हर हार मुझे और हराती है
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आज मैं ख़ाली-ख़ाली-सी हूँ, अपने अतीत को टटोल रही
तमाम चेष्टा के बाद भी बिखरने से रोक न पायी
नहीं मालूम जीने का हुनर क्यों न आया?
अपने सपनों को पालना क्यों न आया?
जानती हूँ मेरी विफलताओं का आरोप मुझ पर ही है
मेरी हार का दंश मुझे ही झेलना है
पर मेरे सपनों की परिणति, पीड़ा तो देती है न!
हर हार, मुझे और हराती है।
- जेन्नी शबनम (9. 12. 2010)
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आज मैं ख़ाली-ख़ाली-सी हूँ, अपने अतीत को टटोल रही
तमाम चेष्टा के बाद भी बिखरने से रोक न पायी
नहीं मालूम जीने का हुनर क्यों न आया?
अपने सपनों को पालना क्यों न आया?
जानती हूँ मेरी विफलताओं का आरोप मुझ पर ही है
मेरी हार का दंश मुझे ही झेलना है
पर मेरे सपनों की परिणति, पीड़ा तो देती है न!
हर हार, मुझे और हराती है।
- जेन्नी शबनम (9. 12. 2010)
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