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शुक्रवार, 1 मई 2026

801. लाले-लाल

लाले-लाल

***

लग रही है बेलगाम बोली 
राजपथ असहाय है
आज़ादी पूर्व का एहसास हो रहा
राजपथ बेचैन है
चंद सरमायेदारों की क्रूरता से घिरा 
राजपथ ज़ख़्मी है।

राजपथ स्वतंत्र हुआ था अनगिनत बलिदानों से
आज उसे फिर शुद्ध लहू की दरकार है
नाम बदला पर कर्त्तव्य पथ न बन सका
राजपथ पर पसरा बड़ा व्यापार है
राजपथ पर हिंसकों का क़ब्ज़ा  
बेग़ैरत हर सरकार है
हर आज़ादी वापस मिले
बेबस जनता की करुण पुकार है
किसानों-श्रमिकों-मज़लूमों एक हो
अब इन्क़िलाब की दरकार है।

राजपथ को आज़ादी चाहिए 
हमें 1947 वाली आज़ादी चाहिए 
ग़रीबी-बेरोज़गारी से आज़ादी चाहिए 
जाति-धर्म से आज़ादी चाहिए 
साम्प्रदायिकता से आज़ादी चाहिए 
सम्पूर्ण देश का विकास चाहिए 
ज्ञान का प्रकाश चाहिए।

आओ नौजवानों बिखेर दो लहू 
हर तरफ़ अब लाले-लाल चाहिए
झंडा लाल, लहू लाल, लाले-लाल 
राजपथ पर हर निशान लाल चाहिए
हर हाथ में क्रांति की मशाल  
खेत हरा और पगड़ी लाल चाहिए
धरा-आसमान सब लाले-लाल 
हर तरफ़ अब लाले-लाल चाहिए।

-जेन्नी शबनम (1.5.2026)
(श्रमिक दिवस)
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शनिवार, 8 मार्च 2025

789. एक सवाल

एक सवाल 

***

भार्या होने का दण्ड 
बार-बार भोगती रही
अपमान का घूँट पीती रही
और तुम सभी नज़रें झुकाए 
कायर बने बैठे तमाशा देखते रहे
तुम सभी के पुरुष होने पर
तुम सभी के योद्धा होने पर 
ऐसे वचन पर
ऐसे धर्म पर 
लानत है 
एक सवाल है मेरा  
मेरी जगह तुम्हारी पुत्री होती तो?
क्या फिर भी उसे दाँव पर लगा देते?
क्या उसे भी पाँच पुरुषों में बाँट देते?
भरी सभा में निर्वस्त्र होने देते?
मेरी हँसी नाजाएज़ सही
पर क्या ये जाएज़ है?
पाँच पतियों के होते हुए मैं असहाय रही   
रक्षा करने धर्म-भाई आया 
क्या तुम में से कोई वचन तोड़ नहीं सकता था?
पति का धर्म निभा नहीं सकता था?
पत्नी की रक्षा न कर सकने वाले तुम पाँचों पुरुष  
तुम सभी पर लानत है। 

-जेन्नी शबनम (8.3.25)
(महिला दिवस)
________________ 

बुधवार, 1 मई 2024

775. वक़्त आ गया है

वक़्त आ गया है 

***

अक्सर सोचती हूँ 

हर बार, बार-बार 

मैं चुप क्यों हो जाती हूँ?

जानती हूँ 

मेरी चुप्पी हर किसी को भा रही है

पर मुझे भीतर से खोखला कर रही है

अन्दर-ही-अन्दर खा रही है। 

 

मैं अनभिज्ञ नहीं किसी सरोका से

स्वयं का हो या संसार का

पर मेरी चुप्पी मुझे धकेल देती है गुमनाम दुनिया में

जहाँ मेरे अस्तित्व का सवाल पैदा हो जाता है

मैं हर बार अपनी खाल में चुपचाप समा जाती हूँ 

अपनी चुप्पी से अपनी ही आहुति देती जाती हूँ 

कोई इससे बाहर नहीं निकालता है

सब छोड़ देते हैं मुझे, मेरी क़िस्मत कहकर। 


पर मैं क्यों ऐसी हूँ?

मन-मस्तिष्क का लावा मुझे जलाता है 

पर यह आग दिखती क्यों नहीं?

क्यों मैं जलती रहती हूँ?

अंगारों पर चलती रहती हूँ 

ख़ुद को आग में जलाती रहती हूँ 

सभी के सामने मुस्कुराती रहती हूँ 

मेरे जलने-रोने से संसार प्रभावित नहीं होता

मैं ही धीरे-धीरे मिटती जाती हूँ

अपने सवाल का जवाब ख़ुद को देती जाती हूँ 

जो निरर्थक है और व्यर्थ भी। 


मुझे अब अपना जवाब सभी को बताना होगा

अपनी चुप्पी को तोड़ना होगा

हर उस सवाल पर लावा उगलना होगा

जो मुझे मिटाता हैजलाता है

अपनी चुप्पी का एहसास मुझे नहीं चाहिए 

मेरी चुप्पी का अर्थ मुझे जतलाना होगा

मुझे क्या-क्या कहना है, समझाना होगा 

मेरी चुप्पी को ज्वालामुखी में बदलना होगा 

अन्यथा मैं जलती रहूँगी, लोग जलाते रहेंगे

मैं मिटती रहूँगी, लोग मिटाते हेंगे। 


अब बस!

चुप्पी को तोड़ने का वक़्त  गया है

अपने मनमाफ़िक जीने का वक़्त  या है

संसार से क़दम ताल मिलाने का वक़्त  गया है।


-जेन्नी शबनम (1.5.2024)

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सोमवार, 15 अगस्त 2022

747. आज़ादी का अमृत महोत्सव

आज़ादी का अमृत महोत्सव 

*** 

नहीं चलना ऐसे   
जब किसी की परछाईं पीछा करे   
नहीं देखना उसे   
जो तुम्हारी नज़रों की तलाश को ख़ुद तक रोके   
नहीं सुनना उसे   
जो तुम्हारी न सुने, सिर्फ़ अपनी कहे   
नहीं निभाना साथ उसके   
जिसका फ़रेब तुम्हें सताता रहे   
नहीं करना प्रेम उससे   
जो बदले में तुम्हारी आज़ादी छीने   
नहीं उलझना उससे, जो साँसों की पहरेदारी करे   
आज़ादी की बात कर साँसें लेना मुहाल करे। 
  
ज़िन्दगी एक बार ही मिलती है   
आज़ादी बड़े-बड़े संघर्षों से मिलती है   
ठोकर मारकर शातिरों को   
जीवन का जश्न जीभरकर मनाओ   
अपनी धरती, अपना आसमाँ, अपना जहाँ   
बेबाक बनकर आज़ादी का लुत्फ़ उठाओ। 
  
आज़ादी की साँसें दिल से दिल तक हो   
आज़ादी की बातें मन से मन तक हो   
जीकर देखो कि कितनी मिली आज़ादी   
किससे कब-कब मिली आज़ादी   
लेनी नहीं है भीख में आज़ादी   
हक़ है, जबरन छीननी है आज़ादी।
   
आज़ादी का यह अमृत महोत्सव   
सबके लिए है, तो तुम्हारे लिए भी है। 

-जेन्नी शबनम (15.8.22) 
(स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगाँठ) 
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शनिवार, 18 जून 2022

743. साढ़े-सात सदी

साढ़े-सात सदी 

*** 

बाबा जी ने चिन्तित होकर कहा   
शनि की दूसरी साढ़ेसाती चल रही है   
फलाँ ग्रह, इस घर से उस घर को देख रहा है   
फलाँ घर में राहु-केतु बैठा हुआ है   
फलाँ की महादशा
फलाँ की अन्तर्दशा चल रही है   
कोई भी विपत्ति कभी भी आ सकती है   
पर तुम चिन्ता न करो, हम सब ठीक कर देंगे   
कुछ पूजा पाठ करो, थोड़ा दान-दक्षिणा…। 
  
ओह बाबाजी! आप ठीक-ठीक नहीं देख रहे हैं   
मेरी साढ़ेसाती नहीं, साढ़े-सात सदी गुज़र रही है   
शनि महाराज को हम पसन्द हैं न   
सबके जीवन में साढ़े-सात, साढ़े-सात करके   
तीन बार ही रहते हैं   
पर मेरे साथ साढ़े-सात सदी से रह रहे हैं   
राहु-केतु पूरी दुनिया को छोड़   
सदियों से मेरे घर में ताका-झाँकी कर रहे हैं 
बाबाजी! ये लीजिए, मेरे लिए कुछ न कीजिए   
जाइए आज आप भी जश्न मनाइए। 
  
पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा   
साढ़े-छह सदी तक तो सब किए   
फिर भी यह जीवन   
अब इस अन्तिम सदी में सब छोड़ दिए हैं   
दूसरी ढइया हो या तीसरी   
अन्तिम साढ़ेसाती हो या अन्तिम सदी   
अब राहु-केतु हों या शनि महाराज   
देखते रहें तिरछी नज़रों से या वक्री नज़रों से   
हमको परवाह नहीं, देखें या न देखें   
देखना हो तो देखें या भाड़ में जाएँ   
साढ़े-छह तो बीत गया यों ही   
साढ़े-सात सदी अब बीतने को है।   

-जेन्नी शबनम (18.6.2022) 
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मंगलवार, 8 मार्च 2022

740. एक दिन मुक्ति के नाम

एक दिन मुक्ति के नाम 

*** 

कभी अधिकार के लिए शुरु हुई लड़ाई   
हमारी ज़ात को ज़रा-सा हक़ दे गई   
बस एक दिन, राहत की साँसें भर लूँ   
ख़ूब गर्व से इठलाऊँ, ख़ूब तनकर चलूँ   
मेरा दिन है, आज बस मेरा ही दिन है   
पर रात से पहले, घर लौट आऊँ।
   
बैनर, पोस्टर, हर जगह छा गई स्त्री    
लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ   
लड़की-लड़की, महिला-महिला    
बहन, बेटी, माँ, प्रेमिका अच्छी   
मानो आज देवी बन गई स्त्री    
रोज़ जो होती थी वह कोई और है   
आज है कोई नई स्त्री।
   
एक पूरा दिन करके स्त्री के नाम   
छीन ली गई सोचने की आज़ादी   
बारह मास की ग़ुलामी   
और बदले में बस एक दिन   
जिसमें समेटना है साल का हर दिन।
   
कभी जीती थी हर बाज़ी   
पर हार गई स्त्री    
सदियों से लड़ती रही   
पर हार गई स्त्री!
   
अब किसे लानत भेजी जाए?   
उन गिनी-चुनी स्त्रियों को   
जिनके सफ़र सुहाने थे   
जिनके ज़ख़्मों पर मलहम लगे   
इतिहास के कुछ पन्ने जिनके नाम सजे   
और बाक़ियों को उन 'कुछ' की एवज़ में   
यह कहकर मानसिक बन्दी बनाया गया-   
तुमने क्रान्ति की, देखो कितनी आज़ाद हो   
कभी किताबें तो पढ़कर देखो   
तुम केवल अक्षरों को याद हो   
लड़कों की तरह तुम्हारी परवरिश होती है   
देखो तुम्हारे हक़ में कितने कानून हैं   
तुम्हें विधान से इतनी ताक़त मिली   
जब चाहे हमें फँसा सकती हो   
तुम्हारे सामने हमारी क्या औक़ात   
हे देवी! हम पुरुषों पर दया करो! 
  
आज महिला दिवस है   
पूरी दुनिया की स्त्रियाँ जश्न मनाएँगी   
पर यह भी सच है आज के दिन   
कई स्त्रियों की जिस्म लुटेगा, बाज़ार में बिकेगा   
आग और तेज़ाब में जलेगा   
कइयों को माँ की कोख में मार दिया जाएगा   
बैनरों-पोस्टरों के साथ   
स्त्री की काग़ज़ी जीत पर नारा बुलन्द होगा   
छल-प्रपंच का तमाचा   
अन्ततः हमारे ही मुँह पर पड़ेगा।
   
कोई कुतिया कहकर   
बदन नोच-नोचकर खाएगा   
कोई डायन कहकर   
ज़मीन पर पटक-पटककर मार डालेगा   
रंडी बनाकर उसका सगा ही कमाई उड़ाएगा   
बेटी जनने वाली पापिन कहकर   
उसका आदमी ही उसे घर से निकालेगा   
या ब्याह दी जाएगी उसके साथ   
जो रोज़ जबरन भोगेगा   
या ज़ेवरों से लादकर आजीवन हुक़्म चलाएगा। 
  
आज के दिन मैं इतराऊँगी   
स्त्री होने पर फ़ख़्र करूँगी   
क़र्ज़ सही, ख़ैरात सही   
एक दिन जो मिला   
हम स्त्रियों को मुक्ति के नाम। 
  
क्यों आज अपनी हर साँसों के लिए   
किसी मर्द से फ़रियाद की जाए   
सौ बरस तक साँसें लें   
और बस एक दिन की ज़िन्दगी जी जाए।
   
मैं ख़ुद को धिक्कारती हूँ   
क्यों बस एक दिन की भीख माँगती हूँ   
क्यों नहीं होता हर दिन   
स्त्री-पुरुष का बराबर दिन!

-जेन्नी शबनम (8.3.2022)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
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सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

739. अलगनी

अलगनी 

*** 

हर रोज़ थक-हारकर टाँग देती हूँ ख़ुद को खूँटी पर   
जहाँ से मौन होकर देखती-सुनती हूँ, दुनिया का जिरह   
कभी-कभी जीवित महसूस करने के लिए   
ख़ुद को पसार आती हूँ, अँगना में अलगनी पर   
जहाँ से घाम मेरे मन में उतरकर 
हर ताप को सहने की ताक़त देता है   
और हवा देश-दुनिया की ख़बर सुनाती है। 
   
इस असंवेदी दुनिया का हर दिन 
ख़ून में डूबा होता है   
जाति-धर्म के नाम पर क़त्ल 
मन-बहलावा-सा होता है   
स्त्री-पुरुष के दो संविधान 
इस युग के विधान की देन है   
हर विधान में दोनों की तड़प   
अपनी-अपनी जगह जायज़ है। 
   
क्रूरता का कोई अन्त नहीं दिखता   
अमन का कोई रास्ता नहीं सूझता    
संवेदनाएँ सुस्ता रही हैं किसी गुफा में   
जिससे बाहर आने का द्वार बन्द है   
मधुर स्वर या तो संगीतकार के ज़िम्मे है   
या फिर कोयल की धरोहर बन चुकी है। 
   
भरोसा? ग़ैरों से भले मिल जाए   
पर अपनों से...ओह!
   
बहुत जटिलता, बहुत कुटिलता   
शरीर साबुत बच भी जाए    
पर अपनों के छल से मन छिलता रहता है   
दीमक की भाँति, पीड़ा तन-मन को 
अन्दर से खोखला करती रहती है। 
   
ज़िन्दगी पल-पल बेमानी हो रही है   
छल, फ़रेब, क्रूरता, मज़लूमों की पीड़ा   
दसों दिशाओं से चीख-पुकार गूँजती रहती है 
मन असहाय, सब कुछ असह्य लगता है   
कोई गुहार करे भी तो किससे करे? 
  
कुछ ख़ास हैं, कुछ शासक हैं
अधिकांश शोषित हैं   
किसी तरह बचे हुए कुछ आम लोग भी हैं   
जो मेरी ही तरह आहें भरते हुए 
खूँटी पर ख़ुद को रोज़ टाँग देते हैं   
कभी-कभी कोटर से निकल 
अलगनी पर पसरकर जीवन तलाशते हैं। 
   
बेहतर है, मैं खूँटी पर यों ही रोज़ लटकती रहूँ   
कभी-कभी जीवित महसूस करने के लिए   
धूप में अलगनी पर ख़ुद को टाँगती रहूँ   
और ज़माने के तमाशे देख 
ज्ञात को कोसती रहूँ।   

-जेन्नी शबनम (20.2.2022)
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सोमवार, 31 मई 2021

722. सिगरेट (5 कविता)

सिगरेट 

***

1. 
अदना-सी सिगरेट (नवधा-197)
*** 
क्यों कहते हो कि उसे छोड़ दूँ 
अदना-सी, वह क्या बिगाड़ती है तुम्हारा?
मैंने समय इसके साथ ही गुज़ारा 
इसने ख़ुद को जलाए, दिया मुझको सहारा। 
   
इसके साथ मेरा वक़्त बेफ़िक्र रहता है   
और जीवन बेपरवाह चलता है   
तनहाइयों में एक वही तो है, जो साथ रहती है   
मनोदशा को बेहतर समझती है   
और मिज़ाजपुर्सी करती है   
ख़ुद को जलाकर बादलों-सा सफ़ेद धुआँ बनकर   
उसमें मेरी मनचाही आकृतियाँ गढ़ती है।
   
हाँ! मालूम है मुझे   
उसके साथ मेरी साँसे घट रही हैं   
मेरे फेफड़ों पर कालिख जम रही है   
पर वह तलब है मेरी, ज़रूरत है मेरी   
रगों में वह जीवन-वायु बन घुल चुकी है   
सिगरेट मेरी बेचैनी समझती है   
मेरी राज़दार, मेरे अकेलेपन की साथी   
मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती है।
   
उसके बिना साँसें बचें भी तो क्या   
यों भी मौत तो एक दिन आनी है   
इसके साथ ही आए   
ज़िन्दगी और मौत इसके साथ ही सुहाती है   
दिल इसे छोड़कर किधर जाए।   

2. 
सिगरेट : इन्सान 
*** 
धीरे-धीरे फूँक-फूँककर   
सिगरेट को इन्सान राख बनाता है   
सिगरेट धीरे-धीरे अपनी गिरफ़्त में लेकर   
इन्सान को राख के ढेर तक पहुँचाती है   
अन्तिम सत्य- दोनों का राख में तब्दील होना   
तय वक़्त पर दोनों ख़ाक होते हैं   
एक दूसरे के ये अद्भुत यार   
एक दूजे को जलाकर ख़ाक में मिलते हैं   
जबतक जीते हैं दोनों यारी निभाते हैं।   

3. 
आख़िरी सिगरेट 
*** 
सिगरेट के राख बनने तक   
घड़ी की सूई बेलगाम भागती है   
शायद याद दिलाती है मुझे   
ज़ल्दी ही एक दिन राख बनना है   
सिगरेट थामे मेरी उँगलियाँ अक्सर काँप जाती है   
क्या पता इस उम्र की यह आख़िरी सिगरेट हो   
क्या पता यह अन्तिम कश हो   
या मेरी उम्मीद की अन्तिम साँसें   
जिसे सिगरेट के हवाले किया है।   

4. 
सिगरेट की यारी 
*** 
सब कहते- 
सिगरेट यार नहीं दुश्मन है   
जान लेकर कैसी यारी निभाती है?   
छोड़ दो न ऐसी यारी!   
पर जीने का सहारा कोई तो बताए   
सिगरेट से ज़्यादा कोई तो साथ निभाए   
एक वही तो है   
जो मेरे दर्द को समेटकर   
मेरे मन की आग से ख़ुद को जलाती है   
भले मेरा फेफड़ा जलता है   
पर मेरी ज़िन्दगी   
वाह! नशा ही नशा है   
इससे अच्छी कोई और है क्या?   

5. 
सिगरेट को श्रधांजलि 
***
चलो कहते हो तो छोड़ देते हैं   
उसे जीवन से दूर कर देते हैं   
पर वादा करो, सच्चा वाला वादा   
मेरे रिसते ज़ख़्मों पर मरहम लगाओगे   
मेरे हर दर्द पर तंज तो न कसोगे   
मेरी नाकामियों में साथ तो न छोड़ोगे?   
जब-जब हार मिले मेरा सम्बल बनोगे?   
हर हालात में मेरा साथ निभाओगे?   
नाराज़ हो जाऊँ, तब भी तुम प्यार करना न छोड़ोगे?   
हाँ! पक्का वादा, सच्चा वादा, प्यार का वादा!   
वाह! अब वादा कर लिया तुमने   
मालूम है, तुम कसमें निभाओगे   
अब मेरी बारी है वादा करने की   
सच्चा वाला, अच्छा वाला, प्यारा वाला वादा   
आज से सिगरेट को तिलांजलि   
आओ, दे दें उसे श्रद्धांजलि   
अब तुम में ही सिगरेट   
तुम्हें अर्पित पुष्पांजलि।   

-जेन्नी शबनम (31.5.2021)
(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर)
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शनिवार, 1 मई 2021

719. कोरोना (5 कविता)

कोरोना 

*** 

1. 
ओ कोरोना (कोरोना- नवधा-198) 
***
ओ कोरोना!   
है कैसा व्यापारी तू   
लाशों का करता व्यापार तू   
और कितना रुलाएगा   
कब तक यूंँ तड़पाएगा   
हिम्मत हार गया संसार   
नतमस्तक सारा संसार   
लाशों से ख़ज़ाना तूने भर लिया   
हर मौत का इल्ज़ाम तूने ले लिया   
पर यम भी अब घबरा रहा   
बार-बार समझा रहा   
तेरे ख़ज़ाने के लिए बचा न स्थान   
मरघट बन गया स्वर्ग का धाम   
ओ कोरोना!   
ढूँढ कोई दूजा संसार।   

2. 
ओ विषाणु 
***
ओ विषाणु!   
सुन, तुझे रक्त चाहिए   
आ, आकर मुझे ले चल!   
मैं रावण-सी बन जाती हूँ   
हर एक साँस मिटने पर   
ढेरों बदन बन उग जाऊँगी   
तू अपनी क्षुधा मिटाते रहना   
पर विनती है   
जीवन वापस दे उन्हें   
जिन्हें तू ले गया छीनकर   
मैं तैयार हूँ   
आ मुझे ले चल!   

3. 
ओ नरभक्षी 
***
ओ नरभक्षी!   
हर मन श्मशान बनता जा रहा है   
पर तू शान से भोग करता जा रहा है   
कैसे न काँपते हैं तेरे हाथ   
जब एक-एक साँस के लिए   
तुझसे मिन्नत करते हैं करोड़ों हाथ   
और तेरा खूनी पंजा   
लोगों को तड़पाकर   
नोचते-खसोटते हुए   
अपने मुँह का ग्रास बनाता है   
अब बहुत भोग लगाया तूने   
जा, सदा के लिए अब जा   
अन्तरिक्ष में विलीन हो जा!   

4. 
ओ रक्त पिपासु 
***
ओ रक्त पिपासु!   
तेरे खूनी पंजे ने   
हर मन, हर घर पर   
चिपकाए हैं इश्तेहार-   
''तुझे जो भाएगा, तू ले जाएगा   
दीप, शंख, हवन, गो कोरोना गो से   
तू नहीं डरता   
सब तरफ़ लाल रक्त बहाएगा''   
रोते, चीखते, काँपते, छटपटाते लोग   
तुझे बहुत भाते हैं   
पर अब तो रहम कर   
जब कोई न होगा   
तू किसका भोग लगाएगा।   

5. 
ओ पिशाच 
***
ओ पिशाच!   
अब दया कर   
चला जा तू अपने घर   
हम सब हार गए   
तेरी शक्ति मान गए   
ज़ख़्म दिए तूने गहरे सबको   
भला कौन बचा, तू खोजे जिसको   
घर-घर में मातम पसरा   
कौन ताके किसका असरा   
जा, तू चला जा   
अब कभी न आना   
बची-खुची, आधी-अधूरी दुनिया से   
हम काम चला लेंगे   
जिनको खोया उनकी यादों में   
जीवन बिता लेंगे।   

-जेन्नी शबनम (30.4.2021) 
____________________

सोमवार, 8 मार्च 2021

711. अब नहीं हारेगी औरत

अब नहीं हारेगी औरत

******* 

जीवन के हर जंग में हारती है औरत   
ख़ुद से लड़ती-भिड़ती हारती है औरत   
सुख समेटते-समेटते हारती है औरत   
दुःख छुपाते-छुपाते हारती है औरत   
भावनाओं के जाल में उलझी हारती है औरत   
मन पर पैबंद लगाते-लगाते हारती है औरत   
टूटे रिश्तों को जोड़ने में हारती है औरत   
परायों से नहीं अपनों से हारती है औरत   
पति-पत्नी के रिश्तों में हारती है औरत   
पिता-पुत्र के अहं से हारती है औरत   
बेटा-बेटी के द्वन्द्व से हारती है औरत   
बहु-दामाद के छद्म से हारती है औरत   
दुनियादारी के संघर्ष से हारती है औरत   
दुनिया की भीड़ में गुम हारती है औरत   
अपनी चुप्पी से ही सदा हारती है औरत   
तोहमतों के बाज़ार से हारती है औरत   
ख़ुद सपनों को तोड़के हारती है औरत   
ख़ुद को साबुत रखने में हारती है औरत   
जीवन भर हँस-हँसकर हारती है औरत   
जाने क्यों मरकर भी हारती है औरत   
जीवन के हर युद्ध में हारती है औरत।   
अब हर हार को जीत में बदलेगी औरत   
किसी भी युद्ध में अब नहीं हारेगी औरत।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2021)
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मंगलवार, 3 नवंबर 2020

693. कपट

कपट 

***

हाँ कपट ही तो है   
सत्य से भागना, सत्य न कहना, पलायन करना   
पर यह भी सच है, सत्य की राह में   
बखेड़ों के मेले हैं, झमेलों के रेले हैं   
कोई कैसे कहे सारे सत्य, जो दफ़्न हो सीने में   
उम्र की थकान के, मन के अरमान के   
सदियों-सदियों से, युगों-युगों से। 
  
यों तो मिलते हैं कई मुसाफ़िर   
दो पल ठहरकर राज़ पूछते हैं 
दमभर को अपना कहते, फिर चले जाते हैं 
उम्मीद तोड़ जाते हैं, राह पर छोड़ जाते हैं। 
   
काश! कोई तो थम जाता, छोड़कर न जाता   
मन की यायावरी को एक ठौर दे जाता। 
   
ये कपट, ये भटकाव मन को नहीं भाते हैं   
पर इनसे बच भी कहाँ पाते हैं   
यों हँसी में हर राज़ दफ़्न हो जाते हैं   
फिर कहना क्या और पूछना क्या, सब बेमानी है   
ऐसे ही बीत जाता है, सम्पूर्ण जीवन   
किसी की आस में, ठहराव की उम्मीद में। 
   
हम सब इसी राह के मुसाफ़िर, मत पूछो सत्य   
गर कोई जान न सके, बिन कहे पहचान न सके 
यह उसकी कमी है  
सत्य तो प्रगट है, कहा नहीं जाता, समझा जाता है   
फिर भी लोग इसरार करते हैं। 
   
सत्य को शब्द न दें, हँसकर टाल दें, तो कपटी कहते हैं   
ठीक ही कहते हैं वे, हम कपटी हैं, कपटी!   

-जेन्नी शबनम (3.11.2020)
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शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

692. दड़बा

दड़बा 

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ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ, अपने-अपने दड़बे में   
अपने-अपने परों को सँभालो   
एक दूसरे को अपनी-अपनी चोंच से लहूलुहान करो। 
  
कटना तो तुम सबको है, एक-न-एक दिन   
अपनों द्वारा या ग़ैरों द्वारा   
सीख लो लड़ना 
ख़ुद को बचाना 
दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध। 
  
दड़बे के बाहर की दुनिया 
क़ातिलों से भरी है   
जिनके पास शब्द के भाले हैं 
बोली की कटारें हैं   
जिनके देह और जिह्वा को 
तुम्हारे मांस और लहू की प्यास है   
पलक झपकते ही झपट ली जाओगी   
चीख भी न पाओगी।
   
दड़बे के भीतर, कितना भी लिख लो तुम   
बहादुरी की गाथाएँ, हौसलों की कथाएँ   
पर बाहर की दुनिया, जहाँ पग-पग पर भेड़िए हैं    
जो मानव-रूप धरकर, तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहे हैं   
भेड़िए के सामने मेमना नहीं, ख़ुद भेड़िया बनना है   
टक्कर सामने से देना है, बराबरी पर देना है। 
  
ऐ लड़कियो!   
जीवन की रीत, जीवन का संगीत, जीवन का मन्त्र   
सब सीख लो तुम   
न जाने कब किस घड़ी 
समय तुमसे क्या माँगे।   

-जेन्नी शबनम (24.10.2020)
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

691. देहाती

देहाती 

*** 

फ़िक्रमन्द हूँ उन सभी के लिए   
जिन्होंने सूरज को हथेली में नहीं थामा   
चाँद के माथे को नहीं चूमा   
वर्षा में भीग-भीगकर न नाचा, न खेला   
माटी को मुट्ठी में भरकर, बदन पर नहीं लपेटा।
   
दुःख होता है उनके लिए   
जिन्हें नहीं पता कि मुँडेर क्या होती है   
मूँज से चटाई कैसे बनती है   
अँगना लीपने के बाद कैसा दिखता है   
ढेंकी और जाँता की आवाज़ कैसी होती है।
   
उन्होंने कभी देखा नहीं, गाय-बैल का रँभाना   
बाछी का पगहा तोड़ माँ के पास भागना   
भोरे-भोरे खेत में रोपनी, खलिहान में धान की ओसौनी   
आँधियों में आम की गाछी में टिकोला बटोरना   
दरी बिछाकर ककहरा पढ़ना, मास्टर साहब से छड़ी खाना। 
  
कितने अनजान हैं वे, कितना कुछ खोया है उन्होंने  
यों वे सभी अति-सुशिक्षित हैं 
चाँद और मंगल की बातें करते हैं   
एक उँगली के स्पर्श से दुनिया का ज्ञान बटोर लेते हैं। 
  
पर हाँ! सच ही कहते हैं वे, हम देहाती हैं    
भात को चावल नहीं कहते, रोटी को चपाती नहीं कहते   
तरकारी को सब्ज़ी नहीं कहते, पावरोटी को ब्रेड नहीं कहते   
हम गाँव-जवार की बात करते हैं 
वे अमेरिका-इंग्लैंड की बात करते हैं। 
  
नहीं! नहीं! कोई बराबरी नहीं, हम देहाती ही भले   
पर उन सबों के लिए निराशा होती है 
जो अपनी माटी को नहीं जानते   
अपनी संस्कृति और समाज को नहीं पहचानते   
तुमने बस पढ़कर सुना है सब   
हमने जीकर जाना है सब। 

-जेन्नी शबनम (20.10.2020)
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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

683. परी

परी

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दुश्वारियों से जी घबराए   
जाने क़यामत कब आ जाए   
मेरे सारे राज़, तुम छुपा लो जग से   
मेरा उजड़ा मन, बसा लो मन में।   
पूछे कोई कि तेरे मन में है कौन   
कहना कि एक थी परी, ग़ुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई   
किसी से न कहना, उस परी की कहानी   
जो एक रोज़ मिली तुमको, डरती हुई   
खोकर आज़ादी तड़पती हुई।   
लहू से लथपथ, जीवन से विरक्त   
किसी ने छला था, बड़ा उसका मन   
पंख थे दोनों उसके कतरे हुए   
आँखें थीं बंद, पर आँसू लुढ़कते रहे   
होठों पे चुप्पी और सिसकी थमती नहीं   
उफ़! बदहवास, बड़ी थी बदहाल   
उसके मन में थे ढेरों मलाल   
कह गई मुझसे वो अपना हाल   
जीवन बीता था बनकर सवाल   
ले लिया वादा कि लेना न नाम।   
परी थी वो, मगर थी ग़ुलाम   
अपनों ने छीने थे सारे अरमान   
साँसों पर बंदिश, सपनों पर पहरे   
ऐसे में भला, कोई कैसे जीए?   
ज़ख़्मी तन और घायल मन   
फ़ना हो गई, हर राज़ कहकर   
रह गई मेरे मन में कहानी बनकर   
सच उसका, मुझे कहना नहीं   
वो दे गई, ये कैसी मज़बूरी।   
हाँ! सच है, वो परी न थी   
न किसी के सपनों की रानी   
वह थी थकी-हारी, टूटी एक नारी   
जो सदा रही सबके लिए बेमानी   
नहीं है कोई अब उसकी निशानी।   
ओह! उसने कहा था राज़ न खोलना   
उसकी इज़्ज़त अपने तक रखना,   
ना-ना वो थी परी,ग़ुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई।   

- जेन्नी शबनम (3. 9. 2020)
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रविवार, 30 अगस्त 2020

682. ज़िन्दगी के सफ़हे (क्षणिका)

ज़िन्दगी के सफ़हे 

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ज़िन्दगी के सफ़हे पर चिंगारी धर दी किसी ने   
जो सुलग रही है धीरे-धीरे   
मौसम प्रतिकूल है, आँधियाँ विनाश का रूप ले चुकी हैं   
सूरज झुलस रहा है, हवा और पानी का दम घुट रहा है   
सन्नाटों से भरे इस दश्त में 
क्या ज़िन्दगी के सफ़हे सफ़ेद रह पाएँगे?   
झुलस तो गए हैं, बस राख बनने की देर है।   

- जेन्नी शबनम (30. 8. 2020) 
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बुधवार, 8 जुलाई 2020

677. इतनी-सी फ़िक्र

इतनी-सी फ़िक्र

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दो चार फ़िक्र हैं जीवन के   
गर मिले कोई राह, चले जाओ   
बेफ़िक्री लौटा लाओ। 
   
कह तो दिया कि दूर जाओ   
निदान के लिए सपने न देखो   
राह पर बढ़ो, बढ़ते चले जाओ   
वहाँ तक जहाँ पृथ्वी का अन्त है   
वहाँ तक जहाँ कोई दुष्ट या संत है   
बस इन्सान नहीं है 
प्यार से कोई पहचान नहीं है   
या वहाँ जहाँ क्षितिज पर आकाश से मिलती है धरा   
या वहाँ जहाँ गुम हो जाए पहचान, न हो कोई अपना। 
   
मत सोचो देस-परदेस   
भूल जाओ सब तीज-त्योहार   
बिसरा दो सब प्यार-दुलार   
लौट न पाओ कभी   
मिल न पाओ अपनों से कभी   
यह पीर मन में बसाकर रखना   
पर हिम्मत कभी न हारना   
यायावर-सा न भटकना    
दिग्भ्रमित न होना तुम   
अकारण और नहीं रोना तुम   
एक ठोस ठौर ढूँढकर   
सपनों में हमको सजा लेना   
मन में लेकर अपनों की यादें   
पूरी करना बुनियादी ज़रूरतें। 
   
आस तो रहेगी तुम्हें   
अपने उपवन की झलक पाने की   
कुटुम्बों संग जीवन बिताने की   
वंशबेल को देखने की   
प्रियतमा के संग-साथ की   
मिलन की किसी रात की   
पर समय की दरकार है   
तक़दीर की यही पुकार है। 
   
कोई उम्मीद नहीं, कोई आस नहीं   
किसी पल पर कोई विश्वास नहीं   
रहा-सहा सब पिछले जन्म का भाग्य है   
इस जन्म का इतना ही इन्तिज़ाम है   
बाक़ी सब अगले जन्म का ख़्वाब है। 
   
निपट जाए जीवन-भँवर, बस इतना ही हिसाब है   
चार दिन का जीवन, दो जून की रोटी   
बदन पर दो टुक चीर, फूस का अक्षत छप्पर   
बस इतनी-सी दरकार है   
बस इतनी-सी तो बात है।   

-जेन्नी शबनम (7.7.2020) 
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मंगलवार, 2 जून 2020

669. रंग

रंग  

*** 

बेरंग जीवन बेनूर न हो   
क़र्ज़ में माँग लाई मौसम से ढेरों रंग   
लाल, पीले, हरे, नीले, नारंगी, बैगनी, जामुनी   
छोटी-छोटी पोटली में बड़े सलीक़े से लेकर आई   
और ख़ुद पर उड़ेलकर ओढ़ लिया मैंने इंद्रधनुषी रंग। 
   
अब चाहती हूँ   
रंगों का क़र्ज़ चुकाने, मैं मौसम बन जाऊँ   
मैं रंगों की खेती करूँ और ख़ूब सारे रंग मुफ़्त में बाँटूँ   
उन सभी को जिनके जीवन में मेरी तरह रंग नहीं हैं    
जिन्होंने न रोटी का रंग देखा, न प्रेम का   
न ज़मीन का, न आसमान का।
   
चाहती हूँ   
अपने-अपने शाख से बिछुड़े 
पेट की आग का रंग ढूँढते-ढूँढते   
बेरंग सपनों में जीनेवाले   
अब रंगों से होली खेलें, रंगों से ही दीवाली भी   
रंगों के सपने हों, रंगों की ही हक़ीकत हो। 
  
रंग रंग रंग!   
क़र्ज़! क़र्ज़! क़र्ज़!   
ओह मौसम! नहीं चुकाऊँगी उधारी   
कितना भी तगादा करो, चाहे न निभाओ यारी। 
   
तुम्हारी उधारी तब तक   
जब तक मैं मौसम न बन जाऊँ।   

-जेन्नी शबनम (2.6.2020) 
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गुरुवार, 7 नवंबर 2019

637. महज़ नाम (क्षणिका)

महज़ नाम 

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सोचती थी, किसी के आँचल में हर वेदना मिट जाती है   
पर भाव बदल जाते हैं, तो संवेदना मिट जाती है   
न किसी प्यार का, न अधिकार का नाम है   
माँ संबंध नहीं, महज़ पुकार का एक नाम है   
तासीर खो चुका है, बेकार का नाम है।     

- जेन्नी शबनम (7. 11. 2019)   
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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

634. दंगा

दंगा  

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किसी ने कहा ये हिन्दू मरा   
कोई कहे ये मुसलमान था   
अपने-अपने दड़बे में क़ैद    
बँटा सारा हिन्दुस्तान था   

थरथराते जिस्मों के टुकड़े 
मगर जिह्वा पे रहीम-ओ-राम था   
कोई लाल लहू, कोई हरा लहू   
रँगा सारा हिन्दुस्तान था   

घूँघट और बुर्क़ा उघड़ा   
कटा जिस्म कहाँ बेजान था   
नौनिहालों के शव पर   
रोया सारा हिन्दुस्तान था    

दसों दिशाओं में चीख-पुकार   
ख़ौफ़ से काँपा आसमान था   
दहशत और अमानवीयता से   
डरा सारा हिन्दुस्तान था   

मन्दिर बने कि मस्जिद गिरे   
अवाम का नहीं, सत्ता का ये खेल था   
मन्दिर-मस्जिद के झगड़े में   
मरा सारा हिन्दुस्तान था   

-जेन्नी शबनम (24.10.2019)   
(भागलपुर दंगा के 30 साल होने पर)
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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

627. तमाशा

तमाशा 

***  

सच को झूठ, झूठ को सच कहती है दुनिया   
इसी सच-झूठ के दरमियान रहती है दुनिया   
ख़ून के नाते हों या क़िस्मत के नाते   
फ़रेब के बाज़ार में सब ख़रीददार ठहरे। 
   
सहूलियत की पराकाष्ठा है   
अपनों से अपनों का छल   
मन के नातों का क़त्ल   
कोखजनों की बदनीयती   
सरेबाज़ार शर्मसार है करती। 
   
दुनिया को सिर्फ़ नफ़रत आती है   
दुनिया कब प्यार करती है   
धन-बल के लोभ में इन्सानियत मर गई है   
धन के बाज़ार में सबकी बोली लग गई है। 
   
यक़ीन और प्रेम गौरैया-सी फुर्र हुई   
तमाम जंगल झुलस गए   
कहाँ नीड़ बसाए परिन्दा   
कहाँ तलाशे प्रेम की बगिया। 
   
झूठ-फ़रेब के चीनी माँझे में उलझकर    
लहूलुहान हो गई है ज़िन्दगी   
ऐसा लगता है, खो गई है ज़िन्दगी   
देखो मिट रही है ज़िन्दगी   
मौत की बाहों में सिमट रही है ज़िन्दगी। 
   
आओ-आओ तमाशा देखो  
रिश्तों-नातों का तमाशा देखो   
पैसों के खेल का तमाशा देखो   
बिन पैसों का तमाशा देखो।   

- जेन्नी शबनम (19.9.2019)   
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