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शनिवार, 16 नवंबर 2024

781. आग मुझे खल रही है

आग मुझे खल रही है 

***

एक आग में तमाम उम्र 
जलती, तपती, झुलसती रही
आह निकले, पर सब्र किया
ज़ख़्म दुःखे, पर हँस दिया
आसमाँ से वर्षा की गुहार लगाई
उसने आग बरसाई 
हवा से नमी उधार माँगी
उसने लावा की तपिश भेजी
धूप से छाँव की गुज़ारिश की
उसने आग धरती पर उतारी
उम्र से कुछ सुखद पलों की याचना की 
उसने तमाम पलों को चिन्दी-चिन्दी कर बिखेर दिया।
  
न जाने क्यों अब ये सब चुप हैं
मेरी चाहतें तंग हैं या
मेरी तक़दीर की मुझसे जंग है
सुकून के एक पल भी मिलने नहीं आते हैं  
संवेदना से भरे हाथ मुझ तक नहीं पहुँचते हैं। 
 
अपनी मुट्ठियों में ख़ुद को समेटे 
सुलग रही हूँ, दहक रही हूँ
अग्नि धीरे-धीरे बुझ रही हूँ 
चिनगारी अब भी सुलग रही है
मेरी ज़िन्दगी अब भी जल रही है
और ये आग मुझे खल रही है।

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2024)
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सोमवार, 23 जनवरी 2023

756. पुल

पुल 

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पुल तो ध्वस्त हो गया   
जिससे दोनों पाटों को जोड़कर   
पार कर जाते थे अथाह खाई। 
   
हाँ, एक पतली सी डोरी छोड़ दी थी   
शायद किसी मोड़ पर वापसी हो   
तो लौटना मुमकिन हो सके   
यह याद रखते हुए   
कि यह अन्तिम   
अस्त्र, शस्त्र और मन्त्र है। 
   
जीवन के प्रवाह की   
यह डोरी अगर टूटी या छूटी   
फिर उम्र और वक़्त की सीमा कुछ भी हो   
जीवन एक पार ही रहेगा। 
   
तमाम अंतर्द्वंद्वों को समझते जानते हुए   
अब कोई नया पुल न बनेगा   
न मरम्मत की जाएगी   
न कोई सूत जोड़ी या छोड़ी जाएगी।

-जेन्नी शबनम (23.1.23)
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शुक्रवार, 4 जून 2021

723. जीने का करो जतन

जीने का करो जतन 

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काँटों की तक़दीर में, नहीं होती कोई चुभन   
दर्द है फूलों के हिस्से, मगर नहीं देते जलन।   

शमा तो जलती है हर रात, ग़ैरों के लिए   
ख़ुद के लिए जीना, बस इंसानों का है चलन।   

तमाम उम्र जो बोते रहे, पाई-पाई की फ़सल   
बारहा मिलता नहीं, वक़्त-ए-आख़िर उनको कफ़न।   

उसने कहा कि धर्म ने दे दिया, ये अधिकार   
सिर ऊँचा करके, अधीनों का करते रहे दमन।   

जुनून कैसा छा रहा, हर तरफ़ है क़त्ल-ए-आम   
नहीं दिखता अब ज़रा-सा भी, दुनिया में अमन।   

जीने का भ्रम पाले, ज़िन्दगी से दूर हुआ हर इंसान   
'शब' कहती ये अन्तिम जीवन, जीने का करो जतन।   

जेन्नी शबनम (4. 6. 2021) 
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सोमवार, 11 जनवरी 2021

708. आकुल (5 माहिया)

आकुल 

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1. 
जीवन जब आकुल है   
राह नहीं दिखती   
मन होता व्याकुल है।   

2. 
हर बाट छलावा है   
चलना ही होगा   
पग-पग पर लावा है।   

3. 
रूठे मेरे सपने   
अब कैसे जीना   
भूले मेरे अपने।   

4. 
जो दूर गए मुझसे   
सुध ना ली मेरी   
क्या पीर कहूँ उनसे।   

5. 
जीवन एक झमेला   
सब कुछ उलझा है   
यह साँसों का खेला।   

- जेन्नी शबनम (10. 1. 2021)
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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

627. तमाशा

तमाशा 

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सच को झूठ, झूठ को सच कहती है दुनिया   
इसी सच-झूठ के दरमियान रहती है दुनिया   
ख़ून के नाते हों या क़िस्मत के नाते   
फ़रेब के बाज़ार में सब ख़रीददार ठहरे। 
   
सहूलियत की पराकाष्ठा है   
अपनों से अपनों का छल   
मन के नातों का क़त्ल   
कोखजनों की बदनीयती   
सरेबाज़ार शर्मसार है करती। 
   
दुनिया को सिर्फ़ नफ़रत आती है   
दुनिया कब प्यार करती है   
धन-बल के लोभ में इन्सानियत मर गई है   
धन के बाज़ार में सबकी बोली लग गई है। 
   
यक़ीन और प्रेम गौरैया-सी फुर्र हुई   
तमाम जंगल झुलस गए   
कहाँ नीड़ बसाए परिन्दा   
कहाँ तलाशे प्रेम की बगिया। 
   
झूठ-फ़रेब के चीनी माँझे में उलझकर    
लहूलुहान हो गई है ज़िन्दगी   
ऐसा लगता है, खो गई है ज़िन्दगी   
देखो मिट रही है ज़िन्दगी   
मौत की बाहों में सिमट रही है ज़िन्दगी। 
   
आओ-आओ तमाशा देखो  
रिश्तों-नातों का तमाशा देखो   
पैसों के खेल का तमाशा देखो   
बिन पैसों का तमाशा देखो।   

- जेन्नी शबनम (19.9.2019)   
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शनिवार, 1 जून 2019

614. नज़रबंद

नज़रबंद   

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ज़िन्दगी मुझसे भागती रही   
मैं दौड़ती रही, पीछा करती रही   
एक दिन आख़िर वो पकड़ में आई   
ख़ुद ही जैसे मेरे घर में आई   
भागने का सबब पूछा मैंने   
झूठ बोल बहला दिया मुझे,   
मैं अपनी खामी ढूँढती रही   
आख़िर ऐसी क्या कमी थी   
जो ज़िन्दगी मुझसे कह गई   
मेरी सोच, मेरी उम्र या फिर जीने का शऊर   
हाँ! भले मैं बेशऊरी   
पर वक़्त से जो सीखा वैसे ही तो जिया मैंने   
फिर अब?   
आजीज आ गई ज़िन्दगी   
एक दिन मुझे प्रेम से दुलारा, मेरे मन भर मुझे पुचकारा   
हाथों में हाथ लिए मेरे, चल पड़ी झील किनारे   
चाँद तारों की बात, फूल और ख़ुशबू थी साथ   
भूला दिया मैंने उसका छल   
आँखें मूँद काँधे पे उसके रख दिया सिर   
मैं ज़िन्दगी के साथ थी   
नहीं-नहीं मैं अपने साथ थी   
फिर हौले से उसने मुझे झिंझोड़ा   
मैंने आँख मूँदे मुस्कुरा कर पूछा-   
बोलो ज़िन्दगी, अब तो सच बताओ   
क्यों भागती रही तुम तमाम उम्र   
मैं तुम्हारा पीछा करती रही ताउम्र   
जब भी तुम पकड़ में आई   
तुमने स्वप्नबाग दिखा मुझसे पीछा छुड़ाया,   
फिर ज़िन्दगी ने मेरी आँखों में देखा   
कहा कि मैं झील की सुन्दरता देखूँ   
अपना रूप उसमें निहारूँ,   
मैं पागल फिर से छली गई   
आँखें खोल झील में ख़ुद को निहारा   
मेरी ज़िन्दगी ने मुझे धकेल दिया   
सदा के लिए उस गहरी झील में   
बहुत प्रेम से बड़े धोखे से,   
अब मैं झील में नज़रबंद हूँ   
ज़िन्दगी की बेवफाई से रंज हूँ   
अब न ज़िन्दगी का कारोबार होगा   
न ज़िन्दगी से मुलाक़ात होगी   
अब कौन सुनेगा मुझको कभी   
न किसी से बात होगी।    

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2019)   
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रविवार, 18 मार्च 2018

569. ज़िद्दी मन (क्षणिका)

ज़िद्दी मन  

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ज़िद्दी मन ज़िद करता है 
जो नहीं मिलता वही चाहता है  
तारों से भी दूर मंज़िल ढूँढता है  
यायावर-सा भटकता है  
ज़ीस्त में जंग ही जंग पर सुकून की बाट जोहता है  
ये मेरा ज़िद्दी मन अल्फ़ाज़ का बंदी मन  
ख़ामोशी ओढ़के जग को ख़ुदा हाफ़िज़ कहता है  
पर्वत-सी ज़िद ठाने, कतरा-कतरा ढहता है  
पल-पल मरता है, पर जीने की ज़िद करता है।  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2018)  
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रविवार, 1 नवंबर 2015

500. उऋण

उऋण 

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कुछ ऋण ऐसे हैं  
जिनसे उऋण होना नहीं चाहती  
वो कुछ लम्हे 
जिनमें साँसों पर क़र्ज़ बढ़ा  
वो कुछ एहसास  
जिनमें प्यार का वर्क चढ़ा  
वो कुछ रिश्ते  
जिनमें जीवन मिला  
वो कुछ नाते  
जिनमें जीवन खिला  
वो कुछ अपने  
जिन्होंने बेगानापन दिखाया  
वो पराए  
जिन्होने अपनापन सिखाया  
ये सारे ऋण  
सर माथे पर  
ये सब खोना नहीं चाहती  
इन ऋणों के बिना  
मरना नहीं चाहती  
ऋणों की पूर्णिमा रहे  
अमावस नहीं चाहती  
ये ऋण बढ़ते रहें  
मैं उऋण होना नहीं चाहती।  

- जेन्नी शबनम (1. 11. 2015)
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शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

443. बेपरवाह मौसम

बेपरवाह मौसम

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कुछ मौसम   
जाने कितने बेपरवाह हुआ करते हैं   
बिना हाल पूछे, चुपके से गुज़र जाते हैं   
भले ही मैं उसकी ज़रूरतमंद होऊँ   
भले ही मैं आहत होऊँ,   
कुछ मौसम   
शूल से चुभ जाते हैं 
और मन की देहरी पर 
साँकल-से लटक जाते हैं   
हवा के हर एक हल्के झोंके से   
साँकल बज उठती है   
जैसे याद दिलाती हो, कहीं कोई नहीं,   
दूर तक फैले बियाबान में   
जैसे बिन मौसम बरसात शुरू हो   
कुछ वैसे ही   
मौसम की चेतावनी   
मन की घबराहट और कुछ पीर   
आँखों से बह जाती हैं   
कुछ ज़ख़्म और गहरे हो जाते हैं,   
फिर सन्नाटा   
जैसे हवाओं ने सदा के लिए   
अपना रुख़ मोड़ लिया हो   
और जिसे इधर देखना भी   
अब गँवारा नहीं।   

- जेन्नी शबनम (8. 2. 2014) 
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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

429. फिर आता नहीं

फिर आता नहीं

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जाने कब आएगा, मेरा वक़्त   
जब पंख मेरे और परवाज़ मेरी   
दुनिया की सारी सौग़ात मेरी   
फूलों की खुशबू, तारों की छतरी   
मेरे अँगने में खिली रहे, सदा चाँदनी   

वो कोई सुबह   
जब आँखों के आगे कोई धुँध न हो   
वो कोई रात, जो अँधेरी मगर काली न हो   
साँसों में ज़रा-सी थकावट नहीं   
पैरों में कोई बेड़ी नहीं   
उड़ती पतंगों-सी, गगन को छू लूँ   
जब चाहे हवा से बातें करूँ   
नदियों के संग बहती रहूँ   
झीलों में डुबकी, मन भर लेती रहूँ   
चुन-चुनकर, ख़्वाब सजाती रहूँ   
सारे ख़्वाब हों, सुनहरे-सुनहरे   
शहद की चाशनी में पके, मीठे गुलगुले-से  

धक् से, दिल धड़क गया   
सपने में देखा, उसने मुझसे कहा-   
तुम्हारा वक़्त कल आएगा   
लम्हा भर भी सोना नहीं   
हाथ बढ़ाकर पकड़ लेना झट से   
खींचकर चिपका लेना कलेजे से   
मंदी का समय है, सब झपटने को आतुर   
चूकना नहीं   
गया वक़्त फिर आता नहीं   

- जेन्नी शबनम (13. 12. 2013) 
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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

421. ज़िन्दगी (21 हाइकु) पुस्तक 44-46

ज़िन्दगी

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1.
लम्हों की लड़ी
एक-एक यूँ जुड़ी
ज़िन्दगी ढली।

2.
गुज़र गई
जैसे साज़िश कोई
तमाम उम्र।

3.
ताकती रही
जी गया कोई और
ज़िन्दगी मेरी।

4.
बिना बताए
जाने किधर गई
मेरी ज़िन्दगी

5.
फैला सन्नाटा
ज़मीं से नभ तक,
ज़िन्दगी कहाँ?

6.
कैसी पहेली
ज़िन्दगी हुई अवाक्
अनसुलझी।

7.
उलझी हुई 
है अजब पहेली
मूर्ख ज़िन्दगी

8.
ज़िन्दगी बीती
जैसे शोर मचाती
आँधी गुज़री।

9.
शोर मचाती
बावरी ये ज़िन्दगी 
भागती रही।

10.
खींचती रही
अन्तिम लक्ष्य तक
ज़िन्दगी-रथ।

11.
रिसता लहू
चाक-चाक ज़िन्दगी 
चुपचाप मैं।

12.
नहीं खिलती
ज़िन्दगी की बगिया
रेगिस्तान में।

13.
तड़पी सदा 
जल-बिन मीन-सी 
ज़िन्दगी बीती

14.
रौशन होती
ग़ैरों की चमक से
हाय ज़िन्दगी!

15.
तमाम उम्र
भरमाती ही रही
ज़िन्दगी छल।

16.
मौन ही रहो
ज़िन्दगी चुप रहो
ज्यों सूरज है।

17.
ज़िन्दगी ढली
मगर चुपचाप
ज्यों रात ढली।

18.
सूरज ढला
ज़िन्दगी भी गुज़री
सब ख़ामोश।

19.
अब भी शेष
देहरी पर मन
स्वाहा ज़िन्दगी

20.
मेरी ज़िन्दगी 
कहानी बन गई
सबने कही।

21.
हवन हुई
बादलों तक गई
ज़िन्दगी धुँआ।

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2013)
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रविवार, 27 मार्च 2011

224. ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी

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तल्ख़ धूप कितना जलाएगी
अब तो बीत जाए दिन बुरा
रहम कर हम पर, ऐ ज़िन्दगी

बाबस्ता नहीं कोई
दर्द बाँटें किससे बता
चुप हो जी ले, ऐ ज़िन्दगी

दिन के उजाले में स्वप्न पले
ढल गई शाम अब करें क्या
किसका रस्ता देखें, ऐ ज़िन्दगी

वो कहते हैं समंदर में प्यासे रह गए
नदी की तरफ़ वो चले ही कब भला
गिला किससे शिकवा क्यों, ऐ ज़िन्दगी

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी
समझें कैसे उनकी मोहब्बत बता
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2011)
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रविवार, 20 जून 2010

149. बाबा आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है / baba aao dekho! tumhaari bitiya rotee hai (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 33)

बाबा आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है 

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मन में अब भी कहीं, एक नन्ही-सी बच्ची पलती है
जाने क्या-क्या सपने बुनती, दूर आसमान को ताकती है
शायद वहाँ से कोई परी, उसके बाबा को ले आएगी
गोद बाबा के बैठ, वो अपने सारे दुखड़े रोएगी

क्यों चले गए, तुम छोड़ के बाबा
देखो बाप बिन बेटी, कैसे जीती है
बूँद आँसू न बहे, तुमने इतने जतन से पाले थे
देखो आज अपनी बिटिया को, अपने आँसू पीती है

जाना ही था, तो साथ अपने, मुझे और अम्मा को भी ले जाते
मेरे आधे आँसू, अम्मा की आँखों से भी बहते हैं
मेरी उथली हँसी और पनीली आँखें, बिन कहे अम्मा पहचानती है
वे अपने सारे ग़म भूल, मेरे दुःख से रोती है

जाने को तुम चले गए, क़िस्मत हमारी भी ले गए
हम कैसे जिएँ बताओ बाबा, अपना दर्द किसे सुनाएँ बाबा
जानती हूँ, आसमान से न कोई परी आएगी, न तुम आओगे
फिर भी, मन में अब भी एक नन्ही बच्ची पलती है

तुम सितारा बन आसमान में चले गए, बचपन में दादी कहती थी
आँसुओं से तर उसकी आँखें, रोज़ मुझे और भैया को नयी कहानी सुनाती थी
बाबा आओ देखो! तुम्हारे सारे अपने रोते हैं
एक-दूसरे के सामने अपने आँसू छुपाते हैं

सपने में तुम आते हो, जैसे कभी कहीं तुम गए नहीं
सपने में ही कह दो आकर, कब तक यूँ आँसू और बहेंगे
बाबा! इतना तो कह कर जाते, कभी नहीं तुम आओगे
चाहे जितना भी रोएँ हम, वापस नहीं तुम आओगे

बच्ची नहीं औरत हूँ अब, किसी का घर भी बसाना है
कोख जायों को अपने, उनकी मंज़िल तक पहुँचाना है
ज़हर घूँट का पीकर भी, सबकी ख़ातिर जीना है
तुमसे शिकवा कर, पल-पल अपने आँसू पोंछना है

बाबा! जब भी आँसू बहते हैं, मन छोटी बच्ची बन जाता है
जानती हूँ, तुम आसमान में नहीं रहते, न कोई परी रहती है
दूर आसमान से तुम देख रहे, मन को झूठी तसल्ली होती है
बाबा आओ देखो! तुम्हारी प्यारी बिटिया रोती है

(सितम्बर 27, 2008)
(पितृ दिवस)
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baba aao dekho! tumhaari bitiya rotee hai

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mann mein ab bhi kahin, ek nanhi-see bachchee paltee hai
jaane kya-kya sapne buntee, door aasmaan ko taaktee hai
shaayad wahaan se koi paree, uske baba ko le aayegi
goad baba ke baith, wo apne saare dukhde royegi.

kyon chale gaye, tum chhod ke baba
dekho baap bin betee, kaise jeetee hai
boond aansoo na bahe, tumne itne jatan se paale they
dekho aaj apni bitiya ko, apne aansoo pitee hai.

jana hi tha, to saath apne, mujhe aur amma ko bhi le jaate
mere aadhe aansoo, amma kee aankho se bhi bahte hain
meri uthli hansi aur paneelee aankhe, bin kahe amma pahchaantee hai
wo apne saare gham bhool, mere dukh se rotee hai.

jane ko tum chale gaye, qismat humari bhi le gaye
hum kaise jiyen batao baba, apna dard kise sunaayen baba,
janti hoon, aasman se, na koi paree aayegi, na tum aaoge
phir bhi, mann mein ab bhi, ek nanhi bachchi paltee hai.

tum sitaara ban aasman mein chale gaye, bachpan mein daadi kahtee thi
aasuon se tar uski aankhen, roz mujhe aur bhaiya ko, nayee kahaani sunaati thi
baba aao dekho! tumhaare saare apne rote hain
ek dusre ke saamne, apne aansoo chhupaate hain.

sapno mein tum aate ho, jaise kabhi kahin tum gaye nahi
sapno mein hi kah do aakar, kab tak yun aansoo aur bahenge
baba! itna to kah kar jate, kabhi nahi tum aaoge
chaahe jitna bhi royen hum, waapas nahi tum aaoge.

bachchi nahi aurat hun ab, kisi ka ghar bhi basaana hai
kokh jaayon ko apne, unki manzil tak pahuchaana hai
zehar ghunt ka pikar bhi, sabki khaatir jina hai,
tumse shikwa kar, pal-pal apne aansoo pochhna hai.

baba! jab bhi aansoo bahte hain, mann chhoti bachchee ban jaata hai
jaanti hun, tum aasman mein nahi rahte, na koi paree rahti hai
door aasman se tum dekh rahe, mann ko jhoothi tasalli hoti hai
baba aao dekho! tumhaari pyaari bitiya rotee hai.

- Jenny Shabnam (September 27,  2008)
(father's day)
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सोमवार, 29 जून 2009

66. आख़िर क्यों

आख़िर क्यों

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बेअख़्तियार दौड़ी थी
जाने क्यों?
कुछ पाने या खोने
जाने क्यों?
कुछ लम्हों की सौग़ात मिली
साथ दर्द इक इनाम मिला,
अंहकार की घोर टकराहट थी
और भय की अखंडित दीवार थी,
पाट सकी न अपना संशय
जता सकी न अपना आशय,
पाप-पुण्य से परे प्यासे तन
सत्य-असत्य से विचलित मन,
बाँट सकी न अपनी निराशा
दिला सकी न कोई आशा,
थम सकी न मेरी राहें
थाम सकी न कोई बाहें,
बेतहाशा भागी थी
आख़िर क्यों?
क्या पाया, क्या खोया 
आख़िर क्यों?

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 2008)
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सोमवार, 23 मार्च 2009

41. यकीन

यकीन

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चाहती हूँ, यकीन कर लूँ
तुम पर और अपने आप पर
ख़ुदा की गवाही का भ्रम
और तुमसे बाबस्ता मेरी ज़िन्दगी
दोनों ही तक़दीर है
हँसूँ या रोऊँ
कैसे समझाऊँ दिल को?
एक कशमकश-सी है ज़िन्दगी
एक प्रश्नचिह्न-सा है जीवन
हर लम्हा, सारे जज़्बात, क़ैदी हैं
ज़ंजीरें टूट गईं
पर आज़ादी कहाँ?
कैसे यकीन करूँ
खुद पर और तुम पर,
तुम भी सच हो
और ज़िन्दगी भी

- जेन्नी शबनम (22. 3. 2009)
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