विचित्र वक़्त
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1.
वक़्त का ये पहिया
ख़ुद पर भरोसा
सबका बेड़ा पार।
बँधे हैं पाँव,
स्व-सम्बल बनना
टूटेगी फिर बेड़ी।
वक़्त का मलहम
घायल होती आत्मा।
मन की अभिव्यक्ति का सफ़र
विचित्र वक़्त
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1.
निशानी
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हमारी आत्मा
जीवन जाल
प्यार
तो मिले उपहार
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आज़ादी मिले
बनूँ गुलमोहर
हे सूर्य देव!
ज़रा रहम करो
धरती को बचाओ
मेघ को भेजो
तपते जीव-जन्तु
करुणा दिखलाओ।
6.
बाण व बात
हैं तीव्र हथियार
छूटे तो लौटे नहीं
माने न हार
करें क्रूर प्रहार
तन-मन छलनी।
क्षणभंगुर जीवन
वृद्ध का दुःख
नौतपा दैत्य
यात्री सूरज
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यात्री सूरज
करके रोज़ यात्रा
थकता होगा
चलना ही है धर्म
कोई हो ऋतु
कहीं न पहुँचता,
उसके पाँव
ज़ख़्मी तो होते होंगे
कौन लगाये
मरहम व पट्टी
दर्द छुपाके
जीवन का सन्देश
रोज़ ही देता
पर कौन सुनता
जल-जल के
उजाला पसारता,
बिन बैटरी
रोबोट बना सूर्य
रात व दिन
चकरघिन्नी बन
मन न चाहे
चलता ही रहता,
हे यायावर!
एक दिन तो करो
ज़रा विश्राम
तुमसे ही तो जग
सोता-जागता
एक दिन लो तुम
सोने का मज़ा
फिर चल पड़ना
बिन ठहरे
हँसते व जलते,
घुमंतू सूर्य!
बात सुन रहा न
आ साथ बैठ
ज़रा तो गप्पे लड़ा
चाय भी पी ले
फिर तू निकलना
अपनी यात्रा पर।
-जेन्नी शबनम (18.10.2022)
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युद्ध जारी है
स्त्रियाँ
जश्न जारी है
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ज़िन्दगी की लकीर
किरदार
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सफ़र जारी है
होली
(होली पर 20 हाइकु)