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शनिवार, 8 मार्च 2025

789. एक सवाल

एक सवाल 

***

भार्या होने का दण्ड 
बार-बार भोगती रही
अपमान का घूँट पीती रही
और तुम सभी नज़रें झुकाए 
कायर बने बैठे तमाशा देखते रहे
तुम सभी के पुरुष होने पर
तुम सभी के योद्धा होने पर 
ऐसे वचन पर
ऐसे धर्म पर 
लानत है 
एक सवाल है मेरा  
मेरी जगह तुम्हारी पुत्री होती तो?
क्या फिर भी उसे दाँव पर लगा देते?
क्या उसे भी पाँच पुरुषों में बाँट देते?
भरी सभा में निर्वस्त्र होने देते?
मेरी हँसी नाजाएज़ सही
पर क्या ये जाएज़ है?
पाँच पतियों के होते हुए मैं असहाय रही   
रक्षा करने धर्म-भाई आया 
क्या तुम में से कोई वचन तोड़ नहीं सकता था?
पति का धर्म निभा नहीं सकता था?
पत्नी की रक्षा न कर सकने वाले तुम पाँचों पुरुष  
तुम सभी पर लानत है। 

-जेन्नी शबनम (8.3.25)
(महिला दिवस)
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शुक्रवार, 8 मार्च 2024

772. स्त्री जानती है

स्त्री जानती है 

***

उलझनें मिलती हैं, पर कम उलझती है 
स्त्री ये जानती है, स्त्री सब समझती है 
कब कहाँ कितना बोलना है
कब कहाँ कितना छुपाना है
क्या दिल में दफ़्न करना है 
क्या दुनिया को कहना है 
बेबाक़ बातें स्त्री नहीं कर सकती
मन की हर बात नहीं कह सकती
लग जाएँगे बेहयाई के इल्ज़ाम 
हो जाएगी अपने ही घर में बदनाम
जान चली जाए पर मन खोल सकती नहीं  
झूठ कहती नहीं, सच अक्सर बोल सकती नहीं  
उम्र बीत जाए पर मनचाहा नहीं कर सकती
फूल उगा सकती है, पर तितलियाँ नहीं पकड़ सकती 
अपने मन की बातें अपने मन तक
अपने दुख अपने एहसास अपने तक
रिश्ते समेटते-समेटते ख़ुद बिखरती है
कोई नहीं समझता स्त्री कितना टूटती है, मरती है 
हज़ारों शोक, मगर स्त्री के आँसू नापसन्द हैं
हँसती-खिलखिलाती स्त्री सबकी पसन्द है
जन्म से मिली इस विरासत को ढोना है
स्त्री को इन्सान नहीं केवल स्त्री होना है 
और स्त्री की स्त्री होने की यह अकथ्य पीड़ा है।

-जेन्नी शबनम (8.3.2024)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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मंगलवार, 8 मार्च 2022

740. एक दिन मुक्ति के नाम

एक दिन मुक्ति के नाम 

*** 

कभी अधिकार के लिए शुरु हुई लड़ाई   
हमारी ज़ात को ज़रा-सा हक़ दे गई   
बस एक दिन, राहत की साँसें भर लूँ   
ख़ूब गर्व से इठलाऊँ, ख़ूब तनकर चलूँ   
मेरा दिन है, आज बस मेरा ही दिन है   
पर रात से पहले, घर लौट आऊँ।
   
बैनर, पोस्टर, हर जगह छा गई स्त्री    
लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ   
लड़की-लड़की, महिला-महिला    
बहन, बेटी, माँ, प्रेमिका अच्छी   
मानो आज देवी बन गई स्त्री    
रोज़ जो होती थी वह कोई और है   
आज है कोई नई स्त्री।
   
एक पूरा दिन करके स्त्री के नाम   
छीन ली गई सोचने की आज़ादी   
बारह मास की ग़ुलामी   
और बदले में बस एक दिन   
जिसमें समेटना है साल का हर दिन।
   
कभी जीती थी हर बाज़ी   
पर हार गई स्त्री    
सदियों से लड़ती रही   
पर हार गई स्त्री!
   
अब किसे लानत भेजी जाए?   
उन गिनी-चुनी स्त्रियों को   
जिनके सफ़र सुहाने थे   
जिनके ज़ख़्मों पर मलहम लगे   
इतिहास के कुछ पन्ने जिनके नाम सजे   
और बाक़ियों को उन 'कुछ' की एवज़ में   
यह कहकर मानसिक बन्दी बनाया गया-   
तुमने क्रान्ति की, देखो कितनी आज़ाद हो   
कभी किताबें तो पढ़कर देखो   
तुम केवल अक्षरों को याद हो   
लड़कों की तरह तुम्हारी परवरिश होती है   
देखो तुम्हारे हक़ में कितने कानून हैं   
तुम्हें विधान से इतनी ताक़त मिली   
जब चाहे हमें फँसा सकती हो   
तुम्हारे सामने हमारी क्या औक़ात   
हे देवी! हम पुरुषों पर दया करो! 
  
आज महिला दिवस है   
पूरी दुनिया की स्त्रियाँ जश्न मनाएँगी   
पर यह भी सच है आज के दिन   
कई स्त्रियों की जिस्म लुटेगा, बाज़ार में बिकेगा   
आग और तेज़ाब में जलेगा   
कइयों को माँ की कोख में मार दिया जाएगा   
बैनरों-पोस्टरों के साथ   
स्त्री की काग़ज़ी जीत पर नारा बुलन्द होगा   
छल-प्रपंच का तमाचा   
अन्ततः हमारे ही मुँह पर पड़ेगा।
   
कोई कुतिया कहकर   
बदन नोच-नोचकर खाएगा   
कोई डायन कहकर   
ज़मीन पर पटक-पटककर मार डालेगा   
रंडी बनाकर उसका सगा ही कमाई उड़ाएगा   
बेटी जनने वाली पापिन कहकर   
उसका आदमी ही उसे घर से निकालेगा   
या ब्याह दी जाएगी उसके साथ   
जो रोज़ जबरन भोगेगा   
या ज़ेवरों से लादकर आजीवन हुक़्म चलाएगा। 
  
आज के दिन मैं इतराऊँगी   
स्त्री होने पर फ़ख़्र करूँगी   
क़र्ज़ सही, ख़ैरात सही   
एक दिन जो मिला   
हम स्त्रियों को मुक्ति के नाम। 
  
क्यों आज अपनी हर साँसों के लिए   
किसी मर्द से फ़रियाद की जाए   
सौ बरस तक साँसें लें   
और बस एक दिन की ज़िन्दगी जी जाए।
   
मैं ख़ुद को धिक्कारती हूँ   
क्यों बस एक दिन की भीख माँगती हूँ   
क्यों नहीं होता हर दिन   
स्त्री-पुरुष का बराबर दिन!

-जेन्नी शबनम (8.3.2022)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
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गुरुवार, 18 मार्च 2021

713. अनाथ

अनाथ 

*** 

काश! हवा या धुआँ बनकर   
आसमान में जाती   
चाँद की चाँदनी में उन तारों को ढूँढती   
जो बचपन में मेरे पापा बन गए   
और अब माँ भी उन्हीं का हिस्सा है।
   
न जाने वहाँ पापा कैसे होंगे   
इतने साल अकेले कैसे रहे होंगे?   
नहीं! नहीं! वे वहाँ किताबें पढ़ते होंगे   
वहाँ से देखते होंगे कि उनके सिद्धान्तों को   
हमने कितना जाना, कितना अपनाया   
वे बहुत बूढ़े हो गए होंगे   
उम्र तो तारों की भी बढ़ती होगी   
क्या मुझे याद करते होंगे?
   
वे तो मुझे पहचानेंगे भी नहीं   
जब वे गए मैं छोटी बच्ची थी   
जब पहचानेंगे 
तो क्या अब भी गोद में बिठाकर दुलार करेंगे?   
बचपन की तरह अब भी रूठने पर मनाएँगे?   
उसी तरह प्यार करेंगे?
   
पर माँ तो पहचानती है   
अभी-अभी तो गई है   
ये विदाई तो अभी बहुत नई है   
मुझे देखते ही बड़े लाड़ से गले लगाएगी   
रोएगी, मुझे ढाढस देगी   
मेरे अनाथ हो जाने पर   
ख़ुद की क़िस्मत पर नाराज़ होगी   
रुँधी हुई उसकी आवाज़ होगी   
वह बताएगी कि कैसे अन्तिम साँस लेते समय   
चारों तरफ़ मुझे ढूँढ रही थी   
एक अन्तिम बार देखने को तड़प रही थी।  
 
कितनी बेबस रही होगी   
कितना कुछ कहना चाहती होगी   
मेरे अकेलेपन के ग़म में रोई होगी   
कितनी आवाज़ दी होगी मुझे   
पर साँसे घुट रही होंगी   
आवाज़ हलक में अटक रही होगी   
वह रो रही होगी, छटपटा रही होगी   
मेरी बहुत याद आ रही होगी   
यम से मिन्नत करती होगी कि ज़रा-सा वक़्त दे-दे   
बेटी से एक बार तो मिल लेने दे। 
  
वक़्त तो सदा का असंवेदनशील   
न पापा के समय मेरे लिए रुका   
न मम्मी के लिए   
अपनी मनमानी कर गया   
मम्मी चली गई   
बिना कुछ कहे चली गई   
तारों में गुम हो गई। 
  
अब कोई नहीं जो मेरा मन समझेगा   
अब कोई नहीं जो मेरा ग़म बाँटेगा   
मेरे हर दर्द पर मुझसे ज़्यादा तड़पेगा   
मेरी फ़िक्र में हर समय बेहाल रहेगा   
न पापा थे, न मम्मी है   
दोनों अलविदा कह गए   
जिनको जाते वक़्त मैंने न सुना, न देखा। 
  
काश! तुम दोनों तारों के झुरमुट में मिल जाओ   
एक बार गले लगा जाओ   
पापा के बिना जीने का हौसला तुमने दिया था   
अब तुम्हारे बिना जीने का हौसला कौन देगा माँ? 
  
दुआ करो मैं हवा या धुआँ बन जाऊँ   
एक बार तुमसे मिल आऊँ   
अपनी फ़रियाद किसे सुनाऊँ   
क्या करूँ कि हवा या धुआँ बन जाऊँ   
एक बार तुमसे मिल आऊँ   
बस एक बार।   
मेरी मम्मी 
-जेन्नी शबनम (18.3.2021) 
(मम्मी की स्मृति/अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) 
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सोमवार, 8 मार्च 2021

711. अब नहीं हारेगी औरत

अब नहीं हारेगी औरत

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जीवन के हर जंग में हारती है औरत   
ख़ुद से लड़ती-भिड़ती हारती है औरत   
सुख समेटते-समेटते हारती है औरत   
दुःख छुपाते-छुपाते हारती है औरत   
भावनाओं के जाल में उलझी हारती है औरत   
मन पर पैबंद लगाते-लगाते हारती है औरत   
टूटे रिश्तों को जोड़ने में हारती है औरत   
परायों से नहीं अपनों से हारती है औरत   
पति-पत्नी के रिश्तों में हारती है औरत   
पिता-पुत्र के अहं से हारती है औरत   
बेटा-बेटी के द्वन्द्व से हारती है औरत   
बहु-दामाद के छद्म से हारती है औरत   
दुनियादारी के संघर्ष से हारती है औरत   
दुनिया की भीड़ में गुम हारती है औरत   
अपनी चुप्पी से ही सदा हारती है औरत   
तोहमतों के बाज़ार से हारती है औरत   
ख़ुद सपनों को तोड़के हारती है औरत   
ख़ुद को साबुत रखने में हारती है औरत   
जीवन भर हँस-हँसकर हारती है औरत   
जाने क्यों मरकर भी हारती है औरत   
जीवन के हर युद्ध में हारती है औरत।   
अब हर हार को जीत में बदलेगी औरत   
किसी भी युद्ध में अब नहीं हारेगी औरत।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2021)
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रविवार, 8 मार्च 2020

648. पूरक

पूरक 

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ओ साथी! 
अपना वजूद तलाशो, दूसरों का नष्ट न करो   
एक ही तराजू से, हम सभी को न तौलो   
जीवन जो नेमत है, हम सभी के लिए है   
इससे असहमत न होओ।   
मुमकिन है, युगों की प्रताड़ना से आहत तुम   
प्रतिशोध चाहती हो   
पर यह प्रतिकार   
एक नई त्रासदी को जन्म देगा   
सामाजिक संरचनाएँ डगमगा जाएँगी   
और यह संसार के लिए मुनासिब नहीं।   
तुम्हारे तर्क उचित नहीं   
तुम पूरी जाति से बदला कैसे ले सकती हो?   
जिसने पीड़ा दी उसे दंड दो   
न कि सम्पूर्ण जाति को   
जीवन और जीवन की प्रक्रिया, हमारे हाथ नहीं   
तुम समझो इस बात को।   
हाँ यह सच है, परम्पराओं से पार जाना   
बेहद कठिन था हमारे लिए   
हम गुनहगार हैं, तुम सभी के दुःख के लिए   
पर युग बदल रहा है   
समय ने पहचान दी है तुम्हें   
पर तुम अपना आत्मविश्वास खो रही हो   
बदला लेने पर आतुर हो   
पर किससे?   
कभी सोचा है तुमने   
हम तुम्हारे ही अपने हैं   
तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं   
हमारी रगों में तुम्हारा ही रक्त बहता है   
जीवन तुम्हारे बिना नहीं चलता है।   
तुम समझो, दूसरों के अपराध के कारण   
हम सभी अपराधी नहीं हैं   
हम भी दुखी होतें हैं   
जब कोई मानव से दानव बन जाता है   
हम भी असहाय महसूस करते हैं   
उन जैसे पापियों से   
जो तुम्हें दोजख में धकेलता है।   
हाँ हम जानते हैं   
घोषित कानून तुम्हारे साथ है   
पर अघोषित सज़ा हम सब भुगतते हैं   
महज़ इस कारण कि हम पुरूष हैं।  
तुम्हें भी इसे बदलना होगा   
हमें भी यह समझना होगा   
कुछ हैवानों के कारण हम सभी परेशान हैं   
कुछ हममें भी राक्षस है, कुछ तुममें भी राक्षसी है   
हमें परखना होगा, हम सब को चेतना होगा   
हमें एक दूसरे का साथ देना होगा।   
हमें चलना है, हमें साथ जीना है   
हम पूरक हैं   
ओ साथी!   
आओ, हम क़दम से क़दम मिला कर चलें।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2020)  
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

607. पानी और स्त्री

पानी और स्त्री 

*******   

बचपन में पढ़ा-   
पानी होता है रंगहीन गंधहीन   
जिसे जहाँ रखा उस साँचे में ढला    
ख़ूब गर्म किया भाप बन उड़ गया   
ख़ूब ठंडा किया बर्फ़ बन जम गया   
पानी के साथ उगता है जीवन   
पनपती हैं सभ्यताएँ   
पानी गर हुआ लुप्त   
संसार भी हो जाएगा विलुप्त।   
फिर भी पानी के साथ होता है खिलवाड़   
नहीं होता उसका सम्मान   
नहीं करते उसका बचाव   
न ही करते उसका संरक्षण   
न ही करते उसका प्रबंधन   
जबकि जानते हैं पानी नहीं तो दुनिया नहीं।   
बचपन में जो था पढ़ा   
अब जीवन ने है समझा   
स्त्रियाँ पानी हैं   
वक़्त ने जहाँ चाहा उस साँचे में ढाल दिया   
कभी आरोपों से जम गई   
तो व्याकुलता से लिपटकर भाप-सी पिघल गई   
स्त्रियों ने किया सर्जन   
नवजीवन का किया पोषण   
फिर भी मानी गई सब पर बोझ   
सभी चाहते नहीं मिले उसको कोख   
पानी-सी न सुरक्षित की गई   
पानी-सी न संरक्षित हुई  
पानी बिन होता अकाल   
स्त्री बिन मिट जाएगा संसार।   
पानी-सी स्त्री है   
स्त्री-सा पानी है   
सीरत अलग मगर   
स्त्री और पानी जीवन है।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2019)   
(महिला दिवस)
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गुरुवार, 8 मार्च 2018

568. पायदान (क्षणिका)

पायदान  

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सीढ़ी की पहली पायदान हूँ मैं  
जिसपर चढ़कर समय ने छलाँग मारी  
और चढ़ गया आसमान पर  
मैं ठिठककर तब से खड़ी  
काल-चक्र को बदलते देख रही हूँ,  
न जिरह न कोई बात कहना चाहती हूँ  
न हक़ की, न ईमान की, न तब की, न अब की।  
शायद यही प्रारब्ध है मेरा  
मैं, सीढ़ी की पहली पायदान।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2018)  
(महिला दिवस)
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मंगलवार, 8 मार्च 2016

506. तू भी न कमाल करती है

तू भी न कमाल करती है  

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ज़िन्दगी तू भी न कमाल करती है!  
जहाँ-तहाँ भटकती फिरती  
ग़ैरों को नींद के सपने बाँटती  
पर मेरी फ़िक्र ज़रा भी नहीं  
सारी रात जागती-जागती  
तेरी बाट जोहती रहती हूँ  

तू कहती-  
फ़िक्र क्यों करती हो  
ज़िन्दगी हूँ तो जश्न मनाऊँगी ही  
मैं तेरी तरह बदन नहीं  
जिसका सारा वक़्त   
अपनों की तीमारदारी में बीतता है  
तूझे सपने देखने और पालने की मोहलत नहीं  
चाहत भले हो मगर साहस नहीं  
तू बस यूँ ही बेमक़सद बेमतलब जिए जा  
मैं तो जश्न मनाऊँगी ही  

मैं ज़िन्दगी हूँ  
अपने मनमाफ़िक जीती हूँ  
जहाँ प्यार मिले वहाँ उड़के चली जाती हूँ  
तू और तेरा दर्द मुझे बेचैन करता है  
तूझे कोई सपने जो दूँ  
तू उससे भी डर जाती है   
''ये सपने कोई साज़िश तो नहीं''  
इसलिए तुझसे दूर बहुत दूर रहती हूँ  
कभी-कभी जो घर याद आए  
तेरे पास चली आती हूँ  

ज़िन्दगी हूँ  
मिट तो जाऊँगी ही एक दिन  
उससे पहले पूरी दुनिया में उड़-उड़कर  
सपने बाँटती हूँ  
बदले में कोई मोल नहीं लेती  
सपनों को जिलाए रखने का वचन लेती हूँ  
सुकून है मैं अकारथ नहीं हूँ  

उन्मुक्त उड़ना ही ज़िन्दगी है  
मैं भी उड़ना चाहती हूँ बेफ़िक्र अपनी ज़िन्दगी की तरह 
हर रात तमाम रात सर पर सपनों की पोटली लिए  
मन चाहता है आसमान से एक बार में पूरी पोटली  
खेतों में उड़ेल दूँ  
सपनों के फल  
सपनों के फूल  
सपनों का घर  
सपनों का संसार  
खेतों में उग जाए  
और... मैं...!  

चल तन और सपन मिल जाए  
चल ज़िन्दगी तेरे साथ हम जी आएँ  
बहुत हुई उनकी बेगारी जिनको मेरी परवाह नहीं  
बस अब तेरी सुनूँगी गीत ज़िन्दगी के गाऊँगी  

तू दुनिया सुन्दर बनाती है  
सपनों को उसमें सजाती है  
जीने का हौसला बढ़ाती है  
ज़िन्दगी तू भी न कमाल करती है!  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2016)  
(महिला दिवस)
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रविवार, 8 मार्च 2015

490. क्या हुक्म है मेरे आका

क्या हुक्म है मेरे आका

*******

अकसर सोचती हूँ 
किस ग्रह से मैं आई हूँ 
जिसका ठिकाना 
न कोख में, न घर में, न गाँव में, न शहर में  
मुमकिन है, उस ख़ुदा के घर में भी नहीं, 
अन्यथा क्रूरता के इस जंगल में 
बार-बार मुझे भेजा न गया होता 
चाहे जन्मूँ चाहे क़त्ल होऊँ 
चाहे जियूँ चाहे मरूँ 
चाहे तमाम दर्द के साथ हँसूँ, 
पग-पग पर एक कटार है 
परम्परा का, नातों का, नियति का 
जो कभी कोख में झटके से घुसता है 
कभी बदन में ज़बरन ठेला जाता है 
कभी कच्ची उम्र के मन को हल्के-हल्के चीरता है 
जरा-ज़रा सीने में घुसता है 
घाव हर वक़्त ताज़ा 
तन से मन तक रिसता रहता है,  
जाने ये कौन सा वक़्त है 
कभी बढ़ता नहीं 
दिन महीना साल सदी, कुछ बदलता नहीं 
हर रोज़ उगना-डूबना 
शायद सूरज ने अपना शाप मुझे दे दिया है, 
मेरी पीर 
तन से ज़्यादा, मन की पीर है 
मैं बुझना चाहती हूँ, मैं मिटना चाहती हूँ 
बेघरबार हूँ 
चाहे उस स्वर्ग में जाऊँ, चाहे इस नरक में टिकूँ, 
बहुत हुआ 
अब उस ग्रह पर लौटना चाहती हूँ 
जहाँ से इस जंगल में शिकार होने के लिए 
मुझे निहत्था भेजा गया है, 
जाकर शीघ्र लौटूँगी अपने ग्रह से 
अपने हथियार के साथ 
फिर करूँगी 
उन जंगली जानवरों पर वार
जिन्होंने अपने शौक के लिए मुझे अधमरा कर दिया है
मेरी साँसों को बंधक बना कर रखा है
बोतल के जिन की तरह, जो कहे-
''क्या हुक्म है मेरे आका!''

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2015)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
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शनिवार, 8 मार्च 2014

445. किसे लानत भेजूँ

किसे लानत भेजूँ

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किस एहसास को जीऊँ आज?
ख़ुद को बधाई दूँ 
या लानत भेजूँ उन सबको 
जो औरत होने पर गुमान करती हैं  
और सबसे छुपकर हर रोज़ 
पलायन के नए-नए तरीक़े सोचती हैं 
जिससे हो सके जीवन का सुनिश्चित अन्त  
जो आज ख़ुद के लिए तोहफ़े खरीदती हैं 
और बड़े नाज़ से 
आज काम न करने का हक़ जताती हैं। 
  
कभी अधिकार के लिए हुए जंग में     
औरतों को मिला एक दिन हक़ में    
दुनिया की हुकूमतों ने  
एक दिन हम औरतों के नाम कर  
मुट्ठी में कर ली हमारी आज़ादी
हम औरतें हार गईं
हमारी क़ौम हार गई 
एक दिन के नाम पर 
हमारी साँसें छीन ली गईं। 

किसे लानत भेजूँ?
मैं ख़ुद को लानत भेजती हूँ 
क्यों लगाती हूँ गुहार 
एक दिन हम औरतों के लिए 
जबकि जानती हूँ 
आज भी कितनी स्त्रियों का जिस्म 
लूटेगा, पिटेगा, जलेगा, कटेगा  
गुप्तांगों को चीरकर 
कोई हैवान रक्त-पान करेगा
चीख निकले तो ज़ुबान काट दी जाएगी 
और बदन के टुकड़े 
कचरे के ढेर पर मिलेगा।  

धोखे से बच्चियों को कोठे पर बेचा जाएगा 
जहाँ उसका जिस्म ही नहीं मन भी हारेगा 
वह अबोध समझ भी न पाएगी
यह क्या हो रहा है 
क्यों उसकी क़िस्मत में दर्द ही दर्द लिखा है?

बस एक दिन का जश्न 
फिर एक साल का प्रश्न 
जिसका नहीं है कोई जवाब 
न हमारे पास 
न हुक्मरानों के पास।  

सब जानते हुए भी हम औरतें 
हम औरतें जश्न मनाती हैं  
बस एक दिन ही सही 
हम ग़ुलाम औरतों के नाम।  

- जेन्नी शबनम (मार्च 8, 2014)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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मंगलवार, 8 मार्च 2011

217. आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं

आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं

***

तुम कहते हो-

‘’अपनी क़ैद से आज़ाद हो जाओ।’’

बँधे हाथ मेरे, सींखचे कैसे तोडूँ ?

जानती हूँ, उनके साथ मुझमें भी ज़ंग लग रहा है

अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद

एक हाथ भी आज़ाद नहीं करा पाती हूँ।


कहते ही रहते हो तुम

अपनी हाथों से काट क्यों नहीं देते मेरी जंज़ीर?

शायद डरते हो

बेड़ियों ने मेरे हाथ मज़बूत न कर दिए हों

या फिर कहीं तुम्हारी अधीनता अस्वीकार न कर दूँ

या कहीं ऐसा न हो

मैं बचाव में अपने हाथ तुम्हारे ख़िलाफ़ उठा लूँ।


मेरे साथी! डरो नहीं तुम

मैं महज़ आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं

किस-किस से लूँगी बदला

सभी तो मेरे ही अंश हैं

मेरे द्वारा सृजित मेरे अपने अंग हैं

तुम बस मेरा एक हाथ खोल दो

दूसरा मैं ख़ुद छुड़ा लूँगी

अपनी बेड़ियों का बदला नहीं चाहती

मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद जीना चाहती हूँ।


तुम मेरा एक हाथ भी छुड़ा नहीं सकते

तो फिर आज़ादी की बातें क्यों करते हो?

कोई आश्वासन न दो, न सहानुभूति दिखाओ

आज़ादी की बात दोहराकर

प्रगतिशील होने का ढोंग करते हो

अपनी खोखली बातों के साथ 

मुझसे सिर्फ़ छल करते हो

इस भ्रम में न रहो कि मैं तुम्हें नहीं जानती हूँ

तुम्हारा मुखौटा मैं भी पहचानती हूँ।


मैं इन्तिज़ार करूँगी उस हाथ का 

जो मेरा एक हाथ आज़ाद करा दे

इन्तिज़ार करूँगी उस मन का 

जो मुझे मेरी विवशता बताए बिना साथ चले

इन्तिज़ार करूँगी उस वक़्त का

जब जंज़ीर कमज़ोर पड़े और मैं अकेली उसे तोड़ दूँ।


जानती हूँ, कई युग और लगेंगे

थकी हूँ, पर हारी नहीं

तुम जैसों के आगे विनती करने से अच्छा है

मैं वक़्त या उस हाथ का इन्तिज़ार करूँ।


-जेन्नी शबनम  (8. 3. 2011)
(अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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रविवार, 6 मार्च 2011

216. क्यों होती है आहत

क्यों होती है आहत

*******

लपलपाती ज़बाँ ने
जाने क्या कहा
थर्रा उठी वो बीच सड़क
गुज़र गए कई लोग
बगल से मुस्कुराकर
यूँ जैसे देख लिया हो
किसी नव यौवना का नंगा बदन
और फुरफुरी-सी
दौड़ गई हो बदन में

झुक गए सिर
ख़ामोशी से उसके
फिर आसमान में ताका उसने
सुना है कि वो आसमान में रहता है
क्यों नहीं दिखता उसे?
ऐसी रोज़ की शर्मिंदगी से
क्यों नहीं बचाता उसे?
करती तो है रोज़ सज्दा
क्यों नहीं सुनता उसे?

आँखों में पाशविकता
ज़बाँ में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2007)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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सोमवार, 8 मार्च 2010

126. नाइंसाफी क्यों / naainsaafi kyon

नाइंसाफी क्यों

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ख़ुदा से रूबरू पूछा मैंने -
मर्द और औरत का ईजाद किया तुमने
ख़ुद पत्थर में बसते हो
क्या पत्थर की कठोरता नहीं जानते?
फिर ऐसी नाइंसाफी क्यों?

मर्द को आदमी बनाया
और पाषाण का दिल भी लगा दिया,
औरत को बस औरत बनाया
साथ ही दिल में जज़्बात भी भर दिया,
मर्द के दिल में
ज़रा-सा तो जज़्बात भर दिया होता!
औरत के दिल में
ज़रा-सा तो पत्थर लगा दिया होता!

मर्द बन गया पाषाण-हृदयी
भला दर्द कैसे हो?
औरत हो गई जज़्बाती
भला दर्द कैसे न हो?
आख़िर ऐसी नाइंसाफी क्यों?

ख़ुदा भी चौंक गया
अपनी नाइंसाफी को मान गया,
फिर ग़ैरवाज़िब तर्क कुछ सोचा वो
ठहरा आख़िर तो मर्द जात वो,
औरत से कमतर कैसे हो
ख़ुदा है, बेजवाब कैसे हो?

उसने कहा -
ग़र बराबरी जो होती
मर्द और औरत की पहचान कैसे होती?
फ़ासले की वज़ह कहाँ से मिलती ?
सब इंसान होते तो दुनिया कैसे चलती?
दुःख दर्द का एहसास कैसे होता?
विपरीत के आकर्षण का भान कैसे होता?

हे मूर्ख नारी, सुनो!
इसलिए कुछ औरत और कुछ आदमी बनाया
तभी तो चलायमान है ये सारी दुनिया!

मैंने भी आज जान लिया
ख़ुदा का तर्क मान लिया,
अपनी बेवकूफ़ी के सवालों से नाता तोड़ लिया
आज इस नाइंसाफी का राज़ जान लिया

अब समझ आया कि ये नाइंसाफी क्यों
मेरे सभी सवाल नादान जज़्बाती क्यों,
क्योंकि ये जवाब ख़ुदा ने नहीं दिया था
ख़ुदारुपी पाषण-हृदयी मर्द जात ने दिया था
इसीलिए मर्द पत्थर-दिल आदमी है
और औरत कमज़ोर-दिल इंसान है

- जेन्नी शबनम (मार्च 8, 2010)

(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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naainsaafi kyon...

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khuda se rubaru puchha maine -
mard aur aurat ka ijaad kiya tumne
khud patthar mein baste ho
kya patthar ki kathorta nahin jante?
fir aisi naainsaafi kyon?

mard ko aadmi banaya
aur paashaan ka dil bhi laga diya,
aurat ko bas aurat banaya
sath hi dil mein jazbaat bhi bhar diya,
mard ke dil mein
zara-sa to jazbaat bhar diya hota!
aurat ke dil mein
zara-sa to patthar laga diya hota!

mard ban gaya paashaan-hridayee
bhala dard kaise ho?
aurat ho gayee jazbaati
bhala dard kaise na ho?
aakhir aisi naainsaafi kyon?

khuda bhi chaunk gaya
apni naainsaafi ko maan gaya,
fir gairwaazib tark kuchh socha wo
thahra aakhir to mard jaat wo,
aurat se kamtar kaise ho
khuda hai bejawaab kaise ho?

usne kaha -
gar baraabari jo hoti
mard aur aurat ki pahchaan kaise hoti?
faasle ki wazah kahan se milti?
sab insaan hote to duniya kaise chalti?
dukh dard ka ehsaas kaise hota?
wipreet ka aakarshan ka bhaan kaise hota?

hey murkh naari, suno!
isliye kuchh aurat aur kuchh aadmi banaaya
tabhi to chalaayemaan hai ye saari duniya!

maine bhi aaj jaan liya
khuda ka tark maan liya,
apni bewakufi ke sawaalon se naata tod liya
aaj is naainsaafi ka raaz jaan liya.

ab samajh aaya ki ye nainsaafi kyon
mere sabhi sawaal naadaan jazbaati kyon,
kyonki ye jawaab khuda ne nahin diya tha
khudaroopi paashan-hridayee mard jaat ne diya tha.
isiliye mard patthar-dil aadmi hai
aur aurat kamjor-dil insaan hai.

- Jenny Shabnam (8. 3. 2010)
(antarrashtriy mahila divas par)
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रविवार, 8 मार्च 2009

36. एक गीत तुम गाओ न

एक गीत तुम गाओ न

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एक गीत तुम गाओ न!
एक ऐसा गीत गाओ कि -
मेरे पाँव उठ चल पड़े, घायल पड़े हैं कब से
हाथों में ताक़त आ जाए, छीन लिए गए हैं बल से
पंख फिर उग जाए, कतर दिए गए हैं छल से
सपनों को ज़मीं मिल जाए, उजाड़े गए हैं सदियों से
आत्मा जी जाए, मारी गई हैं युगों से। 

तुम गाओगे न ऐसा गीत?
एक ऐसा गीत ज़रूर गाना!

मैं रहूँ न रहूँ
पर तुम्हारे गीत से जब भी कोई जी उठे -
मैं उसके मन में जन्मूँगी
तुम्हारे गीत गुनगुनाऊँगी
स्वछंद आकाश में उडूँगी
प्रेम का जहान बसाऊँगी
युगों से बेजान थी, सदियों तक जीऊँगी। 

तुम गाओगे न ऐसा एक गीत?
मेरे लिए गा दो न एक गीत! 

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2009)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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