बुधवार, 25 नवंबर 2020

700. दागते सवाल

दागते सवाल 

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यही तो कमाल है   
सात समंदर पार किया, साथ समय को मात दी   
फिर भी कहते हो -   
हम साथ नहीं चलते हैं।   

हर स्वप्न को, बड़े जतन से ज़मींदोज़ किया   
टूटने की हद तक, ख़ुद को लुटा दिया   
फिर भी कहते हो -   
हम साथ नहीं देते हैं।   

अविश्वास की नदी, अविरल बह रही है   
दागते सवाल, मुझे झुलसा रहे हैं   
मेरे अन्तस् का ज्वालामुखी, अब धधक रहा है।   

हाँ! यह सत्य अब मान लिया, सारे उपक्रम धाराशायी हुए   
धधकते सवालों की चिंगारी, कलेजे को राख बना चुकी है   
साबुत मन तरह-तरह के सामंजस्य में उलझा   
चिन्दी-चिन्दी बिखर चुका है।   

बड़ी जुगत से, चाँदनी वस्त्रों में लपेटकर   
जिस्म के मांस की पोटली बनाई है   
दागते सवालों से झुलसी पोटली, सफ़र में साथ है   
ज़रा-सा थमो   
जिस्म की यह पोटली, दिल की तरह खुलकर   
अब, बस, बिखरने को है।  

- जेन्नी शबनम (25. 11. 2020) 

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सोमवार, 23 नवंबर 2020

699. भटकना

भटकना 

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सारा दिन भटकती हूँ   
हर एक चेहरे में, अपनों को तलाशती हूँ   
अंतत: हार जाती हूँ   
दिन थक जाता है, रात उदास हो जाती है!   
हर दूसरे दिन फिर से   
वही तलाश, वही थकान   
वही उदासी, वही भटकाव   
अंततः कहीं कोई नहीं मिलता!   
समझ में अब आ गया है   
कोई दूसरा अपना नहीं होता   
अपना आप को खुद होना होता है   
और यही जीवन है!   

- जेन्नी शबनम (23. 11. 2020)
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मंगलवार, 17 नवंबर 2020

698. वसीयत

वसीयत   

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जीस्त के ज़ख्मों की कहानी तुम्हें सुनाती हूँ   
मेरी उदासियों की यही है वसीयत   
तुम्हारे सिवा कौन इस को सँभाले   
मेरी ये वसीयत अब तुम्हारे हवाले   
हर लफ्ज़ जो मैंने कहे हर्फ़-हर्फ़ याद रखना   
इन लफ़्ज़ों को जिंदा मेरे बाद रखना   
किसी से कुछ न कभी तुम बताना   
मेरी ये वसीयत मगर मत भूलाना   
तुम्हारी मोहब्बत ही है मेरी दौलत   
मेरे लफ्ज़ ज़िंदा हैं इसकी बदौलत!   

उस दौलत ने दिल को धड़कना सिखाया   
हर साँस पे था जो कर्ज़ा चुकाया   
मेरे जख्मों की अब मुझको परवाह नहीं है   
लबों पे मेरे अब कोई आह नहीं है   
अगर्चे अभी भी कोई सुख नहीं है   
ग़म तुमने समझा तो अब दुःख नहीं है!   

गैरों की भीड़ में मुझको कई अपने मिले थे   
मगर जैसे सारे ही सपने मिले थे   
मुझसे किसी ने कहाँ प्यार किया था   
वार अपनों ने खंजर से सौ बार किया था   
मन ज़ख़्मी हुआ, ताउम्र आँखों से रक्त रिसता रहा   
किसे मैं बताती कि दोष इसमें किसका रहा   
किस्मत ने जो दर्द दिया तोहफ़ा मान सब सहेजा   
मैंने कदमों को टोका किस्मत को दिया न धोखा   
जीवन में नाकामियों की हज़ारों दास्तान है   
हर पग के साथ बढ़ता छल का अंबार है   
मेरी हर साँस में मेरी एक हार है!   

जीकर तो किसी के काम न आ सकी   
मेरे जीवन की किसी को कभी भी न दरकार थी   
मेरे शरीर का हर एक अंग मैंने दुनिया को दान किया   
पर कभी ये न सोचा मैंने कोई अहसान किया   
मैं जब न रहूँ कइयों के बदन को नया जीवन दिलाना   
बिजली की भट्टी में इसे तुम जलाना   
बिजली की भट्टी में मेरा बदन राख बन जाएगा   
आधे राख को गंगा में वहाँ लेकर जाना वहीं पर बहाना   
जहाँ मेरे अपनों का जिस्म राख में था बदला   
आधे को मिट्टी में गाड़ कर रात की रानी का पौधा लगाना   
मुझे रात में कोई खुशबू बनाना   
जीवन बेनूर था मर के बहक लूँ   
वसीयत में ये एक ख़्वाहिश भी रख लूँ   
रात की रानी बन खिलूँगी और रात में बरसूँगी   
न साँस मैं माँगूँगी न प्यार को तरसूँगी   
भोर में ओस की बूंदों से लिपटी मैं दमकूँगी   
दिन में बुझी भी तो रात में चमकूँगी!   

क़ज़ा की बाहों में जब मेरी सुकून भरी मुस्कुराहट दिखे   
समझना मेरे जीस्त की कुछ हसीन कहानी उसने मुझे सुनाई है   
शब के लिए रात की रानी खिलाई है   
जीवन में बस एक प्रेम कमाया वह भी तुम्हारे सहारे   
इतना करो कि ये प्रेम कभी न हारे   
तुम्हें कसम है, एक वादा तुम करना   
मेरी ये वसीयत तुम ज़रूर पूरी करना   
तुम्हारे सिवा कौन इसको सँभाले   
मेरी ये वसीयत अब तुम्हारे हवाले!  

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2020) 
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शनिवार, 14 नवंबर 2020

697. प्रकाश-पर्व

प्रकाश-पर्व


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1.

धूम धड़ाका   

चारों ओर उजाला   

प्रकाश-पर्व!


2.

फूलों-सी सजी   

जगमग करती   

दीयों की लड़ी!


3.

जगमगाते   

चाँद-तारे-से दीये   

घोर अमा में!


4.

झूमती गाती   

घर-घर में सजी   

दीपों की लड़ी


5.

झिलमिलाता   

अमावस की रात   

नन्हा दीपक!


6.

फुलझड़ियाँ   

पटाखे और दीये   

गप्पे मारते!


7.

दिवाली कही –   

दूर भाग अँधेरा,   

दीया है जला!


8.

रोशनी खिली   

अँधेरा हुआ दुखी   

किधर जाए!


9.

दीया जो जला   

सरपट दौड़ता   

तिमिर भागा!


10.

रिश्ते महके   

दीयों संग दमके   

दीवाली आई!  

  • जेन्नी शबनम (14. 11. 2020) _____________________

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

696. जिया करो

जिया करो 

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सपनों के गाँव में, तुम रहा करो   
किस्त-किस्त में न, तुम जिया करो!   

संभावनाओं भरा, ये शहर है   
ज़रा आँखें खुली, तुम रखा करो!   

कब कौन किस वेष में, छल करे   
ज़रा सोच के ही, तुम मिला करो!   

हैं ढ़ेरों झमेले, यहाँ पे पसरे   
ज़रा सँभल के ही, तुम चला करो!   

आजकल हर रिश्ते हैं, टूटे बिखरे   
ज़रा मिलजुल के ही, तुम रहा करो!   

तूफ़ाँ आ के, गुज़र न जाए जबतक   
ज़रा झुका के सिर, तुम रहा करो!   

मतलबपरस्ती से, क्यों है घबराना   
ज़रा दुनियादारी, तुम समझा करो!   

गुनहगारों की, जमात है यहाँ   
ज़रा देखकर ही, तुम मिला करो!   

नस-नस में भरा, नफ़रतों का खून   
ज़रा-सा आशिक़ी, तुम किया करो!   

अँधेरों की महफ़िल, सजी है यहाँ   
ज़रा रोशनी बन, तुम बिखरा करो!   

रात की चादर पसरी है, हर तरफ़   
ज़रा दीया बन के, तुम जला करो!   

कौन क्या सोचता है, न सोचो 'शब'   
जी भरकर जीवन अब, तुम जिया करो!  

- जेन्नी शबनम (10. 11. 2020) 
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रविवार, 8 नवंबर 2020

695. हम (10 हाइकु)

हम 


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1. 
चाहता मन   
काश पंख जो होते   
उड़ते हम!  

2. 
जल के स्रोत   
कण-कण से फूटे   
प्यासे हैं हम!  

3. 
पेट मे आग   
पर जलता मन,   
चकित हम!  

4. 
हमसे जन्मी   
मंदिर की प्रतिमा,   
हम ही बुरे!  

5. 
बहता रहा   
आँसुओं का दरिया   
हम ही डूबे!  

6. 
कोई  सगा   
ये कैसी है दुनिया?   
ठगाए हम!   

7. 
हमने ही दी   
सबूत  गवाही,   
इतिहास मैं!  

8. 
मिला है शाप,   
अभिशापित हम   
किया  पाप!  

9. 
अकेले चले   
सूरज-से जलते   
जन्मों से हम!  

10. 
अड़े ही रहे   
आँधियों में अडिग   
हम हैं दूब! 

- जेन्नी शबनम (7. 11. 2020)
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मंगलवार, 3 नवंबर 2020

694. कपट

 कपट 

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हाँ कपट ही तो है   
सत्य से भागना, सत्य न कहना, पलायन करना   
पर यह भी सच है, सत्य की राह में   
बखेड़ों के मेले हैं, झमेलों के रेले हैं,   
कैसे कहे कोई सारे सत्य, जो दफ़न हो सीने में   
उम्र की थकान के, मन के अरमान के   
सदियों-सदियों से, युगों-युगों से,   
यूँ तो मिलते हैं कई मुसाफ़िर   
जो दो पल ठहर राज़ पूछते हैं, दम भर को अपना कहते हैं   
फिर चले जाते हैं, उम्मीद तोड़ जाते हैं, राह पे छोड़ जाते हैं   
काश! कोई तो थम जाता, छोड़ के न जाता   
मन की यायावरी को एक ठौर दे जाता,   
ये कपट, ये भटकाव मन को नहीं भाते हैं   
पर इनसे हम बच भी कहाँ पाते हैं   
यूँ हँसी में हर राज़ दफ़न हो जाते हैं   
फिर कहना क्या और पूछना क्या, सब बेमानी है   
और ऐसे ही बीत जाता है, सम्पूर्ण जीवन   
किसी की आस में, ठहराव की उम्मीद में,   
हम सब इसी राह के मुसाफ़िर, मत पूछो सत्य   
गर कोई जान न सके, बिन कहे पहचान न सके, यह उसकी कमी है,   
सत्य तो प्रगट है, कहा नहीं जाता, समझा जाता है   
फिर भी लोग इसरार करते हैं   
सत्य को शब्द न दें, हँसकर टाल दें, तो कपटी कहते हैं,   
ठीक ही कहते हैं वे, हम कपटी हैं   
कपटी!   

- जेन्नी शबनम (3. 11. 2020)
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शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

693. दड़बा

दड़बा 

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ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ अपने-अपने दड़बों में   
अपने-अपने परों को सम्हालो   
एक दूसरे को अपने-अपने चोंचों से लहूलुहान करो!   
कटना तो तुम सबको है, एक न एक दिन   
अपनों द्वारा या गैरों द्वारा   
सीख लो लड़ना, ख़ुद को बचाना, दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध!   
दड़बे के बाहर की दुनिया, क़ातिलों से भरी है   
जिनके पास, शब्द के भाले हैं, बोली की कटारें हैं   
जिनके देह और जिह्वा को, तुम्हारे माँस और लहू की प्यास है   
पलक झपकते ही, झपट ली जाओगी   
चीख भी न पाओगी!   
दड़बे के भीतर, कितना भी लिख लो तुम   
बहादूरी की गाथाएँ, हौसलों की कथाएँ   
पर बाहर की दुनिया, जहाँ पग-पग पर भेड़िया है   
मानव रूप धरकर, तुम्हारा इंतजार कर रहा है   
भेड़िये के सामने मेमना नहीं, खुद भेड़िया बनना है   
टक्कर सामने से देना है, बराबरी पर देना है!   
ऐ लड़कियों!   
जीवन की रीत, जीवन का संगीत, जीवन का मंत्र   
सब सीख लो तुम   
न जाने कब किस घड़ी   
समय तुमसे क्या माँगे!   

- जेन्नी शबनम (24. 10. 2020)
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बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

692. देहाती

देहाती  

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फ़िक्रमंद हूँ, उन सभी के लिए   
जिन्होंने सूरज को हथेली में नहीं थामा   
चाँद के माथे को नहीं चूमा   
वर्षा में भींग-भींगकर न नाचा न खेला   
माटी को मुट्ठी में भरकर, बदन पर नहीं लपेटा   
दुःख होता है उनके लिए   
जिन्हें नहीं पता कि मुंडेर क्या होती है   
मूँज से चटाई कैसे बनती है   
अँगना लीपने के बाद कैसा दिखता है   
ढ़ेंकी और जाँता की आवाज़ कैसी होती है   
उन्होंने कभी देखा नहीं, गाय-बैल का रँभाना   
बाछी का पगहा तोड़ माँ के पास भागना   
भोरे-भोरे खेत में रोपनी, खलिहान में धान की ओसौनी   
आँधियों में आम के गाछी में टिकोला बटोरना   
दरी बिछाकर ककहरा पढ़ना, मास्टर साहब से छड़ी खाना   
कितने अनजान हैं वे, कितना कुछ खोया है उन्होंने   
यूँ वे सभी अति सुशिक्षित हैं, चाँद और मंगल की बातें करते हैं   
एक ऊँगली के स्पर्श से, दुनिया का ज्ञान बटोर लेते हैं   
पर, हाँ, सच ही कहते हैं वे, हम देहाती हैं   
भात को चावल नहीं कहते, रोटी को चपाती नहीं कहते   
तरकारी को सब्जी नहीं कहते, पावरोटी को ब्रेड नहीं कहते   
हम गाँव-जबार की बात करते हैं, वे अमेरिका-इंग्लैंड की बात करते हैं   
नहीं-नहीं! कोई बराबरी नहीं, हम देहाती ही भले   
पर उन सबों के लिए निराशा होती है, जो अपनी माटी को नहीं जानते   
अपनी संस्कृति और समाज को नहीं पहचानते   
तुमने बस पढ़कर सुना है सब   
हमने जीकर जाना है सब।  

- जेन्नी शबनम (20. 10. 2020)
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रविवार, 18 अक्तूबर 2020

691. चलते ही रहना (चोका - 14)

चलते ही रहना 

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जीवन जैसे   
अनसुलझी हुई   
कोई पहेली   
उलझाती है जैसे   
भूल भूलैया,   
कदम-कदम पे   
पसरे काँटें   
लहूलुहान पाँव   
मन में छाले   
फिर भी है बढ़ना   
चलते जाना,   
जब तक हैं साँसें   
तब तक है   
दुनिया का तमाशा   
खेल दिखाए   
संग-संग खेलना   
सब सहना,   
इससे पार जाना   
संभव नहीं   
सारी कोशिशें व्यर्थ   
कठिन राह   
मन है असमर्थ,   
मगर हार   
कभी मानना नहीं   
थकना नहीं   
कभी रुकना नहीं   
झुकना नहीं   
चलते ही रहना   
न घबराना   
जीवन ऐसे जीना   
जैसे तोहफ़ा   
कुदरत से मिला   
बड़े प्यार से   
बड़ी हिफाज़त से   
सँभाल कर जीना!   

- जेन्नी शबनम (18. 10. 2020)

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