बुधवार, 8 जुलाई 2020

678. इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

******* 

दो चार फ़िक्र हैं जीवन के   
मिले गर कोई राह, चले जाओ   
बेफ़िक्री लौटा लाओ   
कह तो दिया कि दूर जाओ   
निदान के लिए सपने न देखो   
राह पर बढ़ो, बढ़ते चले जाओ   
वहाँ तक जहाँ पृथ्वी का अंत है   
वहाँ तक जहाँ कोई दुष्ट है या संत है   
बस इंसान नहीं है, प्यार से कोई पहचान नहीं है   
या वहाँ जहाँ क्षितिज पर आकाश से मिलती है धरा   
या वहाँ जहाँ गुम हो जाए पहचान, न हो कोई अपना   
मत सोचो देस परदेस   
भूल जाओ सब तीज-त्योहार   
बिसरा दो सब प्यार-दुलार   
लौट न पाओ कभी   
मिल न पाओ अपनों से कभी   
यह पीर मन में बसा कर रखना   
पर हिम्मत कभी न हारना   
यायावर-सा न भटकना तुम   
दिग्भ्रमित न होना तुम   
अकारण और नहीं रोना तुम   
एक ठोस ठौर ढूँढ कर   
सपनों में हमको सजा लेना   
मन में लेकर अपनों की यादें   
पूरी करना बुनियादी जरूरतें   
आस तो रहेगी तुम्हें   
अपने उपवन की झलक पाने की   
कुटुम्बों संग जीवन बीताने की   
वंशबेल को देखने की   
प्रियतमा के संग-साथ की   
मिलन की किसी रात की   
पर समय की दरकार है   
तकदीर की यही पुकार है   
कोई उम्मीद नहीं कोई आस नहीं   
किसी पल पर कोई विश्वास नहीं   
रहा सहा सब पिछले जन्म का भाग्य है   
इस जनम का इतना ही इंतजाम है   
बाकी सब अगले जन्म का ख्वाब है   
निपट जाए जीवन-भँवर   
बस इतना ही हिसाब है   
चार दिन का जीवन   
दो जून की रोटी   
बदन पर दो टुक चीर   
फूस का अक्षत छप्पर   
बस इतनी-सी दरकार है   
बस इतनी-सी तो बात है।   

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2020) 
______________________________________

बुधवार, 1 जुलाई 2020

677. सँवरने नहीं देती

सँवरने नहीं देती

****** 

दर्द की ज़ुबान मीठी है बहकने नहीं देती   
लहू में डूबी है ज़िन्दगी सँवरने नहीं देती !   

इक रूह है जो जिस्म में तड़पती रहती है   
कमबख्त साँस हैं जो निकलने नहीं देती !   

मसला तो हल न हुआ बस चलते ही रहे   
थक गए पर ये ज़िन्दगी थमने नहीं देती !   

वक़्त के ताखे पे रखी रही उम्र की बाती   
किस्मत गुनहगार ज़िन्दगी जलने नहीं देती !   

अब रूसवाई क्या और भला किससे करना   
चाक-चाक दिल मगर आँसू बहने नहीं देती !   

मेरे वास्ते अपनों की भीड़ ने कजा को पुकारा   
शब से रूठी है कजा उसको मरने नहीं देती !   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2020) 
___________________________________

शुक्रवार, 26 जून 2020

676. रीसेट

रीसेट

******* 

हयात के लम्हात, दर्द में सने थे   
मेरे सारे दिन-रात, आँसू से बने थे   
नाकामियों, नादानियों और मायूसियों के तूफ़ान   
मन में लिए बैठे थे   
वक़्त से सुधारने की गुहार लगाते-लगाते   
बेज़ार जिए जा रहे थे   
हम थे पागल, जो माजी से प्यार किए जा रहे थे   
कल वक़्त ने कान में चुपके से कहा -   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो   
जितनी बची है, उतनी ज़िन्दगी भरपूर जी लो   
दर्द को खा लो, आँसू को पी लो   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो !   

- जेन्नी शबनम (26. 6. 2020) 
_____________________________________  

मंगलवार, 23 जून 2020

675. ईनार

ईनार

******* 

मन के किसी कोने में   
अब भी गूँजती हैं कुछ धुनें   
रस्सी का एक छोर पकड़   
छपाक से कूदती हुई बाल्टी   
ईनार पर लगी हुई चकरी से   
एक सुर में धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती बाल्टी   
टन-टन करती बड़ी बाल्टी छोटी बाल्टी   
लोटा-कटोरा और बाल्टी-बटलोही   
सब करते रहते खूब बतकही   
दाँत माँजना बर्तन माँजना   
कपड़ा फींचना दुख-सुख गुनना   
ननद-भौजाई की हँसी ठिठोली   
सास-पतोह की नोक झोंक   
बाबा-दादी के आते ही   
घूँघट काढ़ करती हड़बड़ी   
चिल्ल-पों करते बच्चों का नहाना   
तुरहा-तुरहिन का आकर साँसे भरना   
प्यासे बटोही की अँजुरी में   
बाल्टी से पानी उड़ेल-उड़ेल पिलाना   
लोटा में पानी भरकर सूरज को अर्घ्य देना   
रोज-रोज वही दृश्य पर ईनार चहकता हर दिन   
भोर से साँझ प्यार लुटाता रुके बिन   
एक सामूहिक सहज जीवन   
समय के साथ बदला मन   
दुख-सुख का साथी ईनार, अब मर गया है   
चापाकल घर-घर आ गया है   
परिवर्तन जीवन का नियम है   
पर कुछ बदलाव टीस दे जाता है   
आज भी ईनार बहुत याद आता है। 

- जेन्नी शबनम (23. 6. 2020) 
_________________________________

रविवार, 21 जून 2020

674. बोनसाई

बोनसाई 

******* 

हज़ारों बोनसाई उग गए हैं   
जो छोटे-छोटे ख्वाबों की पौध हैं   
ये पौधे अब दरख़्तों में तब्दील हो चुकें हैं   
ये सदा हरे भरे नहीं रहते   
मुरझा जाने को होते ही हैं   
कि रहम की ज़रा-सी बदली बरसती है   
वे ज़रा-ज़रा हरियाने लगते हैं   
फिर कुनमुना कर सब जीने लगते हैं   
वे अक्सर अपने बौनेपन का प्रश्न करते हैं   
आख़िर वे सामान्य क्यों न हुए, क्यों बोनसाई बन गए   
ये कैसा रहस्य है   
ये ऐसे दरख़्त क्यों हुए, जो किसी को छाँव नहीं दे सकते   
फलने-फूलने-जीने के लिए हज़ार मिन्नतें करते हैं   
फिर मौसम को तरस आता है   
वे ज़रा-सी धूप और पानी दे देते हैं   
आख़िर ऐसा क्यों है   
क्यों बिन माँगे मौसम उन्हें कुछ न देता   
क्यों लोग हँसते हैं उसके ठिगनेपन पर   
बोनसाई होना उनकी चाहत तो न थी   
सब तक़दीर के तमाशे हैं   
जो वे भुगतते हैं   
रोज़ मर-मर कर जीते है   
पर ख़्वाबों के ये बोनसाई   
कभी-कभी तन्हाई में हँसते भी हैं !   

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2020)
________________________________________

मंगलवार, 16 जून 2020

673. ख़ाली हाथ जाना है

ख़ाली हाथ जाना है 

******* 

ख़ाली हाथ हम आए थे   
ख़ाली हाथ ही जाना है !  

तन्हा-तन्हा रातें गुज़री   
तन्हा दिन भी बिताना है !  

समझ-समझ के समझे क्यों   
समझ से दिल कब माना है !  

कतरा-कतरा जीवन छूटा   
कतरा-कतरा सब पाना है !  

बूँद-बूँद बिखरा लहू   
बूँद-बूँद मिट आना है !  

झम-झम बरसी आँखें उसकी   
झम-झम जल ये चखाना है !  

'शब' को याद मत करो तुम   
उसका गया जमाना है !  

- जेन्नी शबनम (16. 6. 2020)
_________________________
  

मंगलवार, 9 जून 2020

672. आईना और परछाई

आईना और परछाई 

****** 

आईना मेरा सखा   
जो मुझसे कभी झूठ नहीं बोलता   
परछाई मेरी सखी   
जो मेरा साथ कभी नहीं छोड़ती   
इन दोनों के साथ मैं   
जीवन के धूप-छाँव का खेल खेलती   
आईना मेरे आँसू पोछता   
बिना थके मुझे सदा हँसाता   
परछाई मेरे संग-संग घूमती   
अँधियारे से मैं जब-जब डरती   
मेरा हाथ पकड़ वो रोशनी में भागती   
हाँ ! यह अलग बात   
आजकल आईना मुझसे रूठा है   
मैं उससे मिलने नहीं जाती   
उसका सच मैं देखना नहीं चाहती   
आजकल मेरी परछाई मुझसे लड़ती है   
मैं अँधेरों से बाहर नहीं निकलती   
जाने क्यों रोशनी मुझे नहीं सुहाती।   
जानती हूँ, ये दोनों साथी   
मेरे हर वक्त के राज़दार हैं   
मेरा आईना मेरा मन   
मेरी परछाई मेरी साँसें   
ये कभी न छोड़ेंगे मेरा दामन । 

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2020) 
____________________________

शुक्रवार, 5 जून 2020

671. फूलवारी

फूलवारी 

******* 

जब भी मिलने जाती हूँ   
कसकर मेरी बाँहें पकड़, कहती है मुझसे -   
अब जो आई हो, तो यहीं रह जाओ   
याद करो, जब अपने नन्हे-नन्हे हाथों से   
तुमने रोपा था, हम सब को   
देखो कितनी खिली हुई है बगिया   
पर तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता   
बहुत याद आती हो तुम   
शहर में न तो फूल है न फूलवारी   
रूक जाओ न यहीं पर   
बचपन के दिनों सी बौराई फिरना।  

- जेन्नी शबनम (5. 6. 2020) 
_________________________________

मंगलवार, 2 जून 2020

670. रंग

रंग

*****

बेरंग जीवन बेनूर न हो   
कर्ज में माँग लायी मौसम से ढ़ेरों रंग   
लाल पीले हरे नीले नारंगी बैगनी जामुनी   
छोटी-छोटी पोटली में बड़े सलीके से लेकर आई   
और खुद पर उड़ेल कर ओढ़ लिया मैंने इंद्रधनुषी रंग   
अब चाहती हूँ   
रंगों का कर्ज चुकाने, मैं मौसम बन जाऊँ   
मैं रंगों की खेती करूँ और खूब सारे रंग मुफ़्त में बाँटूँ   
उन सभी को जिनके जीवन में मेरी ही तरह रंग नहीं है   
जिन्होंने न रोटी का रंग देखा न प्रेम का   
न जमीन का न आसमान का   
चाहती हूँ   
अपने-अपने शाख से बिछुड़े पेट की आग का रंग ढूँढते-ढूँढते   
बेरंग सपनों में जीने वाले   
अब रंगों से होली खेलें रंगों से ही दिवाली भी   
रंगों के सपने हों रंगों की ही हकीकत हो   
रंग रंग रंग !   
क़र्ज़ क़र्ज़ क़र्ज़ !   
ओह ! मौसम ! नहीं चुकाऊँगी उधारी   
कितना भी तगादा करो चाहे न निभाओ यारी   
तुम्हारी उधारी तब तक   
जब तक मैं मौसम न बन जाऊँ।   

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2020) 
___________________________________________

सोमवार, 1 जून 2020

669. सीता की पीर

सीता की पीर 

******* 

1. 
राह अगोरे  
शबरी-सा ये मन,  
कब आओगे?  

2. 
अहल्या बनी  
कोई राम न आया  
पाषाण रही।  

3. 
चीर-हरण,  
द्रौपदी का वो कृष्ण  
आता न अब।  

4. 
शुचि द्रौपदी  
पाँच वरों में बँटी,  
किसका दोष?  

5. 
कर्ण का दान  
कवच व कुंडल,  
कुंती बेकल।  

6. 
सीता है स्तब्ध  
राम का तिरस्कार  
भूमि की गोद।  

7. 
सीता की पीर  
माँ धरा ने समेटी  
दो फाँक हुई।  

8. 
स्पंदित धरा  
फटा धरा का सीना  
समाई सीता।  

9. 
त्रिदेव शिशु,  
सती अनसूइया  
आखिर हारे।  

10. 
सती का कुंड  
अब भी प्रज्वलित,  
कोई न शिव।  

- जेन्नी शबनम (31. 5. 2020)
________________________



शनिवार, 30 मई 2020

668. नीरवता

नीरवता 

****** 

मन के भीतर   
एक विशाल जंगल बस गया है   
जहाँ मेरे शब्द चीखते चिल्लाते हैं   
ऊँचे वृक्षों-सा मेरा अस्तित्व   
थक कर एक छाँव ढूँढ़ता है   
लेकिन छाँव कहीं नहीं है   
मैंने खुद वृक्षों का कत्ल किया था,   
इस बीहड़ जंगल से अब मन डरने लगा है   
ढूँढती हूँ पुकारती हूँ   
पर कहीं कोई नहीं है   
मैंने इस जंगल में आने का न्योता   
कभी किसी को दिया ही नहीं था,   
मन में ये कैसा कोलाहल ठहर गया है?   
जानवरों के जमावड़े का ऊधम है या मेरे सपने टकरा रहे हैं?   
कभी मैंने अपनी सभी ख्वाहिशों को   
ताकत के रूप में बाँट कर, आपस में लड़ा दिया था   
और जो बच गए थे उन्हें आग में जला डाला   
अब तो सब लुप्त हो चुके हैं   
मगर शोर है कि थमता ही नहीं,   
मन का यह जंगल न आग लगने से जलता है   
न आँधियों में उजड़ता है   
नीरवता व्याप्त है, जंगल थरथरा रहा है   
अब कयामत आने को है।  

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2020) 
____________________________________________

सोमवार, 25 मई 2020

667. मंत्र

मंत्र

****** 

अपनी पीर छुपाकर जीना   
मीठे कह के आँसू पीना   
ये दस्तूर निभाऊँ कैसे   
जिस्म है घायल छलनी सीना   
रिश्ते नाते अब निभते कहाँ   
शिकवे शिकायत किससे भला   
गली चौबारे खुद में सिमटे   
दरख़्त भी हुए टुकड़े-टुकड़े   
संवेदनाओं की बली चढ़ाकर   
मतलबपरस्त हो गई दुनिया   
खिदमत में मिट जाओ भी गर   
किस्मत सोई कहेगी दुनिया   
साथ नहीं कोई ब्रह्म बाबा   
पीर-पैगम्बर का नहीं सहारा   
पीर पराई समझे कब कोई   
मर-मर कर जीना छोड़े हर कोई   
खतम न हो ताल्लुकात सारा   
जीने का यह मंत्र दोहराना।  

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2020) 
_____________________________


शुक्रवार, 22 मई 2020

666. स्वाद / बेस्वाद (10 क्षणिकाएँ)

स्वाद / बेस्वाद

******* 

1. 
तेरे इश्क का स्वाद   
मीठे पानी के झरने-सा   
प्यास से तड़पते राही को   
इक घूँट भर भी मिल जाए   
पीर-पैगंबर की दुआ   
कुबूल हो जाए।   

2. 
एक घूँट इश्क   
और तेरा स्वाद   
अस्थि-मज्जा में जा घुला   
जिसके बिना   
जीवन नामुमकिन।   

3. 
उस रोज़ नथुनों में समा गई   
रजनीगंधा की खुश्बू   
जो तेरे बदन को छूती हुई   
मुझसे आकर लिपट गई थी   
और मेरी साँसों में तू ठहर गया था   
रजनीगंधा की खुश्बू अब भी आती है   
और मुझे छूकर गुजर जाती है   
पर कोई और खुश्बू अब मुझे भाती नहीं   
तेरा स्वाद मेरे मन ने   
एक बार चख जो लिया है।   

4. 
तेरी बातें तेरी मर्जी   
तेरी दीद तेरी मनमर्जी   
तेरी मर्जी तेरी मनमर्जी   
इसमें कहाँ मेरी मर्जी   
तेरी मर्जी का स्वाद   
बड़ा ही तीखा   
भा गई मुझको तेरी मर्जी   
अब तेरी मर्जी मेरी मर्जी।   

5. 
जीवन का स्वाद   
मैंने घूँट-घूँट पीकर लिया   
एक घूँट तेरे वास्ते बचा कर रखा है   
गर मिलो कभी तुम   
वह घूँट तुम पी लेना   
मेरी ज़िन्दगी की कड़वाहट   
तुम भी जी लेना।   

6. 
कुछ खट्टी कुछ मीठी   
स्वाद से भरी मेरी ज़िन्दगी   
थोड़ी नरम थोड़ी गरम   
गुलगुले-सी मेरी ज़िन्दगी   
आओ थोड़ा तुम भी चख लो   
एक और स्वाद का मजा ले लो।   

7. 
तेरा स्वाद बदन में घुल गया था   
जब इश्क का जाम पिया मैंने   
अब सब बेस्वाद हो गया है   
जब से तेरा इश्क   
कहीं और आबाद हुआ है।   

8. 
झामे से खुरच-खुरच कर   
पूरे बदन को छील दिया है   
कि रिसते लहू के साथ   
तेरे इश्क का स्वाद बह जाए।   

9. 
तेरे इश्क का स्वाद   
कितना कसैला है   
जब-जब तेरी याद आई   
उबकाई-सी आती है।   

10. 
कैसी कसक थी   
झिझक में जीती रही   
कहने की बेताबी   
मगर कभी कह न सकी   
दर्दे ए एहसास नहीं रेशमी   
मेरे अल्फ़ाज़ हो गए कागजी   
जाने किस चूल्हे पर पकी किस्मत   
जो ज़िन्दगी का स्वाद कसैला हुआ।   

- जेन्नी शबनम (22. 5. 2020) 
________________________________

बुधवार, 20 मई 2020

665. कहा-सुनी जारी है

कहा-सुनी जारी है

*******

पल-पल समय के साथ, कहा-सुनी जारी है   
वो कहता रहता है, मैं सुनती रहती हूँ,   
अरेब-फरेब, जो उसका मन, बोलता रहता है   
कान में पिघलता सीसा, उड़ेलता रहता है   
मैं हूंकार भरती रहती हूँ, मुस्कुराती रहती हूँ   
अपना अपनापा दिखाती रहती हूँ,   
नहीं याद क्या-क्या सुनती रहती हूँ   
नहीं याद क्या-क्या बिसराती जाती हूँ   
जितना मेरा मन किया, उतना ही सुनती हूँ   
बहुत कुछ अनसुना करती हूँ,   
न उसे पता कि मैंने क्या-क्या न सुना   
न मुझे पता कि उसने मुझे कितना-कितना धिक्कारा   
कितना-कितना दुत्कारा,   
फिर भी सब कहते हैं   
हमारे बीच बड़ा प्यारा संबंध है   
न हम लड़ते-झगड़ते दिखते हैं   
न कभी कहा-सुनी होती है   
बहुत प्यार से हम जीते हैं,   
यह हर कोई जानता है   
कहासुनी में दोनों को बोलना पड़ता है   
अपना-अपना कहना होता है   
दूसरों का सुनना होता है,   
पर मेरे और समय के बीच   
अजब-सा नाता है   
वो कहता जाता है, मै सुनती जाती हूँ   
और कहा-सुनी जारी रहती है,   
कहा-सुनी जारी है। 

 - जेन्नी शबनम (20. 5. 2020) 
__________________________________  

शुक्रवार, 15 मई 2020

664. लॉकडाउन

लॉकडाउन 

******* 

लॉकडाउन से जब शहर हुए हैं वीरान  
बढ़ चुकी है मन के लॉकडाउन की भी मियाद  
अनजाने भय से मन वैसे ही भयभीत रहता है  
जैसे आज महामारी से पूरी दुनिया डरी हुई है  
मन को हजारों सवाल बेहिसाब तंग करते हैं  
जैसे टी वी पर चीखते खबरनवीसों के कुतर्क असहनीय लगते हैं  
कितना कुछ बदल दिया इस नन्हे-से विषाणु ने  
मानव को उसकी औकात बता दी, इस अनजान शत्रु ने,  
आज ताकत के भूखे नरभक्षी, अपने बनाए गढ्ढे में दफन हो रहे हैं  
भात-छत के मसले, वोटों की गिनती में जुट रहे हैं  
सैकड़ों कोस चल-चल कर, कोई बेदम हो टूट रहा है  
बदहवास लोगों के ज़ख्मों पर, कोई अपनी रोटी सेंक रहा है  
पेट-पाँव झुलस रहे हैं, आत्माएँ सड़कों पर बिलख रही हैं  
रूह कँपाती खबरें हैं, पर अधिपतियों को व्याकुल नहीं कर रही हैं  
अफवाहों के शोर में, घर-घर पक रहे हैं तोहमतों के पकवान  
दिल दिमाग दोनों त्रस्त हैं, चारों तरफ है त्राहि-त्राहि कोहराम,  
मन की धारणाएँ लगातार चहल कदमी कर रही है  
मंदिर-मस्जिद के देवता लम्बी छुट्टी पर विश्राम कर रहे हैं  
इस लॉकडाउन में मन को सुकून देती पक्षियों की चहचहाहट है  
जो सदियों से दब गई थी मानव की चिल्ला-चिल्ली में  
खुला-खुला आसमान, खिली-खिली धरती है  
सन्न-सन्न दौड़ती हवा की लहरें हैं  
आकाश को पी-पीकर ये नदियाँ नीली हो गई हैं  
संवेदनाएँ चौक-चौराहों पर भूखे का पेट भर रही हैं  
ढ़ेरों ख़ुदा आसमान से धरती पर उतर आए हैं अस्पतालों में  
खाकी अपने स्वभाव के विपरीत मानवीय हो रही है  
सालों से बंद घर फिर से चहक रहा है  
अपनी-अपनी माटी का नशा नसों में बहक रहा है,  
बहुत कुछ भला-भला-सा है, फिर भी मन बुझा-बुझा-सा है  
आँखे सब देख रहीं हैं, पर मन अपनी ही परछाइयों से घबरा रहा है  
आसमाँ में कहकशाँ हँस रही है, पर मन है कि अँधेरों से निकलता नहीं  
जाने यह उदासियों का मौसम कभी जाएगा कि नहीं,  
तय है, शहर का लॉकडाउन टूटेगा  
साथ ही लौटेंगी बेकाबू भीड़, बदहवास चीखें  
लौटेगा प्रदूषण, आसमान फिर ओझल होगा  
फिर से कैद होंगी पशु-पक्षियों की जमातें,  
हाँ, लॉकडाउन तो टूटेगा, पर अब नहीं लौटेगी पुरानी बहार  
नहीं लौटेंगे वे जिन्होंने खो दिया अपना संसार  
सन्नाटों के शहर में अब सब कुछ बदल जाएगा  
शहर का सारा तिलिस्म मिट जाएगा  
जीने का हर तरीका बदल जाएगा  
रिश्ते, नाते, प्रेम, मोहब्बत का सलीका बदल जाएगा,  
यह लॉकडाउन बहुत-बहुत बुरा है  
पर थोड़ा-थोड़ा अच्छा है  
यह भाग-दौड़ से कुछ दिन आराम दे रहा है  
चिन्ताओं को ज़रा-सा विश्राम दे रहा है,  
यह समय कुदरत के स्कूल का एक पाठ्यक्रम है  
जीवन और संवेदनाओं को समझने का पाठ पढ़ा रहा है। 

- जेन्नी शबनम (15. 5. 2020) 
_____________________________________________

बुधवार, 13 मई 2020

663. अलविदा

अलविदा  

*******

तपती रेत पर  
पाँव के नहीं, जलते पाँव के ज़ख्म के निशान हैं  
मंजिल दूर, बहुत दूर दिख रही है  
पर पाँव थक चुके हैं, पाँव और मन जल चुके हैं  
हौसला देने वाला कोई नहीं  
साँसें सँभालने वाला कोई नहीं  
यह तय है ज़िन्दगी वहाँ तक नहीं पहुँचेगी  
जहाँ पाँव-पाँव चले थे, जहाँ सपनों को पंख लगे थे  
जहाँ से ज़िन्दगी को सींचने, बहुत दूर निकल पड़े थे  
आह! अब और सहन नहीं होता  
तलवे ही नहीं आँतें भी जल गई हैं  
जल की एक बूँद भी नहीं  
जिससे अंतिम क्षण में तालू तर हो सके  
उम्मीद की अंतिम तीली बुझने को है  
आखिरी साँस अब थमने को है  
सलाम उन सबको जिनके पाँव ने साथ दिया  
उन सपनों, उन अपनों, उन यादों को अलविदा। 

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2020) 
_____________________________________

शुक्रवार, 8 मई 2020

662. अनुभूतियों का सफर

अनुभूतियों का सफर

*******

अनुभूतियों के सफ़र में   
संभावनाओं को ज़मीन न मिली   
हताश हूँ, परेशान हूँ   
मगर हार की स्वीकृति मन को नहीं सुहाती   
फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए   
पुरज़ोर कोशिश करती हूँ   
कड़वे कसैले से कुछ अल्फ़ाज़ मन को बेधते हैं   
फिर-फिर जीने की तमन्ना में   
हौसलों की बाग़वानी करती हूँ   
सँभलने और स्थिरता की मियाद   
पूरी नहीं होती, कि सब ध्वस्त हो जाता है।   
जाने कौन सा गुनाह था, या किसी जन्म का शाप   
अनुभूतियों के सफ़र में महज़ कुछ फूल मिले   
शेष काँटें ही काँटें   
जो वक़्त बेवक्त चुभते रहे, मन को बेधते रहे।   
पर अब, संभावनाओं को जिलाना होगा   
उसे ज़मीन में उगाना होगा   
थके हों क़दम मगर चलना होगा   
आसमान छिन जाए मगर   
ज़मीन को पकड़ना होगा।   
जीवन की अनुभूतियाँ संबल है और   
जीवन की संभावना भी।  

- जेन्नी शबनम (7. 5. 2020) 
_________________________________________

मंगलवार, 5 मई 2020

661. सरेआम मिलना (तुकबंदी)

सरेआम मिलना 

*******  

अकेले मिलना अब हो नहीं सकता  
जब भी मिलना है सरेआम मिलना   

मेरे रंजों ग़म उन्हें भाते नहीं
फिर क्या मिलना और क्योंकर मिलना   

नहीं होती है रुतबे से यारी
इनसे दूरी भली फ़िज़ूल मिलना   

कब मिटते हैं नाते उम्र भर के
कभी आना अगर तो जीभर मिलना।   

काश! ऐसा मिलना कभी हो जाए
ख़ुद से मिलना और ख़ुदा से मिलना।   

ऐसा मिलना कभी तो हम सीखेंगे  
रूह से मिलना और दिल से मिलना   

ऐसा हुनर अब भी नहीं हम सीख पाए  
जो चुभाए नश्तर उससे अदब से मिलना   

रोज़ गुम होते रहे भीड़ में हम  
आसान नहीं होता ख़ुद से मिलना।   

जीस्त की यादें अब सोने नहीं देती  
यूँ जाग-जाग कर किससे मिलना?   

सच्ची बातें हैं चुभती बर्छी-सी  
'शब' तुम चुप रहना किसी से न मिलना।  

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2020) 

________________________________ 

शुक्रवार, 1 मई 2020

660. गँवारू लड़की

गँवारू लड़की

*******   

एक गाँव की लड़की   
शहर में पनाह ढूँढती रही   
अपना नाम बता के अपना पता पूछती रही   
अपने हिस्से के कुछ किस्से लेकर   
सबके मन के द्वार खटखटाती थी   
थोड़ा अपनापन माँगती थी, मुट्ठी भर जमीन चाहती थी  
कभी किसी ने उसकी परवाह न की   
पर अब वह खुद भी बेपरवाह हो चुकी है   
न घर मिला न मन मिला न मान मिला   
न ठौर न ठिकाना मिला   
सबने कहा वह गँवारू है किसी काम की नहीं   
न शहर के लायक न किसी घर के लायक   
पर अब वह उदास नहीं रहती, अब उसकी चुप्पी टूट चुकी है   
वह पलायन न करेगी, ढ़ीठ होकर बढ़ेगी   
वह देसी बोली बोलती है, उसे गर्व है अपनी बोली पर   
वह गाँव की गँवार है, उसे गर्व है अपने गँवारूपन पर   
कमसे कम उसने सोंधी मिट्टी को तो चूमा है   
अपनी बोली में सपनों को पाला है   
शहर आ के भी जो गाँव से लाई थी, सब सँभाला है   
पेड़ पौधों को दुलराया है   
वह हाथ से खाती है, तो अन्न को पहचानती है   
धड़कनों से बात करती है, तो मन को पहचानती है   
खेतों डरेरों पर कूदती फाँदती, पशु पक्षियों से यारी निभाई है   
वो सारे रिश्ते जी के शहर आई है   
हाँ वह शहरी नहीं शहर के लिए पराई है   
पर वो बहुत प्यारे गाँव से आई है   
शायद इसलिए वह अबतक कंक्रीट पहन नहीं पाई   
मोम को ओढ़ के बैठी है, पत्थर बन नहीं पाई   
इस जंगल में खो नहीं पाई   
अच्छा है शहर की हो नहीं पाई   
वह गाँव की लड़की गँवारू है   
मगर अब शहर की नब्ज और शहरियों का शातिरपना पहचान गई है   
खुद को समझने लगी है शहर को जान गई है।   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2020)  
_______________________________________

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

659. निपटाया जाएगा

निपटाया जाएगा  

*******  

विरोध के स्वर को कुछ यूँ दबाया जाएगा  
होश में जो हो उसे पागल बताया जाएगा !  

काट छाँट कर बाँट-बाँट कर यह संसार चलेगा  
रोटी और बेटी का मसला यूँ निपटाया जाएगा !  

क्रूरता और पाश्विकता कई खेमों में बँटे  
चौक चौराहों पर टँगा जिस्म दिखाया जाएगा !  

हदों की परवाह किसे बेहद से हम सब गुज़रे  
मुट्ठियों का इंक्लाब अब बेदम कराया जाएगा !  

नहीं परवाह सबको ज़माने के बदख्याली की  
नफ़रतों में अमन का पौधा खिलाया जाएगा !  

बाट जोहकर समय जब हथेलियों से फिसल जाएगा  
बद्दुआएँ 'शब' को देकर फिर ख़ूब पछताया जाएगा ! 

- जेन्नी शबनम (27. 4. 2020) 

________________________________________

रविवार, 26 अप्रैल 2020

658. झरोखा

झरोखा  

*******  

समय का यह दौर  
जीवन की अहमियत, जीवन की ज़रुरत सिखा रहा है  
मुश्किल के इस रंगमहल में  
आशाओं का एक झरोखा जिसे, पत्थर का महल बनाने में  
सदियों पहले बंद किया था हमने  
अब खोलने का वक्त आ गया है  
ताकि एक बार फिर लौट सके, सपनों का सुन्दर संसार  
सूरज की किरणों की बौछार  
बारिश की बूंदों की फुहार  
हो सके चाँदनी की आवाजाही  
आ सके हवाएँ झूमती नाचती गाती  
हम ताक सकें आसमान में चाँद तारों की बैठक  
आकृतियाँ गढ़ती बादलों की जमात  
पक्षियों का कलरव  
रास्ते से गुजरता इंसानी रेला  
हमारी ज़रूरतों के सामानों का ठेला  
हम सुन सकें हवाओं का नशीला राग  
बादलों की गड़गड़ाहट  
धूल मिट्टी की थाप  
प्रार्थना की गुहार  
पड़ोसी की पुकार  
रँभाते मवेशियों की तान  
गोधूलि में पशुओं के खुरों और घंटियों की धुन  
हम मिला सकें कोयल के साथ कूउउ-कूउउ  
हम चिढ़ा सके कौओं को काँव-काँव  
हम कर सकें कोई ऐसी चित्रकारी  
जिसमें खूबसूरत नीला आसमान, गेरुआ रंग धारण कर लेता है  
पौधों की हरियाली में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं  
कोई बच्चा लाड़ दुलार से माँ की गोद में जा सिमटता है  
हम बसा सकें सपनों के बड़े-बड़े चौबारे पर  
कोई अचम्भित करने वाली कामनाएँ  
ओह! कितना कुछ था जिसे खोया है हमने  
मन के झरोखों को बंद कर  
कृत्रिमता से लिपट कर, पत्थर के आशियाने में सिमट कर  
अब समझ आ गया है  
जीवन की क्षणभंगुरता, कायनात की शिक्षा  
खोल ही दो सबको  
आने दो झरोखे से वह सब  
जिसे हमने खुद ही गँवाया था  
खोल दो झरोखा।  

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2020)  

__________________________________________

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

657. 10 क्षणिकाएँ

1. 
सच  
***  

न कोई कल था  
न कोई आज है  
जो पाया, सब खोया  
जीवन का यही सच है।  
__________________

2. 
हुनर  
***  

छोटी-छोटी डिब्बियों में भर कर  
सीलबंद कर दिए मैंने अपने सारे हुनर  
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी  
पर अब संतोष है  
मेरा सारा हुनर ओझल है सबसे  
अब उसका अपमान नहीं होता।  
__________________________

3. 
संवेदना  
***  

संवेदनाओं को  
ज़मीन नहीं मिलती  
आकाश चाहिए नहीं  
फिर क्या?  
यूँ ही घुट-घुटकर मर जाए !  
जल सूखता जाता है, नदी उतरती है  
संवेदनशून्यता यूँ ही तो बढ़ती है।  
_________________________  
4. 
काश !  
***  

ढ़ेरों काश इकठ्ठा हो गए हैं  
पर मन है कि ठहरता नहीं  
काश! यह किया होता, काश! वह कर पाते  
इकत्रित काश के साथ, भविष्य के और काश न जुड़े  
मन को समझना होगा  
मन को रुकना होगा या मरना होगा  
या फिर सन्यस्त होना होगा।  
___________________________

5. 
नींद  
***  

दिल को जलाया है  
दिल मेरा खाली है  
कोई नहीं जो सुकून दे  
मेरी तल्खियों को नींद दे  
आ जाओ ऐ फरिश्ते  
दिल में एक ख्वाब उगा दो  
रूह को जरा सा चैन दे दो  
आज बस सुला दो।  
___________________

6. 
करवट  
***  

यादों के बिस्तर पर करवट ही करवट है  
हर करवट में टूटते दिल की सलवट है  
सलवटें तो मिट जाएँगी  
करवटें नींद में समा जाएगी  
पर यादें?  
कितने फूल कितने शूल  
हँसता दिल जख्मी सीना  
क्या ये यादों से दूर जा पाएँगे?  
______________________

7. 
शर्त  
***  

बेशर्त ज़िन्दगी चलती नहीं  
शर्तें मन को फबती नहीं  
इसी उधेड़बुन में ठहरी रही  
करूँ तो अब मैं क्या करूँ  
शर्तें मानूँ या ज़िन्दगी मिटा लूँ  
अपनी बचाऊँ कि साँसें सँभालूँ।  
_______________________

8. 
भूल जाते हैं  
***  

चलो आज सारी रात जागते हैं  
आधा आसमान तुम्हारा आधा मेरा  
तुम तारे गिनो  
हम आधे आसमान में  
चाँद को सजाते हैं  
दिन भी निकलेगा भूल जाते हैं।  
________________________

9. 
मुबारक  
***  

अँधेरों का सैलाब बढ़ता जा रहा है  
रोशनी का एक तिनका भी नहीं, सब डूब रहा है  
हाथ थामने को कुछ नहीं सूझ रहा है  
सूरज ने अँधेरों को थामने से मना कर दिया है  
वह रोशनी भेजने को तैयार नहीं है  
मेरे लिए कुछ भी न इस पार है न उस पार है  
उसने कहा - तुम्हें अँधेरे पसंद थे न  
लो, तुम्हें अँधेरे मुबारक।  
______________________________

10. 
मेरा घर  
*******  

रात के सीने में  
हजारों चमकते कोने हैं  
पर वहाँ एक महफूज़ कोना भी है  
जहाँ सबका प्रवेश वर्जित है  
वहाँ अँधेरा ही अँधेरा है  
बस वहीं, घर मेरा है।  
_______________________

- जेन्नी शबनम (20. 4. 2020)  
___________________________________________   
 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

656. फूल यूँ खिले (10 हाइकु)

फूल यूँ खिले 
(10 हाइकु) 

*******  

1.  
फूल यूँ खिले,  
गलबहियाँ डाले  
बैठे हों बच्चे !  

2.  
अम्बर रोया,  
ज्यों बच्चे से छिना  
प्यारा खिलौना !  

3.  
सूरज ने की  
किरणों की बिदाई  
शाम जो आई !  

4.  
फसलें हँसी,  
ज्यों धरा ने पहना  
ढ़ेरों गहना !  

5.  
नाम तुम्हारा  
मन की रेत पर  
गहरा लिखा !  

6.  
देख गगन  
चिहुँकती है धरा  
हो कोई सगा !  

7.  
रूठा है सूर्य  
कैकेयी-सा, जा बैठा  
कोप-भवन !  

8.  
मन झरना  
कल-कल बहता  
पा के अपना !  

9.  
मिश्री-सी बोली  
बहुत ही मँहगी,  
ताले में बंद !  

10.  
चुभता रहा  
खुरदरा-सा रिश्ता  
फिर भी जिया !  

- जेन्नी शबनम (27. 1. 2020)  
________________________ 

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

655. 10 क्षणिकाएँ

10 क्षणिकाएँ 

*******  

1. 
परत
***  
मेरे मौसम में अब कोई नहीं  
न मेरे मिजाज में कोई शामिल है  
मेरे मन पर जो एक नरम परत लिपटा था  
समय की ताप से पककर  
वह अब लोहे का हो गया है।  
____________________  

2.
यारी
***  
फूल तो सबको प्रिय, मैंने काँटों से यारी की  
इस यारी में लाचारी थी, मेरी नहीं मनमानी थी  
नसीब का लेखा जोखा है, सब कुदरत का धोखा है  
यह किस्मत की साज़िश है, नहीं कोई गुंजाइश है  
काँटों की कलम से चाक-चाक, सीना मेरा छलनी है  
दर्द भले पुराना है, लेकिन मेरी कथा बहुत नयी है।  
____________________________________  

3.  
ज़ख्म  
***  
काँटों ने चुभाकर, जब भी ज़ख्म दिए  
एक संतोष-सा मन में ठहर गया  
काँटों ने जख्म दिए हैं, तन छलनी हुआ तो क्या हुआ  
गर फूलों ने जख्म दिया होता, तो मन छलनी होता  
घाव तो भर जाएँगे  
मन तो साबुत रहेगा।
__________________________

4.  
पुल  
***  
ढेरों इल्जामों की तरह एक और  
ढेरों कटु वचनों की तरह एक और  
फ़र्क नहीं पड़ता अब दुर्भावनाओं से  
न ही असर होता है, इल्जामों की इन गिनतियों से  
वह जो एक पुल था, हमारे दरम्यान  
उसे वक्त ने ढ़हा दिया है।  
___________________________  

5.  
चेहरा  
***  
चेहरे तो कई ओढ़े कई उतारे  
कब कौन पहना अब याद नहीं  
सबसे सच्चा वाला चेहरा  
जो गुम हो चुका है, इन चेहरों की भीड़ में  
अब कभी नहीं पहन पाऊँगी  
पर एक टीस तो उठेगी  
जब-जब आईना निहारूँगी।  
_____________________

6.  
बेजान सड़क  
***  
बेजान सड़क में जैसे जान आ जाती है
और मेरे पाँव में पहिया पहना देती है
फिर मुझे पहुँचा आती है वहाँ-वहाँ
जहाँ भीड़ में मैं अक्सर गुम हो जाती हूँ
फिर कोई अनजाना हाथ मुझे थाम लेता है
मगर कुछ कदम के फ़ासले पर चलता है
सड़क को सब पता है
कहाँ मेरा सुकून है, कहाँ मेरी मंज़िल
और कहाँ थामने वाले हाथ।  
___________________________

7.  
समय चक्र  
***  
समय चक्र और जीवन चक्र  
दोनों घूम रहे हैं  
उन्हें रोकने की कोशिशों में  
मेरे दोनों हाथ छिल चुके हैं  
मैं उन्हें न रोक पाई न साथ चल पाई  
सदा नाकाम रही  
उसी तरह जिस तरह  
खुद को अपने साथ रखने में नाकाम होती हूँ  
मुझे खुद नहीं पता कि मैं कहाँ होती हूँ।
________________________________

8.  
तस्वीर  
***  
काश कि अतीत विस्मृत हो जाए  
ज़ेहन में तस्वीर कुछ ताज़ी आ जाए  
दर्द की ढ़ेरों तहरीर और रिसते ज़ख़्मों के धब्बे हैं  
रिश्तों की ग़ुलामी और अनजीए पहलू की सरगोशी है  
सब बिसरा कर नई तस्वीर बसाना चाहती हूँ  
कुछ नए फूल खिलाना चाहती हूँ  
एक नई ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ।  
_________________________________  

9.  
जुर्रत  
***  
लुंज पुंज से वक्त में, जिंदगी की अफरा तफरी में
इश्क करने की मोहलत मिल गई
समय संजीदा हुआ, पूछा - ऐसी जुर्रत क्यों की?
अब इसका क्या जवाब
जुर्रत तो हो गई
अब हो गई तो हो गई।  
_________________________  

10.
दवा-दुआ  
***  
उम्र के इस दौर में, तन्हाइयों के इस ठौर में  
न दवा काम आती है न दुआ काम आती है  
बस किसी अपने की यादें साथ रह जाती हैं  
यूँ सच है खोखले रिश्तों के बेजान शहर में  
कौन किसके वास्ते दुआ करे, करे तो क्यों करे  
कोई किसी को अपना मान ले  
आख़िरी पलों में बस इतना ही काफी है।  
____________________________  

- जेन्नी शबनम (8. 4. 2020)  

______________________________________

रविवार, 5 अप्रैल 2020

654. मन का दीया (दीया पर 5 हाइकु)

मन का दीया  
(दीया पर 5 हाइकु)

*******

1.  
आस्था का दीया  
बुझने मत देना  
ख़ुद के प्रति !  

2. 
देता सन्देश  
जल-जल के दीया -  
रोशनी देना !  

3.  
मन का दीया  
जल ही नहीं पाता  
किसी आग से !  

4.  
नन्हा दीपक  
बिन थके जलता  
हिम्मत देता !  

5.  
दीपक जला  
मन खिलखिलाया  
उजास फैला !  

- जेन्नी शबनम (5. 4. 2020)

_______________________

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

653. शाम

शाम  

*******  

ऐसी कोई शाम हो  
जब थका हारा जीवन  
अपने अंत पर हो  
एक बड़ा चमत्कार हो जाए  
ढ़लता सूरज सब जान जाए  
भेज दे वो अपने रथ से थोड़ा सुकून
और हर ले उदासी  
भले ही वह पल शाम हो  
पर जीवन की सुबह बन जाए  
शाम से रात तक  
जीवन को अर्थ मिल जाए  
काश ऐसी कोई शाम हो  
ढ़लता सूरज देवता बन जाए।

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2020)  

__________________________

गुरुवार, 26 मार्च 2020

652. एकांत

एकांत   

******* 

अपने आलीशान एकांत में   
सिर्फ अपने साथ रहने का मन है   
जिन बातों को जिलाया मन में   
स्वयं को वह सब कहने का मन है   
सवालों के वृक्ष जो वटवृक्ष बन गए   
उन्हें जमींदोज कर देने का मन है।   

मेरे हिस्से में आई है नफरत ही नफरत   
उसे दूर किसी गहरी झील में डूबो देने का मन है   
तोहमतों की फेहरिस्त जो मेरे माथे पे चस्पा है   
उन सभी को जगज़ाहिर कर देने का मन है   
मीलों लम्बा रेगिस्तान जिसे मैंने ही चुना है   
अब वहाँ फूलों की क्यारी लगाने का मन है।   

जीवन के सारे अवलम्ब अब काँटें चुभाते हैं   
सब छोड़ कर अपने मौन को जीने का मन है   
जीस्त के बियाबान रास्तों की कसक कम नही होती   
उन सारे रास्तों से मुँह मोड़ लेने का मन है   
पसरी हुई चुप्पी बहुत आवाज देती है जब तब   
सारे बंधन तोड़ खुद के साथ जब्त हो जाने का मन है।   

जीवन के सारे संतुलन खार हैं बस   
अब और संताप नहीं लेने का मन है   
जहर की मीठी खुशबू न्योता देने आती है   
सारे विष पीकर नीलकंठ बन जाने का मन है   
अनायास तो कभी कुछ होता नहीं पर   
सायास कुछ भी नहीं करने का मन है।   
अपने आलीशान एकांत में   
सिर्फ अपने साथ रहने का मन है।    

- जेन्नी शबनम (26. 3. 2020)   

__________________________________________

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

651. गौरैया (गौरैया पर 15 हाइकु)

गौरैया  
(गौरैया पर 15 हाइकु)

*******

1.  
ओ री गौरैया,  
तुम फिर से आना  
मेरे अँगना।  

2.  
मेरी गौरैया  
चीं चीं चीं चीं बोल री,  
मन है सूना।  

3.  
घर है सूना,  
मेरी गौरैया रानी  
तू आ जा ना रे।  

4.  
लुप्त अँगना  
सूखे ताल-पोखर  
रूठी गौरैया।  

5.  
कंक्रीट फैला  
कहाँ जाए गौरैया  
घोंसला टूटा।  

6.  
प्यासी गौरैया  
प्यासे ताल-तलैया  
कंक्रीट-वन।  

7.  
बिछुड़ी साथी  
हमारी ये गौरैया  
घर को लौटी।  

8.  
झुंड के झुंड  
सोनकंठी गौरैया  
वन को उड़ी।  

9.  
रात व भोर  
चिरई करे शोर  
हो गई फुर्र।  

10.  
भोज है सजा  
पथार है पसरा  
गौरैया खुश।  

11.  
दाना चुगती  
गौरैया फुदकती  
चिड़े को देती।  

12.  
गौरैया बोली -  
पानी दो घोंसला दो  
हमें जीने दो।  

13.  
गौरैया रानी  
आज है इतराती  
संग है साथी।  

14.  
छूटा है देस  
चली है परदेस  
गौरैया बेटी।  

15.  
फुर्र-सी उड़ी  
चहकती गौरैया  
घर वीराना।  

(पथार - सुखाने के लिए फैलाया गया अनाज)   

- जेन्नी शबनम (20. 3. 2020)  
(विश्व गौरैया दिवस पर)


______________________________

शनिवार, 14 मार्च 2020

650. रंगीली होली

रंगीली होली 
(होली पर 9 हाइकु)

*******

1.  
होली की टोली  
बैर-भाव बिसरे  
रंगीली होली।  

2.  
रंगों की मस्ती  
चेहरे भोली भाली  
रंग हँसते।  

3.  
रंगों की वर्षा  
खिले जावा कुसुम  
घर-घर में।  

4.  
उड़ती आई  
मदमस्त फुहार  
रंग गुलाल।  

5.  
पिया विदेस  
रंगों का ये गुबार  
जोगिया मन।  

6.  
निष्पक्ष रंग  
मिटाए भेद-भाव  
रंग दे मन।  

7.  
सजी सँवरी  
पिचकारी रँगीली  
होली आई रे।  

8.  
फीके से रिश्ते  
रंगों की बरसात  
रंग दे मन।  

9.  
हँसी ठिठोली  
रौनक़ ही रौनक़  
होली हुलसी।  

- जेन्नी शबनम (10. 3. 2020)  



_______________________

रविवार, 8 मार्च 2020

649. पूरक

पूरक 

*******  

ओ साथी, 
अपना वजूद तलाशो, दूसरों का नष्ट न करो   
एक ही तराजू से, हम सभी को न तौलो   
जीवन जो नेमत है, हम सभी के लिए है   
इससे असहमत न होओ।   
मुमकिन है, युगों की प्रताड़ना से आहत तुम   
प्रतिशोध चाहती हो   
पर यह प्रतिकार   
एक नई त्रासदी को जन्म देगा   
सामाजिक संरचनाएँ डगमगा जाएँगी   
और यह संसार के लिए मुनासिब नहीं।   
तुम्हारे तर्क उचित नहीं   
तुम पूरी जाति से बदला कैसे ले सकती हो ?   
जिसने पीड़ा दी उसे दंड दो   
न कि सम्पूर्ण जाति को   
जीवन और जीवन की प्रक्रिया, हमारे हाथ नहीं   
तुम समझो इस बात को।   
हाँ यह सच है, परम्पराओं से पार जाना   
बेहद कठिन था हमारे लिए   
हम गुनहगार हैं, तुम सभी के दुख के लिए   
पर युग बदल रहा है   
समय ने पहचान दी है तुम्हें   
पर तुम अपना आत्मविश्वास खो रही हो   
बदला लेने पर आतुर हो   
पर किससे?   
कभी सोचा है तुमने   
हम तुम्हारे ही अपने हैं   
तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं   
हमारे रगों में तुम्हारा ही रक्त बहता है   
जीवन तुम्हारे बिना नहीं चलता है।   
तुम समझो, दूसरों के अपराध के कारण   
हम सभी अपराधी नहीं हैं   
हम भी दुखी होतें हैं   
जब कोई मानव से दानव बन जाता है   
हम भी असहाय महसूस करते हैं   
उन जैसे पापियों से   
जो तुम्हें दोजख में धकेलता है।   
हाँ हम जानते हैं   
घोषित कानून तुम्हारे साथ है   
पर अघोषित सजा हम सब भुगतते हैं   
महज इस कारण कि हम पुरूष हैं।  
तुम्हें भी इसे बदलना होगा   
हमें भी यह समझना होगा   
कुछ हैवानों के कारण हम सभी परेशान हैं   
कुछ हममें भी राक्षस है, कुछ तुममें भी राक्षसी है   
हमें परखना होगा, हम सब को चेतना होगा   
हमें एक दूसरे का साथ देना होगा।   
हमें चलना है, हमें साथ जीना है   
हम पूरक हैं   
ओ साथी !   
आओ, हम कदम से कदम मिला कर चलें !  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2020)  
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
_____________________________________

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

648. फ़ितरत

फ़ितरत 

******* 

थोड़ा फ़लसफ़ा थोड़ी उम्मीद लेकर 
चलो फिर से शुरू करते हैं सफर 
जिसे छोड़ा था हमने तब, जब 
जिंदगी बहुत बेतरतीब हो गई थी 
और दूरी ही महज़ एक राह बची थी 
साथ न चलने और साथ न जीने के लिए, 
साथ सफर पर चलने के लिए 
एक दूसरे को राहत देनी होती है 
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है 
और वह हमने खो दिया था 
जिंदगी को न जीने के लिए 
हमने खुद मजबूर किया था, 
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं 
न सीने में दफ़न हो सकती हैं 
चलो, अपने-अपने मन के एक कोने में 
बीती बातों को पुचकार कर सुला आते हैं 
अपने-अपने मन पर एक ताला लगा आते हैं, 
क्योंकि अब और कोई ज़रिया भी तो नहीं बचा 
साँसों की रवानगी और समय से साझेदारी का 
अब यही हमारी जिंदगी है और 
यही हमारी फ़ितरत भी। 

- जेन्नी शबनम (20. 2. 2020)

___________________________________ 

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

647. भोली-भाली

भोली-भाली 

*******  

मेरी बातें भोली-भाली  
जीभर कर हैं हँसने वाली  
बात तुम्हारी जीवन वाली  
इक जीवन में ढ़लने वाली  
दुख की बातें न करना जो  
घुट-घुट कर हैं मरने वाली  
रद्दी सद्दी बातें हुईं जो  
समझो वो है भूलने वाली  
बात चली जो भी थक-थक के  
ये समझो है रुकने वाली  
ऐसी बातें कहा करो मत  
धुक-धुक साँसें भरने वाली  
प्यार की बातें करती है 'शब'  
दर्द नहीं अब कहने वाली।  

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2020)  

____________________________

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

646. साथी

साथी  

*******  

मेरी हँसी खो गई साथी  
मेरी यादें रूठ गई साथी  
दिन महीने और साल बीते  
न जाने कब और कैसे बीते  
हम संग-संग कैसे रहते थे  
हम पल-पल कैसे हँसते थे  
बीती बातें हमें रूलाती हैं  
रूठी यादें तुम्हें बुलाती हैं,  
फिर से हम हँसना सीखें  
यादों को हम जीना सीखें  
विस्मृत हो तो बस वेदना  
विस्मृत न हो मेरा सपना  
थोड़ी हँसी लेकर आओ  
आकर के जीना सिखलाओ,  
सब कुछ हमको दुख देता है  
हर कोई हमसे छल करता है  
धैर्य नहीं अब मन धरता है  
पल-पल जीवन भारी लगता है  
बस अब तुम आ जाओ साथी  
आकर गले लगाओ साथी,  
ठौर-ठौर जो मन रुठा था  
पल-पल मेरा भ्रम टूटा था  
मेरे लिए तुम आओ साथी  
सारे दुख तुम हर लो साथी  
मेरी हँसी रूठ गई साथी  
मेरी यादें खो गई साथी।  

- जेन्नी शबनम (8. 2. 2020)  
________________________

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

645. ऑक्सीजन

ऑक्सीजन 

*******  

मेरे पुरसुकून जीवन के वास्ते  
तुम्हारा सुझाव -  
जीवन जीने के लिए प्रेम  
प्रेम करने के लिए साँसें  
साँसें भरने के लिए ऑक्सीजन  
ऑक्सीजन है प्रेम  
और वह प्रेम मैं तलाशूँ,  
अब बताओ भला, कहाँ से ढूँढूँ?  
ऐसा समीकरण कहाँ से जुटाऊँ?  
चारों ओर सूखा, वीराना, लिजलिजा  
फिर ऑक्सीजन कहाँ पनपे, कैसे नसों में दौड़े  
ताकि मैं साँसें लूँ, फिर प्रेम करूँ, फिर जीवन जीऊँ,  
सही ग़लत मैं नहीं जानती  
पर इतना जानती हूँ  
जब-जब मेरी साँसें उखड़ने को होती हैं  
एक कप कॉफी या एक ग्लास नींबू-पानी के साथ  
ऑक्सीजन की नई खेप तुम मुझमें भर देते हो,  
शायद तुम हँसते होगे मुझपर  
या यह सोचते होगे कि मैं कितनी मूढ़ हूँ  
यह भी सोच सकते हो कि मैं जीना नहीं जानती  
लेकिन तुमसे ही सारी उम्मीदें हूँ पालती  
पर मैं भी क्या करूँ?  
कब तक भटकती फिरुँ?  
अनजान राहों पर कदम डगमगाता है  
दूर जाने से मन बहुत घबराता है  
किसी तलाश में कहीं दूर जाना नहीं चाहती  
नामुमकिन में खुद को खोना नहीं चाहती,  
ज़रा-ज़रा-सा कभी-कभी  
तुम ही भरते रहो मुझमें जीवन  
और बने रहो मेरे ऑक्सीजन।  
हाँ, यह भी सच है मैंने तुम्हें माना है  
अपना ऑक्सीजन  
तुमने नहीं।   

- जेन्नी शबनम (2. 2. 2020)   

______________________________________  

सोमवार, 27 जनवरी 2020

644. बेफिक्र धूप (ठंड पर 10 हाइकु)

बेफिक्र धूप 
(ठंड पर 10 हाइकु)   

*******   

1.   
ठठ्ठा करता   
लुका-चोरी खेलता   
मुआ सूरज।   

2.   
बेफिक्र धूप   
इठलाती निकली   
मुँह चिढ़ाती।   

3.   
बिफरा सूर्य   
मनाने चली हवा   
भूल के गुस्सा।   

4.   
गर्म अँगीठी   
घुसपैठिया हवा,   
रार है ठनी।   

5.   
ठिठुरा सूर्य   
अलसाया-सा उगा   
दिशा में पूर्व।   

6.   
धमकी देता   
और भी पिघलूँगा,   
हिम पर्वत।   

7.   
डर के भागा   
सूरज बचकाना,   
सर्द हवाएँ।   

8.   
वक्त चलता   
खरामा-खरामा-सा   
ठंड के मारे।   

9.   
जला जो सूर्य   
राहत की बारिश,   
मिजाज स्फूर्त।   

10.   
शातिर हवा   
चुगली है करती   
सूर्य बिदका।   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2020)   



_________________________

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

643. एक शाम ऐसी भी

एक शाम ऐसी भी 

*******   

एक शाम ऐसी भी, एक मुलाकात ऐसी भी   
बहुत-बहुत खास जैसी भी   
जीवन का एक रंग यह भी, जीवन का एक पड़ाव यह भी   
एक सुख ऐसा भी और एक भाव यह भी,   
खाली सड़क पर दो मन, एक हाथ की दूरी पर दोनो मन   
और ये दूरी भी मिटाने का जतन   
आत्मीयता में डूबे मन, बतकही करते दोनों मन   
और बहुत कुछ अनकहा समझने का प्रयत्न,   
न सिद्धांत की बातें न संस्कृति पर चर्चा   
न समाज की बातें न सरोकारों पर चर्चा   
न संताप की बातें न समझौतों पर चर्चा   
न संघर्ष की बातें न संयमो पर चर्चा   
पर होती रही बेहद लम्बी परिचर्चा,   
न शब्दों का खेल, न आश्वासनों का खेल
न अनुग्रह कोई, न भावनाओं का मेल     
न कोई कौतुहल न कोई व्यग्रता   
धीमे-धीमे बढ़ते कदम बिना किसी अधीरता   
समय भी साथ चला हँसता-गाता-झूमता,   
कॉफी की गर्माहट नसों में घुल रही जरा-जरा   
मीठे पान-सी लाली चेहरे पर जरा-जरा   
ठंडी रात है और बदन में ताप जरा-जरा   
जिंदगी हँस रही है आज जरा-जरा   
खाली जीवन भी आज जैसे भरा-भरा।   

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2020)   

___________________________________

सोमवार, 13 जनवरी 2020

642. प्यार करते रहे

प्यार करते रहे 

******* 

तुम न समझे फिर भी हम कहते रहे 
प्यार था हम प्यार ही करते रहे !   

छाँव की बातें कहीं, और चल दिए   
जिंदगी की धूप में जलते रहे !   

तुम न आए जब, जहां हँसता रहा   
जिंदगी रूठी औ हम ठिठके रहे !   

चैन दमभर को न आया था कभी   
और तुम कहते हो, हम हँसते रहें !   

बेवफ़ाई तुमसे है जाना, मगर   
हम वफ़ा के गीत ही रचते रहे !   

ढल गई शब, अब सहर होने को है   
सोच के साये से हम लड़ते रहे !   

बारहा तुमने हमें टोका मगर   
अपनी धुन में गीत हम कहते रहे !   

आए तुम आकर भी कब के जा चुके   
हम सफर तन्हा मगर करते रहे !   

अबके जो जाओ, तो आना मत सनम   
हम तुम्हारे बिन भी अब रहते रहे !   

सौ जनम ‘शब‘ ने जिए हैं आज तक   
इस जनम में बोझ क्यों कहते रहे !   

('दिल के अरमां आँसुओं में बह गए' के तर्ज़ पर)
- जेन्नी शबनम (13. 1. 2020)   

______________________________

बुधवार, 1 जनवरी 2020

641. जो देखा जो सुना

जो देखा जो सुना   

*******   

जो देखा जो सुना   
जो जिया जो गुना   
वह लिखा वह सब लिखा   
जो मन ने कहा   
जो मन में पला   
वह लिखा बस वही लिखा   
कब कौन सी विधा हुई   
किस तराजू पे परखी गई   
किस नियम में सजी लेखनी   
वो त्रिभुज हुई या वृत्ताकार बनी   
समीप रही या समानांतर चली   
नहीं मालूम यह क्या हुआ   
नहीं मालूम यह क्यों हुआ   
बस हुआ और इतना हुआ   
जो समझा जो पहचाना   
वह लिखा वह सब लिखा।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2020)   

_____________________________