गुरुवार, 26 मार्च 2020

652. एकांत

एकांत   

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अपने आलीशान एकांत में   
सिर्फ अपने साथ रहने का मन है   
जिन बातों को जिलाया मन में   
स्वयं को वह सब कहने का मन है   
सवालों के वृक्ष जो वटवृक्ष बन गए   
उन्हें जमींदोज कर देने का मन है।   

मेरे हिस्से में आई है नफरत ही नफरत   
उसे दूर किसी गहरी झील में डूबो देने का मन है   
तोहमतों की फेहरिस्त जो मेरे माथे पे चस्पा है   
उन सभी को जगज़ाहिर कर देने का मन है   
मीलों लम्बा रेगिस्तान जिसे मैंने ही चुना है   
अब वहाँ फूलों की क्यारी लगाने का मन है।   

जीवन के सारे अवलम्ब अब काँटें चुभाते हैं   
सब छोड़ कर अपने मौन को जीने का मन है   
जीस्त के बियाबान रास्तों की कसक कम नही होती   
उन सारे रास्तों से मुँह मोड़ लेने का मन है   
पसरी हुई चुप्पी बहुत आवाज देती है जब तब   
सारे बंधन तोड़ खुद के साथ जब्त हो जाने का मन है।   

जीवन के सारे संतुलन खार हैं बस   
अब और संताप नहीं लेने का मन है   
जहर की मीठी खुशबू न्योता देने आती है   
सारे विष पीकर नीलकंठ बन जाने का मन है   
अनायास तो कभी कुछ होता नहीं पर   
सायास कुछ भी नहीं करने का मन है।   
अपने आलीशान एकांत में   
सिर्फ अपने साथ रहने का मन है।    

- जेन्नी शबनम (26. 3. 2020)   

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शुक्रवार, 20 मार्च 2020

651. गौरैया (गौरैया पर 15 हाइकु)

गौरैया  
(गौरैया पर 15 हाइकु)

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1.  
ओ री गौरैया,  
तुम फिर से आना  
मेरे अँगना।  

2.  
मेरी गौरैया  
चीं चीं चीं चीं बोल री,  
मन है सूना।  

3.  
घर है सूना,  
मेरी गौरैया रानी  
तू आ जा ना रे।  

4.  
लुप्त अँगना  
सूखे ताल-पोखर  
रूठी गौरैया।  

5.  
कंक्रीट फैला  
कहाँ जाए गौरैया  
घोंसला टूटा।  

6.  
प्यासी गौरैया  
प्यासे ताल-तलैया  
कंक्रीट-वन।  

7.  
बिछुड़ी साथी  
हमारी ये गौरैया  
घर को लौटी।  

8.  
झुंड के झुंड  
सोनकंठी गौरैया  
वन को उड़ी।  

9.  
रात व भोर  
चिरई करे शोर  
हो गई फुर्र।  

10.  
भोज है सजा  
पथार है पसरा  
गौरैया खुश।  

11.  
दाना चुगती  
गौरैया फुदकती  
चिड़े को देती।  

12.  
गौरैया बोली -  
पानी दो घोंसला दो  
हमें जीने दो।  

13.  
गौरैया रानी  
आज है इतराती  
संग है साथी।  

14.  
छूटा है देस  
चली है परदेस  
गौरैया बेटी।  

15.  
फुर्र-सी उड़ी  
चहकती गौरैया  
घर वीराना।  

(पथार - सुखाने के लिए फैलाया गया अनाज)   

- जेन्नी शबनम (20. 3. 2020)  
(विश्व गौरैया दिवस पर)


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शनिवार, 14 मार्च 2020

650. रंगीली होली

रंगीली होली 
(होली पर 9 हाइकु)

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1.  
होली की टोली  
बैर-भाव बिसरे  
रंगीली होली।  

2.  
रंगों की मस्ती  
चेहरे भोली भाली  
रंग हँसते।  

3.  
रंगों की वर्षा  
खिले जावा कुसुम  
घर-घर में।  

4.  
उड़ती आई  
मदमस्त फुहार  
रंग गुलाल।  

5.  
पिया विदेस  
रंगों का ये गुबार  
जोगिया मन।  

6.  
निष्पक्ष रंग  
मिटाए भेद-भाव  
रंग दे मन।  

7.  
सजी सँवरी  
पिचकारी रँगीली  
होली आई रे।  

8.  
फीके से रिश्ते  
रंगों की बरसात  
रंग दे मन।  

9.  
हँसी ठिठोली  
रौनक़ ही रौनक़  
होली हुलसी।  

- जेन्नी शबनम (10. 3. 2020)  



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रविवार, 8 मार्च 2020

649. पूरक

पूरक 

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ओ साथी, 
अपना वजूद तलाशो, दूसरों का नष्ट न करो   
एक ही तराजू से, हम सभी को न तौलो   
जीवन जो नेमत है, हम सभी के लिए है   
इससे असहमत न होओ।   
मुमकिन है, युगों की प्रताड़ना से आहत तुम   
प्रतिशोध चाहती हो   
पर यह प्रतिकार   
एक नई त्रासदी को जन्म देगा   
सामाजिक संरचनाएँ डगमगा जाएँगी   
और यह संसार के लिए मुनासिब नहीं।   
तुम्हारे तर्क उचित नहीं   
तुम पूरी जाति से बदला कैसे ले सकती हो ?   
जिसने पीड़ा दी उसे दंड दो   
न कि सम्पूर्ण जाति को   
जीवन और जीवन की प्रक्रिया, हमारे हाथ नहीं   
तुम समझो इस बात को।   
हाँ यह सच है, परम्पराओं से पार जाना   
बेहद कठिन था हमारे लिए   
हम गुनहगार हैं, तुम सभी के दुख के लिए   
पर युग बदल रहा है   
समय ने पहचान दी है तुम्हें   
पर तुम अपना आत्मविश्वास खो रही हो   
बदला लेने पर आतुर हो   
पर किससे?   
कभी सोचा है तुमने   
हम तुम्हारे ही अपने हैं   
तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं   
हमारे रगों में तुम्हारा ही रक्त बहता है   
जीवन तुम्हारे बिना नहीं चलता है।   
तुम समझो, दूसरों के अपराध के कारण   
हम सभी अपराधी नहीं हैं   
हम भी दुखी होतें हैं   
जब कोई मानव से दानव बन जाता है   
हम भी असहाय महसूस करते हैं   
उन जैसे पापियों से   
जो तुम्हें दोजख में धकेलता है।   
हाँ हम जानते हैं   
घोषित कानून तुम्हारे साथ है   
पर अघोषित सजा हम सब भुगतते हैं   
महज इस कारण कि हम पुरूष हैं।  
तुम्हें भी इसे बदलना होगा   
हमें भी यह समझना होगा   
कुछ हैवानों के कारण हम सभी परेशान हैं   
कुछ हममें भी राक्षस है, कुछ तुममें भी राक्षसी है   
हमें परखना होगा, हम सब को चेतना होगा   
हमें एक दूसरे का साथ देना होगा।   
हमें चलना है, हमें साथ जीना है   
हम पूरक हैं   
ओ साथी !   
आओ, हम कदम से कदम मिला कर चलें !  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2020)  
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

648. फ़ितरत

फ़ितरत 

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थोड़ा फ़लसफ़ा थोड़ी उम्मीद लेकर  
चलो फिर से शुरू हुई करते हैं सफर  
जिसे छोड़ा था हमने तब, जब  
जिंदगी बहुत बेतरतीब हो गई थी  
और दूरी ही महज़ एक राह बची थी  
साथ न चलने और साथ न जीने के लिए,  
साथ सफर पर चलने के लिए  
एक दूसरे को राहत देनी होती है  
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है  
और वह हमने खो दिया था  
जिंदगी को न जीने के लिए  
हमने खुद मजबूर किया था,  
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं  
न सीने में दफ़न हो सकती हैं  
चलो, अपने-अपने मन के एक कोने में  
बीती बातों को पुचकार कर सुला आते हैं  
अपने-अपने मन पर एक ताला लगा आते हैं,  
क्योंकि अब और कोई ज़रिया भी तो नहीं बचा  
साँसों की रवानगी और समय से साझेदारी का  
अब यही हमारी जिंदगी है और  
यही हमारी फ़ितरत भी।   

- जेन्नी शबनम (20. 2. 2020)

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शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

647. भोली-भाली

भोली-भाली 

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मेरी बातें भोली-भाली  
जीभर कर हैं हँसने वाली  
बात तुम्हारी जीवन वाली  
इक जीवन में ढ़लने वाली  
दुख की बातें न करना जो  
घुट-घुट कर हैं मरने वाली  
रद्दी सद्दी बातें हुईं जो  
समझो वो है भूलने वाली  
बात चली जो भी थक-थक के  
ये समझो है रुकने वाली  
ऐसी बातें कहा करो मत  
धुक-धुक साँसें भरने वाली  
प्यार की बातें करती है 'शब'  
दर्द नहीं अब कहने वाली।  

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2020)  

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शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

646. साथी

साथी  

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मेरी हँसी खो गई साथी  
मेरी यादें रूठ गई साथी  
दिन महीने और साल बीते  
न जाने कब और कैसे बीते  
हम संग-संग कैसे रहते थे  
हम पल-पल कैसे हँसते थे  
बीती बातें हमें रूलाती हैं  
रूठी यादें तुम्हें बुलाती हैं,  
फिर से हम हँसना सीखें  
यादों को हम जीना सीखें  
विस्मृत हो तो बस वेदना  
विस्मृत न हो मेरा सपना  
थोड़ी हँसी लेकर आओ  
आकर के जीना सिखलाओ,  
सब कुछ हमको दुख देता है  
हर कोई हमसे छल करता है  
धैर्य नहीं अब मन धरता है  
पल-पल जीवन भारी लगता है  
बस अब तुम आ जाओ साथी  
आकर गले लगाओ साथी,  
ठौर-ठौर जो मन रुठा था  
पल-पल मेरा भ्रम टूटा था  
मेरे लिए तुम आओ साथी  
सारे दुख तुम हर लो साथी  
मेरी हँसी रूठ गई साथी  
मेरी यादें खो गई साथी।  

- जेन्नी शबनम (8. 2. 2020)  
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रविवार, 2 फ़रवरी 2020

645. ऑक्सीजन

ऑक्सीजन 

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मेरे पुरसुकून जीवन के वास्ते  
तुम्हारा सुझाव -  
जीवन जीने के लिए प्रेम  
प्रेम करने के लिए साँसें  
साँसें भरने के लिए ऑक्सीजन  
ऑक्सीजन है प्रेम  
और वह प्रेम मैं तलाशूँ,  
अब बताओ भला, कहाँ से ढूँढूँ?  
ऐसा समीकरण कहाँ से जुटाऊँ?  
चारों ओर सूखा, वीराना, लिजलिजा  
फिर ऑक्सीजन कहाँ पनपे, कैसे नसों में दौड़े  
ताकि मैं साँसें लूँ, फिर प्रेम करूँ, फिर जीवन जीऊँ,  
सही ग़लत मैं नहीं जानती  
पर इतना जानती हूँ  
जब-जब मेरी साँसें उखड़ने को होती हैं  
एक कप कॉफी या एक ग्लास नींबू-पानी के साथ  
ऑक्सीजन की नई खेप तुम मुझमें भर देते हो,  
शायद तुम हँसते होगे मुझपर  
या यह सोचते होगे कि मैं कितनी मूढ़ हूँ  
यह भी सोच सकते हो कि मैं जीना नहीं जानती  
लेकिन तुमसे ही सारी उम्मीदें हूँ पालती  
पर मैं भी क्या करूँ?  
कब तक भटकती फिरुँ?  
अनजान राहों पर कदम डगमगाता है  
दूर जाने से मन बहुत घबराता है  
किसी तलाश में कहीं दूर जाना नहीं चाहती  
नामुमकिन में खुद को खोना नहीं चाहती,  
ज़रा-ज़रा-सा कभी-कभी  
तुम ही भरते रहो मुझमें जीवन  
और बने रहो मेरे ऑक्सीजन।  
हाँ, यह भी सच है मैंने तुम्हें माना है  
अपना ऑक्सीजन  
तुमने नहीं।   

- जेन्नी शबनम (2. 2. 2020)   

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सोमवार, 27 जनवरी 2020

644. बेफिक्र धूप (ठंड पर 10 हाइकु)

बेफिक्र धूप 
(ठंड पर 10 हाइकु)   

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1.   
ठठ्ठा करता   
लुका-चोरी खेलता   
मुआ सूरज।   

2.   
बेफिक्र धूप   
इठलाती निकली   
मुँह चिढ़ाती।   

3.   
बिफरा सूर्य   
मनाने चली हवा   
भूल के गुस्सा।   

4.   
गर्म अँगीठी   
घुसपैठिया हवा,   
रार है ठनी।   

5.   
ठिठुरा सूर्य   
अलसाया-सा उगा   
दिशा में पूर्व।   

6.   
धमकी देता   
और भी पिघलूँगा,   
हिम पर्वत।   

7.   
डर के भागा   
सूरज बचकाना,   
सर्द हवाएँ।   

8.   
वक्त चलता   
खरामा-खरामा-सा   
ठंड के मारे।   

9.   
जला जो सूर्य   
राहत की बारिश,   
मिजाज स्फूर्त।   

10.   
शातिर हवा   
चुगली है करती   
सूर्य बिदका।   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2020)   



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गुरुवार, 23 जनवरी 2020

643. एक शाम ऐसी भी

एक शाम ऐसी भी 

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एक शाम ऐसी भी, एक मुलाकात ऐसी भी   
बहुत-बहुत खास जैसी भी   
जीवन का एक रंग यह भी, जीवन का एक पड़ाव यह भी   
एक सुख ऐसा भी और एक भाव यह भी,   
खाली सड़क पर दो मन, एक हाथ की दूरी पर दोनो मन   
और ये दूरी भी मिटाने का जतन   
आत्मीयता में डूबे मन, बतकही करते दोनों मन   
और बहुत कुछ अनकहा समझने का प्रयत्न,   
न सिद्धांत की बातें न संस्कृति पर चर्चा   
न समाज की बातें न सरोकारों पर चर्चा   
न संताप की बातें न समझौतों पर चर्चा   
न संघर्ष की बातें न संयमो पर चर्चा   
पर होती रही बेहद लम्बी परिचर्चा,   
न शब्दों का खेल, न आश्वासनों का खेल
न अनुग्रह कोई, न भावनाओं का मेल     
न कोई कौतुहल न कोई व्यग्रता   
धीमे-धीमे बढ़ते कदम बिना किसी अधीरता   
समय भी साथ चला हँसता-गाता-झूमता,   
कॉफी की गर्माहट नसों में घुल रही जरा-जरा   
मीठे पान-सी लाली चेहरे पर जरा-जरा   
ठंडी रात है और बदन में ताप जरा-जरा   
जिंदगी हँस रही है आज जरा-जरा   
खाली जीवन भी आज जैसे भरा-भरा।   

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2020)   

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