बुधवार, 8 जुलाई 2020

678. इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

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दो चार फ़िक्र हैं जीवन के   
मिले गर कोई राह, चले जाओ   
बेफ़िक्री लौटा लाओ   
कह तो दिया कि दूर जाओ   
निदान के लिए सपने न देखो   
राह पर बढ़ो, बढ़ते चले जाओ   
वहाँ तक जहाँ पृथ्वी का अंत है   
वहाँ तक जहाँ कोई दुष्ट है या संत है   
बस इंसान नहीं है, प्यार से कोई पहचान नहीं है   
या वहाँ जहाँ क्षितिज पर आकाश से मिलती है धरा   
या वहाँ जहाँ गुम हो जाए पहचान, न हो कोई अपना   
मत सोचो देस परदेस   
भूल जाओ सब तीज-त्योहार   
बिसरा दो सब प्यार-दुलार   
लौट न पाओ कभी   
मिल न पाओ अपनों से कभी   
यह पीर मन में बसा कर रखना   
पर हिम्मत कभी न हारना   
यायावर-सा न भटकना तुम   
दिग्भ्रमित न होना तुम   
अकारण और नहीं रोना तुम   
एक ठोस ठौर ढूँढ कर   
सपनों में हमको सजा लेना   
मन में लेकर अपनों की यादें   
पूरी करना बुनियादी जरूरतें   
आस तो रहेगी तुम्हें   
अपने उपवन की झलक पाने की   
कुटुम्बों संग जीवन बीताने की   
वंशबेल को देखने की   
प्रियतमा के संग-साथ की   
मिलन की किसी रात की   
पर समय की दरकार है   
तकदीर की यही पुकार है   
कोई उम्मीद नहीं कोई आस नहीं   
किसी पल पर कोई विश्वास नहीं   
रहा सहा सब पिछले जन्म का भाग्य है   
इस जनम का इतना ही इंतजाम है   
बाकी सब अगले जन्म का ख्वाब है   
निपट जाए जीवन-भँवर   
बस इतना ही हिसाब है   
चार दिन का जीवन   
दो जून की रोटी   
बदन पर दो टुक चीर   
फूस का अक्षत छप्पर   
बस इतनी-सी दरकार है   
बस इतनी-सी तो बात है।   

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2020) 
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बुधवार, 1 जुलाई 2020

677. सँवरने नहीं देती

सँवरने नहीं देती

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दर्द की ज़ुबान मीठी है बहकने नहीं देती   
लहू में डूबी है ज़िन्दगी सँवरने नहीं देती !   

इक रूह है जो जिस्म में तड़पती रहती है   
कमबख्त साँस हैं जो निकलने नहीं देती !   

मसला तो हल न हुआ बस चलते ही रहे   
थक गए पर ये ज़िन्दगी थमने नहीं देती !   

वक़्त के ताखे पे रखी रही उम्र की बाती   
किस्मत गुनहगार ज़िन्दगी जलने नहीं देती !   

अब रूसवाई क्या और भला किससे करना   
चाक-चाक दिल मगर आँसू बहने नहीं देती !   

मेरे वास्ते अपनों की भीड़ ने कजा को पुकारा   
शब से रूठी है कजा उसको मरने नहीं देती !   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2020) 
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शुक्रवार, 26 जून 2020

676. रीसेट

रीसेट

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हयात के लम्हात, दर्द में सने थे   
मेरे सारे दिन-रात, आँसू से बने थे   
नाकामियों, नादानियों और मायूसियों के तूफ़ान   
मन में लिए बैठे थे   
वक़्त से सुधारने की गुहार लगाते-लगाते   
बेज़ार जिए जा रहे थे   
हम थे पागल, जो माजी से प्यार किए जा रहे थे   
कल वक़्त ने कान में चुपके से कहा -   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो   
जितनी बची है, उतनी ज़िन्दगी भरपूर जी लो   
दर्द को खा लो, आँसू को पी लो   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो !   

- जेन्नी शबनम (26. 6. 2020) 
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मंगलवार, 23 जून 2020

675. ईनार

ईनार

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मन के किसी कोने में   
अब भी गूँजती हैं कुछ धुनें   
रस्सी का एक छोर पकड़   
छपाक से कूदती हुई बाल्टी   
ईनार पर लगी हुई चकरी से   
एक सुर में धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती बाल्टी   
टन-टन करती बड़ी बाल्टी छोटी बाल्टी   
लोटा-कटोरा और बाल्टी-बटलोही   
सब करते रहते खूब बतकही   
दाँत माँजना बर्तन माँजना   
कपड़ा फींचना दुख-सुख गुनना   
ननद-भौजाई की हँसी ठिठोली   
सास-पतोह की नोक झोंक   
बाबा-दादी के आते ही   
घूँघट काढ़ करती हड़बड़ी   
चिल्ल-पों करते बच्चों का नहाना   
तुरहा-तुरहिन का आकर साँसे भरना   
प्यासे बटोही की अँजुरी में   
बाल्टी से पानी उड़ेल-उड़ेल पिलाना   
लोटा में पानी भरकर सूरज को अर्घ्य देना   
रोज-रोज वही दृश्य पर ईनार चहकता हर दिन   
भोर से साँझ प्यार लुटाता रुके बिन   
एक सामूहिक सहज जीवन   
समय के साथ बदला मन   
दुख-सुख का साथी ईनार, अब मर गया है   
चापाकल घर-घर आ गया है   
परिवर्तन जीवन का नियम है   
पर कुछ बदलाव टीस दे जाता है   
आज भी ईनार बहुत याद आता है। 

- जेन्नी शबनम (23. 6. 2020) 
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रविवार, 21 जून 2020

674. बोनसाई

बोनसाई 

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हज़ारों बोनसाई उग गए हैं   
जो छोटे-छोटे ख्वाबों की पौध हैं   
ये पौधे अब दरख़्तों में तब्दील हो चुकें हैं   
ये सदा हरे भरे नहीं रहते   
मुरझा जाने को होते ही हैं   
कि रहम की ज़रा-सी बदली बरसती है   
वे ज़रा-ज़रा हरियाने लगते हैं   
फिर कुनमुना कर सब जीने लगते हैं   
वे अक्सर अपने बौनेपन का प्रश्न करते हैं   
आख़िर वे सामान्य क्यों न हुए, क्यों बोनसाई बन गए   
ये कैसा रहस्य है   
ये ऐसे दरख़्त क्यों हुए, जो किसी को छाँव नहीं दे सकते   
फलने-फूलने-जीने के लिए हज़ार मिन्नतें करते हैं   
फिर मौसम को तरस आता है   
वे ज़रा-सी धूप और पानी दे देते हैं   
आख़िर ऐसा क्यों है   
क्यों बिन माँगे मौसम उन्हें कुछ न देता   
क्यों लोग हँसते हैं उसके ठिगनेपन पर   
बोनसाई होना उनकी चाहत तो न थी   
सब तक़दीर के तमाशे हैं   
जो वे भुगतते हैं   
रोज़ मर-मर कर जीते है   
पर ख़्वाबों के ये बोनसाई   
कभी-कभी तन्हाई में हँसते भी हैं !   

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2020)
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मंगलवार, 16 जून 2020

673. ख़ाली हाथ जाना है

ख़ाली हाथ जाना है 

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ख़ाली हाथ हम आए थे   
ख़ाली हाथ ही जाना है !  

तन्हा-तन्हा रातें गुज़री   
तन्हा दिन भी बिताना है !  

समझ-समझ के समझे क्यों   
समझ से दिल कब माना है !  

कतरा-कतरा जीवन छूटा   
कतरा-कतरा सब पाना है !  

बूँद-बूँद बिखरा लहू   
बूँद-बूँद मिट आना है !  

झम-झम बरसी आँखें उसकी   
झम-झम जल ये चखाना है !  

'शब' को याद मत करो तुम   
उसका गया जमाना है !  

- जेन्नी शबनम (16. 6. 2020)
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मंगलवार, 9 जून 2020

672. आईना और परछाई

आईना और परछाई 

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आईना मेरा सखा   
जो मुझसे कभी झूठ नहीं बोलता   
परछाई मेरी सखी   
जो मेरा साथ कभी नहीं छोड़ती   
इन दोनों के साथ मैं   
जीवन के धूप-छाँव का खेल खेलती   
आईना मेरे आँसू पोछता   
बिना थके मुझे सदा हँसाता   
परछाई मेरे संग-संग घूमती   
अँधियारे से मैं जब-जब डरती   
मेरा हाथ पकड़ वो रोशनी में भागती   
हाँ ! यह अलग बात   
आजकल आईना मुझसे रूठा है   
मैं उससे मिलने नहीं जाती   
उसका सच मैं देखना नहीं चाहती   
आजकल मेरी परछाई मुझसे लड़ती है   
मैं अँधेरों से बाहर नहीं निकलती   
जाने क्यों रोशनी मुझे नहीं सुहाती।   
जानती हूँ, ये दोनों साथी   
मेरे हर वक्त के राज़दार हैं   
मेरा आईना मेरा मन   
मेरी परछाई मेरी साँसें   
ये कभी न छोड़ेंगे मेरा दामन । 

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2020) 
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शुक्रवार, 5 जून 2020

671. फूलवारी

फूलवारी 

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जब भी मिलने जाती हूँ   
कसकर मेरी बाँहें पकड़, कहती है मुझसे -   
अब जो आई हो, तो यहीं रह जाओ   
याद करो, जब अपने नन्हे-नन्हे हाथों से   
तुमने रोपा था, हम सब को   
देखो कितनी खिली हुई है बगिया   
पर तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता   
बहुत याद आती हो तुम   
शहर में न तो फूल है न फूलवारी   
रूक जाओ न यहीं पर   
बचपन के दिनों सी बौराई फिरना।  

- जेन्नी शबनम (5. 6. 2020) 
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मंगलवार, 2 जून 2020

670. रंग

रंग

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बेरंग जीवन बेनूर न हो   
कर्ज में माँग लायी मौसम से ढ़ेरों रंग   
लाल पीले हरे नीले नारंगी बैगनी जामुनी   
छोटी-छोटी पोटली में बड़े सलीके से लेकर आई   
और खुद पर उड़ेल कर ओढ़ लिया मैंने इंद्रधनुषी रंग   
अब चाहती हूँ   
रंगों का कर्ज चुकाने, मैं मौसम बन जाऊँ   
मैं रंगों की खेती करूँ और खूब सारे रंग मुफ़्त में बाँटूँ   
उन सभी को जिनके जीवन में मेरी ही तरह रंग नहीं है   
जिन्होंने न रोटी का रंग देखा न प्रेम का   
न जमीन का न आसमान का   
चाहती हूँ   
अपने-अपने शाख से बिछुड़े पेट की आग का रंग ढूँढते-ढूँढते   
बेरंग सपनों में जीने वाले   
अब रंगों से होली खेलें रंगों से ही दिवाली भी   
रंगों के सपने हों रंगों की ही हकीकत हो   
रंग रंग रंग !   
क़र्ज़ क़र्ज़ क़र्ज़ !   
ओह ! मौसम ! नहीं चुकाऊँगी उधारी   
कितना भी तगादा करो चाहे न निभाओ यारी   
तुम्हारी उधारी तब तक   
जब तक मैं मौसम न बन जाऊँ।   

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2020) 
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सोमवार, 1 जून 2020

669. सीता की पीर

सीता की पीर 

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1. 
राह अगोरे  
शबरी-सा ये मन,  
कब आओगे?  

2. 
अहल्या बनी  
कोई राम न आया  
पाषाण रही।  

3. 
चीर-हरण,  
द्रौपदी का वो कृष्ण  
आता न अब।  

4. 
शुचि द्रौपदी  
पाँच वरों में बँटी,  
किसका दोष?  

5. 
कर्ण का दान  
कवच व कुंडल,  
कुंती बेकल।  

6. 
सीता है स्तब्ध  
राम का तिरस्कार  
भूमि की गोद।  

7. 
सीता की पीर  
माँ धरा ने समेटी  
दो फाँक हुई।  

8. 
स्पंदित धरा  
फटा धरा का सीना  
समाई सीता।  

9. 
त्रिदेव शिशु,  
सती अनसूइया  
आखिर हारे।  

10. 
सती का कुंड  
अब भी प्रज्वलित,  
कोई न शिव।  

- जेन्नी शबनम (31. 5. 2020)
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