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शुक्रवार, 18 जून 2021

727. एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

*** 

उम्र के सारे वसन्त वार दिए   
रेगिस्तान में फूल खिला दिए   
जद्दोजहद चलती रही एक अदद घर की   
रिश्तों को सँवारने की   
हर डग पर चाँदनी बिखराने की   
हर कण में सूरज उगाने की। 
   
अन्ततः मकान तो घर बना   
परन्तु किसी कोने पर मेरा कोई रंग न चढ़ा   
कोई भी कोना महफ़ूज़ न रहा   
न मेरे मन का, न घर का   
कोई कोना नहीं जहाँ सुकून बरसे   
सूरज, चाँद, सितारे आकर बैठें   
हमसे बतकहियाँ करते हुए जीवन को निहारें। 
   
धीरे-धीरे हर रिश्ता दरकता गया   
घर मकान में बदलता रहा   
सब बिखरा और पतझर आकर टिक गया 
अब यहाँ न फूल है, न पक्षियों के कलरव   
न हवा नाचती है, न गुनगुनाती है   
कभी भटकते हुए आ जाए   
तो सिर्फ़ मर्सिया गाती है। 
   
अब न सपना कोई, न अपना कोई   
मन में पसरा अकथ्य गाथा का वादा कोई   
धीरे-धीरे वीरानियों से बहनापा बढ़ा   
जीवन पार से बुलावा आया   
पर न जाने क्यों   
न इस पार, न उस पार   
कहीं कोई कोना शेष न रहा। 
   
जाने की आतुरता को किसी ने बढ़कर रोक लिया   
और मेरा गुलमोहर भी गुम हो गया   
जो हौसला देता था 
विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का   
साहस और हौसला को ख़ाली मन में भरने का। 
   
अब न रिश्ते, न घर, न गुलमोहर   
न इस पार, न उस पार कोई ठौर   
जीवन के इस पतझर में   
एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है।   

-जेन्नी शबनम (18.6.2021)
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मंगलवार, 18 मई 2021

720. अब डर नहीं लगता

अब डर नहीं लगता 

******* 

अब डर नहीं लगता!   
न हारने को कुछ शेष   
न किसी जीत की चाह   
फिर किस बात से डरना?   
सब याद है   
किस-किस ने प्यार किया   
किस-किस ने दुत्कारा   
किस-किस ने छला   
किस-किस ने तोड़ा   
किस-किस को पुकारा   
किस-किस ने मुँह फेरा   
सब के सब   
अब कहानी-से हैं   
अतीत के सभी छाले   
दर्द नहीं देते   
अब सुकून देते हैं   
भीड़ में गुम होने की ख़ुशी देते हैं   
मुक्त होने का एहसास देते हैं   
बेफ़िक्र जीने का सन्देश देते हैं   
फिर किस बात से डरना?   
न खोने को कुछ शेष   
न कुछ पाने की चाह   
अब डर नहीं लगता!   

- जेन्नी शबनम (18. 5. 2021) 
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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

683. परी

परी

******* 

दुश्वारियों से जी घबराए   
जाने क़यामत कब आ जाए   
मेरे सारे राज़, तुम छुपा लो जग से   
मेरा उजड़ा मन, बसा लो मन में।   
पूछे कोई कि तेरे मन में है कौन   
कहना कि एक थी परी, ग़ुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई   
किसी से न कहना, उस परी की कहानी   
जो एक रोज़ मिली तुमको, डरती हुई   
खोकर आज़ादी तड़पती हुई।   
लहू से लथपथ, जीवन से विरक्त   
किसी ने छला था, बड़ा उसका मन   
पंख थे दोनों उसके कतरे हुए   
आँखें थीं बंद, पर आँसू लुढ़कते रहे   
होठों पे चुप्पी और सिसकी थमती नहीं   
उफ़! बदहवास, बड़ी थी बदहाल   
उसके मन में थे ढेरों मलाल   
कह गई मुझसे वो अपना हाल   
जीवन बीता था बनकर सवाल   
ले लिया वादा कि लेना न नाम।   
परी थी वो, मगर थी ग़ुलाम   
अपनों ने छीने थे सारे अरमान   
साँसों पर बंदिश, सपनों पर पहरे   
ऐसे में भला, कोई कैसे जीए?   
ज़ख़्मी तन और घायल मन   
फ़ना हो गई, हर राज़ कहकर   
रह गई मेरे मन में कहानी बनकर   
सच उसका, मुझे कहना नहीं   
वो दे गई, ये कैसी मज़बूरी।   
हाँ! सच है, वो परी न थी   
न किसी के सपनों की रानी   
वह थी थकी-हारी, टूटी एक नारी   
जो सदा रही सबके लिए बेमानी   
नहीं है कोई अब उसकी निशानी।   
ओह! उसने कहा था राज़ न खोलना   
उसकी इज़्ज़त अपने तक रखना,   
ना-ना वो थी परी,ग़ुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई।   

- जेन्नी शबनम (3. 9. 2020)
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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

681. घात (10 क्षणिका)

घात

******* 

1. 
घात 
******* 
सपने और साँसें दोनों नज़रबंद हैं   
न जाने कौन घात लगाए बैठा हो   
ज़रा-सी चूक और सब ख़त्म।   

2.
कील 
******* 
मन के नाज़ुक तहों में   
कभी एक कील चुभी थी   
जो बाहर न निकल सकी   
वह बारहा टीस देती है   
जब-जब दूसरी नई कील   
उसे और अंदर बेध देती है।     

3. 
काँटे 
******* 
तमाम उम्र ज़िन्दगी से काँटे छाँटती रही   
ताकि ज़िन्दगी बस फूल ही फूल हो   
बिना चुभे एक भी काँटा अलग न हुआ   
हर बार चुभता, ज़ख्म देता, रूलाता   
धीरे-धीरे फूलों का खिलना बंद हुआ   
रह गए बस काँटे ही काँटे   
अब इसे छाँटना क्या।     

4. 
जल गए 
******* 
वक़्त की टहनी पर रिश्तों के फूल खिले   
कुछ टिके, कुछ झरे, कुछ रुके, कुछ बढे   
जो टिके, वे सँभल न सके   
जो झरे, वे झुलस गए   
ज़िन्दगी आग का दरिया है   
वक़्त के साथ सब जल गए   
वक़्त के साथ सब ढल गए।      

5. 
साथ 
******* 
हम समझते थे   
वक़्त पर साथ मेरे सब खड़े होंगे   
ताल्लुकात के रंग   
वक़्त ने बहुत पहले ही दिखा दिए।     

6. 
हिसाब 
******* 
तमाम उम्र हिसाब लगाते रहे   
क्या पाया क्या न पाया   
फ़ेहरिस्त तो बनी बड़ी लम्बी   
मगर सिर्फ़ कुछ न पाने की।     

7. 
गुज़र गया 
******* 
सूखे पत्तों-सा सूखा मन   
बिखरा पड़ा, मानो पतझड़   
आस की ऊँगली थामे   
गुज़र गया, तमाम जीवन।     

8. 
परिहास 
******* 
संबंधों की पृष्ठभूमि पर   
भाव लिखूँ, अभाव लिखूँ, प्रभाव लिखूँ   
या तहस-नहस होते नातों पर   
परिहास लिखूँ।     

9. 
माँग 
******* 
हर लम्हा वक़्त ने है छीना   
सारी उम्र पे कब्ज़ा है   
अब कुछ भी तो शेष नहीं   
वक़्त अभी भी माँग रहा   
मैं मानूँगी आदेश नहीं   
अब कुछ भी तो शेष नहीं।     

10. 
रूह 
******* 
एक रूह की तलाश में कितने ही पड़ाव मिले   
पर कहीं ठौर न मिला कहीं ठहराव न मिला   
मन का सफ़र ख़त्म नही होता   
रूहों का नगर जाने कहाँ होता है?   
रूहें शायद सिर्फ़ आसमान में बसती हैं।     

- जेन्नी शबनम (20. 8. 2020) 
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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

680. विदा (क्षणिका)

विदा 

******* 

उम्र के बेहिसाब लम्हे, जाने कैसे ख़र्च हो गए    
बदले में मिले ज़िन्दगी के छल   
एकांत के अनेक कठोर पल   
जब न सुनने वाला कोई, न समझाने वाला कोई   
न पास आने वाला, न दूर जाने वाला कोई   
न संगी, न साथी, न रिश्ते, न रिश्तेदारी   
अपनी नीरवता में ख़ुद के साथ   
सिमटे हुए दोनों खुले हाथ   
और यूँ धीरे-धीरे विदा हो रही ज़िन्दगी।   

- जेन्नी शबनम (12. 8. 2020) 
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बुधवार, 6 नवंबर 2019

636. रेगिस्तान (क्षणिका)

रेगिस्तान 

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आँखें अब रेगिस्तान बन गई हैं 
यहाँ न सपने उगते हैं न बारिश होती है 
धूल-भरी आँधियों से 
रेत पे गढ़े वे सारे हर्फ़ मिट गए हैं 
जिन्हें सदियों पहले किसी ऋषि ने लिख दिया था- 
कभी कोई दुष्यंत सब विस्मृत कर दे तो 
शकुंतला यहाँ आकर अतीत याद दिलाए 
पर अब कोई स्रोत शेष नहीं 
जो जीवन को वापस बुलाए 
कौन किसे अब क्या याद दिलाए।  

- जेन्नी शबनम (6. 11. 2019)
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सोमवार, 1 जुलाई 2019

617. सरमाया (क्षणिका)

सरमाया   

*******   

ये कैसा दौर आया है, पहर-पहर भरमाया है   
कुछ माँगूँ तो ईमान मरे, न माँगूँ तो ख़्वाब मरे   
क़िस्मत से धक्का-मुक्की, पोर-पोर घबराया है   
जद्दोज़हद में युग बीते, यही मेरा सरमाया है।   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2019)   
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सोमवार, 17 जून 2019

616. कड़ी

कड़ी   

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अतीत की एक कड़ी   
मैं ख़ुद हूँ   
मन के कोने में, सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने पिता को जीवित रखा है   
जब-जब हारती हूँ   
जब-जब अपमानित होती हूँ   
अँधेरे में सुबकते हुए, पापा से जा लिपटती हूँ   
 ख़ूब रोती हूँ, ख़ूब ग़ुस्सा करती हूँ   
जानती हूँ पापा कहीं नहीं   
थककर ख़ुद ही चुप हो जाती हूँ   
यह भूलती नहीं, कि रोना मेरे लिए गुनाह है   
चेहरे पे मुस्कान, आँखों पर चश्मा   
सब छुप जाता है ज़माने से   
पर हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा   
सिमटती जा रही हूँ, मिटती जा रही हूँ   
जीने की आरज़ू, जीने का हौसला   
सब शेष हो चुका है   
न रिश्ते साथ देते हैं, न रिश्ते साथ चलते हैं   
दर्द की ओढ़नी, गले में लिपटती है   
पिता की बाँहें, कभी रोकने नहीं आतीं   
नितांत अकेली मैं   
अपनों द्वारा कतरे हुए परों को, सहलाती हूँ   
कभी-कभी चुपचाप   
फेविकोल से परों को चिपकाती हूँ   
जानती हूँ, यह खेल है, झूठी आशा है   
पर मन बहलाती हूँ   
हार अच्छी नहीं लगती मुझे   
इसलिए ज़ोर से ठहाके लगाती हूँ   
जीत का झूठा सच सबको बताती हूँ   
बस अपने पापा को सब सच बताती हूँ   
ज़ोर से ठहाके लगाती हूँ   
मन बहलाती हूँ।   

- जेन्नी शबनम (17. 6. 2019)   
(पितृ-दिवस पर) 
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शनिवार, 1 जून 2019

614. नज़रबंद

नज़रबंद   

*******   

ज़िन्दगी मुझसे भागती रही   
मैं दौड़ती रही, पीछा करती रही   
एक दिन आख़िर वो पकड़ में आई   
ख़ुद ही जैसे मेरे घर में आई   
भागने का सबब पूछा मैंने   
झूठ बोल बहला दिया मुझे,   
मैं अपनी खामी ढूँढती रही   
आख़िर ऐसी क्या कमी थी   
जो ज़िन्दगी मुझसे कह गई   
मेरी सोच, मेरी उम्र या फिर जीने का शऊर   
हाँ! भले मैं बेशऊरी   
पर वक़्त से जो सीखा वैसे ही तो जिया मैंने   
फिर अब?   
आजीज आ गई ज़िन्दगी   
एक दिन मुझे प्रेम से दुलारा, मेरे मन भर मुझे पुचकारा   
हाथों में हाथ लिए मेरे, चल पड़ी झील किनारे   
चाँद तारों की बात, फूल और ख़ुशबू थी साथ   
भूला दिया मैंने उसका छल   
आँखें मूँद काँधे पे उसके रख दिया सिर   
मैं ज़िन्दगी के साथ थी   
नहीं-नहीं मैं अपने साथ थी   
फिर हौले से उसने मुझे झिंझोड़ा   
मैंने आँख मूँदे मुस्कुरा कर पूछा-   
बोलो ज़िन्दगी, अब तो सच बताओ   
क्यों भागती रही तुम तमाम उम्र   
मैं तुम्हारा पीछा करती रही ताउम्र   
जब भी तुम पकड़ में आई   
तुमने स्वप्नबाग दिखा मुझसे पीछा छुड़ाया,   
फिर ज़िन्दगी ने मेरी आँखों में देखा   
कहा कि मैं झील की सुन्दरता देखूँ   
अपना रूप उसमें निहारूँ,   
मैं पागल फिर से छली गई   
आँखें खोल झील में ख़ुद को निहारा   
मेरी ज़िन्दगी ने मुझे धकेल दिया   
सदा के लिए उस गहरी झील में   
बहुत प्रेम से बड़े धोखे से,   
अब मैं झील में नज़रबंद हूँ   
ज़िन्दगी की बेवफाई से रंज हूँ   
अब न ज़िन्दगी का कारोबार होगा   
न ज़िन्दगी से मुलाक़ात होगी   
अब कौन सुनेगा मुझको कभी   
न किसी से बात होगी।    

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2019)   
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रविवार, 24 मार्च 2019

610. परम्परा

परम्परा   

*******   
  
मैं उदासी नहीं चाहती थी   
मैं तो खिलखिलाना चाहती थी   
आज़ाद पंक्षियों-सा उड़ना चाहती थी   
हर रोज़ नई धुन गुनगुनाना चाहती थी   
और यह सब अनकहा भी न था   
हर अरमान चादर-सा बिछा दिया था तुम्हारे सामने   
तुमने सहमति भी जताई थी कि तुम साथ दोगे   
लेकिन जाने यह क्योंकर हुआ   
पर मैं वक़्त को दोष न दूँगी   
वक़्त ने तो बहुत साथ दिया   
पर तुम बिसुर गए सब   
एक-एककर मेरे सपनों को   
होलिका के साथ तुमने जला दिया   
मुझसे कहा कि यह परम्परा है   
मैं उदास हुई पर इंकार न किया   
तुम्हारा कहा सिर माथे पर।   

- जेन्नी शबनम (9.3.2019)   
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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

604. काला जादू (पुस्तक-96)

काला जादू   

*******   

जब भी, दिल खोलकर हँसती हूँ   
जब भी, दिल खोलकर जीती हूँ   
जब भी, मोहब्बत के आग़ोश में साँसें भरती हूँ   
जब भी, संसार की सुन्दरता को, दामन में समेटती हूँ   
न जाने कब, मैं ख़ुद को नज़र लगा देती हूँ   
मुझे मेरी ही नज़र लग जाती है   
हँसना, जीना, अचानक गुम हो जाता है   
मुहब्बत के आसमान से, ज़मीन पर, पटक दी जाती हूँ   
जिन फूलों को थामे थी, उनमें काँटें उग जाते हैं   
और मेरी ऊँगलियाँ ही नहीं   
तक़दीर की लकीरें भी, लहूलुहान हो जाती हैं   
दौड़ती हूँ, भागती हूँ, छटपटाती हूँ   
चौकन्ना होकर, चारों तरफ़ निहारती हूँ   
मैंने किसी का, कुछ भी तो न छीना, न बिगाड़ा   
फिर मेरे जीवन में, रेगिस्तान कहाँ से पनप जाता है   
कैसे आँखों में, आँसू की जगह, रक्त-धार बहने लगती है   
कौन पलट देता है, मेरी क़िस्मत    
कौन है, जो काला जादू करता है   
कोई तो इतना अपना नहीं, किसी से कोई रंजिश भी नहीं   
फिर यह सब कैसे?   
हाँ! शायद मुझे मेरी ही नज़र लग जाती है   
मैंने ही ख़ुद पर काला जादू किया है   
अल्लाह! कोई इल्म बता   
कोई कारामात कर दे   
मिटने से पहले चाहती हूँ   
हँसना, जीना, मुहब्बत   
बस एक बार   
बस एक बार।     

- जेन्नी शबनम (2. 2. 2019)
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बुधवार, 9 जनवरी 2019

600. अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ)

अंतर्मन 

*******   

1. 
अंतर्मन 
***   
मेरे अंतर्मन में पड़ी हैं   
ढेरों अनकही कविताएँ   
तुम मिलो कभी   
तो फ़ुर्सत में सुनाऊँ तुम्हें। 
-०-  

2.
सवाल 
***  
हज़ारों सवाल हैं मेरे अंतर्मन में   
जिनके जवाब तुम्हारे पास हैं   
तुम आओ गर कभी   
फ़ुर्सत में जवाब बताना।
-०-   

3.
प्रश्न 
*** 
मेरा अंतर्मन   
मुझसे प्रश्न करता है-   
आख़िर कैसे कोई भूल जाता है   
सदियों का नाता पलभर में,   
उसके लिए जो कभी अपना नहीं था   
न कभी होगा।
-०-   

4.
मियाद 
***   
हमारे फ़ासले की मियाद   
जाने किसने तय की है   
मैंने तो नहीं की,   
क्या तुमने? 
-०-  

5.
तय 
***   
क्षण-क्षण कण-कण   
तुम्हें ढूँढ़ती रही   
जानती हूँ मैं अहल्या नहीं कि   
तुमसे मिलना तय हो।
-०-   

6.
वापसी 
*** 
कुछ तो हुआ ऐसा    
जो दरक गया मन   
गर वापसी भी हो तुम्हारी   
टूटा ही रहेगा तब भी यह मन।
-०-   

7.
आदत 
***   
रात का अँधेरा अब नहीं डराता मुझे   
उसकी सारी कारस्तानियाँ मुझसे हार गईं   
मैंने अकेले जीने की आदत जो पाल ली।
-०-   

8.
लुका-चोरी 
***   
ढूँढ़कर थक चुकी   
दिन का सूरज, रात का चाँद   
दोनों के साथ, लुका-चोरी खेल रही थी   
वे दग़ा दे गए   
छल से मुझे तन्हा छोड़ गए।
-०-   

9.
तिजोरी
***   
अब आओ तो चलेंगे   
उन यादों के पास   
जिसे हमने छुपाया था   
समय से माँगी हुई तिजोरी में   
शायद कई जन्मों पहले।
-०-   

10.
तजरबा
***   
सोचा न था   
ऐसे तजरबे भी होंगे   
दुनिया की भीड़ में   
सदा हम तन्हा ही रहेंगे।
-०-   

11.
चुप 
***   
चुप-से दिन, चुप-सी रातें   
चुप-से नाते, चुप-सी बातें   
चुप है ज़िन्दगी
कौन करे बातें   
कौन तोड़े सघन चुप्पी।
-०-    

12. 
ग़ुस्सा 
*** 
तुमसे मिलकर जाना यह जीवन क्या है   
बेवजह ग़ुस्सा थी 
ख़ुद को ही सता रही थी   
तुम्हारी एक हँसी 
तुम्हारा एक स्पर्श 
तुम्हारे एक बोल   
मैं जीवन को जान गई।
-०-   

13. 
क्षण 
***  
वक़्त बस एक क्षण देता है   
बन जाएँ या बिगड़ जाएँ   
जी जाएँ या मर जाएँ   
उस एक क्षण को मुट्ठी में समेटना है   
वर्तमान भी वही भविष्य भी वही  
बस एक क्षण   
जो हमारा है सिर्फ़ हमारा।
-०-    

14. 
पाप-पुण्य 
***  
नज़दीकियाँ   
पाप-पुण्य से परे होती हैं   
फिर भी कभी-कभी   
फ़ासलों पे रहकर   
जीनी होती है ज़िन्दगी।
-०-   

15.
तुम 
***   
चाहती हूँ   
धूप में घुसकर तुम आ जाओ छत पर   
बड़े दिनों से मुलाक़ात न हुई   
जीभर कर बात न हुई   
यूँ भी सुबह की धूप देह के लिए ज़रूरी है   
और तुम मेरे मन के लिए। 
-०-  

- जेन्नी शबनम (9. 1. 2019)  
_____________________ 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

597. बातें (क्षणिका)

बातें 

*******   

रात के अँधेरे में ढेरों बातें करती हूँ 
जानती हूँ मेरे साथ 
तुम कहीं नहीं थे, तुम कभी नहीं थे 
पर सोचती रहती हूँ- तुम सुन रहे हो 
और मैं ख़ुद से बातें करती हूँ।   

- जेन्नी शबनम (25. 12. 2018)   
______________________

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

572. विनती (क्षणिका)

विनती   

*******   

समय की शिला पर   
जाने किस घड़ी लिखी जीवन की इबारत मैंने   
ताउम्र मैं व्याकुल रही और वक़्त तड़प गया   
वक़्त को पकड़ने में 
मेरी मांसपेशियाँ कमज़ोर पड़ गईं   
दूरी बढ़ती गई और वक़्त लड़खड़ा गया   
अब मैं आँखें मूँदे बैठी समय से विनती करती हूँ-   
वक़्त दो या बिन बताए   
सब अपनों की तरह मेरे पास से भाग जाओ।  

- जेन्नी शबनम (18. 4. 2018)
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रविवार, 25 मई 2014

458. हादसा

हादसा

*******

हमारा मिलना 
हर बार एक हादसे में तब्दील हो जाता है 
हादसा, जिससे दूसरों का कुछ नहीं बिगड़ता 
सिर्फ़ हमारा-तुम्हारा बिगड़ता है  
क्योंकि, ये हादसे हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं 
हमारे वजूद में शामिल 
दहकते शोलों की तरह 
जिनके जलने पर ही ज़िन्दगी चलती है  
अगर बुझ गए तो जीने का मज़ा चला जाएगा 
और बेमज़ा जीना तुम्हें भी तो पसंद नहीं  
फिर भी, तुम्हें साथी कहने का मन नहीं होता  
क्योंकि, इन हादसों में कई सारे वे क्षण भी आए थे 
जब अपने-अपने शब्द-वाण से
हम एक दूसरे की हत्या तक करने को आतुर थे 
अपनी ज़हरीली जिह्वा से  
एक दूसरे का दिल चीर देते थे  
हमारे दरम्यान कई क्षण ऐसे भी आए   
जब ख़ुद को मिटा देने का मन किया  
कई बार हमारा मिलना गहरे ज़ख़्म दे जाता था 
जिसका भरना कभी मुमकिन नहीं हुआ  
हम दुश्मन भी नहीं 
क्योंकि, कई बार अपनी साँसों से 
एक दूसरे की ज़िन्दगी को बचाया है हमने 
अब हमारा अपनापा भी ख़त्म है 
क्योंकि, मुझे इस बात से इंकार है कि हम प्रेम में है 
और तुम्हारा जबरन इसरार कि 
मैं मान लूँ     
''हम प्रेम में हैं और प्रेम में तो यह सब हो ही जाता है'' 
सच है 
हादसों के बिना, हमारा मिलना मुमकिन नहीं
कुछ और हादसों की हिम्मत, अब मुझमें नहीं 
अंततः
पुख्ता फ़ैसला चुपचाप किया है- 
''असंबद्धता ही मुनासिब है''   
अब न कोई जिरह होगी 
न कोई हादसा होगा। 

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2014) 
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शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

443. बेपरवाह मौसम

बेपरवाह मौसम

******* 

कुछ मौसम   
जाने कितने बेपरवाह हुआ करते हैं   
बिना हाल पूछे, चुपके से गुज़र जाते हैं   
भले ही मैं उसकी ज़रूरतमंद होऊँ   
भले ही मैं आहत होऊँ,   
कुछ मौसम   
शूल से चुभ जाते हैं 
और मन की देहरी पर 
साँकल-से लटक जाते हैं   
हवा के हर एक हल्के झोंके से   
साँकल बज उठती है   
जैसे याद दिलाती हो, कहीं कोई नहीं,   
दूर तक फैले बियाबान में   
जैसे बिन मौसम बरसात शुरू हो   
कुछ वैसे ही   
मौसम की चेतावनी   
मन की घबराहट और कुछ पीर   
आँखों से बह जाती हैं   
कुछ ज़ख़्म और गहरे हो जाते हैं,   
फिर सन्नाटा   
जैसे हवाओं ने सदा के लिए   
अपना रुख़ मोड़ लिया हो   
और जिसे इधर देखना भी   
अब गँवारा नहीं।   

- जेन्नी शबनम (8. 2. 2014) 
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बुधवार, 22 जनवरी 2014

438. उफ़! माया

उफ़! माया

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"मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है... 
मेरा वो सामान लौटा दो...!"
'इजाज़त' की 'माया',
उफ़ माया!
तुम्हारा सामान लौटा कि नहीं, नहीं मालूम 
मगर तुम लौट गई, इतना मालूम है 
पर मैं?
मेरा तो सारा सामान...!
क्या-क्या कहूँ लौटाने
मेरा वक़्त, मेरे वक़्त की उम्र 
वक़्त के घाव, वक़्त के मलहम 
दिन-रात की आशनाई 
भोर की लालिमा, साँझ का सूनापन 
शब के अँधियारे, दिन के उजाले 
रोज़ की इबादत, सपनों की हकीकत
हवा की नरमी, धूप की गरमी 
साँसों की कम्पन, अधरों के चुम्बन 
होंठों की मुस्कान, दिल नादान 
सुख-दुःख, नेह-देह...!
सब तुम्हारा, सब के सब तुम्हारा 
अपना सब तो उस एक घड़ी सौंप दिया 
जब तुम्हें ख़ुदा माना 
इनकी वापसी...?
फिर मैं कहाँ? क्या वहाँ?
जहाँ तुम हो माया?

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2014)
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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

427. ज़िन्दगी लिख रही हूँ

ज़िन्दगी लिख रही हूँ

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लकड़ी के कोयले से 
आसमान पर ज़िन्दगी लिख रही हूँ 
उन सबकी 
जिनके पास शब्द तो हैं 
पर लिखने की आज़ादी नहीं,
तुम्हें तो पता ही है  
क्या-क्या लिखूँगी- 
वो सब जो अनकहा है 
और वो भी 
जो हमारी तक़दीर में लिख दिया गया था 
जन्म से पूर्व 
या शायद यह पता होने पर कि
दुनिया हमारे लिए होती ही नहीं है, 
बुरी नज़रों से बचाने के लिए
बालों में छुपाकर 
कान के नीचे काजल का टीका 
और दो हाथ आसमान से दुआ माँगती रही 
जाने क्या? 
पहली घंटी के साथ 
क्रमश बढ़ता रुदन 
सबसे दूर इतनी भीड़ में बड़ा डर लगा था 
पर बिना पढ़ाई ज़िन्दगी मुकम्मल कहाँ होती है,
वक़्त की दोहरी चाल
वक़्त की रंजिश   
वक़्त ने हठात जैसे जिस्म के लहू को सफ़ेद कर दिया
सब कुछ गडमगड 
सपने-उम्मीद-भविष्य
फड़फड़ाते हुए परकटे पंछी-से धाराशायी, 
अवाक्!
स्तब्ध! 
आह!
कहीं कोई किरण?
शायद नहीं!
दस्तूर तो यही है न!
जिस्म जब अपने ही लहू से रंग गया 
आत्मा जैसे मूक हो गई 
निर्लज्जता अब सवाल नहीं जवाब बन गई  
यही तो है हमारा अस्तित्व
भाग सको तो भाग जाओ 
कहाँ?
यह भी ख़ुद का निर्णय नहीं
लिखी हुई तक़दीर पर मूक सहमति 
आख़िरी निर्णय 
आसमान की तरफ दुआ के हाथ नहीं 
चिता के कोयले से 
आसमान पर ज़िन्दगी की तहरीर!

- जेन्नी शबनम (11. 11. 2013)
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शुक्रवार, 15 जून 2012

351. मैं कहीं नहीं

मैं कहीं नहीं

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हर बार की तरह
निष्ठुर बन, फिर चले गए तुम
मुझे मेरे प्रश्नों में जलने के लिए छोड़ गए  
वो प्रश्न जिसके उत्तर तलाशती हुई मैं
एक बार जैसे नदी बन गई थी 
और बिरहा के आँसू, बरखा की बूंदों में लपेट-लपेटकर 
नदी में प्रवाहित कर रही थी
और ख़ुद से पूछती रही, क्या सिर्फ मैं दोषी हूँ?

क्या उस दिन मैंने कहा था कि 
चलो चलकर चखें उस झील के पानी को
जिसमें सुना है 
कभी किसी राजा ने अपनी प्रेमिका के संग 
ठिठुरते ठण्ड में स्नान किया था 
ताकि काया कंचन-सी हो जाए
और अनन्त काल तक वे चिर युवा रहें।  

वो पहला इशारा भी तुमने ही किया 
कि चलो चाँदनी को मुट्ठी में भर लें
क्या मालूम मुफ़लिसी के अँधेरों का 
जाने कब ज़िन्दगी में अँधियारा भर जाए
मुट्ठी खोल एक दूसरे के मुँह पर झोंक देंगे 
होठ ख़ामोश भी हो 
मगर आँखें तो देख सकेंगी एक झलक। 

और उस दिन भी तो तुम ही थे न
जिसने चुपके से कानों में कहा था-
''मैं हूँ न, मुझसे बाँट लिया करो अपना दर्द''
अपना दर्द भला कैसे बाँटती तुमसे
तुमने कभी ख़ुशी भी सुननी नहीं चाही 
क्योंकि मालूम था तुम्हें, मेरे जीवन का अमावस
जानती थी, तुमने कहने के लिए सिर्फ़ कहा था 
''मैं हूँ न'' मानने के लिए नहीं। 

एक दिन कहा था तुमने  
''वक़्त के साथ चलो''
मन में बहुत रंजिश है तुम्हारे लिए भी 
और वक़्त के लिए भी 
फिर भी चल रही हूँ वक़्त के साथ 
रोज़-रोज़ प्रतीक्षा की मियाद बढ़ाते रहे तुम
मेरे संवाद और संदेश फ़ुज़ूल होते गए 
वक़्त के साथ चलने का मेरा वादा, अब भी क़ायम है  
सवाल करना तुम ख़ुद से कभी  
कोई वादा कब तोड़ा मैंने?
वक़्त से बाहर कब गई भला?
क्या उस वक़्त, मैं वक़्त के साथ नहीं चली थी?

कितनी लंबी प्रतीक्षा
और फिर जब सुना ''मैं हूँ न'' 
उसके बाद ये सब कैसे
क्या सारी तहज़ीब भूल गए?
मेरे सँभलने तक रुक तो सकते थे 
या इतना कहकर जाते 
''मैं कहीं नहीं''
कम-से-कम प्रतीक्षा का अंत तो होता।  

तुम बेहतर जानते हो 
मेरी ज़िन्दगी तो तब भी थी, तुम्हारे ही साथ
अब भी है, तुम्हारे ही साथ
फ़र्क यह है कि तुम अब भी नहीं जानते मुझे  
और मैं, तुम्हें कतरा-कतरा जीने में 
सर्वस्व पी चुकी हूँ। 

- जेन्नी शबनम (10. 6. 2012)
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बुधवार, 25 जनवरी 2012

317. स्वतः नहीं जन्मी

स्वतः नहीं जन्मी

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नहीं मालूम, मैं हैरान हूँ या परेशान
पर यथास्थिति को समझने में, नाकाम हूँ,
समझ नहीं आता
ज़िन्दगी की करवटों को
किस रूप में लूँ
जिस चुप्पी को मैंने ओढ़ लिया
या उसे जिसे मानने के लिए दिल सहमत नहीं,
मेरे दोस्त!
मौनता मुझमें स्वतः नहीं जन्मी
न उपजी है मुझमें
मैंने ख़ामोशी को जन्म दिया है
वक़्त से निभाकर,
अब दरकिनार हो गई ज़िन्दगी 
उन सबसे
जिसमें तूफ़ान भी था
नदी भी और बरसते हुए बादल भी
तसल्ली से देखो
सब अपनी-अपनी जगह आज भी यथावत हैं,
मैं ही नामुराद
न बह सकी, न चल सकी, न रुक सकी। 

- जेन्नी शबनम (17. 1. 2012)
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