रंगरेज़ हमारा
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सुहानी संध्या
डूबने को सूरज
देखो नभ को
नारंगी रंग फैला
मानो सूरज
एक बड़ा संतरा,
साँझ की वेला
दीया-बाती जलाओ
गोधूली-वेला
देवता को जगाओ
ऋचा सुनाओ
अपनी संस्कृति को
न बिसराओ,
शाम होते ही जब
लौटते घर
विचरते परिन्दे
गलियाँ सूनी
जगमग रोशनी
वो देखो चन्दा
हौले-हौले मुस्काए
साँझ ढले तो
सूरज सोने जाए
तारे चमके
टिम-टिम झलके
काली स्याही से
गगन रंग देता
बड़ा सयाना
रंगरेज़ हमारा
सबका प्यारा
अनोखी ये दुनिया
किसने रची!
हर्षित हुआ मन
घर-आँगन
देख सुन्दर रूप
चकित निहारते।
-जेन्नी शबनम (13.8.2012)
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