मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

605. बसन्त (क्षणिका)

बसन्त   

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मेरा जीवन मेरा बंधु   
फिर भी निभ नहीं पाता बंधुत्व   
किसकी चाकरी करता नित दिन   
छुट गया मेरा निजत्व   
आस उल्लास दोनों बिछुड़े   
हाय ! जीवन का ये कैसा बसंत ! 

- जेन्नी शबनम (12. 2. 2019)

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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

604. काला जादू

काला जादू...   

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जब भी, दिल खोल कर हँसती हूँ   
जब भी, दिल खोल कर जीती हूँ   
जब भी, मोहब्बत के आगोश में साँसें भरती हूँ   
जब भी, संसार की सुन्दरता को, दामन में समेटती हूँ   
न जाने कब, मैं खुद को नजर लगा देती हूँ   
मुझे मेरी ही नजर लग जाती है   
हँसना, जीना, अचानक गुम हो जाता है   
मुहब्बत के आसमान से, जमीन पर, पटक दी जाती हूँ   
जिन फूलों को थामे थी, उनमें काँटें उग जाते हैं   
और मेरी ऊँगलियाँ ही नहीं   
तक़दीर की लकीरें भी, लहूलुहान हो जाती हैं   
दौड़ती हूँ, भागती हूँ, छटपटाती हूँ   
चौकन्ना होकर, चारों तरफ निहारती हूँ   
मैंने किसी का, कुछ भी तो न छीना, न बिगाड़ा   
फिर मेरे जीवन में, रेगिस्तान कहाँ से पनप जाता है   
कैसे आँखों में, आँसू की जगह, रक्त-धार बहने लगती है   
कौन पलट देता है, मेरी किस्मत   
कौन है, जो काला जादू करता है   
कोई तो इतना अपना नहीं, किसी से कोई रंजिश भी नहीं   
फिर यह सब कैसे?   
हाँ ! शायद मुझे मेरी ही नजर लग जाती है   
मैंने ही खुद पर काला जादू किया है   
अल्लाह ! कोई इल्म बता   
कोई कारामात कर दे   
मिटने से पहले चाहती हूँ   
हँसना जीना मुहब्बत   
बस एक बार   
बस एक बार !   

- जेन्नी शबनम (2. 2. 2019)

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सोमवार, 28 जनवरी 2019

603.वक़्त (चोका - 10)

वक़्त (चोका)   

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वक्त की गति   
करती निर्धारित   
मन की दशा   
हो मन प्रफुल्लित   
वक़्त भागता   
सूर्य की किरणों-सा   
मनमौजी-सा   
पकड़ में न आता   
मन में पीर   
अगर बस जाए   
बीतता नहीं   
वक़्त थम-सा जाता   
जैसे जमा हो   
हिमालय पे हिम   
कठोरता से   
पिघलना न चाहे,   
वक़्त सजाता   
तोहफ़ों से ज़िन्दगी   
निर्ममता से   
कभी देता है सज़ा   
बिना कुसूर   
वक़्त है बलवान   
उसकी मर्ज़ी   
जिधर ले के चले   
जाना ही होता   
बिना किए सवाल   
बिना दिए जवाब !   

- जेन्नी शबनम (28. 1. 2019)   

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शनिवार, 26 जनवरी 2019

602. प्रजातंत्र

प्रजातंत्र...   

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मुझपर इल्जाम है उनकी ही तरह   
जो कहते हैं कि   
देश के माहौल से डर लगता है   
हाँ ! मैं मानती हूँ मुझे भी अब डर लगता है   
सिर्फ अपने लिए नहीं   
अपनों के लिए डर लगता है।   
उन्हें मेरे कहे पर आपत्ति है   
उनके कहे पर आपत्ति है   
वे कहते हैं चार सालों से   
न कहीं बम विस्फोट हो रहे हैं   
न उन दिनों की तरह इमरजेंसी है   
जब बेकसूरों को पकड़ कर जेल भेजा जाता था   
न इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद का   
सिख विरोधी दंगा है   
जब हर एक सिख असुरक्षित था और डरा हुआ कि   
न जाने कब उनकी हत्या कर दी जाए।   
वे कहते है   
यह डर उन्हें क्यों   
जिनके पास धन भरपूर है   
जो जब चाहे देश छोड़ कर   
कहीं और बस सकते हैं   
यह डर उन्हें क्यों   
जो 1975 और 1984 में खामोश रहे   
तब क्यों नहीं कुछ कहा   
तब क्यों नहीं डर लगा?   
मैं स्वीकार करती हूँ कि   
यह सब दुर्भाग्यपूर्ण था   
परन्तु सिर्फ इन वजहों से   
1989 का भागलपुर दंगा   
2002 का गुजरात दंगा   
या अन्य दंगा-फसाद   
जायज नहीं हो सकता।   
मॉब लिंचिग   
बलात्कार   
एसिड अटैक   
हत्या   
और न जाने कितने अपराध   
हर रोज़ कुछ नए अपराध   
क्या इसके खिलाफ बोलना गुनाह है?   
डर और खौफ़ के साये में जी रही है प्रजा   
क्या यही प्रजातंत्र है?   
जुर्म के खिलाफ बोलना   
अगर गुनाह है   
तो मैं गुनाह कर रही हूँ   
समाज में शांति चाहना   
अगर गुनाह है   
तो मैं गुनाह कर रही हूँ।   
मैं खुलेआम कबूल कर रही हूँ   
हाँ ! मुझे डर लगता है   
मुझे आज के माहौल से डर लगता है !   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2019)   
(गणतंत्र दिवस पर)
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रविवार, 20 जनवरी 2019

601. फ़रिश्ता (क्षणिका)

फ़रिश्ता     

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सुनती हूँ कि कोई फ़रिश्ता है 
जो सब का हाल जानता है 
पर मेरा? 
ना-ना मेरा नहीं है वह 
मुझे नहीं जानता वह 
पर तुम? 
तुम मुझे जानते हो 
जीने का हौसला देते हो 
जाने किस जन्म में, तुम मेरे कौन थे 
जो अब मेरे फ़रिश्ते हो! 

- जेन्नी शबनम (19. 1. 2019)   

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बुधवार, 9 जनवरी 2019

600. अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ)

अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ) 

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1.   
मेरे अंतर्मन में पड़ी हैं   
ढेरों अनकही कविताएँ   
तुम मिलो कभी   
तो फ़ुर्सत में सुनाऊँ तुम्हें।   

2.   
हजारों सवाल हैं मेरे अंतर्मन में   
जिनके जवाब तुम्हारे पास हैं   
तुम आओ गर कभी   
फ़ुर्सत में जवाब बताना।   

3.   
मेरा अंतर्मन   
मुझसे प्रश्न करता है -   
आख़िर कैसे कोई भूल जाता है   
सदियों का नाता 
पल भर में   
उसके लिए   
जो कभी अपना नहीं था   
न कभी होगा।   

4.   
हमारे फ़ासले की मियाद   
जाने किसने तय की है   
मैंने तो नहीं,   
क्या तुमने?   

5.   
क्षण-क्षण कण-कण   
तुम्हें ढूँढ़ती रही   
जानती हूँ   
मैं अहल्या नहीं कि   
तुमसे मिलना तय हो।   

6.   
कुछ तो हुआ ऐसा    
जो दरक गया मन   
गर वापसी भी हो तुम्हारी   
टूटा ही रहेगा तब भी यह मन।   

7.   
रात का अँधेरा   
अब नहीं डराता मुझे   
उसकी सारी कारस्तानियाँ   
मुझसे हार गई   
मैंने अकेले जीने की   
आदत जो पाल ली।   

8.   
ढूँढ़कर थक चुकी   
दिन का सूरज   
रात का चाँद   
दोनों के साथ   
लुकाचोरी खेल रही थी   
वे दगा दे गए   
छल से मुझे तन्हा छोड़ गए।   

9.   
अब आओ, तो चलेंगे   
उन यादों के पास   
जिसे हमने छुपाया था   
समय से माँगी हुई तिजोरी में   
शायद कई जन्मों पहले।   

10.   
सोचा न था   
ऐसे तजुर्बे भी होंगे   
दुनिया की भीड़ में   
सदा हम तन्हा ही रहेंगे।   

11.   
चुप-से दिन   
चुप-सी रातें   
चुप-से नाते   
चुप-सी बातें   
चुप है ज़िन्दगी   
कौन करे बातें   
कौन तोड़े सघन चुप्पी !   

12.   
तुमसे मिलकर जाना   
यह जीवन क्या है   
बेवजह गुस्सा थी   
खुद को ही सता रही थी   
तुम्हारी एक हँसी   
तुम्हारा एक स्पर्श   
तुम्हारे एक बोल   
मैं जीवन को जान गई।   

13.   
वक्त बस एक क्षण देता है   
बन जाएँ या बिगड़ जाएँ   
जी जाएँ या मर जाएँ,   
उस एक क्षण को   
मुट्ठी में समेटना है   
वर्तमान भी वही   
भविष्य भी वही,   
बस एक क्षण   
जो हमारा है   
सिर्फ हमारा !   

14.   
नजदीकियाँ   
पाप-पुण्य से परे होती हैं   
फिर भी   
कभी-कभी   
फ़ासलों पे रहकर   
जीनी होती है ज़िन्दगी।   

15.   
चाहती हूँ   
धूप में घुसकर   
तुम आ जाओ छत पर   
बडे दिनों से   
मुलाकात न हुई   
जीभर कर बात न हुई   
यूँ भी सुबह की धूप   
देह के लिए जरूरी है   
और तुम   
मेरे मन के लिए।   

- जेन्नी शबनम (9. 1. 2019)  

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मंगलवार, 8 जनवरी 2019

599. हे नव वर्ष (नव वर्ष पर 5 हाइकु)

हे नव वर्ष (नव वर्ष पर 5 हाइकु)   

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1.   
हे नव वर्ष   
आखिर आ ही गए,   
पर जल्दी क्यों?   

2.   
उम्मीद जगी -   
अच्छे दिन आएँगे   
नव वर्ष में।   

3.   
मन से करो   
इस्तकबाल करो   
नव वर्ष का।   

4.   
पिछला साल   
भूलना नहीं कभी,   
मिली जो सीख।   

5.   
प्रेम ही प्रेम   
नव वर्ष कामना,   
सब हों सुखी।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2019)

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रविवार, 30 दिसंबर 2018

598. वृद्ध जीवन (वृद्धावस्था पर 20 हाइकु)

वृद्ध जीवन 

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1.   
उम्र की साँझ   
बेहद डरावनी   
टूटती आस।   

2.   
अटकी साँस   
बुढापे की थकान   
मन बेहाल।   

3.   
वृद्ध की कथा   
कोई न सुने व्यथा   
घर है भरा।   

4.   
दवा की भीड़   
वृद्ध मन अकेला   
टूटता नीड़।   

5.   
अकेलापन   
सबसे बड़ी पीर   
वृद्ध जीवन।   

6.   
उम्र जो हारी   
एक पेट है भारी   
सब अपने।   

7.
धन के नाते   
मन से हैं बेगाने   
वृद्ध बेचारे।   

8.   
वृद्ध से नाता   
अपनों ने था छोड़ा   
धन ने जोड़ा।   

9.   
बदले कौन   
मखमली चादर   
बुढ़ापा मौन।   

10.   
बहता नीर   
यही जीवन रीत   
बुढ़ापा भारी।   

11.   
उम्र का चूल्हा   
आजीवन सुलगा   
अब बुझता।   

12.   
किससे कहें?   
जीवन-साथी छूटा   
ढेरों शिकवा।   

13.   
बुढ़ापा खोट   
अपने भी भागते   
कोई न ओट।   

14.   
वृद्ध की आस   
शायद कोई आए   
टूटती साँस।   

15.   
ग़म का साया   
बुजुर्ग का अपना   
यही है सच।   

16.   
जीवन खिले   
बुजुर्गों के आशीष   
खूब जो मिले।   

17.   
टूटा सपना   
कौन सुने दुखड़ा   
वृद्ध अकेला।   

18.   
वक्त ने कहा -   
याद करो जवानी   
भूल अपनी।   

19.   
वक्त है लौटा   
बुजुर्ग का सपना   
सब हैं साथ।   

20.
वृद्ध की लाठी
बस गया विदेश
भूला वो माटी। 

- जेन्नी शबनम (24. 12. 2018)

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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

597. बातें (क्षणिका)

बातें 

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रात के अँधेरे में   
मैं ढेरों बातें करती हूँ 
जानती हूँ मेरे साथ 
तुम कहीं नहीं थे   
तुम कभी नहीं थे 
पर सोचती रहती हूँ 
तुम सुन रहे हो 
और खुद से बातें करती हूँ।   

- जेन्नी शबनम (25. 12. 2018)   

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बुधवार, 19 दिसंबर 2018

596. दुःख (दुःख पर 10 हाइकु)

दुःख (10 हाइकु)   

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1.   
दुःख का पारा 
सातवें आसमाँ पे   
मन झुलसा !   

2.   
दुःख का लड्डु   
रोज-रोज यूँ खाना   
बड़ा ही भारी !   

3.   
दुःख की नदी 
बेखटके दौड़ती   
बे रोक-टोक !   

4.   
साथी है दुःख   
साथ है हरदम 
छूटे न दम !   

5.   
दुःख की वेला 
कभी तो गुजरेगी   
मन में आस !   

6.   
दुःख की रोटी 
भरपेट है खाई   
फिर भी बची !   

7.   
दुःख अतिथि 
जाने की नहीं तिथि   
बड़ा बेहया !   

8.   
दुख की माला 
काश ये टूट जाती   
सुकून पाती !   

9.   
मस्त झूमता 
बड़ा ही मतवाला   
दुःख है योगी !   

- जेन्नी शबनम (28. 9. 2018)   

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