सपने जो मेरे हैं
जितने सपने थे
ख़्वाबों को भरकर
चाँदी का रथ गुज़रा।
नाता तोड़ गया
उसकी है मनमर्ज़ी।
महके इठलाए
जीवन ज्यों बचपन में।
सपने जो मेरे हैं
सूरज किसका चाँद किसका
***
इस पार या उस पार
***
शब्दों का कब तक दूँ हिसाब
सवालों से घिरी मैं
अब नहीं चाहती जवाब
सिर पर लिए हुए सारे सवालों का उ
चुपचाप गुम हो जाना चाहती हूँ
संसार के इस पार या उस पार।
3.
रिश्ते बेजान हुए
कोई चाह अब शेष नहीं
टूटी-फूटी धड़कनें बेहाल हुईं
खण्ड-खण्ड में टूटा दिल, साँसें बेजार हुईं
सपनों के भँवर-जाल की सन्नाटों से बात हुईं
सब छूटा, सब बिखरा, जीने की ख़त्म राह हुई।
ज़िन्दगी
आग मुझे खल रही है
बच्चे
ज़िन्दगी बौनी
***
खण्डहर
कशमकश
***
वक़्त आ गया है
***
अक्सर सोचती हूँ
हर बार, बार-बार
मैं चुप क्यों हो जाती हूँ?
जानती हूँ
मेरी चुप्पी हर किसी
पर मुझे भीतर से खोखला कर रही है
अन्दर-ही-अन्दर खा रही है।
मैं अनभिज्ञ नहीं किसी सरोका
स्वयं का हो या संसार का
पर मेरी चुप्पी मुझे धकेल देती
जहाँ मेरे अस्तित्व का सवाल पै
मैं हर बार अपनी खाल में चुपचाप
अपनी चुप्पी से अपनी ही आहुति दे
कोई इससे बाहर नहीं निका
सब छोड़ देते हैं मुझे, मेरी क़ि
पर मैं क्यों ऐसी हूँ?
मन-मस्तिष्क का लावा मुझे जलाता
पर यह आग दिखती क्यों नहीं?
क्यों मैं जलती रहती हूँ?
अंगारों पर चलती रहती हूँ
ख़ुद को आग में जलाती रहती हूँ
सभी के सामने मुस्कुराती रहती हूँ
मेरे जलने-रोने से संसार प्रभा
मैं ही धीरे-धीरे मिटती जाती हूँ
अपने सवाल का जवाब ख़ुद को देती जाती हूँ
जो निरर्थक है और व्यर्थ भी।
मुझे अब अपना जवाब सभी को बताना
अपनी चुप्पी को तोड़ना होगा
हर उस सवाल पर लावा उगलना होगा
जो मुझे मिटाता है, जलाता है
अपनी चुप्पी का एहसास मुझे नहीं
मेरी चुप्पी का अर्थ मुझे जतला
मुझे क्या-क्या कहना है, समझाना
मेरी चुप्पी को ज्वालामुखी में
अन्यथा मैं जलती रहूँगी, लोग जला
मैं मिटती रहूँगी, लोग मिटाते र
अब बस!
चुप्पी को तोड़ने का वक़्त आ गया है
अपने मनमाफ़िक जीने का वक़्त आ ग
संसार से क़दम ताल मिलाने का वक़्त आ गया है।
-जेन्नी शबनम (1.5.2024)
__________________
नैनों से नीर बहा (19 माहिया)
अन्तिम लक्ष्य
हँसती हुई नारी
***
जीकर देखना है
***
जीवन तो जी लिया
कभी अपने लिए जीकर देखा क्या?
सच ही है
जीते-जीते जीना कब कोई भूल जाता
कुछ पता नहीं चलता
तभी तो कोई पूछता है-
कभी अपने लिए जीकर देखा है?
यह तो यूँ है जैसे कोई नदी से पू
बादलों से पूछे- तुमने बारिश
आग से पूछे- तुमने जलकर देखा है
सूरज से पूछे- तुमने
सबकी फ़ितरत एक जैसी है
अनवरत नियमों के साथ रहना
पर मैं क्यों प्रकृति के विरुद्ध?
साँसें का चलना, दिल का धड़कना
यही तो नियम है
पर मैं प्रफुल्लित क्यों नहीं?
नदी-बादल-आग-सूरज
वे तल्लीन हैं अपने बहाव में
अकेले होकर भी ख़ुश
प्रकृति के नियमों से बँधे, सिर्फ़ अपने साथ
न कोई हड़बड़ी, न घबराहट
न कुछ छूटने का डर, न कुछ पाने की लालसा
शायद यही जीवन है
फ़लसफ़ा भले कुछ भी हो
पर सत्य तो यही है
ये प्रवाहमय होकर दूसरों को सुख
स्वयं भी आह्लादित रहते हैं।
प्रवाहमान तो मैं भी हूँ
पर न मैं ख़ुश हूँ, न कोई मु
यह कैसा जीवन?
न अपने लिए है, न किसी के लिए
मैंने कभी जीकर क्यों न देखा?
शायद जीकर देखा होता
सिर्फ़ अपने लिए जीकर देखा होता
तो बात ही कुछ और होती
प्रकृति ने हँसने को कहा
मैंने जबरन हँसी ओढ़ी
मुझसे कहा गया कि नाचूँ-गाऊँ
मैंने सिनेमा का कोई दृश्य चला
सबने कहा फ़र्ज़ निभाओ
ख़ामोशी से फ़र्ज़ निभा दिया
इन सब में मैं कहाँ?
यह यायावर मन न अपना, न किसी का
शहर के बियाबान में भटककर
आकाश में एक चिनगारी ढूँढता।
अब भी समय है
आस है तो प्राण है
प्राण है तो जीवन है
भले कुछ भी अपना नहीं
न सगा न सखा
पर जीवन तो है
एक बार अपने लिए जीकर देखना है।