गुरुवार, 5 मई 2022

742. मन हो न हो (मन पर 20 हाइकु)

मन हो न हो 

(मन पर 20 हाइकु) 


1. 
जीवन-मृत्यु   
निरन्तर का खेल   
मन हो, न हो।   

2. 
डटके खड़ा   
गुलमोहर मन   
कोई मौसम।   

3. 
काटता मन   
समय है कुल्हाड़ी   
देता है दुःख।   

4. 
काश! रहता   
वन-सा हरा-भरा   
मन का बाग़।   

5. 
मन हाँकता   
धीमी - मध्यम - तेज़   
साँसों की गाड़ी।   

6. 
मन का रथ   
अविराम चलता   
कँटीला पथ।   

7. 
मन अभागा   
समय है गँवाया   
तब समझा।   

8. 
मन क्या करे?   
पछतावा बहुत   
जीवन ख़त्म।   

9. 
जटिल बड़ा   
साँसों का तानाबाना   
मन है हारा।   

10. 
मन का रोगी   
भेद न समझता   
रोता-रूलाता।   

11. 
हँसे या रोए   
नियति की नज़र   
मन न बचे।   

12. 
पास या फेल   
ज़िन्दगी इम्तिहान   
मन का खेल।   

13. 
मन की कथा   
समय पे बाँचती   
रिश्ते जाँचती।   

14. 
न खोलो मन,   
पराए पाते सुख   
सुन के दुःख।   

15. 
कठोर वाणी   
कृपाण-सी चुभती,   
मन घायल।   

16. 
लौ उम्मीद की   
मन जलता दीया   
जीवन-दीप्त।   

17. 
भौचक मन   
हतप्रभ देखता   
दृश्य के पार।   

18. 
मन का पंछी   
लालायित देखता   
उड़ता पंछी।   

19. 
मन में पीर   
चेहरे पे मुस्कान   
जीवन बीता।   

20. 
अकेला मन   
ख़ुद से बतियाता   
खोलता मन।   

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2022)
____________________

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

741. दुलारी होली (होली पर 15 हाइकु)

दुलारी होली

******* 

1. 
दे गया दग़ा    
रंगों का ये मौसम,   
मन है कोरा।   

2. 
गुज़रा छू के   
कर अठखेलियाँ   
मौसमी-रंग।   

3. 
होली आई   
मन ने दग़ा किया   
उसे भगाया।   

4. 
दुलारी होली   
मेरे दुःख छुपाई   
देती बधाई।   

5. 
सादा-सा मन   
होली से मिलकर   
बना रंगीला।   

6. 
होलिका-दिन   
होलिका जल मरी   
कमाके पुण्य।   

7. 
फगुआ मन   
जी में उठे हिलोर   
मचाए शोर।   

8. 
छाये उमंग   
खिलखिलाते रंग   
बसन्ती मन।   

9. 
ख़ूब बरसे   
ज्यों दरोगा की लाठी   
रंग-अबीर।   

10. 
बिन रँगे ही   
मन हुआ बसन्ती   
रुत है प्यारी।   

11. 
कैसी ये होली   
रिश्ते नाते छिटके   
अकेला मन।   

12. 
छुपके आई   
कुंडी खटखटाई   
होली भौजाई।   

13. 
माई न बाबू   
मन कैसे हो क़ाबू,   
अबकी होली।   

14. 
अबकी साल   
मन हो गया जोगी,   
लौट जा होली!   

15. 
पी ली है भाँग   
लड़खड़ाती होली   
धप्प से गिरी। 

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2022)
_______________________

मंगलवार, 8 मार्च 2022

740. एक दिन मुक्ति के नाम

एक दिन मुक्ति के नाम 

******* 

कभी अधिकार के लिए शुरु हुई लड़ाई   
हमारी ज़ात को ज़रा-सा हक़ दे गई   
बस एक दिन, राहत की साँसें भर लूँ   
ख़ूब गर्व से इठलाऊँ, ख़ूब तनकर चलूँ   
मेरा दिन है, आज बस मेरा ही दिन है   
पर रात से पहले, घर लौट आऊँ।   
बैनर, पोस्टर, हर जगह छा गई औरत   
लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ   
लड़की-लड़की, औरत-औरत   
बहन, बेटी, माँ, प्रेमिका अच्छी   
मानो आज देवी बन गई औरत   
रोज़ जो होती थी वो कोई और है   
आज है कोई नयी औरत।   
एक पूरा दिन करके औरत के नाम   
छीन ली गई सोचने की आज़ादी   
बारह मास की ग़ुलामी   
और बदले में बस एक दिन   
जिसमें समेटना है साल का हर दिन।   
कभी जीती थी हर बाज़ी   
पर हार गई औरत   
सदियों से लड़ती रही   
पर हार गई औरत!   
अब किसे लानत भेजी जाए?   
उन गिनी-चुनी औरतों को   
जिनके सफ़र सुहाने थे   
जिनके ज़ख़्मों पर मलहम लगे   
इतिहास के कुछ पन्ने जिनके नाम सजे   
और बाक़ियों को, उन 'कुछ' की एवज़ में   
यह कहकर मानसिक बन्दी बनाया गया-   
तुमने क्रान्ति की, देखो कितनी आज़ाद हो   
कभी किताबें तो पढ़के देखो   
तुम केवल अक्षरों को याद हो   
लड़कों की तरह तुम्हारी परवरिश होती है   
देखो तुम्हारे हक़ में कितने कानून हैं   
तुम्हें विधान से इतनी ताक़त मिली   
जब चाहे हमें फँसा सकती हो   
तुम्हारे सामने हमारी क्या औक़ात   
हे देवी! हम पुरुषों पर दया करो!   
आज महिला दिवस है   
पूरी दुनिया की औरतें जश्न मनाएँगी   
पर यह भी सच है आज के दिन   
कई स्त्रियों की जिस्म लुटेगा, बाज़ार में बिकेगा   
आग और तेज़ाब में जलेगा   
कइयों को माँ की कोख में मार दिया जाएगा   
बैनरों-पोस्टरों के साथ   
स्त्री की काग़ज़ी जीत पर नारा बुलंद होगा   
छल-प्रपंच का तमाचा   
अन्ततः हमारे ही मुँह पर पड़ेगा।   
कोई कुतिया कहकर   
बदन नोच-नोचकर खाएगा   
कोई डायन कहकर   
ज़मीन पर पटक-पटककर मार डालेगए   
रंडी बनाकर   
उसका सगा ही कमाई उड़ाएगा   
बेटी जनने वाली पापिन कहकर   
उसका आदमी ही उसे घर से निकालेगा   
या ब्याह दी जाएगी उसके साथ   
जो रोज़ जबरन भोगेगा   
या ज़ेवरों से लादकर आजीवन हुक़्म चलाएगा।   
आज के दिन मैं इतराऊँगी   
औरत होने पर फ़ख़्र करूँगी   
क़र्ज़ सही, ख़ैरात सही   
एक दिन जो मिला   
हम औरतों को मुक्ति के नाम।   
क्यों आज अपनी हर साँसों के लिए   
किसी मर्द से फ़रियाद की जाए   
सौ बरस तक साँसें लें   
और बस एक दिन की ज़िन्दगी जी जाए।   
मैं ख़ुद को धिक्कारती हूँ   
क्यों बस एक दिन की भीख माँगती हूँ   
क्यों नहीं होता हर दिन   
स्त्री-पुरुष का बराबर दिन!

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2022)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
___________________

सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

739. अलगनी

 अलगनी 

******* 


हर रोज़ थक-हारकर टाँग देती हूँ ख़ुद को खूँटी पर   
जहाँ से मौन होकर देखती-सुनती हूँ दुनिया का जिरह   
कभी-कभी जीवित महसूस करने के लिए   
ख़ुद को पसार आती हूँ अँगना में अलगनी पर   
जहाँ से घाम मेरे मन में उतरकर हर ताप को सहने की ताक़त देता है   
और हवा देश-दुनिया की ख़बर सुनाती है,   
इस असंवेदी दुनिया का हर दिन, ख़ून में डूबा होता है   
जाति-धर्म के नाम पर क़त्ल, मन-बहलावा-सा होता है   
स्त्री-पुरुष के दो संविधान इस युग के विधान की देन है   
हर विधान में दोनों की तड़प   
अपनी-अपनी जगह जायज़ है,   
क्रूरता का कोई अन्त नहीं दिखता   
अमन का कोई रास्ता नहीं दिखता   
संवेदनाएँ सुस्ता रही हैं किसी गुफा में   
जिससे बाहर आने का द्वार बन्द है   
मधुर स्वर या तो संगीतकार के ज़िम्मे है   
या फिर कोयल की धरोहर बन चुकी है   
भरोसा? ग़ैरों से भले मिल जाए   
पर अपनों से...ओह!   
बहुत जटिलता, बहुत कुटिलता   
शरीर साबुत बच भी जाए पर   
अपनों के छल से मन छिलता रहता है   
दीमक की भाँति   
पीड़ा अपने ही तन-मन को खोखला करती रहती है   
ज़िन्दगी पल-पल बेमानी हो रही है   
छल, फ़रेब, क्रूरता, मज़लूमों की पीड़ा   
दसों दिशाओं से चीख-पुकार गूँजती रहती है   
मन असहाय, सब कुछ असह्य लगता है   
कोई गुहार करे भी तो किससे करे?   
कुछ ख़ास हैं, कुछ शासक हैं, अधिकांश शोषित हैं   
किसी तरह बचे हुए कुछ आम लोग भी हैं   
जो मेरी ही तरह आहें भरते हुए, खूँटी पर ख़ुद को रोज़ टाँग देते हैं   
कभी-कभी कोटर से निकल अलगनी पर पसरकर जीवन तलाशते हैं,   
बेहतर है मैं खूँटी पर यूँ ही रोज़ लटकती रहूँ   
कभी-कभी जीवित महसूस करने के लिए   
धूप में अलगनी पर ख़ुद को टाँगती रहूँ   
और ज़माने के तमाशे देख ज्ञात को कोसती रहूँ।   

- जेन्नी शबनम (20. 2. 2022)
_____________________

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

738. वसन्त पंचमी (वसन्त पंचमी पर 10 हाइकु)

वसन्त पंचमी 

(वसन्त पंचमी पर 10 हाइकु)

******* 

1. 
पीली सरसों   
आया है ऋतुराज   
ख़ूब वो खिली।   

2. 
ज्ञान की चाह   
है वसन्त पंचमी   
अर्चन करो।   

3. 
पावस दिन   
ये वसन्त पंचमी   
शारदा आईं।   

4. 
बदली ऋतु,   
काश! मन में छाती   
बसन्त ऋतु।   

5. 
अब जो आओ   
ओ! ऋतुओं के राजा   
कहीं न जाओ।   

6. 
वाग्देवी ने दीं   
परा-अपरा विद्या,   
हुए शिक्षित।   

7. 
चुनरी रँगा   
बसन्त रंगरेज़   
धरा लजाई।   

8. 
पीला ही पीला   
बसन्त जादूगर   
फूल व मन।   

9. 
वसन्त ऋतु!   
अब नहीं लौटना   
हाथ थामना।   

10.
हे पीताम्बरा!   
सदा साथ निभाना   
चेतना तुम। 

- जेन्नी शबनम (5. 2. 2022)
____________________

रविवार, 23 जनवरी 2022

737. समय (10 क्षणिका)

समय 

*******


1.
समय 

समय हर बार मरहम नहीं बनता  
कई बार पुराने से ज़्यादा बड़ा घाव दे देता है
जो ताउम्र नहीं भरता 
उस घाव का 
सड़ना गलना और मवाद का बहना देख
अपनी ताक़त पर घमंड करता समय 
हाथ बाँधे अकड़कर खड़ा रहता है।
-०-

2.
रुदाली 

मन में अनुभव की किरचें हैं
जो हर घड़ी चुभती हैं
चुप ज़बान में गीतों की लड़ी है  
जो रुदन बन गूँजती है 
बिखरते सपनों की छटपटाहट है  
जो हर घड़ी टीस देती है 
दर्द के फाहे से दर्द को पोंछती हूँ 
और अपनी साँसे कुतरती हूँ 
ज़िन्दगी की अर्थी सजी है  
मैं रुदाली बन गई हूँ। 
-०-

3.
नटी

यूँ मानो तनी हुई रस्सी पर
नटी की तरह कलाबाज़ी सीख ली है  
गिरते-पड़ते-उठते संतुलन बना लिया मैंने  
अब अग्रसर हूँ 
जीवन जीने की कला के साथ।
-०- 

4.
काग़ज़ 

मैं फूल-सी जन्म लेकर
एक समर्थ लड़की बनी
दुनिया के तीखे बोल से
मैं फूल से पत्थर बनी
अपने दर्द ख़ुद से कहकर
पत्थर से काग़ज़ बनी
अब हर्फ़-हर्फ़ बिखरी हूँ मैं
काग़ज़ों में रची हूँ मैं
अपने दिए ज़ख्मों को
अब तुम सब ख़ुद ही पढ़ो।
-०-

5.
गाँठ 

मानो या  मानोफ़रेब नहीं था
बस नादानियाँ थीं थोड़ी
जिसने  जीने दिया  मरने
दिल की दहलीज़ पर एक गाँठ पड़ गई
जिससे रिश्तों की डोरी छोटी पड़ गई
मन में चुभती ये गाँठें
मेरे जज़्बात को हदों में रखती हैं। 
-०- 

6.
देर न हो जाए

बेहद कठिन होता है
पीली पड़ती पत्तियों को हरा करना
मर रहे पौधों को जिलाना 
बीत चुके मौसम को यादों में ही सही
वापस बुलाना
देर न हो जाए, सँभल जाओ
वरना सारे तर्क और सारे फ़लसफ़े
धरे रह जाएँगे 
और झंकृत दुनिया वीरान हो जाएगी
वक़्त को मुरझाने से पहले सींच लो।
-०-

7.
मिन्नत 

चाँदनी की चाह में
करती रही चाँद से मिन्नतें 
चाँद दग़ा दे गया
अपनी चाँदनी ले गया
जाने किसे दे दिया?
मुझमें अमावास भर गया 
हाय! ये क्या कर गया 
क्यों बेवफ़ा हो गया?
-0-

8.
ताप भर नाता 

ताप भर नाता 
दिल में बचाए रखना
जब सामने रास्ता होगा
पर ज़िन्दगी चल न सकेगी
ठंडी पड़ रही साँसों को
तब ज़रुरत होगी।
-0-

9.
संगदिल 

जाओ! तुम सबको आज़ाद किया 
रिश्ते-नाते और कर्तव्यों से 
संगदिल के साथ 
कुछ वक़्त गुज़ारा जा सकता है 
तमाम उम्र नहीं। 
-0-

10.
इस दुनिया के उस पार 

अपनी समस्त आकांक्षाओं के साथ 
चली जाना चाहती हूँ  
सबसे दूर बहुत दूर 
इस दुनिया के उस पार 
जहाँ से मेरी पुकार 
कभी किसी तक न पहुँचे। 
-0- 

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2022)
__________________________

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

736. मरजीना (10 क्षणिका)

मरजीना 
******* 

1. 
मरजीना 
*** 
मन का सागर दिन-ब-दिन और गहरा होता जा रहा   
दिल की सीपियों में क़ैद मरजीना बाहर आने को बेकल   
मैंने बिखेर दिया उन्हें कायनात के वरक़ पर।
-0- 

2. 
कुछ 
*** 
सब कुछ पाना, ये सब कुछ क्या?   
धन दौलत, इश्क़ मोहब्बत, या कुछ और?   
जाने इस 'कुछ' का क्या अर्थ है।
-0- 

3. 
मौसम 
*** 
बात-बात में गुज़रा है मौसम   
आँखों में रीत गया है मौसम   
देखो बदल गया है मौसम   
हिज्र का आ गया है मौसम। 
-०- 

4. 
हाथ नहीं आता 
*** 
समय असमय टटोलती रहती हूँ   
अतीत के किस्सों की परछाइयाँ   
नींद को बुलाने की जद्दोजहद ज़ारी रहती है   
सब कुछ गडमगड हो जाता है   
रात बीत जाती है, कुछ भी हाथ नहीं आता   
न सपने, न सुख, न मेरे हिस्से के किस्से। 
-०- 

5. 
विलीन 
*** 
ऐतिहासिक सुख, प्रागैतिहासिक दुःख   
सब के सब विलीन हो रहे हैं वर्तमान में   
घोर पीड़ा-पराजय, घोर उमंग-आनंद   
क्या सचमुच विलीन हो सकते हैं   
वर्तमान की आगोश में?   
नहीं-नहीं, वे दफन हैं ज़ेहन में   
साँसों की सलामती और   
महज़ ख़ुद के साथ होने तक।
-०- 

6. 
युद्धरत 
*** 
युद्धरत मन में   
तलवारें जाने कहाँ-कहाँ किधर-किधर   
घुसती है, धँसती हैं   
लहू नहीं सिर्फ़ लोर बहता है   
अपार पीड़ा, पर युद्धरत मन हारता नहीं   
ज़्यादा तीव्र वार किसका   
सोचते-सोचते   
मुट्ठी में कस जाती है तलवार की मूठ। 
-०- 

7. 
जला सूरज 
*** 
उस रोज़ चाँद को ग्रहण लगा   
बौख़लाया जाने क्यों सूरज   
सूर्ख़ लाल लहू से लिपट गई रात   
दिन की चीख़ से टूट गया सूरज   
शरद के मौसम में  
धू-धू कर जला सूरज। 
-०- 

8. 
क़र्ज़ और फ़र्ज़ 
*** 
क़र्ज़ और फ़र्ज़ चुकाने के लिए   
जाने कितने जन्म लिए   
कंधों पर से बोझ उतरता नहीं   
क़र्ज़ जो अनजाने में मिला   
फ़र्ज़ जो जन्म से मिला   
कुछ भी चुक न सका   
यह उम्र भी यूँ ही गुज़र गई   
अब फिर से एक और जन्म   
वही क़र्ज़ वही फ़र्ज़   
आह! अब और नहीं! 
-०-

9. 
समझौता 
*** 
वर्जनाओं को तोड़ना   
कई बार कठिन नहीं लगता   
कठिन लगता है   
उनका पालन या अनुसरण करना   
पर करना तो होता है, मन या बेमन   
यह समझौता है, जिसे आजीवन करना होता है। 
-०- 

10. 
जिजीविषा 
*** 
सपनों और उम्मीदों का मरना   
जिजीविषा का ख़त्म होना है   
पर कभी-कभी ज़िन्दा रहने के लिए   
सपनों और उम्मीदों को मारना होता है   
और जीवन जीना होता है।   
जीवित रहना और दिखते रहना   
दोनों लाज़िमी है। 
-०- 

- जेन्नी शबनम (2. 12. 2021)
____________________ 

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

735. हाँ! मैं बुरी हूँ

हाँ! मैं बुरी हूँ 

*******

मैं बुरी हूँ   
कुछ लोगों के लिए बुरी हूँ   
वे कहते हैं-   
मैं सदियों से मान्य रीति-रिवाजों का पालन नहीं करती   
मैं अपनी सोच से दुनिया समझती हूँ   
अपनी मनमर्ज़ी करती हूँ, बड़ी ज़िद्दी हूँ।   
हाँ! मैं बुरी हूँ   
मुझे हर मानव एक समान दिखता है   
चाहे वह शूद्र हो या ब्राह्मण   
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान   
मैं तथाकथित धर्म का पालन नहीं करती   
मुझे किसी धर्म पर न विश्वास है न आस्था   
मुझे महज़ एक ही धर्म दिखता है- इंसानी प्यार।   
मैं औरत होकर वह सब करती हूँ जो पुरुषों के लिए जायज़ है   
मगर औरतों के लिए नाजायज़   
जाने क्यों मुझे मित्रता में औरत मर्द अलग नहीं दिखते   
किसी काम में औरत मर्द के दायित्व का बँटवारा उचित नहीं लगता।   
मैं अपने मन का करती हूँ   
घर परिवार को छोड़कर अकेले सिनेमा देखती हूँ   
अकेले कॉफी पीने चाली जाती हूँ   
अपने साथ के लिए किसी से गुज़ारिश नहीं करती।   
भाग-दौड़ में मेरा दुपट्टा सरक जाता है   
मैं दुपट्टे को सही से ओढ़ने की तहजीब नहीं जानती   
दुपट्टे या आँचल में शर्म कैद है यह सोचती ही नहीं।   
समय-चक्र के साथ मैं घूमती रही   
न चाहकर भी वह काम करती रही, जो समाज के लिए सही है   
भले इसे मानने में हज़ारों बार मैं टूटती रही।   
औरतें तो अंतरिक्ष तक जाती हैं   
मैं घर-बच्चों को जीवन मान बैठी   
ये ही मेरे अंतरिक्ष, मेरे ब्रह्माण्ड, मेरी दुनिया   
यही मेरा जीवन और यही हूँ मैं।   
जीवन में कभी कुछ किया नहीं   
सिर्फ़ अपने लिए कभी जिया नहीं   
धन उपार्जन किया नहीं   
किसी से कुछ लिया नहीं।   
जीवन से जो खोया-पाया लिखती हूँ   
अपनी अनुभूतियों को शब्दों में पिरोती हूँ   
जो हूँ बस यही हूँ   
यही मेरी धरोहर है और यही मेरा सरमाया है।   
मैं भले बुरी हूँ   
पर, रिश्ते या ग़ैर, जो प्रेम दें, वही अपने लगते हैं   
मुझे कोई स्वीकार करे या इनकार   
मैं ऐसी ही हूँ।   
जानती हूँ, मेरे अपने मुझसे बदलने की उम्मीद नहीं करते   
जो चाहते हैं कि मैं ख़ुद को पूरा बदल लूँ   
वे मेरे अपने हो नहीं सकते   
जिसके लिए मैं 
बुरी हूँ, तों हूँ।  
अपने और अपनों के लिए 
अच्छी हूँ, तो हूँ।   
मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मेरे अपने हज़ारों हैं   
उन्हीं के लिए शायद मैं इस जग में आई   
बस उन्हीं के लिए मेरी यह सालगिरह है। 

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2021)
______________________ 

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

734. हथेली गरम-गरम

हथेली गरम-गरम 

******* 

रात हो मतवाली-सी   
सपने पके नरम-नरम   
सुबह हो प्यारी-सी   
दिन हो रेशम-रेशम   
मन में चाहे ढेरों संशय   
रस्ता दिखे सुगम-सुगम   
सुख-दुःख दोनों जीवन है   
मन समझे सहज-सहज   
जीवन में बना रहे भरम   
खुशियाँ हों सब सरल-सरल   
कम न पड़े कोई भी छाँव   
रिश्ते सँभालो सँभल-सँभल   
चाहे गुज़रे कोई पहर   
हाथ में एक हथेली गरम-गरम।   

- जेन्नी शबनम (12. 10. 2021) 
____________________________
 

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

733. बेइख़्तियार हूँ (8 क्षणिका)

बेइख़्तियार हूँ 

*******

1.
बेइख़्तियार हूँ 
*** 
भावनाएँ और संवेदनाएँ   
अपनी राह से भटक चुकी हैं   
अब शब्दों में पनाह नहीं लेती   
आँखों में घर कर चुकी है   
कभी बदली बन तैरती है   
कभी बारिश बन बरसती है   
बेइख़्तियार हूँ   
वक़्त, रिश्ते और ख़ुद पर   
हर नियंत्रण खो चुकी हूँ।


2.
नाजुक टहनी 
***
हम सपने बीनते रहे   
जो टूटकर गिरे थे आसमान की शाखों से   
जिसे बुनकर हम ओढ़ा आए थे कभी   
आसमान को    
ज़रा-सी धूप, हवा, पानी के वास्ते,   
आसमान की नाज़ुक टहनी   
सँभाल न सकी थी मेरे सपनों को। 


3.
हदबंदी
***
मन की हदबंदी, ख़ुद की मैंने   
जिस्म की हदबंदी, ज़माने ने सिखाई   
कुल मिलाकर हासिल- अकेलापन   
परिणाम- जीवन की हदबंदी   
जो तब टूटेगी जब साँसें टूटेगी   
और टूट जाएँगे वे तमाम हद   
जो जन्म के साथ हमारी जात को   
पूरी निगरानी के साथ तोहफ़े में मिलते हैं।


4.
इंकार 
***
मेरी ख़ामोशियाँ चीखकर मुझे बुलाती हैं   
सन्नाटे के कोलाहल से व्यथित मेरा मन   
ख़ुद तक पहुँचने से इंकार कर रहा है   
नहीं चाहता मुझ तक कुछ भी पहुँचे।


5.
लम्बी ज़िन्दगी 
***
यह दर्द ठहरता क्यों नहीं?   
मुझसे ज़्यादा लम्बी ज़िन्दगी   
शायद दर्द को मिली है। 


6.
ताकीद 
***
बढ़ती उम्र ने ताकीद की-   
वक़्त गुज़र रहा है   
पर जाने क्यों ठहरा हुआ-सा लगता है   
सिर्फ़ मैं दौड़ती हूँ अकेली भागती हूँ   
चलो, तुम भी दौड़ो मेरे साथ   
मेरे बिना तुम कहाँ?


7.
मीठी 
******* 
मैं इतनी मीठी बन गई    
कि मेरी नसों में मिठास भर गई   
और ज़िन्दगी तल्ख़ हो गई। 


8.
नींद
*** 
सपने आकार द्वार खटखटाते   
नींद न जाने किधर चल देती   
सारी दुनिया की सैर कर आती   
मुझसे नज़रें रोज़ चुराती   
न दवा की सुनती न मिन्नतें सुनती   
अहंकारी नींद जब मर्ज़ी तब ही आती   
सपनो से मैं मिल ना पाती।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2021)
___________________________