख़ुद को अब रोकना होगा
ज़मीन-आसमान हासिल नही
नसीब से कब तक लड़ना होगा?
न अपनों से उम्मीद, न ग़ैरों से
हदों को मुझे ही समझना होगा
बेइख़्तियार रफ़्तार ज़िन्दगी की
अब ज़िन्दगी को रुकना होगा
'शब' का किरदार ख़त्म हुआ
इस किरदार को मिटना होगा।
मंगलवार, 6 मई 2025
792. सफ़र जारी है
सफ़र जारी है
बहुत कुछ छूट गया
ज़िन्दगी न ठहरी, न थमी
न कोई राह दिखाने वाला
न कोई साथ निभाने वाला
न मक़ाम आया, न मंज़िल ही मिली
मन भारी है, सफ़र जारी है
मगर ज़िन्दगी नहीं हारी है।
गुरुवार, 20 मार्च 2025
791. गौरैया (9 हाइकु)
गुरुवार, 13 मार्च 2025
790. होली (होली पर 20 हाइकु)
होली
(होली पर 20 हाइकु)
1.
भाँग पीकर
पुआ-पूड़ी खाकर
होली अघाई।
2.
लगाकर गुलाल
ख़ूब लजाई।
3.
धर्म व जाति
भेद नहीं करती
भोली है होली।
4.
होलिका जली
जलकर दिखाई
कर्म का पथ।
5.
दे बलिदान
होलिका ने सिखाया
सत्य का ज्ञान।
6.
देकर प्राण
होलिका ने बचाया
धर्म का मान।
7.
पगली हवा
रंग उड़ाके बोली-
गाओ फगुआ।
8.
उड़ाओ रंग
फगुआ को भाता है
गुलाबी रंग।
9.
रँगी बावरी
साँवरे के रंग में
खेलती होली।
उड़ा गुलाल
पिया की प्यारी
हुई है लाल।
11.
भेद व द्वेष
मन से है मिटाती
होली सन्मार्गी।
12.
आकर खेलो
अतीत को भूलके
रंगीली होली।
13.
अब तो भूलो
ग़लतफ़हमियाँ
होली खेलो न!
14.
फगुआ के फाग से
मन है बँधा।
15.
रंग लेकर
चली हवा बसन्ती
धरा रंगती।
16.
सब भौजाई
अपनी या पराई
होली है भाई।
17.
हँसी-ठिठोली
मोहल्ले की भौजाई
18.
लगाओ रंग
करो ख़ूब धमाल
होली है यार।
शनिवार, 8 मार्च 2025
789. एक सवाल
बार-बार भोगती रही
अपमान का घूँट पीती रही
और तुम सभी नज़रें झुकाए
तुम सभी के पुरुष होने पर
ऐसे वचन पर
मेरी जगह तुम्हारी पुत्री होती तो?
क्या फिर भी उसे दाँव पर लगा देते?
क्या उसे भी पाँच पुरुषों में बाँट देते?
भरी सभा में निर्वस्त्र होने देते?
मेरी हँसी नाजाएज़ सही
पर क्या ये जाएज़ है?
सोमवार, 10 फ़रवरी 2025
788. प्रवासी पूत (20 हाइकु)
मन हुआ बेकल
2.
रोज़ी-रोटी की खोज
प्रवासी बेटा।
विदेश की धरती
4.
दुःखी माँ-बाप।
5.
छूटा है देश
ज़िम्मेदारी का दंश
अकेला बच्चा।
6.
अकेला बच्चा
माँ-बाप निस्सहाय
प्रवासी पूत।
7.
अकेला बेटा
विदेश की धरती,
दुःख है भारी।
8.
चढ़ गया सूली पे,
बेरोज़गारी।
9.
बेटा है देशी
रोज़गार की खोज
बना विदेशी।
10.
काँटों से घिरा
प्रवासी बना बच्चा,
फूल भेजता।
11.
देश की याद
हर रोज़ सताती
क्या करे बेटा?
12.
विदेशी पूत
अपना न सहारा
दुःख है साथी।
विदेश का सपना,
मंगलवार, 7 जनवरी 2025
787. तुम्हें जीत जाना है
तुम्हें जीत जाना है
***
उस चक्रव्यूह में समाने का समय आ गया है
जिसमें जाने के रास्तों का पता नहीं
न बाहर निकलने का पता होता है
इस चक्रव्यूह में तय, कब कोई रास्ता होता है?
यह वह समय है, जब हर पल समझ से परे हो जाता है।
जीवन कभी आसमान की परिधि में महसूस करता है
तो कभी आसमान से धरती पर पटक दिया जाता है
जिस समय को अपना समझते हैं
उसके द्वारा पूरा-का-पूरा वजूद झटक दिया जाता है
उल्लास से मन भीग रहा होता है
तभी दुश्चिंताओं की काली छाया दिखेगी
हर स्वप्न अधूरा-सा लगेगा
जीवन अर्थहीन-सा लगेगा
सपनों का सुन्दर संसार सामने होगा
मगर ज़िम्मेदारियों से मन घबराएगा
पथ तो चुन लिया, मगर सफल न होने की सम्भावना
सोचे-विचारे रास्ते, अँधेरे से घिरे दिखेंगे
न ठहरने का ठौर होगा, न रास्तों के सिरे दिखेंगे।
राह उचित है या अनुचित
यह अपनी-अपनी तरह से सब सोचते हैं
मगर जहाँ पहुँच गए, वहाँ से न रास्ते
न पथिक लौटते हैं।
यह वह समय है जब निर्णय पर सन्देह नहीं
सम्भव है चुनाव ग़लत हो जाए
मन टूट जाए
पर हौसला टूटने नहीं देना है
मंज़िल इसी पर कहीं होगी
रास्ता छूटने नहीं देना है
मन जो चाहे वह करना है
काँटे तो मिलेंगे ही
चिन्तन-मनन के बाद भी सफ़र न सुहाए
तो थमकर-सोचकर नई राह तलाशना है
दुःख को हार नहीं, हौसले में बदलना है
एक-न-एक दिन वह समय अवश्य आएगा
जब स्वयं पर गर्व होगा
स्वाभिमान से परिपूर्ण जीवन होगा
कठिनाइयों पर विजय होगी
हार नहीं, साथ में बस साहस होगा
हर सवाल का सामने जवाब होगा
और उस दिन फिर से ज़िन्दगी का हिसाब होगा।
जीवन सुन्दर है, सुन्दरता से सँवारना है
हर नए दिन को आनन्दमय बनाना है
जीवन से पलों का एक रिश्ता है, वह रिश्ता निभाना है
बुधवार, 1 जनवरी 2025
786. नव वर्ष (20 हाइकु)
1.
मन में आस-
नव वर्ष की भोर
हो पुनर्जन्म।
लेकर आशा
नव वर्ष है आया
शुभ सन्देश।
3.
उँगली थामे
नव वर्ष की भोर
घूमने चली।
4.
चहकती है
नव वर्ष की भोर
ख़ूब है शोर।
5.
ठिठुरन है
पर मन में जोश
पहली तिथि
नव वर्ष की भोर
ठण्ड से काँपी।
जश्न की रात
स्वागत में संसार
नवीन वर्ष।
8.
धुँध में आई
नव वर्ष की भोर
मन विभोर।
दुःख को भूलें
नव वर्ष का दिन
स्वागत करें।
नवीन वर्ष
उमंग पसारने
फिर से आया।
पिछला वर्ष
बना है इतिहास
याद आएगा।
12.
नूतन वर्ष
धक्का देके भगाया
पुराना वर्ष।
साल पुराना
बन गया अतीत,
नया आएगा।
14.
स्मृति छोड़के
चुपचाप गुज़रा
साल पुराना।
नव वर्ष को थामे
वक़्त पर आई।
16.
सन्देशा लाया-
वक़्त के साथ चलो,
नवीन वर्ष।
छुड़ाके लौटा
नए साल का हाथ
पिछला साल।
18.
याद दिलाता
वक़्त का बदलाव
नूतन वर्ष।
19.
बिछड़ गया
सुख-दुःख का साथी
पिछला साल।
20.
नूतन वर्ष,
वक़्त दोहराएगा
काल का क्रम।
गुरुवार, 26 दिसंबर 2024
785. सपने जो मेरे हैं (5 माहिया)
सपने जो मेरे हैं
जितने सपने थे
ख़्वाबों को भरकर
चाँदी का रथ गुज़रा।
नाता तोड़ गया
उसकी है मनमर्ज़ी।
महके इठलाए
जीवन ज्यों बचपन में।
मंगलवार, 24 दिसंबर 2024
784. सूरज किसका चाँद किसका
सूरज किसका चाँद किसका
***
हम भी तनहा, तुम भी तनहा
संसार में हम दोनों तनहा
पर साथ-साथ हम चलते हैं
अपना कर्त्तव्य निभाते हैं।
सारे दिन जलकर
जब तुम सोने जाते हो
तुमसे लेकर उजाला
हम देते हैं जग को उजाला
बस एक रात होती है
हमारे मिलन की रात
वह है अमावस की रात
हाँ! यह भी बहुत है
हमारे अनन्त जीवन में
हर माह होती है हमारी रात।
कभी-कभी मन सोचता है
मिली ऐसी ज़िन्दगी क्यों
पिया हमने अमृत क्यों
युगों-युगों से चलते हुए
हर रोज़ जलते हुए
क्या पाएँगे हम
कब तक यूँ जलेंगे हम
उफ़ ये क्या कर लिया हमने
अमरत्व का वरदान
अब लगता है अभिशाप।
हम दोनों अपने पथ पर
बिना थके चलते दम भर
करते रहे कर्त्तव्य का पालन
नहीं किया कोई उल्लंघन
पर जग की रीत देखकर
मन चाहता छोड़ दें सब बन्धन।
कोई कहता सूरज है उसका
कोई कहता चाँद है उसका
नहीं पूछता कोई हमसे
क्या इच्छा है हमारे मन में
युगों-युगों से हम साथ रहे
युगों-युगों तक यों ही रहेंगे
मन दुखता है सुनकर
जग हँसता जब हमें बाँटकर।
अब चाहते आ जाए प्रलय
जग में नहीं रहा कोई लय
या मिल जाए विष कहीं
या उगल दें अमृत सभी
कर विषपान हम करें विश्राम
या अमरत्व का मिटे विधान।
सूरज बिना मिट जाएगी दुनिया
अँधेरे में कब तक टिकेगी दुनिया
फिर बाँटते रहना जगवालों
सूरज था किसका
गुरुवार, 12 दिसंबर 2024
783. पैरहन (5 क्षणिका)
हथेली में सिर्फ़ सुख की लकीरें थीं
कब किसने दुःख की लकीरें उकेर दीं
जो ज़िन्दगी की लकीर से भी लम्बी हो गई
अब उम्मीद की वह पतली डोर भी टूट गई
जिसे सँजोए रखती थी तमाम झंझावतों में
और हथेली की लकीरों में तलाशती थी।
इस पार या उस पार
***
शब्दों का कब तक दूँ हिसाब
सवालों से घिरी मैं
अब नहीं चाहती जवाब
सिर पर लिए हुए सारे सवालों का उ
चुपचाप गुम हो जाना चाहती हूँ
संसार के इस पार या उस पार।
3.
रिश्ते बेजान हुए
कोई चाह अब शेष नहीं
टूटी-फूटी धड़कनें बेहाल हुईं
खण्ड-खण्ड में टूटा दिल, साँसें बेजार हुईं
सपनों के भँवर-जाल की सन्नाटों से बात हुईं
सब छूटा, सब बिखरा, जीने की ख़त्म राह हुई।
मैंने ख़ुद को पहन रखा है सदियों से
ज़िन्दगी पैरहन है, जो अब बोझ लगती है
अब तो बे-आवाज़ ये पैरहन छूटे
मैं बे-लिबास हो जाऊँ
मैं आज़ाद हो जाऊँ।
मौसम का बदलना
नियत समय पर होता है
पर मन का मौसम
क्षणभर में बदलता है
यह बदलाव
कोई क्यों नहीं समझता है?