92 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
92 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

580. प्रकृति (प्रकृति पर 12 सेदोका)

प्रकृति
   

***  

1.   
अपनी व्यथा   
गुमसुम प्रकृति   
किससे वो कहती   
बेपरवाह   
कौन समझे दर्द   
सब स्वयं में व्यस्त।   

2.   
पर्वत, वन    
सूर्य, नदी, पवन   
सब हुए बेहाल   
लड़खड़ाती   
साँसें सबकी डरी   
प्रकृति है लाचार।   

3.   
कौन है दोषी?   
काट दिए हैं वन   
उगा कंक्रीट-वन   
मानव दोषी,   
मगर है कहता-   
प्रकृति अपराधी।   

4.   
दोषारोपण   
जग की यही रीत   
कोई न जाने प्रीत   
प्रकृति तन्हा   
किस-किस से लड़े   
कैसे वो ज़ख़्म सिले।   

5.   
नदियाँ प्यासी   
दुनिया ने है छीनी    
उसका मीठा पानी,   
करो विचार   
प्रकृति है लाचार   
कैसे बुझाए प्यास।   

6.   
बाँझ निगोड़ी   
कुम्हलाई धरती   
नि:संतान मरती   
सूखा व बाढ़   
प्रकृति का प्रकोप   
ओह! धरा बेचारी।   

7.   
सब रोएँगे   
साँसें जब घुटेंगी   
प्रकृति भी रोएगी,   
वक़्त है अभी   
प्रकृति को बचा लो   
दुनिया को बसा लो।   

8.   
विषैले नाग   
ये कल-कारखाना   
ज़हर उगलते   
साँसें उखड़ी   
ज़हर पी-पीकर   
प्रकृति है मरती।   

9.   
लहूलुहान   
खेत व खलिहान   
माँगता बलिदान   
रक्त पिपासु   
ख़ुद मानव बना   
धरा का ख़ून पिया।   

10.   
प्यासी नदियाँ   
प्यासी तड़पे धरा   
प्यासी है प्रकृति भी  
छाई उदासी,   
अभिमानी मानव   
विध्वंस को आतुर।

11.
दानी सूरज 
सदाव्रत बाँटता 
फिर भी न घटता 
उसका तेज 
जगमग करता 
जगत को जगाता। 

12.
प्रकृति रोती 
नोचता-खसोटता 
बदन उघारता 
मानव लोभी,
प्रकृति का है दोषी 
मानव असंवेदी। 
   

-जेन्नी शबनम (23.5.2018)
___________________

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

555. कैसी आज़ादी पाई (स्वतंत्रता दिवस पर 4 हाइकु) पुस्तक - 91, 92

कैसी आज़ादी पाई  

*******  

1.  
मन है क़ैदी,  
कैसी आज़ादी पाई?  
नहीं है भायी   

2.  
मन ग़ुलाम  
सर्वत्र कोहराम,  
देश आज़ाद   

3.  
मरता बच्चा  
मज़दूर, किसान,  
कैसी आज़ादी?  

4.  
हूक उठती,  
अपने ही देश में  
हम ग़ुलाम   

- जेन्नी शबनम (15. 8. 2017)  
___________________