सोमवार, 16 नवंबर 2015

501. नन्हा बचपन रूठा बैठा है

नन्हा बचपन रूठा बैठा है   

*******  

अलमारी के निचले खाने में  
मेरा बचपन छुपा बैठा है  
मुझसे डरकर मुझसे ही रूठा बैठा है  
पहली कॉपी पर पहली लकीर  
पहली कक्षा की पहली तस्वीर  
छोटे-छोटे कंकड़ पत्थर  
सब हैं लिपटे साथ यूँ दुबके  
ज्यों डिब्बे में बंद ख़ज़ाना  
लूट न ले कोई पहचाना  
जैसे कोई सपना टूटा बिखरा है  
मेरा बचपन मुझसे हारा बैठा है  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।     

ख़ुद को जान सकी न अबतक
ख़ुद को पहचान सकी न अबतक  
जब भी देखा ग़ैरों की नज़रों से
सब कुछ देखा और परखा भी
अपना आप कब गुम हुआ  
इसका न कभी गुमान हुआ  
ख़ुद को खोकर ख़ुद को भूलकर   
पल-पल मिटने का आभास हुआ  
पर मन के अंदर मेरा बचपन  
मेरी राह अगोरे बैठा है 
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

देकर शुभकामनाएँ मुझको  
मेरा बचपन कहता है आज  
अरमानों के पंख लगा  
वो चाहे उड़ जाए आज  
जो-जो छूटा मुझसे अब तक  
जो-जो बिछुड़ा देकर ग़म  
सब बिसूर कर हर दर्द को धकेलकर  
जा पहुँचूँ उम्र के उस पल पर  
जब रह गया था वो नितांत अकेला  
सबसे डरकर सबसे छुपकर  
अलमारी के खाने में मेरा बचपन  
मुझसे आस लगाए बैठा है  
आलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

बोला बचपन चुप-चुप मुझसे  
अब तो कर दो आज़ाद मुझको  
गुमसुम-गुमसुम जीवन बीता  
ठिठक-ठिठक बचपन गुज़रा  
शेष बचा है अब कुछ भी क्या  
सोच विचार अब करना क्या  
अंत से पहले बचपन जी लो  
अब तो ज़रा मनमानी कर लो  
मेरा बचपन ज़िद किए बैठा है 
आलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

आज़ादी की चाह भले है  
फिर से जीने की माँग भले है  
पर कैसे मुमकिन आज़ादी मेरी  
जब तुझपर है इतनी पहरेदारी  
तू ही तेरे बीते दिन है 
तू ही तो अलमारी है  
जिसके निचले खाने में  
सदियों से मैं छुपा बैठा हूँ  
तुझसे दब के तेरे ही अन्दर  
कैसे-कैसे टूटा हूँ कैसे-कैसे बिखरा हूँ  
मैं ही तेरा बचपन हूँ और मैं ही तुझसे रूठा हूँ  
हर पल तेरे संग जीया पर  
मैं ही तुझसे छूटा हूँ  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2015)  
(अपने जन्मदिन पर)
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रविवार, 1 नवंबर 2015

500. उऋण

उऋण 

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कुछ ऋण ऐसे हैं  
जिनसे उऋण होना नहीं चाहती  
वो कुछ लम्हे 
जिनमें साँसों पर क़र्ज़ बढ़ा  
वो कुछ एहसास  
जिनमें प्यार का वर्क चढ़ा  
वो कुछ रिश्ते  
जिनमें जीवन मिला  
वो कुछ नाते  
जिनमें जीवन खिला  
वो कुछ अपने  
जिन्होंने बेगानापन दिखाया  
वो पराए  
जिन्होने अपनापन सिखाया  
ये सारे ऋण  
सर माथे पर  
ये सब खोना नहीं चाहती  
इन ऋणों के बिना  
मरना नहीं चाहती  
ऋणों की पूर्णिमा रहे  
अमावस नहीं चाहती  
ये ऋण बढ़ते रहें  
मैं उऋण होना नहीं चाहती।  

- जेन्नी शबनम (1. 11. 2015)
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रविवार, 25 अक्तूबर 2015

499. नियति-चक्र (10 हाइकु) पुस्तक 75

नियति-चक्र 

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1. 
अपनी सुने    
नियति मग़रूर,  
मैं मज़बूर    

2. 
बदनीयत   
नियति की नीयत,    
जाल बिछाती   

3. 
स्वाँग करती    
साथी बन खेलती,    
धूर्त नियति    

4. 
नही सुनती  
करबद्ध विनती,  
ज़िद्दी नियति  

5. 
कैसे परखें,     
नियति का जो लेखा     
है अनदेखा  

6. 
खेल दिखाती    
मनमर्ज़ी करती     
दम्भी नियति  

7.   
दुःख देकर    
अट्टहास करती  
क्रोधी नियती   

8.   
नियती-चक्र   
सुख दुःख का वक्र,               
हम हैं मौन  

9. 
कैसी नियती?    
चुप भाग्य विधाता,       
कौन अपना?  

10.  
जादू की छड़ी  
नियती ने घुमाई  
खुशियाँ आई!  

- जेन्नी शबनम (25. 10. 2015)
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बुधवार, 30 सितंबर 2015

498. तुम्हारा इंतज़ार है (क्षणिका) (पुस्तक - 39)

तुम्हारा इंतज़ार है

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मेरा शहर अब मुझे आवाज़ नहीं देता  
नहीं पूछता मेरा हाल
नहीं जानना चाहता मेरी अनुपस्थिति की वजह
वक़्त के साथ शहर भी संवेदनहीन हो गया है
या फिर नई जमात से फ़ुर्सत नहीं   
कि पुराने साथी को याद करे
कभी तो कहे- "आ जाओ, तुम्हारा इंतज़ार है!'' 

- जेन्नी शबनम (30. 9. 2015)  
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सोमवार, 21 सितंबर 2015

497. मगज़ का वो हिस्सा

मगज का वो हिस्सा

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अपने मगज़ के उस हिस्से को 
काट देने का मन होता है
जहाँ पर विचार जन्म लेते हैं
और फिर होती है
व्यथा की अनवरत परिक्रमा,
जाने मगज़ का कौन सा हिस्सा है
जो जवाबदेह है
जहाँ सवाल ही सवाल उगते हैं
जवाब नहीं उगते
और जो मुझे सिर्फ़ पीड़ा देते हैं,
उस हिस्से के न होने से
न विचार जन्म लेंगे
न वेदना की गाथा लिखी जाएगी
न कोई अभिव्यक्ति होगी 
न कोई भाषा 
न कविता

- जेन्नी शबनम (21. 9. 2015)
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शनिवार, 18 जुलाई 2015

496. वो कोठरी

वो कोठरी

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वो कोठरी   
मेरे नाम की
जहाँ रहती थी मैं, सिर्फ़ मैं 
मेरे अपने पूरे संसार के साथ
इस संसार को छूने की छूट
या इस्तेमाल की इजाज़त किसी को नही थी,
ताखे पर क़रीने से रखा एक टेपरिकार्डर
अनगिनत पुस्तकें और सैकड़ों कैसेट
जिस पर अंकित मेरा नाम
ट्रिन-ट्रिन अलार्म वाली घड़ी
खादी के खोल वाली रज़ाई
सफ़ेद मच्छरदानी
सिरहाने में टॉर्च
लालटेन और दियासलाई 
जाने कब कौन मेरे काम आ जाए,
लकड़ी का एक पलंग और मेज़ 
जो पापा इस्तेमाल करते थे 
अब मेरे अधिकार में था 
ताखे में ज़ीरो पावर का लाल-हरा बल्ब
जिसकी रोशनी में कैमरे का रील साफ़ कर
पापा अपना शौक़ पूरा करते थे
वह लाल-हरी बत्ती सारी रात
मेरी निगहबानी करती थी
दिवार वाली एक आलमारी
जिसमें कभी पापा की किताबें आराम करती थीं
बाद में मेरी चीज़ों को सँभालकर रखती थी,
लोहे का दो रैक
जिसने दीवारों पर टँगे-टँगे  
पापा की किताबों को हटते
और मेरे सामानों को भरते हुए देखा था
लोहे का एक बक्सा
जो मेरी माँ के विवाह की निशानी है  
मेरे अनमोल ख़ज़ाने से भरा
टेबल बन बैठा रहता था,
वह छोटी-सी कोठरी धीरे-धीरे
पापा के नाम से मेरे नाम चढ़ गई
मैं पराई हुई मगर
वह कोठरी मेरे नाम से रह गई,  
अब भी वो कोठरी मुझे सपनों मे बुलाती है
जहाँ मेरी ज़िन्दगी की निशानी है
पापा की कोठरी जो बनी थी कभी मेरी    
अब मेरे नाम की भी न रही 
वो कोठरी
    

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2015)
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शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

495. दूब (घास पर 11 हाइकु) पुस्तक 73-74

दूब

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1.

बारहों मास
देती बेशर्त प्यार
दुलारी घास
   

2.
नर्म-नर्म-सी 
हरी-हरी ओढ़नी  
भूमि ने ओढ़ी    

3.
मोती बिखेरे    
शबनमी दूब पे,  
अरूणोदय
  

4.
दूब की गोद
यूँ सुखद प्रतीति  
ज्यों माँ की गोद
  

5.
पीली हो गई 
मेघ ने मुँह मोड़ा    
दूब बेचारी   

6.
धरा से टूटी
ईश के पाँव चढ़ी
पावन दूभी
  

7.
तमाम रात
रोती रही है दूब
अब भी गीली
  

8.
नर्म बिछौना
पथिक का सहारा
दूब बेसुध
  

9.
कभी आसन
कभी बनी भोजन,
कृपालु दूर्वा  

10.
ठंड व गर्म
मौसम को झेलती
अड़ी रहती !

11.
कर्म पे डटी
कर्तव्यपरायणा,
दूर्वा-जीवन
   

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2015)
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शुक्रवार, 29 मई 2015

494. दर्द (दर्द पर 20 हाइकु) (पुस्तक- 71-73)

दर्द 

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1.  
बहुत चाहा    
दर्द की टकसाल
नहीं घटती 

2.
दर्द है गंगा
यह मन गंगोत्री-
उद्गमस्थल
 

3.
मालूम होता
गर दर्द का स्रोत,
दफ़ना देते
  

4.
दर्द पिघला
बादल-सा बरसा
ज़माने बाद
 

5.
किस राह से
मन में दर्द घुसा,  
नहीं निकला
 

6.
टिका ही रहा
मन की देहरी पे,
दर्द अतिथि
 

7.
बहुत मारा
दर्द ने चाबुक से,  
मन छिलाया
 

8.
तू न जा कहीं,

दर्द के बिना जीना
आदत नहीं
 

9. 
यूँ तन्हा किया  
ज्यों चकमा दे दिया,  
निगोड़ा दर्द
  

10.
ये आसमान    
दर्द से रोता रहा,  
भीगी धरती 

11.
सौग़ात मिली,
प्रेम के साथ दर्द,  
ज्यों फूल-काँटे
  

12.
मन में खिले 
हर दर्द के फूल
रंग अनूठे
  

13.
तमाम रात
कल लटका रहा  
तारों-सा दर्द
  

14.
क़ैद कर दूँ
पिंजरे में दर्द को
जी चाहता है
  

15.
फुर्र से उड़ा
ज्यों ही तू घर आया
दर्द का पंछी
  

16. 
ज्यों ख़ाली हुई 
मन की पगडंडी,
दर्द समाया
  

17.
रोके न रुका, 
बेलगाम दौड़ता   
दर्द है आया  

18. 
प्यार भी देता
मीठा-मीठा-सा दर्द,  
यही तो मज़ा
  

19. 
दर्द उफना,  
बदरा बन घिरा,    
आँखों से गिरा  

20.
छुप न सका,
आँखो ने चुगली की  
दर्द है दिखा
   

- जेन्नी शबनम (22. 5. 2015) 
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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

493. सरल गाँव (गाँव पर 10 हाइकु) पुस्तक 70,71

सरल गाँव 

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1.
जीवन त्वरा
बची है परम्परा,     
सरल गाँव  

2.
घूँघट खुला, 
मनिहार जो लाया
हरी चूड़ियाँ। 

3.
भोर की वेला 
बनिहारी को चला   
खेत का साथी। 

4.
पनिहारिन 
मन की बतियाती  
पोखर सुने। 

5.
दुआ-नमस्ते
गाँव अपने रस्ते
साँझ को मिले। 

6.
खेतों ने ओढ़ी
हरी-हरी ओढ़नी
वो इठलाए। 

7.
असोरा ताके
कब लौटे गृहस्थ
थक हारके। 

8.
महुआ झरे
चुपचाप से पड़े,
सब विदेश। 

9.
उगा शहर
खंड-खंड टूटता
ग़रीब गाँव। 

10.
बाछी रम्भाए
अम्माँ गई जो खेत
चारा चुगने। 
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बनिहारी - खेतों में काम करना  
असोरा - ओसारा, दालान 
चुगने - एकत्र करना
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- जेन्नी शबनम (19. 3. 2015) 
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बुधवार, 1 अप्रैल 2015

492. दुःखहरणी

दुःखहरणी

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जीवन के तार को साधते-साधते   
मन रूपी अंगुलियाँ छिल गई हैं   
जहाँ से रिसता हुआ रक्त   
बूँद-बूँद धरती में समा रहा है,     
मेरी सारी वेदनाएँ सोखकर 
धरती पुनर्जीवन का रहस्य बताती है  
हारकर जीतने का मंत्र सुनाती है,    
जानती हूँ  
संभावनाएँ मिट चुकी हैं   
सारे तर्क व्यर्थ ठहराए जा चुके हैं  
पर कहीं न कहीं जीवन का कोई सिरा  
जो धरती के गर्भ में समाया हुआ है  
मेरी ऊँगलियों को थाम रखा है,    
हर बार अंतिम परिणाम आने से ठीक पहले  
यह धरती मुझे झकझोर देती है    
मेरी चेतना जागृत कर देती है
और मुझमें प्राण भर देती है,      
यथासंभव चेष्टा करती हूँ 
जीवन प्रवाहमय रहे
भले पीड़ा से मन टूट जाए
पर कोई जान न पाए  
क्योंकि धरती जो मेरी दुःखहरणी है
मेरे साथ है।  

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2015)
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रविवार, 15 मार्च 2015

491. युद्ध (क्षणिका)

युद्ध

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अबोले शब्द पीड़ा देते हैं
छाती में बहता ख़ून धक्के मारने लगा है
नियति का बहाना अब पुराना-सा लगता है,
जिस्म के भीतर मानो अँगारे भर दिए गए हैं  
जलते लोहे से दिल में सुराख़ कर दिए गए हैं
फिर भी बिना लड़े बाज़ी जीतने तो न देंगे
हाथ में क़लम ले जिगर चीर देने को मन उतावला है
बिगुल बज चूका है, युद्ध का प्रारंभ है।

- जेन्नी शबनम (15. 3. 2015)
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रविवार, 8 मार्च 2015

490. क्या हुक्म है मेरे आका

क्या हुक्म है मेरे आका

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अकसर सोचती हूँ 
किस ग्रह से मैं आई हूँ 
जिसका ठिकाना 
न कोख में, न घर में, न गाँव में, न शहर में  
मुमकिन है, उस ख़ुदा के घर में भी नहीं, 
अन्यथा क्रूरता के इस जंगल में 
बार-बार मुझे भेजा न गया होता 
चाहे जन्मूँ चाहे क़त्ल होऊँ 
चाहे जियूँ चाहे मरूँ 
चाहे तमाम दर्द के साथ हँसूँ, 
पग-पग पर एक कटार है 
परम्परा का, नातों का, नियति का 
जो कभी कोख में झटके से घुसता है 
कभी बदन में ज़बरन ठेला जाता है 
कभी कच्ची उम्र के मन को हल्के-हल्के चीरता है 
जरा-ज़रा सीने में घुसता है 
घाव हर वक़्त ताज़ा 
तन से मन तक रिसता रहता है,  
जाने ये कौन सा वक़्त है 
कभी बढ़ता नहीं 
दिन महीना साल सदी, कुछ बदलता नहीं 
हर रोज़ उगना-डूबना 
शायद सूरज ने अपना शाप मुझे दे दिया है, 
मेरी पीर 
तन से ज़्यादा, मन की पीर है 
मैं बुझना चाहती हूँ, मैं मिटना चाहती हूँ 
बेघरबार हूँ 
चाहे उस स्वर्ग में जाऊँ, चाहे इस नरक में टिकूँ, 
बहुत हुआ 
अब उस ग्रह पर लौटना चाहती हूँ 
जहाँ से इस जंगल में शिकार होने के लिए 
मुझे निहत्था भेजा गया है, 
जाकर शीघ्र लौटूँगी अपने ग्रह से 
अपने हथियार के साथ 
फिर करूँगी 
उन जंगली जानवरों पर वार
जिन्होंने अपने शौक के लिए मुझे अधमरा कर दिया है
मेरी साँसों को बंधक बना कर रखा है
बोतल के जिन की तरह, जो कहे-
''क्या हुक्म है मेरे आका!''

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2015)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
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शुक्रवार, 6 मार्च 2015

489. इन्द्रधनुषी रंग (होली पर 10 हाइकु) पुस्तक 69,70

इन्द्रधनुषी रंग

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1.
तन पे चढ़ा
इन्द्रधनुषी रंग
फगुआ मन।    

2.
नाचे बहार
इठलाती है मस्ती
रंग हज़ार।  

3.
गिले-शिकवे  
कपूर से हैं उड़े   
होली मिलन। 

4.
रंग में भीगी
पर नहीं रंगीली  
बेरंग होली।  

5.
खेलूँगी होली
तेरी यादों के साथ
तू नहीं पास।  

6.
होली लजाई
वसंत ने जो छेड़े
फगुआ-तान।  

7.
कच्ची अमिया
फगुआ में नहाई
मुरब्बा बनी। 

8.
है हुड़दंग
हवा ने छानी भंग  
झूमे मलंग।   

9.
आम्र-मंजरी 
डाल पे हैं झूलती 
गाए फगुआ।   

10.
काहे न टिके
रंगो का ये मौसम
बारहों मास।  

- जेन्नी शबनम (5. 3. 2015)
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मंगलवार, 3 मार्च 2015

488. स्त्री की डायरी (क्षणिका)

स्त्री की डायरी

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स्त्री की डायरी उसका सच नहीं बाँचती    
स्त्री की डायरी में उसका सच अलिखित छपा होता है  
इसे वही पढ़ सकता है, जिसे वो चाहेगी   
भले दुनिया अपने मनमाफ़िक  
उसकी डायरी में हर्फ़ अंकित कर ले।    

- जेन्नी शबनम (3. 3. 2015)
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रविवार, 1 मार्च 2015

487. वासन्ती प्यार (वसंत ऋतु पर 5 हाइकु) पुस्तक 69

वासन्ती प्यार  

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1.  
वासन्ती प्यार    
नस-नस में घुली,   
हँसी, बहार।   

2.
वासन्ती धुन  
आसमान में गूँजे  
मनवा झूमे।   

3.
प्रणय पुष्प
चहुँ ओर है खिला  
रीझती फ़िज़ा।  

4.
मन में ज्वाला 
मरहम लगाती    
वसन्ती हवा।   

5.
बसन्ती रंग 
छितराई सुगंध  
फूलों के संग।   

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2015)
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

486. धृष्टता

धृष्टता

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जितनी बार तुमसे मिली 
ख़्वाहिशों ने जन्म लिया मुझमें  
जिन्हें यकीनन पूरा नहीं होना था  
मगर दिल कब मानता है?  
यह समझती थी
तुम अपने दायरे से बाहर न आओगे
फिर भी एक नज़र देखने की आरज़ू
और चुपके से तुम्हें देख लेती
नज़रें मिलाने से डरती
जाने क्यों खींचती हैं तुम्हारी नज़रें?
अब भी याद है
मेरी कविता पढ़ते हुए
उसमें ख़ुद को खोजने लगे थे तुम  
अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से
तपाक से कह उठी मैं-
''पात्र को न खोजना''
फिर भी तुमने ख़ुद को खोज ही लिया उसमें
मेरी इस धृष्टता पर मुस्कुरा उठे तुम
और चुपके से बोले-
''प्रेम को बचा कर नहीं रखो''   
मैं कहना चाहती थी-
बचाना ही कब चाहती हूँ
तुम मिले जो न थे तो ख़र्च कैसे करती  
पर, कह पाना कठिन था  
शायद जीने से भी ज़्यादा
अब भी जानती हूँ 
महज़ शब्दों से गढ़े पात्र में तुम ख़ुद को देखते हो 
और बस इतना ही चाहते भी हो
उन शब्दों में जीती मैं को 
तुमने कभी नहीं देखा या देखना ही नहीं चाहा 
बस कहने को कह दिया था
फिर भी एक सुकून है
मेरी कविता का पात्र
एक बार अपने दायरे से बाहर आ
मुझे कुछ लम्हे दे गया था
।    

- जेन्नी शबनम (26. 2. 2015)
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शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

485. लम्हों का सफ़र (पुस्तक 89)

लम्हों का सफ़र 

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आसमान की विशालता  
जब अधीरता से खींचती है  
धरती की गूढ़ शिथिलता  
जब कठोरता से रोकती है  
सागर का हठीला मन
जब पर्वत से टकराता है  
तब एक आँधी
मानो अट्टहास करते हुए गुज़रती है  
कलेजे में नश्तर चुभता है   
नस-नस में लहू उत्पात मचाता है  
वक़्त का हर लम्हा, काँपता थरथराता   
ख़ुद को अपने बदन में नज़रबंद कर लेता है।    

मन हैरान है, मन परेशान है   
जीवन का अनवरत सफ़र
लम्हों का सफ़र
जाने कहाँ रुके, कब रुके  
जीवन के झंझावत, अब मेरा बलिदान माँगते हैं
मन न आह कहता है, न वाह कहता
कहीं कुछ है, जो मन में घुटता है
पल-पल मन में टूटता है
मन को क्रूरता से चीरता है।    

ठहरने की बेताबी, कहने की बेक़रारी
अपनाए न जाने की लाचारी
एक-एक कर, रास्ता बदलते हैं
हाथ की लकीर और माथे की लकीर
अपनी नाकामी पर
गलबहिया डाले, सिसकते हैं।    

आकाश और धरती
अब भावविहीन हैं
सागर और पर्वत चेतनाशून्य हैं
हम सब हारे हुए मुसाफ़िर
न एक दूसरे को ढाढ़स देते हैं
न किसी की राह के काँटे बीनते हैं
सब के पाँव के छाले
आपस में मूक संवाद करते हैं।    

अपने-अपने, लम्हों के सफ़र पर निकले हम
वक़्त को हाज़िर नाज़िर मानकर
अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं   
चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं।  

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2015)
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

484. मन! तुम आज़ाद हो जाओगे

मन! तुम आज़ाद हो जाओगे  

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अक्स मेरा मन मुझसे उलझता है  
कहता है- 
वो सारे सच जिसे मन की तलहटी में  
जाने कब से छुपाया है मैंने  
जगज़ाहिर कर दूँ।  
चैन से सो नहीं पाता है वो
सारी चीख़ें, हर रात उसे रुलाती हैं
सारी पीड़ा भरभराकर  
हर रात उसके सीने पर गिर जाती हैं  
सारे रहस्य हर रात कुलबुलाते हैं
और बाहर आने को धक्का मारतें हैं    
इस जद्दोज़हद में गुज़रती हर रात  
यूँ लगता है 
मानो आज आख़िरी है।  
लेकिन सहर की धुन जब बजती है  
मेरा मन ख़ुद को ढाढ़स देता है
बस ज़रा-सा सब्र और कर लो
मुमकिन है एक रोज़ 
जीवन से शब बिदा हो जाएगी  
उस आख़िरी सहर में  
मन! तुम आज़ाद हो जाओगे।  

- जेन्नी शबनम (10. 2. 2015)
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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

483. आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम (तुकांत)

आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम 

******* 

इल्म न था इस क़दर टूटेंगे हम   
ये आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम।    

सपनों की बातें सारी झूठी-मुठी
लेकिन कच्चे-पक्के सब बोएँगे हम।    

मालूम तो थी तेरी मग़रूरियत
पर तुझको चाहा कैसे भूलेंगे हम।    

तेरे लब की हँसी पे हम मिट गए
तुझसे कभी पर कह न पाएँगे हम।    

तुम शेर कहो हम ग़ज़ल कहें
ऐसी हसरत ख़ुद मिटाएँगे हम।    

तू जानता है पर ज़ख़्म भी देता है
तुझसे मिले दर्द से टूट जाएँगे हम।    

किसने कब-कब तोड़ा है 'शब' को
यह कहानी नही सुनाएँगे हम।   

- जेन्नी शबनम (5. 2. 2015) 
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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

482. शुभ-शुभ (क्षणिका)

शुभ-शुभ

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हज़ारों उपाय, मन्नतें, टोटके 
अपनों ने किए ताकि अशुभ हो   
मगर ग़ैरों की बलाएँ, परायों की शुभकामनाएँ  
निःसंदेह कहीं तो जाकर लगती हैं 
वर्ना जीवन में शुभ-शुभ कहाँ से होता
।  

- जेन्नी शबनम (15. 1. 2015) 
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सोमवार, 5 जनवरी 2015

481. वक़्त बेख़ौफ़ चलता रहे साल दर साल

वक़्त बेख़ौफ़ चलता रहे साल दर साल

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वक़्त 
साल दर साल, सदी दर सदी, युग दर युग
चलता रहा, बीतता रहा, टूटता रहा
कभी ग़म गाता
कभी मर्सिया पढ़ता
कभी ख़ौफ़ के चौराहे पर काँपता
कभी मासूम इंसानी ख़ून से रंग जाने पर
असहाय ज़ार-ज़ार रोता
कभी पर्दानशीनों की कुचली नग्नता पर बिलखता
कभी हैवानियत से हारकर तड़पता
ओह! 
कितनी लाचारगी कितनी बेबसी वक़्त झेलता है
फिर चल पड़ता है लड़खड़ाता डगमगाता
चलना ही पड़ता है उसे हर यातनाओं के बाद
नहीं मालूम
थका हारा लहूलुहान वक़्त
चलते-चलते कहाँ पहुँचेगा
न पहला सिरा याद न अंतिम का कोई निशान शेष
जहाँ ख़त्म हो कायनात
ताकि पल भर थमकर सुन्दर संसार की कल्पना में
वक़्त भर सके एक लम्बी साँस
और कहे उन सारे ख़ुदाओं से
जिसके दीवाने कभी आदमजात हुए ही नहीं
कि ख़त्म कर दो यह खेल
मिटा दो सारा झमेला
न कोई दास न कोई शासक
न कोई दाता न कोई याचक
न धर्म का कारोबार
न कोई किसी का पैरोकार
इस ग्रह पर इंसान की खेती मुमकिन नहीं   
न ही संभव है कोई कारगर उपाय 
एक प्रलय ला दो कि बन जाए यह पृथ्वी
उन ग्रहों की तरह
जहाँ जीवन के नामोनिशान नहीं
और तब, फिर से बसाओ यह धरती
उगाओ इंसानी फ़सल
जिनके हों बस एक धर्म
जिनकी हो बस एक राह
सर्वत्र खिले फूल ही फूल 
चमकीले-चमकीले तारों जैसे
और वक़्त बेख़ौफ़ ठठाकर हँसता रहे  
संसार की सुन्दरता पर मचलता रहे 
झूमते नाचते चलता रहे 
साल दर साल 
सदी दर सदी 
युग दर युग।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2015)
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

480. नूतन साल (नव वर्ष पर 7 हाइकु) पुस्तक 68,69

नूतन साल

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1. 
वक़्त सरका  
लम्हे भर को रुका   
यादें दे गया।  

2. 
फूल खिलेंगे  
तिथियों के बाग़ में   
ख़ुशबू देंगे।  

3. 
फुर्र से उड़ा 
थका पुराना साल  
नूतन आया।   

4. 
एक भी लम्हा 
हाथ में न ठहरा   
बीते साल का।  

5. 
मुझ-सा तू भी  
हो जाएगा अतीत,   
ओ नया साल।  

6. 
साल यूँ बीता 
मानो अपना कोई   
हमसे रूठा।  

7. 
हँसो या रोओ  
बीता पूरा बरस  
नए को देखो।  

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2015)
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