Tuesday, 7 April 2009

49. ज़िन्दगी एक बेशब्द किताब...

ज़िन्दगी एक बेशब्द किताब...

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पन्नों से सिमट, ज़िन्दगी, हाशिए पर आ पहुँची
हसरतें हाशिए से, किताब तक जा पहुँची,
मालूम नहीं ज़िन्दगी की इबारत स्याह थी
या कि स्याही का रंग फ़ीका था
शब्द अलिखित रह गए । 

शायद ज़िन्दगी, किताब के पन्नों से निकल
अपना वज़ूद ढूँढ़ने चल पड़ी,
किताब की इबारत और हाशिए क्या
अब तो शीर्षक भी लुप्त हो गए,
ज़िन्दगी बस, कागज़ का पुलिंदा भर रह गई,
जिसमें स्याही के कुछ बदरंग धब्बे और
हाशिए पर कुछ आड़े-तिरछे निशान छूट गए । 

शब्द-शब्द ढूँढ़ कर, एहसासों की स्याही से
पन्नों पर उकेरी थी अपनी ज़िन्दगी,
सोचती थी
कभी तो कोई पढ़ेगा मेरी ज़िन्दगी,
बेशब्द बेरंग पन्ने
कोई कैसे पढ़े ?

क्या मालूम, स्याही फीकी क्यों पड़ गई ?
क्या मालूम, ज़िन्दगी की इबारत धुँधली क्यों हो गई ?
क्या मालूम, मेरी किताब रद्दी क्यों हो गई ?
शायद मेरी किताब और मेरी ज़िन्दगी
सफ़ेद-स्याह पन्नों की अलिखित कहानी है !
मेरी ज़िन्दगी एक बेशब्द किताब है !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 2, 2009)

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