गुरुवार, 2 सितंबर 2021

734. कुछ क्षणिकाएँ (8 क्षणिका)

कुछ क्षणिकाएँ ( 8 क्षणिका) 

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1.
नाजुक टहनी 
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हम सपने बीनते रहे   
जो टूटकर गिरे थे   
आसमान की शाखों से   
जिसे बुनकर हम ओढ़ा आए थे   
आसमान को कभी   
ज़रा-सी धूप हवा पानी के वास्ते,   
आसमान की नाज़ुक टहनी   
सँभाल न सकी थी   
मेरे सपनों को। 
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2.
हदबन्दी
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मन की हदबन्दी, ख़ुद की मैंने   
जिस्म की हदबन्दी, ज़माने ने सिखाई   
कुल मिलाकर हासिल - अकेलापन   
परिणाम - जीवन की हदबन्दी   
जो तब टूटेगी जब साँसें टूटेगी   
और टूट जाएँगे वे तमाम हद   
जो जन्म के साथ हमारी जात को   
पूरी निगरानी के साथ   
तोहफ़े में मिलते हैं।
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3. 
नियंत्रण
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भावनाएँ और संवेदनाएँ   
अपनी राह से भटक चुकी हैं   
अब शब्दों में पनाह नहीं लेती   
आँखों में घर कर चुकी है   
कभी बदली बन तैरती है   
कभी बारिश बन बरसती है,   
बेअख्तियार हूँ   
वक़्त, रिश्ते और ख़ुद पर   
हर नियंत्रण खो चुकी हूँ।
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4.
इन्कार 
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मेरी ख़ामोशियाँ   
चीखकर मुझे बुलाती हैं   
सन्नाटे के कोलाहल से   
व्यथित मेरा मन   
ख़ुद तक पहुँचने से इन्कार कर रहा   
नहीं चाहता, कुछ भी मुझ तक पहुँचे।
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5.
लम्बी ज़िन्दगी 
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यह दर्द ठहरता क्यों नहीं?   
मुझसे ज़्यादा लम्बी ज़िन्दगी   
शायद दर्द को मिली है। 
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6.
ताकीद 
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बढ़ती उम्र ने ताकीद की   
वक़्त गुज़र रहा है   
पर जाने क्यों ठहरा हुआ सा लगता है   
सिर्फ मैं दौड़ती हूँ   
अकेली भागती हूँ   
चलो, तुम भी दौड़ो मेरे साथ   
मेरे बिना तुम कहाँ?
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7.
मीठी 
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मैं इतनी मीठी बन गई    
कि मेरी नसों में मिठास भर गई   
और ज़िन्दगी तल्ख़ हो गई। 
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8.
नींद
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सपने आकार द्वार खटखटाते   
नींद न जाने किधर चल देती   
सारी दुनिया की सैर कर आती   
मुझसे नज़रें रोज़ चुराती   
न दवा की सुनती न मिन्नतें सुनती   
अहंकारी नींद   
जब मर्ज़ी तब ही आती   
सपनो से मैं मिल ना पाती।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2021)
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रविवार, 18 जुलाई 2021

733. पापा

पापा 

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ख़ुशियों में रफ़्तार है इक   
सारे ग़म चलते रहे   
तुम्हारे जाने के बाद भी   
यह दुनिया चलती रही और हम चलते रहे   
जीवन का बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुके   
एक उम्र में कई सदियों का सफ़र कर चुके   
अब मम्मी भी न रही   
तमाम पीड़ाओं से मुक्त हो गई   
तुमसे ज़रूर मिली होगी   
बिलख-बिलख कर रोई होगी   
मम्मी ने मेरा हाल बताया होगा   
ज़माने का व्यवहार सुनाया होगा   
जाने के बाद तुम तो हमको भूल गए   
जाने क्यों मेरे सपने से भी रूठ गए   
बस एक बार आए फिर कभी न आए   
न बुलाने के लिए कहकर चले गए   
पर जानते हो पापा   
एक सप्ताह पहले   
तुम, मम्मी, दादी, मेरे सपने में आए   
पापा, तुम मेरे सपने में फिर से मरे   
मम्मी ने तुम्हारा दाह-संस्कार किया   
पर तब भी जाने क्यों तुम हमको न दिखे   
आग ने भी तुम्हारे नाम न लिखे   
जैसे सच में मरने के बाद हम तुमको न देख सके थे   
तुमसे लिपट कर रो न सके थे   
जाने कैसा रहस्य है   
मम्मी-दादी सपने में सदा साथ रहती है   
पर मेरी परेशानियों के लिए कोई राह नहीं बताती है   
किससे कुछ भी कहें पापा   
तुम ही कुछ तो बताओ पापा   
जानती हूँ हमसे भी अधिक भाग्यहीनों से संसार भरा है   
दुनिया का दर्द शायद मेरे दर्द से भी बड़ा है   
हमसे भी अधिक बहुतों की पीड़ा है   
फिर भी मन की छटपटाहट कम नहीं होती   
ज़ख्मों को तौलने की इच्छा नहीं होती   
जीने की वज़ह नहीं मिलती   
मन रोता है तड़पता है   
दुःख में तुमको ही खोजता है   
बस एक बार सपने में आकर   
कुछ तो कह जाओ   
न कहो एक बार बस दिख जाओ   
जानती हूँ   
समय चक्र का यही हिसाब-किताब है   
हमको आज भी तुमसे उतना ही प्यार है   
पापा, तुम्हारी बेटी को तुम्हारे एक सपने का इन्तिज़ार है। 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2021)
(पापा की 43 वीं पुण्यतिथि पर) 
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रविवार, 4 जुलाई 2021

732. प्यारी नदियाँ

प्यारी नदियाँ 

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1. 
नद से मिली   
भोरे-भोरे किरणें   
छटा निराली।   

2. 
गंगा पवित्र   
नहीं होती अपवित्र   
भले हो मैली।   

3. 
नदी की सीख -   
हर क्षण बहना   
नहीं थकना।   

4. 
राजा या रंक   
सबके अवशेष   
नदी का अंक।   

5. 
सदा हरती   
गंगा पापहरणी   
जग के पाप।   

6. 
नदी का धैर्य   
उसकी विशालता,   
देती है सीख।   

7. 
दुःखहरणी   
गंगा निर्झरनी   
पापहरणी।   

8. 
अपना प्यार   
बाँटती धुआँधार   
प्यारी नदियाँ।   

9. 
सरिता-घाट   
तन अग्नि में भस्म   
अंतिम सत्य।   

10. 
सबके छल   
नदी है समेटती   
कोई न भेद।   

11. 
सरजू तीरे   
महाकाव्य-सर्जन   
तुलसीदास।   

12. 
तड़पी नदी   
सागर से मिलने,   
मानो हो पिया।   

13. 
बेपरवाह   
मिलन को बेताब   
नदी बावरी।   

14. 
सिंधु से मिली   
सर्प-सी लहराती   
नदी लजाती।   

15. 
नदियाँ प्यासी   
प्रकृति का दोहन   
इंसान पापी।   

16. 
तीन नदियाँ   
पुराना बहनापा   
साथ फिरतीं।   

17. 
बढ़ी आबादी   
कहाँ से लाती पानी   
नदी बेचारी।   

18. 
नदी का तट   
सभ्यता व संस्कृति   
सदियाँ जीती।   

19. 
मीन झाँकती,   
पारदर्शी लिबास   
नदी की कोख।   

20. 
खूब निभाती   
वर्षा से बहनापा   
साथ नहाती।   

21. 
बूझो तो कौन?   
खाती, ओढ़ती, जल   
नदी और क्या!   

22. 
कोई न सुना   
बिलखती थी नदी   
पानी के बिना।   

23. 
नदी के तीरे   
देवताओं का घर   
अमृत भर।   

24. 
नदी बहना!   
साथ लेके चल ना   
घूमने जग।   

25. 
बाढ़ क्यों लाती?   
विकराल बनके   
काहे डराती?   

26. 
चंदा-सूरज   
नदी में नहाकर   
काम पे जाते।   

27.   
मिट जाएगा   
तुम बिन जीवन,   
न जाना नदी!   

28. 
दूर न जाओ   
नदी, वापस आओ   
मत गुस्साओ।   

29. 
डूबा जो कोई   
निरपराध नदी   
फूटके रोई।   

30. 
हो गईं मैली   
बेसहारा नदियाँ   
कैसे नहाए।   

31. 
बहती नैया   
गीत गाए खेवैया   
शांत दरिया।   

32. 
पानी दौड़ता   
तटबन्ध तोड़के,   
क्रोधित नदी।   

33. 
तुझमें डूबे   
सोहनी महिवाल   
प्यार का अंत।   

34. 
नदियाँ सूखी,   
बदरा बरस जा   
उनको भिगा।   

35. 
अपनी पीर   
सिर्फ़ सागर से क्यों   
मुझे भी कह।   

36. 
मीन मरती   
पी ज़हरीला पानी   
नदियाँ रोती।   

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2021)
('अप्रमेय' (2021), डॉ. भीकम सिंह जी द्वारा संपादित पुस्तक में प्रकाशित मेरे हाइकु) 
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शुक्रवार, 25 जून 2021

731. पखेरू (8 हाइकु)

पखेरू 

(8 हाइकु) 

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1. 
नील गगन   
पुकारता रहता -   
पाखी, तू आ जा!   

2. 
उड़ती फिरूँ   
हवाओं संग झूमूँ   
बन पखेरू।   

3. 
कतरे पंख   
पर नहीं हारूँगी,   
फिर उडूँगी।   

4. 
चकोर बोली -   
चन्दा छूकर आएँ   
चलो बहिन।   

5. 
मन चाहता,   
स्वतंत्र हो जीवन   
मुट्ठी में विश्व।   

6. 
उड़ना चाहे   
विस्तृत गगन में   
मन पखेरू।   

7. 
छूना है नभ   
कामना पहाड़-सी   
हौसला पंख।   

8. 
झूमता मन,   
अनुपम प्रकृति   
संग खेलती।   

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2021)
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सोमवार, 21 जून 2021

730. योग

योग 

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जीवन जीना सरल बहुत   
अगर समझ लें लोग   
करें सदा मनोयोग से   
हर दिन थोड़ा योग।   

हजारों सालों की विद्या   
क्यों लगती अब ढोंग   
आओ करें मिलकर सभी   
पुनर्जीवित ये योग।   

साँसे कम होतीं नहीं   
जो करते रहते योग   
हमको करना था यहाँ   
अपना ही सहयोग।   

इस शतक के रोग से   
क्यों जाते इतने लोग   
अगर नियम से देश में   
घर-घर होता योग।   

दे गया गहरा ज्ञान भी   
कोरोना का यह सोग   
औषधि लेते रहते पर   
संग करते हम सब योग।   

चमत्कार ये योग बना   
दूर भगा दे रोग   
तन अपना मंदिर बना   
पूजा अपना योग।   

जीवन के अवलम्ब हैं   
प्रकृति, ध्यान व योग   
तन का मन का हो नियम   
सरल साधना जोग।   

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2021) 
(अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21. 6. 21) 
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रविवार, 20 जून 2021

729. ओ पापा!

ओ पापा! 

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ओ पापा!   
तुम गए   
साथ ले गए   
मेरा आत्मबल   
और छोड़ गए मेरे लिए   
कँटीले-पथरीले रास्ते   
जिसपर चलकर   
मेरा पाँव ही नहीं मन भी   
छिलता रहा।   
तुम्हारे बिना   
जीवन की राहें बहुत कठिन रहीं   
गिर-गिरकर ही सँभलना सीखा   
कुछ पाया बहुत खोया   
जीवन निरर्थक चलता रहा।   
तुम्हारी यादें   
और चिन्तन-धारा को   
मन में संचितकर   
अब भरना है स्वयं में आत्मविश्वास   
और उतरना है   
जीवन-संग्राम में।   
भले अब   
जीवन के अवसान पर हूँ   
पर जब तक साँस तब तक आस।   

- जेन्नी शबनम (20. 6. 2021) 
(पितृ दिवस)
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शुक्रवार, 18 जून 2021

728. एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है 


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उम्र के सारे वसंत वार दिए   
रेगिस्तान में फूल खिला दिए   
जद्दोजहद चलती रही एक अदद घर की   
रिश्तों को सँवारने की   
हर डग पर चाँदनी बिखराने की   
हर कण में सूरज उगाने की   
अंततः मकान तो घर बना   
परन्तु किसी कोने पर मेरा कोई रंग न चढ़ा   
कोई भी कोना महफूज़ न रहा   
न मेरे मन का न घर का   
कोई कोना नहीं जहाँ सुकून बरसे   
सूरज चाँद सितारे आकर बैठें   
हमसे बतकहियाँ करते हुए जीवन को निहारे   
धीरे-धीरे हर रिश्ता दरकता गया   
घर मकान में बदलता रहा   
सब बिखरा और पतझर आकर टिक गया   
अब यहाँ न फूल है न पक्षियों के कलरव   
न हवा नाचती है न गुनगुनाती है   
कभी भटकते हुए आ जाए   
तो सिर्फ़ मर्सिया गाती है   
अब न सपना कोई न अपना कोई   
मन में पसरा अकथ्य गाथा का वादा कोई   
धीरे-धीरे वीरानियों से बहनापा बढ़ा   
जीवन पार से बुलावा आया   
पर न जाने क्यों   
न इस पार न उस पार   
कहीं कोई कोना शेष न रहा   
जाने की आतुरता को किसी ने बढ़कर रोक लिया   
और मेरा गुलमोहर भी गुम हो गया   
जो हौसला देता था विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का   
साहस और हौसला को ख़ाली मन में भरने का   
अब न रिश्ते न घर न गुलमोहर   
न इस पार न उस पार कोई ठौर   
जीवन के इस पतझर में   
एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है।   

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2021)
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सोमवार, 14 जून 2021

727. स्मृति में तुम

स्मृति में तुम 
(11 हाइकु)

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1. 
स्मृति में तुम   
जैसे फैला आकाश   
सुवासित मैं।   

2. 
क्षणिक प्रेम   
देता बड़ा आघात   
रोता है मन।   

3. 
अधूरी चाह   
भटकता है मन   
नहीं उपाय।   

4. 
कई सवाल   
सभी अनुत्तरित,   
किससे पूछें?   

5. 
मेरे सवाल   
उलझाते हैं मुझे,   
कैसे सुलझे?   

6. 
ज्यों तुम आए   
जी उठी मैं फिर से   
अब न जाओ।   

7. 
रूठ ही गई   
फुदकती गौरैया   
बगिया सूनी।   

8. 
मेरा वजूद   
नहीं होगा सम्पूर्ण   
तुम्हारे बिना।   

9. 
जाएगी कहाँ   
चहकती चिड़िया   
उजड़ा बाग़।   

10. 
पेड़ की छाँव   
पथिक का विश्राम   
अब हुई कथा।   

11. 
जिजीविषा है   
फिर क्यों हारना?   
यही जीवन।   

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2011)

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बुधवार, 9 जून 2021

726. पुनर्जीवित

पुनर्जीवित 

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मैं पुनर्जीवित होना चाहती हूँ   
अपने मन का करना चाहती हूँ   
छूटते संबंध टूटते रिश्ते   
वापस पाना चाहती हूँ   
वह सब जो निषेध रहा   
अब करना चाहती हूँ   
आख़िरी पड़ाव पर पहुँचने के लिए   
अपने साये के साथ नहीं   
आँख मूँद किसी हाथ को थाम   
तेज़ी से चलना चाहती हूँ   
शिथिल शिराओं में थका रक्त   
दौड़ने की चाह रखता है   
जीते-जीते कब जीने की चाह मिटी   
हौसले ने कब दम तोड़ा   
कब ज़िन्दगी से नाता टूटा   
चुप्पी ओढ़ बदन को ढोती रही   
एक अदृश्य कोने में रूह तड़पती रही   
स्त्री हूँ, शुरू और अंत के बीच   
कुछ पल जी लेना चाहती हूँ   
कुछ देर को अमृत पीना चाहती हूँ   
मैं फिर से जीना चाहती हूँ   
मैं पुनर्जीवित होना चाहती हूँ।   

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2021) 
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शनिवार, 5 जून 2021

725. पर्यावरण (20 हाइकु)

पर्यावरण (20 हाइकु) 

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1. 
द्रौपदी-धरा   
दुशासन मानव   
चीर हरण।   

2. 
पाँचाली-सी भू   
कन्हैया भेजो वस्त्र   
धरा निर्वस्त्र।   

3. 
पेड़ ढकती   
ख़ामोश-सी पत्तियाँ   
करें न शोर।   

4. 
वृद्ध पत्तियाँ   
चुपके झरी, उगी   
नई पत्तियाँ।   

5.   
पुराना भूलो   
नूतन का स्वागत   
यही प्रकृति।   

6. 
पत्तियाँ नाची   
सावन की फुहार   
पेड़ हर्षाया।   

7. 
प्रकृति हाँफी   
जन से होके त्रस्त   
देगी न माफ़ी।   

8.
कैसा ये अंत   
साँसें बोतल-बंद   
खरीदो, तो लो।   

9. 
मानव लोभी   
दुत्कारती प्रकृति -   
कब चेतोगे?   

10. 
कोई न पास   
साइकिल उदास,   
गाड़ी ही ख़्वाब।   

11. 
विषैले प्राणी   
विषाणु व जीवाणु   
झपटे, बचो!   

12. 
पीके ज़हर   
हवा फेंके ज़हर,   
दोषी मानव।   

13. 
हवा व पानी   
सब हैं प्रदूषित,   
काया दूषित।   

14. 
दूरी है बढ़ी   
प्रकृति को असह्य,   
झेलो मानव।   

15. 
प्रकृति रोती   
मानव विनाशक   
रोग व शोक।   

16. 
असह्य व्यथा   
किसे कहे प्रकृति   
नर असंवेदी।   

17. 
फैली विकृति   
अभिमानी मानव   
हारी प्रकृति।   

18. 
दुनिया रोई   
कुदरत भी रोई,   
विनाश लीला।   

19. 
पर्यावरण   
प्रदूषण की मार   
साँसें बेहाल।   

20. 
धुँध या धुआँ,   
प्रदूषित संसार,   
समझें कैसे?   

- जेन्नी शबनम (5. 6. 2021) 
(विश्व पर्यावरण दिवस) 

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