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शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

753. ज़िन्दगी नहीं है (तुकान्त)

ज़िन्दगी नहीं है 

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बहुत कुछ था जो अब नहीं है   
कुछ है पर ज़िन्दगी नहीं है।
   
कश्मकश में उलझकर क्या कहें   
जो कुछ भी था अब नहीं है। 
  
हयात-ए-सफ़र पर चर्चा क्या   
कहने को बचा अब कुछ नहीं है। 
  
फ़िसलते नातों का ये दौर   
ख़तम होता अब क्यों नहीं है। 
  
रह-रहकर पुकारता है मन   
सब है पर अपना कोई नहीं है। 
  
'शब' की बातें कच्ची-पक्की   
ज़िन्दा है पर ज़िन्दगी नहीं है। 

- जेन्नी शबनम (11. 11. 22)
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मंगलवार, 10 मई 2011

242. तनहा-तनहा हम रह जाएँगे (तुकान्त)

तनहा-तनहा हम रह जाएँगे

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सब छोड़ जाएँगे जब हमको
तनहा-तनहा हम रह जाएँगे
किसे बताएँगे ग़म औ खुशियाँ
सदमा कैसे हम सह पाएँगे।  

किसकी तक़दीर में क्यों हुए वो शामिल
कभी नहीं हम कह पाएँगे
अपनी हाथ की फिसलती लकीरों में
उनको सँभाल हम कब पाएँगे। 

हर तरफ़ फैला सन्नाटा
यूँ ही पुकारते हम रह जाएँगे 
है अजब पहेली ज़िन्दगी
उलझन सुलझा कैसे हम पाएँगे। 

हर रोज़ तकरार करते हैं
और कहते कि वो चले जाएँगे
अपनी शिकायत किससे करें
ग़ैरों से नहीं हम कह पाएँगे। 

जाने कैसे कोई रहता तनहा
मगर नहीं हम रह पाएँगे
ज़िन्दगी की बाबत बोली 'शब'
तन्हाई नहीं हम सह पाएँगे। 

- जेन्नी शबनम (8. 5. 2011)
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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

88. शब ने पाले ही नहीं थे (तुकान्त) / shab ne paale hi nahin theye (tukaant)

शब ने पाले ही नहीं थे

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कुछ लम्हे ऐसे रूठ गए हैं, जैसे साथ कभी हम जिए ही नहीं थे
यूँ कि कोई साथी छूट जाए, जैसे साथ कभी हम चले ही नहीं थे 

वक़्त की उदासियों को कौन समझे, जब दिल चीखता ही नहीं
ढूँढ़ता है दिल उस ज़ालिम को, जिसे कभी हम भूले ही नहीं थे 

मज्मा रोज़ है लगता मदिरालय में, कहते कि शराब चीज़ बुरी है
बिन पिए जो होश गँवा दे, ऐसे मयखाने में हम गए ही नहीं थे 

सन्नाटों में गूँजता रहा समंदर की लहरों-सा, बेबस मासूम एक बदन
दरिंदों ने नोच डाला जिस्म, मगर एहसास जाने क्यों थमे ही नहीं थे 

शहीद-ए-वतन के तगमे से, जवान बेवा कैसे गुज़ारे सूना जीवन
जाने कल किसकी बारी, बूढे माँ-बाप ने ऐसे ख़्वाब देखे ही नहीं थे 

मंदिर-मस्जिद और गुरूद्वारे में, उम्र गुज़री हर चौखट चौबारे में
थक गए अब तो, कैसे कहते हो कि हम ख़ुदा को ढूँढ़े ही नहीं थे 

ज़माने से पूछते हो भला क्यों, मेरे गुज़रे अफ़सानों का राज़
दर्द मेरा जाने कौन, ग़ैरों के सामने हम कभी रोए ही नहीं थे 

फ़ना हो जाएँ, तो वो मानेंगे, कितना प्यार हम किए थे उनसे
मिलेंगे वो, ऐसे नामुमकिन अरमान, 'शब' ने पाले ही नहीं थे 

- जेन्नी शबनम (14. 10. 2009)
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shab ne paale hin nahin theye

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kuchh lamhe aise rooth gaye hain, jaise sath kabhi hum jiye hin nahin theye
yun ki koi saathi chhoot jaye, jaise saath kabhi hum chale hi nahin theye.

waqt kee udaasiyon ko kaun samjhe, jab dil cheekhta hi nahin
dhundhta hai dil us zaalim ko, jise kabhi hum, bhoole hi nahin theye.

majmaa roz hai lagta madiraalaye mein, kahte ki sharaab cheez buri hai
bin piye jo hosh ganwaa de, aise mayekhaane mein hum gaye hi nahin theye.

sannaton mein gunjtaa raha samandar kee lahron-saa, bebas maasoom ek badan
darindon ne noch daalaa jism, magar ehsaas jaane kyun thamye hi nahin theye.

shaheed-ae-watan ke tagmein se, jawaan bewa kaise gujaare soona jiwan
jaane kal kiski baari, budhe maa-baap ne aise khwaab dekhe hi nahin theye.

mandir-maszid aur gurudwaare mein, umra gujari har chaukhat chaubaare mein
thak gaye ab to, kaise kahte ho ki hum khuda ko dhundhe hi nahin they.

zamaane se poochhte ho bhalaa kyun, mere gujre afsaanon kaa raaz
dard mera jaane kaun, gairon ke saamne hum kabhi roye hi nahin they.

fanaa ho jaayen, to wo maanenge, kitnaa pyaar hum kiye theye unse
milenge wo, aise naamumkin armaan, 'shab' ne paale hi nahin theye.

- Jenny Shabnam (14. 10. 2009)
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सोमवार, 14 सितंबर 2009

84. उसका आख़िरी कलाम है (तुकान्त) / uska aakhiree kalaam hai (tukaant)

उसका आख़िरी कलाम है

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हर ख़्वाब मेरा वो पालता रहा, जो पल-पल मन मेरा चाहता रहा
कितना जान-निसार वो इंसान है, मेरा सुकून उसकी ज़िन्दगी का करार है 

मेरी मुस्कुराहटों से खिलता रहा, मुझे तस्वीर में रोज़ ढूँढ़ता रहा
दर्द मेरा अपने सीने में भरता है, मुझे तराशना बस उसका कमाल है 

मेरे ज़ख्म रोज़ सिलता रहा, जो ज़माने से मुझे मिलता रहा
कैसे कह दें कि हमें दूर जाना है, उसके हाथ में ज़िन्दगी की कमान है 

मुझे हर्फ़-हर्फ़ रोज़ सुनता रहा, जाने कितने ख़्वाब बुनता रहा
हर सफ़हे पर बस मेरा नाम है, ये शायद उसका आख़िरी कलाम है 

- जेन्नी शबनम (6. 9. 2009)
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uska aakhiree kalaam hai

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har khwaab mera wo paaltaa rahaa, jo pal-pal man mera chaahtaa raha
kitna jaan-nisaar wo insaan hai, mera sukoon uski zindgi ka karaar hai.

meri muskuraahaton se khiltaa raha, mujhe tasweer mein roz dhundhta raha
dard mera apne seene mein bhartaa hai, mujhe taraashnaa bas uskaa kamaal hai.

mere zakham roz siltaa raha, jo zamaane se mujhe miltaa raha
kaise kah dein ki hamein door janaa hai, uske haath mein zindgi ka kamaan hai.

mujhe harf-harf roz suntaa rahaa, jaane kitne khwaab buntaa rahaa
har safahe par bas mera naam hai, ye shaayad uskaa aakhiree kalaam hai.

- jenny shabnam (6. 9. 2009)
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मंगलवार, 1 सितंबर 2009

81. ख़ुदा बना दिया (तुकान्त)

ख़ुदा बना दिया

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मिज़ाज कौन पूछे, जब ख़ुद नासाज़ हो
ये सोच हमने, ख़ुद ही सब्र कर लिया 

इश्क़ का जुनून, कैसे कोई जाने भला
वो जो मोहब्बत से, महरूम रह गया 

दाख़िल ही नहीं कभी, बेदख़ल कैसे हों
फिर भी ये सुन-सुन, ज़माना गुज़र रहा

मायूसी से बहुत, थककर पुकारा उसे
बादलों में गुम वो, फिर निराश कर गया 

तरसते लोग जहाँ में, एक ख़ुदा के वास्ते
'शब' ने जाने कितनों को, ख़ुदा बना दिया 

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2009)
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बुधवार, 26 अगस्त 2009

80. आँखों में इश्क़ भर क्यों नहीं देते हो (तुकान्त)

आँखों में इश्क भर क्यों नहीं देते हो

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दावा करते तुम, आँखों को मेरी पढ़ लेते हो
फिर दर्द मेरा तुम, समझ क्यों नहीं लेते हो? 

बारहा करते सवाल, मेरी आँखों में नमी क्यों है
माहिर हो, जवाब ख़ुद से पूछ क्यों नहीं लेते हो? 

कहते हो कि समंदर-सी, मेरी आँखें गहरी है
लम्हा भर उतरकर, नाप क्यों नहीं लेते हो? 

तुम्हारे इश्क़ की तड़प, मेरी आँखों में बहती है
आकर लबों से अपने, थाम क्यों नहीं लेते हो? 

हम रह न सकेंगे तुम बिन, जानते तो हो
फिर आँखों में मेरी, ठहर क्यों नहीं जाते हो? 

ज़ाहिर करती मेरी आँखें, तुमसे इश्क़ है
बड़े बेरहम हो, क़ुबूल कर क्यों नहीं लेते हो?

मेरे दर्द की तासीर, सिर्फ़ तुम ही बदल सकते हो
फिर मेरी आँखों में इश्क़, भर क्यों नहीं देते हो?

वक़्त का हिसाब न लगाओ, कहते हो सदा
'शब' की आँखों से, कह क्यों नहीं देते हो?

- जेन्नी शबनम (19. 8. 2009)
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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

79. हम दुनियादारी निभा रहे (तुकान्त)

हम दुनियादारी निभा रहे

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एक दुनिया, तुम अपनी चला रहे
एक दुनिया, हम अपनी चला रहे 

ख़ुदा तुम सँवारो दुनिया, बहिश्त-सा
महज़ इंसान हम, दुनियादारी निभा रहे 

हवन-कुंड में कर अर्पित, प्रेम-स्वप्न
रिश्तों से, घर हम अपना सजा रहे 

समाज के क़ायदे से, बग़ावत ही सही
एक अलग जहाँ, हम अपना बसा रहे 

अपने कारनामे को देखते, दीवार में टँगे
जाने किस युग से, हम वक़्त बीता रहे 

सरहद की लकीरें बँटी, रूह इंसानी है मगर
तुम सँभलो, पतवार हम अपनी चला रहे 

शब्द ख़ामोश हुए या ख़त्म, कौन समझे
'शब' से दुनिया का, हम फ़ासला बढ़ा रहे 

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बहिश्त - स्वर्ग / जन्नत 
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- जेन्नी शबनम (17. 8. 2009)
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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

78. यही अर्ज़ होता है (तुकान्त)

यही अर्ज़ होता है

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मजरूह सही, ये दर्द-ए-इश्क़ का तर्ज़ होता है
तजवीज़ न कीजिए, इंसान बड़ा ख़ुदगर्ज़ होता है 

आप कहते हैं कि हर मर्ज़ की दवा, है मुमकिन
इश्क़ में मिट जाने का जुनून, भी मर्ज़ होता है 

दोस्त न सही, दुश्मन ही समझ लीजिए हमको
दुश्मनी निभाना भी, दुनिया का एक फर्ज़ होता है 

आप मनाएँ हम रूठें, बड़ा भला लगता हमको
आप जो ख़फ़ा हो जाएँ तो, बड़ा हर्ज़ होता है 

खुशियाँ मिलती हैं ज़िन्दगी-सी, किस्तों में मगर
हँसकर उधार साँसे लेना भी, एक कर्ज़ होता है 

वो करते हैं हर लम्हा, हज़ार गुनाह मगर
मेरी एक गुस्ताख़ी का, हिसाब भी दर्ज़ होता है 

इश्क़ से महरूम कर, दर्द बेहिसाब न देना 'शब' को
हर दुश्वारी में साथ दे ख़ुदा, बस यही अर्ज़ होता है
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मजरूह - घायल / ज़ख्मी
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- जेन्नी शबनम (11. 8. 2009)
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बुधवार, 22 जुलाई 2009

74. शमा बुझ रही (तुकान्त)

कुछ शेर हैं नज़्म-सा सही, नाम क्या दूँ ये पता भी नहीं,
जो नाम दें आपकी मर्ज़ी, पेश है शमा पर मेरी एक अर्ज़ी

शमा बुझ रही

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शमा बुझ रही, आओ जल जाओ, है नशीली सुरूर मयकशी
मिट गई तो फिर करनी होगी, उम्र तन्हा बसर, ऐ परवानों 

बुझने से पहले हर शमा, है धधकती बेइंतिहा दिलकशी
बुझ रही शमा तो आ पहुँचे, फिर क्यों मगर, ऐ जलनेवालों

सहर होने से पहले है बुझना, फिर क्यों भला छायी मायूसी
ढूँढ़ लो अब कोई हसीन शमा, बदलकर डगर, ऐ मतवालों

जाओ लौट जाओ हमदर्द मुसाफ़िरों, अब हुई साँस आख़िरी
फ़िजूल ही ढल गया, जाने क्यों उम्र का हर पहर, ऐ सफ़रवालों

मिज़ाज अब क्या पूछते हो, बस सुन लो उसकी बेबस ख़ामोशी
जल रही थी जब तड़पकर, तब तो न लिए ख़बर, ऐ शहरवालों

सलीक़ा बताते हो मुद्दतों जीने का क्यों, है ये वक़्त-ए-रुख़सती
बेशक शमा से सीख लो, शिद्दत से मरने का हुनर, ऐ उम्रवालों

शमा की हर साँस तड़प रही जलने को, बुझ जाना है नियति
इल्तिज़ा है, दम टूटने से पहले देख लो एक नज़र, ऐ दिलवालों

जल चुकी दम भर शमा, जान लो 'शब', है ये दस्तूर-ए-ज़िन्दगी
ख़त्म हुआ, अब मान भी लो, इस शमा का सफ़र, ऐ जहाँवालों

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2009)
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शुक्रवार, 29 मई 2009

61. दफ़ना दो यारों (तुकान्त)

दफ़ना दो यारों

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चंदा की चाँदनी से रौशनी बिखरा गया कोई 
हसीन हुई है रात, सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन बिखरा गया रंगीनी, ये न पूछो कोई 
रौशन हुई है रात, बस बहक जाओ यारों

सूरज की तपिश से, अगन लगा गया कोई 
दहक रही है रात, सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन जला गया दामन, ये न पूछो कोई 
जल रही है रात, बस जश्न मनाओ यारों

आसमान की शून्यता से, तक़दीर भर गया कोई 
ख़ामोश हुई है रात, सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन दे गया मातम, ये न पूछो कोई 
तन्हा हुई है रात, बस ज़रा रो लो यारों

अमावास की कालिमा से, अँधियारा फैला गया कोई 
डर गई है 'शब', सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन कर गया है अँधेरा, ये न पूछो कोई 
मर गई है रात, बस उसे दफ़ना दो यारों


- जेन्नी शबनम (28. 5. 2009)
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गुरुवार, 19 मार्च 2009

38. हम अब भी जीते हैं (तुकान्त)

हम अब भी जीते हैं

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इश्क़ की हद, पूछते हैं आप बारहा हमसे
क्या पता, हम तो हर सरहदों के पार जीते हैं  

इश्क़ की रस्म से अनजान, आप भी तो नहीं
क्या कहें, हम कहाँ कभी ख़्वाबों में जीते हैं  

इश्क़ की इंतिहा, देख लीजिए आप भी
क्या हुआ गर, जो हम फिर भी जीते हैं  

इश्क़ में मिट जाने का, 'शब' और क्या अंदाज़ हो
क्या ये कम नहीं, कि हम अब भी जीते हैं  

- जेन्नी शबनम (19. 3. 2009)
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बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

13. ज़ब्त-ए-ग़म (तुकान्त)

ज़ब्त-ए-ग़म

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सुर्ख़ स्याही से सफ़ेद पन्नों पर
लिखी है किसी के ज़ब्त-ए-ग़म की तहरीर

शब्द के सीने में ज़ब्त है
किसी के जज़्बात की जागीर

दफ़न दर्द को कुरेदकर
गढ़ी गई है किताब रंगीन

बड़े जतन से सँभाल रखी है
किसी के अंतर्मन की तस्वीर

इजाज़त नहीं ज़माने को कि
बाँच सके किसी की तक़दीर

हश्र तो ख़ुदा जाने क्या हो
जब कोई तोड़ने को हो व्याकुल ज़ंजीर

नतीजा तो कुछ भी नहीं बस
संताप को मिल जाएगी इक ज़मीन

दर्द और ज़ख्म से जैसे
रच गई ज़ब्त-ए-ग़म की कहानी हसीन

गर रो सको तो पढ़ो कहानी
टूटी-बिखरी दफ़न है किसी की मुरादें प्राचीन

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 9, 2008)
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