रविवार, 18 जुलाई 2021

733. पापा

पापा 

******* 

ख़ुशियों में रफ़्तार है इक   
सारे ग़म चलते रहे   
तुम्हारे जाने के बाद भी   
यह दुनिया चलती रही और हम चलते रहे   
जीवन का बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुके   
एक उम्र में कई सदियों का सफ़र कर चुके   
अब मम्मी भी न रही   
तमाम पीड़ाओं से मुक्त हो गई   
तुमसे ज़रूर मिली होगी   
बिलख-बिलख कर रोई होगी   
मम्मी ने मेरा हाल बताया होगा   
ज़माने का व्यवहार सुनाया होगा   
जाने के बाद तुम तो हमको भूल गए   
जाने क्यों मेरे सपने से भी रूठ गए   
बस एक बार आए फिर कभी न आए   
न बुलाने के लिए कहकर चले गए   
पर जानते हो पापा   
एक सप्ताह पहले   
तुम, मम्मी, दादी, मेरे सपने में आए   
पापा, तुम मेरे सपने में फिर से मरे   
मम्मी ने तुम्हारा दाह-संस्कार किया   
पर तब भी जाने क्यों तुम हमको न दिखे   
आग ने भी तुम्हारे नाम न लिखे   
जैसे सच में मरने के बाद हम तुमको न देख सके थे   
तुमसे लिपट कर रो न सके थे   
जाने कैसा रहस्य है   
मम्मी-दादी सपने में सदा साथ रहती है   
पर मेरी परेशानियों के लिए कोई राह नहीं बताती है   
किससे कुछ भी कहें पापा   
तुम ही कुछ तो बताओ पापा   
जानती हूँ हमसे भी अधिक भाग्यहीनों से संसार भरा है   
दुनिया का दर्द शायद मेरे दर्द से भी बड़ा है   
हमसे भी अधिक बहुतों की पीड़ा है   
फिर भी मन की छटपटाहट कम नहीं होती   
ज़ख्मों को तौलने की इच्छा नहीं होती   
जीने की वज़ह नहीं मिलती   
मन रोता है तड़पता है   
दुःख में तुमको ही खोजता है   
बस एक बार सपने में आकर   
कुछ तो कह जाओ   
न कहो एक बार बस दिख जाओ   
जानती हूँ   
समय चक्र का यही हिसाब-किताब है   
हमको आज भी तुमसे उतना ही प्यार है   
पापा, तुम्हारी बेटी को तुम्हारे एक सपने का इन्तिज़ार है। 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2021)
(पापा की 43 वीं पुण्यतिथि पर) 
____________________________________________


रविवार, 4 जुलाई 2021

732. प्यारी नदियाँ

प्यारी नदियाँ 

******* 

1. 
नद से मिली   
भोरे-भोरे किरणें   
छटा निराली।   

2. 
गंगा पवित्र   
नहीं होती अपवित्र   
भले हो मैली।   

3. 
नदी की सीख -   
हर क्षण बहना   
नहीं थकना।   

4. 
राजा या रंक   
सबके अवशेष   
नदी का अंक।   

5. 
सदा हरती   
गंगा पापहरणी   
जग के पाप।   

6. 
नदी का धैर्य   
उसकी विशालता,   
देती है सीख।   

7. 
दुःखहरणी   
गंगा निर्झरनी   
पापहरणी।   

8. 
अपना प्यार   
बाँटती धुआँधार   
प्यारी नदियाँ।   

9. 
सरिता-घाट   
तन अग्नि में भस्म   
अंतिम सत्य।   

10. 
सबके छल   
नदी है समेटती   
कोई न भेद।   

11. 
सरजू तीरे   
महाकाव्य-सर्जन   
तुलसीदास।   

12. 
तड़पी नदी   
सागर से मिलने,   
मानो हो पिया।   

13. 
बेपरवाह   
मिलन को बेताब   
नदी बावरी।   

14. 
सिंधु से मिली   
सर्प-सी लहराती   
नदी लजाती।   

15. 
नदियाँ प्यासी   
प्रकृति का दोहन   
इंसान पापी।   

16. 
तीन नदियाँ   
पुराना बहनापा   
साथ फिरतीं।   

17. 
बढ़ी आबादी   
कहाँ से लाती पानी   
नदी बेचारी।   

18. 
नदी का तट   
सभ्यता व संस्कृति   
सदियाँ जीती।   

19. 
मीन झाँकती,   
पारदर्शी लिबास   
नदी की कोख।   

20. 
खूब निभाती   
वर्षा से बहनापा   
साथ नहाती।   

21. 
बूझो तो कौन?   
खाती, ओढ़ती, जल   
नदी और क्या!   

22. 
कोई न सुना   
बिलखती थी नदी   
पानी के बिना।   

23. 
नदी के तीरे   
देवताओं का घर   
अमृत भर।   

24. 
नदी बहना!   
साथ लेके चल ना   
घूमने जग।   

25. 
बाढ़ क्यों लाती?   
विकराल बनके   
काहे डराती?   

26. 
चंदा-सूरज   
नदी में नहाकर   
काम पे जाते।   

27.   
मिट जाएगा   
तुम बिन जीवन,   
न जाना नदी!   

28. 
दूर न जाओ   
नदी, वापस आओ   
मत गुस्साओ।   

29. 
डूबा जो कोई   
निरपराध नदी   
फूटके रोई।   

30. 
हो गईं मैली   
बेसहारा नदियाँ   
कैसे नहाए।   

31. 
बहती नैया   
गीत गाए खेवैया   
शांत दरिया।   

32. 
पानी दौड़ता   
तटबन्ध तोड़के,   
क्रोधित नदी।   

33. 
तुझमें डूबे   
सोहनी महिवाल   
प्यार का अंत।   

34. 
नदियाँ सूखी,   
बदरा बरस जा   
उनको भिगा।   

35. 
अपनी पीर   
सिर्फ़ सागर से क्यों   
मुझे भी कह।   

36. 
मीन मरती   
पी ज़हरीला पानी   
नदियाँ रोती।   

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2021)
('अप्रमेय' (2021), डॉ. भीकम सिंह जी द्वारा संपादित पुस्तक में प्रकाशित मेरे हाइकु) 
_______________________________________________________________

 

शुक्रवार, 25 जून 2021

731. पखेरू (8 हाइकु)

पखेरू 

(8 हाइकु) 

******* 

1. 
नील गगन   
पुकारता रहता -   
पाखी, तू आ जा!   

2. 
उड़ती फिरूँ   
हवाओं संग झूमूँ   
बन पखेरू।   

3. 
कतरे पंख   
पर नहीं हारूँगी,   
फिर उडूँगी।   

4. 
चकोर बोली -   
चन्दा छूकर आएँ   
चलो बहिन।   

5. 
मन चाहता,   
स्वतंत्र हो जीवन   
मुट्ठी में विश्व।   

6. 
उड़ना चाहे   
विस्तृत गगन में   
मन पखेरू।   

7. 
छूना है नभ   
कामना पहाड़-सी   
हौसला पंख।   

8. 
झूमता मन,   
अनुपम प्रकृति   
संग खेलती।   

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2021)
__________________________

सोमवार, 21 जून 2021

730. योग

योग 

******* 

जीवन जीना सरल बहुत   
अगर समझ लें लोग   
करें सदा मनोयोग से   
हर दिन थोड़ा योग।   

हजारों सालों की विद्या   
क्यों लगती अब ढोंग   
आओ करें मिलकर सभी   
पुनर्जीवित ये योग।   

साँसे कम होतीं नहीं   
जो करते रहते योग   
हमको करना था यहाँ   
अपना ही सहयोग।   

इस शतक के रोग से   
क्यों जाते इतने लोग   
अगर नियम से देश में   
घर-घर होता योग।   

दे गया गहरा ज्ञान भी   
कोरोना का यह सोग   
औषधि लेते रहते पर   
संग करते हम सब योग।   

चमत्कार ये योग बना   
दूर भगा दे रोग   
तन अपना मंदिर बना   
पूजा अपना योग।   

जीवन के अवलम्ब हैं   
प्रकृति, ध्यान व योग   
तन का मन का हो नियम   
सरल साधना जोग।   

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2021) 
(अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21. 6. 21) 
____________________________

रविवार, 20 जून 2021

729. ओ पापा!

ओ पापा! 

******* 

ओ पापा!   
तुम गए   
साथ ले गए   
मेरा आत्मबल   
और छोड़ गए मेरे लिए   
कँटीले-पथरीले रास्ते   
जिसपर चलकर   
मेरा पाँव ही नहीं मन भी   
छिलता रहा।   
तुम्हारे बिना   
जीवन की राहें बहुत कठिन रहीं   
गिर-गिरकर ही सँभलना सीखा   
कुछ पाया बहुत खोया   
जीवन निरर्थक चलता रहा।   
तुम्हारी यादें   
और चिन्तन-धारा को   
मन में संचितकर   
अब भरना है स्वयं में आत्मविश्वास   
और उतरना है   
जीवन-संग्राम में।   
भले अब   
जीवन के अवसान पर हूँ   
पर जब तक साँस तब तक आस।   

- जेन्नी शबनम (20. 6. 2021) 
(पितृ दिवस)
___________________________

शुक्रवार, 18 जून 2021

728. एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है 


******* 

उम्र के सारे वसंत वार दिए   
रेगिस्तान में फूल खिला दिए   
जद्दोजहद चलती रही एक अदद घर की   
रिश्तों को सँवारने की   
हर डग पर चाँदनी बिखराने की   
हर कण में सूरज उगाने की   
अंततः मकान तो घर बना   
परन्तु किसी कोने पर मेरा कोई रंग न चढ़ा   
कोई भी कोना महफूज़ न रहा   
न मेरे मन का न घर का   
कोई कोना नहीं जहाँ सुकून बरसे   
सूरज चाँद सितारे आकर बैठें   
हमसे बतकहियाँ करते हुए जीवन को निहारे   
धीरे-धीरे हर रिश्ता दरकता गया   
घर मकान में बदलता रहा   
सब बिखरा और पतझर आकर टिक गया   
अब यहाँ न फूल है न पक्षियों के कलरव   
न हवा नाचती है न गुनगुनाती है   
कभी भटकते हुए आ जाए   
तो सिर्फ़ मर्सिया गाती है   
अब न सपना कोई न अपना कोई   
मन में पसरा अकथ्य गाथा का वादा कोई   
धीरे-धीरे वीरानियों से बहनापा बढ़ा   
जीवन पार से बुलावा आया   
पर न जाने क्यों   
न इस पार न उस पार   
कहीं कोई कोना शेष न रहा   
जाने की आतुरता को किसी ने बढ़कर रोक लिया   
और मेरा गुलमोहर भी गुम हो गया   
जो हौसला देता था विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का   
साहस और हौसला को ख़ाली मन में भरने का   
अब न रिश्ते न घर न गुलमोहर   
न इस पार न उस पार कोई ठौर   
जीवन के इस पतझर में   
एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है।   

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2021)
_________________________________________

सोमवार, 14 जून 2021

727. स्मृति में तुम

स्मृति में तुम 
(11 हाइकु)

*******

1. 
स्मृति में तुम   
जैसे फैला आकाश   
सुवासित मैं।   

2. 
क्षणिक प्रेम   
देता बड़ा आघात   
रोता है मन।   

3. 
अधूरी चाह   
भटकता है मन   
नहीं उपाय।   

4. 
कई सवाल   
सभी अनुत्तरित,   
किससे पूछें?   

5. 
मेरे सवाल   
उलझाते हैं मुझे,   
कैसे सुलझे?   

6. 
ज्यों तुम आए   
जी उठी मैं फिर से   
अब न जाओ।   

7. 
रूठ ही गई   
फुदकती गौरैया   
बगिया सूनी।   

8. 
मेरा वजूद   
नहीं होगा सम्पूर्ण   
तुम्हारे बिना।   

9. 
जाएगी कहाँ   
चहकती चिड़िया   
उजड़ा बाग़।   

10. 
पेड़ की छाँव   
पथिक का विश्राम   
अब हुई कथा।   

11. 
जिजीविषा है   
फिर क्यों हारना?   
यही जीवन।   

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2011)

___________________________ 

बुधवार, 9 जून 2021

726. पुनर्जीवित

पुनर्जीवित 

******* 

मैं पुनर्जीवित होना चाहती हूँ   
अपने मन का करना चाहती हूँ   
छूटते संबंध टूटते रिश्ते   
वापस पाना चाहती हूँ   
वह सब जो निषेध रहा   
अब करना चाहती हूँ   
आख़िरी पड़ाव पर पहुँचने के लिए   
अपने साये के साथ नहीं   
आँख मूँद किसी हाथ को थाम   
तेज़ी से चलना चाहती हूँ   
शिथिल शिराओं में थका रक्त   
दौड़ने की चाह रखता है   
जीते-जीते कब जीने की चाह मिटी   
हौसले ने कब दम तोड़ा   
कब ज़िन्दगी से नाता टूटा   
चुप्पी ओढ़ बदन को ढोती रही   
एक अदृश्य कोने में रूह तड़पती रही   
स्त्री हूँ, शुरू और अंत के बीच   
कुछ पल जी लेना चाहती हूँ   
कुछ देर को अमृत पीना चाहती हूँ   
मैं फिर से जीना चाहती हूँ   
मैं पुनर्जीवित होना चाहती हूँ।   

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2021) 
_______________________________

शनिवार, 5 जून 2021

725. पर्यावरण (20 हाइकु)

पर्यावरण (20 हाइकु) 

******* 

1. 
द्रौपदी-धरा   
दुशासन मानव   
चीर हरण।   

2. 
पाँचाली-सी भू   
कन्हैया भेजो वस्त्र   
धरा निर्वस्त्र।   

3. 
पेड़ ढकती   
ख़ामोश-सी पत्तियाँ   
करें न शोर।   

4. 
वृद्ध पत्तियाँ   
चुपके झरी, उगी   
नई पत्तियाँ।   

5.   
पुराना भूलो   
नूतन का स्वागत   
यही प्रकृति।   

6. 
पत्तियाँ नाची   
सावन की फुहार   
पेड़ हर्षाया।   

7. 
प्रकृति हाँफी   
जन से होके त्रस्त   
देगी न माफ़ी।   

8.
कैसा ये अंत   
साँसें बोतल-बंद   
खरीदो, तो लो।   

9. 
मानव लोभी   
दुत्कारती प्रकृति -   
कब चेतोगे?   

10. 
कोई न पास   
साइकिल उदास,   
गाड़ी ही ख़्वाब।   

11. 
विषैले प्राणी   
विषाणु व जीवाणु   
झपटे, बचो!   

12. 
पीके ज़हर   
हवा फेंके ज़हर,   
दोषी मानव।   

13. 
हवा व पानी   
सब हैं प्रदूषित,   
काया दूषित।   

14. 
दूरी है बढ़ी   
प्रकृति को असह्य,   
झेलो मानव।   

15. 
प्रकृति रोती   
मानव विनाशक   
रोग व शोक।   

16. 
असह्य व्यथा   
किसे कहे प्रकृति   
नर असंवेदी।   

17. 
फैली विकृति   
अभिमानी मानव   
हारी प्रकृति।   

18. 
दुनिया रोई   
कुदरत भी रोई,   
विनाश लीला।   

19. 
पर्यावरण   
प्रदूषण की मार   
साँसें बेहाल।   

20. 
धुँध या धुआँ,   
प्रदूषित संसार,   
समझें कैसे?   

- जेन्नी शबनम (5. 6. 2021) 
(विश्व पर्यावरण दिवस) 

_______________________

शुक्रवार, 4 जून 2021

724. जीने का करो जतन

जीने का करो जतन 


******* 

काँटों की तक़दीर में, नहीं होती कोई चुभन   
दर्द है फूलों के हिस्से, मगर नहीं देते जलन।   

शमा तो जलती है हर रात, ग़ैरों के लिए   
ख़ुद के लिए जीना, बस इंसानों का है चलन।   

तमाम उम्र जो बोते रहे, पाई-पाई की फ़सल   
बारहा मिलता नहीं, वक़्त-ए-आख़िर उनको कफ़न।   

उसने कहा कि धर्म ने दे दिया, ये अधिकार   
सिर ऊँचा करके, अधीनों का करते रहे दमन।   

जूनून कैसा छा रहा, हर तरफ़ है क़त्ल-ए-आम   
नहीं दिखता अब ज़रा-सा भी, दुनिया में अमन।   

जीने का भ्रम पाले, ज़िन्दगी से दूर हुआ हर इंसान   
'शब' कहती ये अंतिम जीवन, जीने का करो जतन।   

जेन्नी शबनम (4. 6. 2021) 
_______________________________________

सोमवार, 31 मई 2021

723. सिगरेट

1.

अदना-सी सिगरेट 

******* 

क्यों कहते हो कि उसे छोड़ दूँ   
अदना-सी, वह क्या बिगाड़ती है तुम्हारा?   
मैंने समय इसके साथ ही गुज़ारा   
इसने ख़ुद को जलाए दिया मुझको सहारा   
इसके साथ मेरा वक़्त बेफ़िक्र रहता है   
और जीवन बेपरवाह चलता है   
तन्हाइयों में एक वही तो है जो साथ रहती है   
मनोदशा को बेहतर समझती है   
और मिज़ाजपुर्सी करती है   
ख़ुद को जलाकर बादलों-सा सफ़ेद धुआँ बनकर   
उसमें मेरी मनचाही आकृतियाँ गढ़ती है।   
हाँ, मालूम है मुझे   
उसके साथ मेरी साँसे घट रही हैं   
मेरे फेफड़ों पर कालिख़ जम रही है   
पर वह तलब है मेरी, ज़रूरत है मेरी   
रगों में वह जीवन-वायु बन घुल चुकी है   
सिगरेट मेरी बेचैनी समझती है   
मेरी राज़दार, मेरे अकेलेपन की साथी   
मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती है।   
उसके बिना साँसें बचे भी तो क्या   
यूँ भी मौत तो एक दिन आनी है   
इसके साथ ही आए   
ज़िन्दगी और मौत इसके साथ ही सुहाती है   
दिल इसे छोड़ के किधर जाए।   

2. 
सिगरेट / इन्सान 
******* 

धीरे-धीरे फूँक-फूँककर   
सिगरेट को इन्सान राख बनाता है   
सिगरेट धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में लेकर   
इन्सान को राख के ढेर तक पहुँचाती है   
अंतिम सत्य - दोनों का राख में तब्दील होना   
तय वक़्त पर दोनों ख़ाक होते हैं   
एक दूसरे के ये अद्भुत यार   
एक दूजे को जलाकर ख़ाक में मिलते हैं   
जबतक जीते हैं दोनों यारी निभाते हैं।   

3. 
आख़िरी सिगरेट 
******* 

सिगरेट के राख बनने तक   
घड़ी की सूई बेलगाम भागती है   
शायद याद दिलाती है मुझे   
जल्दी ही एक दिन राख बनना है   
सिगरेट थामे मेरी उँगलियाँ अक्सर काँप जाती है   
क्या पता इस उम्र की यह आख़िरी सिगरेट हो   
क्या पता यह अंतिम कश हो   
या मेरी उम्मीद की अंतिम साँसें   
जिसे सिगरेट के हवाले किया है।   

4. 
सिगरेट की यारी 
******* 

सब कहते, सिगरेट यार नहीं दुश्मन है   
जान लेकर कैसी यारी निभाती है?   
छोड़ दो न ऐसी यारी!   
पर जीने का सहारा कोई तो बताए   
सिगरेट से ज़्यादा कोई तो साथ निभाए   
एक वही तो है   
जो मेरे दर्द को समेटकर   
मेरे मन की आग से ख़ुद को जलाती है   
भले मेरा फेफड़ा जलता है   
पर मेरी ज़िन्दगी   
वाह! नशा ही नशा है   
इससे अच्छी कोई और है क्या?   

5. 
सिगरेट को श्रधांजलि 
******* 

चलो कहते हो तो छोड़ देते हैं   
उसे जीवन से दूर कर देते हैं   
पर वादा करो, सच्चा वाला वादा   
मेरे रिसते ज़ख्मों पर मरहम लगाओगे   
मेरे हर दर्द पर तंज तो न कसोगे   
मेरी नाकामियों में साथ तो न छोड़ोगे?   
जब-जब हार मिले मेरा संबल बनोगे?   
मेरे हर हालात में साथ निभाओगे?   
नाराज़ हो जाऊँ तब भी तुम प्यार करना न छोड़ोगे?   
हाँ! पक्का वादा, सच्चा वादा, प्यार का वादा!   
वाह! अब वादा कर लिया तुमने   
मालूम है, तुम कसमें निभाओगे   
अब मेरी बारी है वादा करने की   
सच्चा वाला, अच्छा वाला, प्यारा वाला वादा   
आज से सिगरेट को तिलांजलि   
आओ, दे दें उसे श्रद्धांजलि   
अब तुम में ही सिगरेट   
तुम्हें अर्पित पुष्पांजलि।   

- जेन्नी शबनम (31. 5. 2021)
(विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर)
_________________________________________

मंगलवार, 25 मई 2021

722. इश्क़ पर 10 क्षणिकाएँ

श्क़ पर 10 क्षणिकाएँ 

******* 

1. 
इश्क़ इक सपना   
टूटकर जुड़ता   
बेचैन करवटों में   
हर बार नया   
फिर से पलता   
मगर रह जाता   
सपना-सा   
सदा अधूरा। 
______________ 

2. 
इश्क़ एक तलवार   
गर म्यान से बाहर   
एक झटका   
धड़ बदन से ग़ायब   
इश्क़-तलवार   
मन-म्यान के अन्दर। 
_________________ 

3. 
इश्क़ जैसे एक आँधी   
तूफ़ान की तरह   
आततायी   
सब मटियामेट   
ज़िन्दगी भी   
और दुनिया भी। 
____________________ 

4. 
इश्क़ जैसे सूरज   
जीवन देता और ताप भी   
जिसके माप का पैमाना है मगर   
पकड़ से बाहर   
वो है तो जीवन है   
वो नहीं तो दुनिया नहीं। 
_________________ 

5. 
इश्क़ की दुनिया गज़ब की   
मिलना-बिछड़ना   
पर साथ-साथ होना   
न  कोई वायदा   
न कोई इसरार   
मन में बसा है प्यार   
भले छूट जाए संसार। 
__________________ 

6. 
जाने ज़िन्दगी किसके जैसी   
न तेरे जैसी न मेरे जैसी   
थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी   
खट्टी-मीठी इमली जैसी   
सोंधी-सोंधी-सी तेरी खुशबू   
फ़िज़ा में इश्क़ ज़िन्दगी ऐसी। 
_____________________ 

7. 
दस्तूर-ए-मोहब्बत   
मालूम नहीं   
इश्क़ ही बस एक इबादत   
इतना ही मालूम है। 
______________________ 

8. 
अल्लाह! एक दुआ क़ुबूल करो   
क़यामत से पहले इतनी मोहलत दे देना   
दम टूटे उससे पहले   
इश्क़ का एक लम्हा दे देना। 
__________________________ 

9. 
इश्क़ के आयत की पर्ची   
यादों की ताबीज़ में बंदकर   
सिरहाने के दराज़ में छुपा दी   
अलामतें कोई न देखे,   
यादों की पूरनमासी   
यादों की अमावस   
यादों का चक्रव्यूह   
जीवन थक चला है,   
अब यादों की ताबीज़ टूट ही जाए   
ज़िन्दगी इश्क़ पर कुर्बान हो जाए। 
_______________________ 

10. 
ज़िन्दगी के माथे पर   
नसीब का टीका   
ज़िन्दगी की हथेली पर   
इश्क़ की लकीर   
फिर उम्र को परवाह क्या   
पल भर मिले या सदियाँ रहे 

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2021) 
________________________ 

मंगलवार, 18 मई 2021

721. अब डर नहीं लगता

अब डर नहीं लगता 

******* 

अब डर नहीं लगता!   
न हारने को कुछ शेष   
न किसी जीत की चाह   
फिर किस बात से डरना?   
सब याद है   
किस-किस ने प्यार किया   
किस-किस ने दुत्कारा   
किस-किस ने छला   
किस-किस ने तोड़ा   
किस-किस को पुकारा   
किस-किस ने मुँह फेरा   
सब के सब   
अब कहानी-से हैं   
अतीत के सभी छाले   
दर्द नहीं देते   
अब सुकून देते हैं   
भीड़ में गुम होने की ख़ुशी देते हैं   
मुक्त होने का एहसास देते हैं   
बेफ़िक्र जीने का सन्देश देते हैं   
फिर किस बात से डरना?   
न खोने को कुछ शेष   
न कुछ पाने की चाह   
अब डर नहीं लगता!   

- जेन्नी शबनम (18. 5. 2021) 
__________________________

शनिवार, 1 मई 2021

720. कोरोना

 कोरोना 

******* 

1. 
ओ कोरोना,   
है कैसा व्यापारी तू   
लाशों का करता व्यापार तू   
और कितना रुलाएगा   
कब तक यूंँ तड़पाएगा   
हिम्मत हार गया संसार   
नतमस्तक सारा संसार   
लाशों से ख़ज़ाना तूने भर लिया   
हर मौत का इल्ज़ाम तूने ले लिया   
पर यम भी अब घबरा रहा   
बार-बार समझा रहा -   
तेरे ख़ज़ाने के लिए बचा न स्थान   
मरघट बन गया स्वर्ग का धाम   
ओ कोरोना,   
ढूँढ़ कोई दूजा संसार।   

2. 
ओ विषाणु,   
सुन, तुझे रक्त चाहिए   
आ, आकर मुझे ले चल   
मैं रावण-सी बन जाती हूँ   
हर एक साँस मिटने पर   
ढेरों बदन बन उग जाऊँगी   
तू अपनी क्षुधा मिटाते रहना   
पर विनती है   
जीवन वापस दे उन्हें   
जिन्हें तू ले गया छीनकर   
मैं तैयार हूँ   
आ मुझे ले चल।   

3. 
ओ नरभक्षी,   
हर मन श्मशान बनता जा रहा है   
पर तू शान से भोग करता जा रहा है   
कैसे न काँपते हैं तेरे हाथ   
जब एक-एक साँस के लिए   
तुझसे मिन्नत करते हैं करोड़ों हाथ   
और तेरा खूनी पंजा   
लोगों को तड़पाकर   
नोचते-खसोटते हुए   
अपने मुँह का ग्रास बनाता है   
अब बहुत भोग लगाया तूने   
जा, सदा के लिए अब जा   
अंतरिक्ष में विलीन हो जा।   

4. 
ओ रक्त पिपासु,   
तेरे खूनी पंजे ने   
हर मन हर घर पर   
चिपकाये हैं इश्तेहार -   
''तुझे जो भायेगा तू ले जाएगा   
दीप, शंख, हवन, गो कोरोना गो से   
तू नहीं डरता   
सब तरफ़ लाल रक्त बहाएगा''   
रोते, चीखते, काँपते, छटपटाते लोग   
तुझे बहुत भाते हैं   
पर अब तो रहम कर   
जब कोई न होगा   
तू किसका भोग लगाएगा।   

5. 
ओ पिशाच,   
अब दया कर   
चला जा तू अपने घर   
हम सब हार गए   
तेरी शक्ति मान गए   
ज़ख्म दिए तूने गहरे सबको   
भला कौन बचा, तू खोजे जिसको   
घर-घर में मातम पसरा   
कौन ताके किसका असरा   
जा तू चला जा   
अब कभी न आना   
बची-खुची आधी-अधूरी दुनिया से   
हम काम चला लेंगे   
जिनको खोया उनकी यादों में   
जीवन बिता लेंगे।   

- जेन्नी शबनम (30. 4. 2021) 
________________________________

   

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

719. पतझर का मौसम

पतझर का मौसम 

******* 

पतझर का यह मौसम है   
सूखे पत्तों की भाँति चूर-चूरकर   
हमारे अपनों को   
एक झटके में वहाँ उड़ाकर ले जा रहा है   
जहाँ से कोई नहीं लौटता,   
कितना-कितना तड़पें   
कितना-कितना रोएँ   
जाने वाले वापस नहीं आएँगे   
उनसे दोबारा हम मिल न पाएँगे   
काल की गरदन तक हम पहुँच न पाएँगे   
न उससे छीन कर किसी को लौटा लाएँगे,   
सँभालने को कोई नहीं   
सँभलने का कोई इंतज़ाम नहीं   
न दुआओं में ताक़त बची   
न मन्नतें क़ामयाब हो रहीं हैं   
संसार की सारी सम्पदाएँ सारी संवेदनाएँ   
एक-एककर मृत होती जा रही हैं,   
श्मशानों में तब्दील होता जा रहा खिलखिलाता शहर   
तड़प-तड़पकर घुट-घुटकर मर रहा नगर   
झीलें रो रही हैं   
ओस की बूँदें सिसक रही हैं   
फूल खिलने से इंकार कर रहा है   
आसमान का चाँद उगना नहीं चाहता   
रात ही नहीं दिन भी अब अमावास-सा अँधेरा हो गया है   
हवा बिलख रही है   
सूरज भी सांत्वना के बोल नहीं बोल पा रहा है   
जाने किसने लगाई है ऐसी नज़र   
लाल किताब भी हो रहा बेअसर,   
पतझर का मौसम नहीं बदल रहा   
न ज़रा भी तरस है उसकी नज़रों में   
न ज़रा भी कमज़ोर हो रही है उसकी बाहें   
हमरा सब छीनकर   
दु:साहस के साथ हमसे ठट्ठा कर रहा है   
अपनी ताक़त पर अहंकार से हँस रहा है   
अब और कितना बलिदान लेगा?   
ओ पतझर! अब तू चला जा!   
हमारा हौसला अब टूट रहा है   
मुट्ठी से जीवन फिसल रहा है   
डरे-डरे-से हम बेज़ार रो रहे हैं   
नियति के आगे अपाहिज हो गए हैं   
हर रोज़ हम ज़रा-ज़रा टूट रहे हैं   
हर रोज़ हम थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं,   
पतझर का यह मौसम   
कुछ माह नहीं साल की सीमाओं से परे जा चुका है   
यह दूसरा साल भी सभी मौसमों पर भारी पड़ रहा है   
पतझर का यह मौसम जाने कब बीतेगा?   
जाने कब लौटेंगी बची-खुची ज़िन्दगी?   
जिससे लगे कि हम थोड़ा-सा जीवित हैं!   

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2021)

___________________________________________  

रविवार, 18 अप्रैल 2021

718. प्रेम में होना

प्रेम में होना   

*******   

प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ तक   
बदन के घेरों में   
या मन के फेरों में?   
सुध-बुध बिसरा देना प्रेम है   
या फिर स्वयं का बोध होना प्रेम है,   
अनकहा प्रेम भी होता है   
न मिलाप न अधिकार   
पर प्रेम है कि बहता रहता है   
अविरल अविचलित,   
प्रेम की परिभाषाएँ ढेरों गढ़ी गईं   
पर सबसे सटीक कोई नहीं   
अपने-अपने मन की आस्था   
अपने-अपने प्रेम की अवस्था,   
प्रेम अकसर पा तो लिया जाता है   
पर वह लेन-देन तक सिमट जाता है,   
हम सभी भूल गए हैं प्रेम का अर्थ   
लालसा में भटकता जीवन है व्यर्थ,   
प्रेम का मूल तत्व बिसर गया है   
स्वार्थ की परिधि में प्रेम बिखर गया है,   
प्रेम पाया नहीं जाता प्रेम जबरन नहीं होता   
प्रेम किया नहीं जाता प्रेम में रहा जाता है   
प्रेम जीवन है   
प्रेम जीया जाता है।  

- जेन्नी शबनम (18. 4. 2021)
_________________________________  

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

717. ज़िन्दगी भी ढलती है

ज़िन्दगी भी ढलती है 

******* 

पीड़ा धीरे-धीरे पिघल, आँसुओं में ढलती है   
वक़्त की पाबन्दी है, ज़िन्दगी भी ढलती है।   

अजब व्यथा है, सुबह और शाम मुझमें नहीं   
बस एक रात ही तो है, जो मुझमें जगती है।   

चाहके भी समेट न पाई, तक़दीर अपनी   
बामुश्किल बसर हो जो, ज़िन्दगी क्यों मिलती है।   

मैं तो ठहरी रही, सदियों से ख़ुद में ही छुपके   
वक़्त की बेबसी, सदियाँ बेतहाशा उड़ती है।   

जाने क्यों हर रास्ता, मुझसे पीछे छूटा है   
मैं अनजानी, ज़िन्दगी बेअख्तियार उड़ती है।   

दिन की कहानी, मुमकिन ही कहाँ कि 'शब' बताए   
रात ज़िन्दगी उसकी, रात की कहानी कहती है।  

- जेन्नी शबनम (9. 4. 2021)

 _____________________________________ 

सोमवार, 29 मार्च 2021

716. होली मइया (होली पर 21 हाइकु)

होली मइया 
(होली पर 21 हाइकु) 

******* 

1. 
उन्मुक्त रंग   
ऋतुराज बसंत   
फगुआ गाते।   

2. 
बंधन मुक्त   
भेदभाव से मुक्त,   
होली संदेश।   

3. 
फगुआ आया   
फूलों ने खिलकर   
रंग बिखेरा।   

4. 
घुँघट काढ़े   
पी की राह अगोरे   
बावरी प्रिया।   

5. 
कैसी ये होली   
नैहर है वीरान   
अम्मा न बाबा।   

6. 
माँ को ले गया,   
वक्त बड़ा निष्ठुर   
होली ले आया।   

7. 
झूम के गाओ   
जोगिरा सा-रा रा-रा   
रंग चिहुँका।   

8. 
रंग गुलाल   
पुआ व पकवान   
होली के यार।   

9. 
होली का पर्व   
सरहद पे पिया,   
कैसे मनाऊँ?   

10. 
मलो गुलाल   
चढ़ा प्रेम का रंग,   
मिटा मलाल।   

11. 
भूलाके रार   
खेलो होली त्योहार,   
ज़िन्दगी छोटी।   

12. 
लेकर आईं   
उत्सव की स्मृतियाँ   
होली का दिन।   

13. 
कैसे थे दिन   
नाचती थी हवाएँ   
होली के संग।   

14. 
अबकी होली   
पीर लिए है आई   
नहीं है माई।   

15. 
द्वार पे खड़ी   
मनुहार करती   
रँगीली होली।   

16. 
आज के दिन   
होली दुखहरणी   
पीर हरती।   

17. 
नशे में धुत्त   
भाँग पीके नाचती   
होली नशेड़ी।   

18. 
होली की दुआ -   
अशुभ का नाश हो   
साल शुभ हो!   

19. 
ठिठका रंग   
देख जग का रंग   
आहत होली।   

20. 
होली का दिन   
मुँह लटका, खड़ा   
टेसू का फूल।   

21. 
होली मइया,   
मन में पीर बड़ा   
रीसेट करो।   

- जेन्नी शबनम (28. 3. 2021)

_______________________ 

सोमवार, 22 मार्च 2021

715. झील (झील पर 30 हाइकु)

झील 

(झील पर 30 हाइकु) 


*******   

1. 
अद्भुत छटा   
आत्ममुग्ध है झील   
ख़ुद में लीन।   

2. 
ता-ता थइया   
थिरकती झील   
वो अलबेली।   

3. 
अनवरत   
हुड़दंग मचाती   
नाचती झील।   

4. 
आसमाँ फेंके   
झील बेचारी हाँफे   
धरती लोके।   

5. 
कोई न साथी   
दुःख किससे बाँटे   
एकाकी झील।   

6. 
पीती रहती   
बड़ी प्यासी है झील   
अपना नीर।   

7. 
रोज़ बुलाती   
स्वप्न सुन्दरी झी ल   
मन लुभाती।   

8. 
अद्भुत झील   
वो कहाँ से है लाती?   
इतना पानी।   

9. 
झील लजाई   
चाँद ने जो पुकारा   
आकर मिला।   

10. 
झील-सा मन   
तेरी यादों की नाव   
बहती रही।   

11. 
ठहरा मन   
हलचल के बिना   
जीवन-झील।   

12. 
बुरा मानती   
प्रदूषण की मारी   
चुप है झील।   

13. 
झील उदास   
कोरोना का क़हर   
कोई न पास।   

14.
झील-झरना   
प्रकृति की संतान   
भाई-बहन।   

15. 
काश बहती   
नदियों-सी घूमती   
झील सोचती!   

16. 
चाँदनी रात   
झील की आगोश में   
बैठा है चाँद।   

17. 
थका सूरज   
करने को आराम   
झील में कूदा।   

18. 
झील है बेटी   
प्रकृति को है नाज़   
लेती बलैयाँ।   

19. 
झील व चाँद   
लुका-छुपी खेलते   
दिन व रात।   

20. 
झील निगोड़ी   
इतनी ख़ूबसूरत   
फिर भी तन्हा!   

21. 
झील सिखाती -   
ठहरे हुए जीना,   
नहीं हारना।   

22. 
कैसे वो पीती   
प्रदूषित है पानी   
प्यासी है झील।   

23. 
झील बेहाल   
मीन दम तोड़ती   
बंजर कोख।   

24. 
झील चकोर   
आसमाँ को बुलाती   
बैठी रहती।   

25. 
झील में नभ   
चुपचाप है छुपा   
चाँद ढूँढता।   

26. 
झील-सा स्वप्न   
चौहद्दी में है कैद   
बहा, न मरा।   

27. 
झील-सी आँखें   
देखती स्वप्न पूर्ण   
होती अपूर्ण।   

28. 
झील डरती,   
मानव व्यभिचारी   
प्राण न छीने!   

29. 
झील की गोद   
नरम-मुलायम   
माँ की गोद।   

30. 
झील है थकी,   
सदियों से है थमी   
क्यों यह कमी?  

- जेन्नी शबनम (22. 3. 2021)
_____________________________

गुरुवार, 18 मार्च 2021

714. अनाथ

अनाथ 

******* 

काश! हवा या धुआँ बनकर   
आसमान में जाती   
चाँद की चाँदनी में उन तारों को ढूँढती   
जो बचपन में मेरे पापा बन गए   
और अब माँ भी उन्हीं का हिस्सा है।   
न जाने वहाँ पापा कैसे होंगे   
इतने साल अकेले कैसे रहे होंगे?   
नहीं-नहीं वे वहाँ किताबें पढ़ते होंगे   
वहाँ से देखते होंगे कि उनके सिद्धांतों को   
हमने कितना जाना कितना अपनाया   
वे बहुत बूढ़े हो गए होंगे   
उम्र तो तारों की भी बढ़ती होगी   
क्या मुझे याद करते होंगे?   
वे तो मुझे पहचानेंगे भी नहीं   
जब वे गए मैं छोटी बच्ची थी   
जब पहचानेंगे तो क्या अब भी   
गोद में बिठाकर दुलार करेंगे?   
बचपन की तरह अब भी रूठने पर मनाएँगे?   
उसी तरह प्यार करेंगे?   
पर माँ तो पहचानती है   
अभी-अभी तो गई है   
ये विदाई तो अभी बहुत नई है   
मुझे देखते ही बड़े लाड़ से गले लगाएगी   
रोएगी, मुझे ढाढ़स देगी   
मेरे अनाथ हो जाने पर   
ख़ुद की किस्मत पर नाराज़ होगी   
रुँधी हुई उसकी आवाज़ होगी   
वह बताएगी कि कैसे   
अंतिम साँस लेते समय   
चारों तरफ़ मुझे ढूँढ रही थी   
एक अंतिम बार देखने को तड़प रही थी।   
कितनी बेबस रही होगी   
कितना कुछ कहना चाहती होगी   
मेरे अकेलेपन के ग़म में रोई होगी   
कितनी आवाज़ दी होगी मुझे   
पर साँसे घुट रही होंगी   
आवाज़ हलक में अटक रही होगी   
वह रो रही होगी, छटपटा रही होगी   
मेरी बहुत याद आ रही होगी   
यम से मिन्नत करती होगी कि ज़रा-सा वक़्त दे-दे   
बेटी से एक बार तो मिल लेने दे।   
वक़्त तो सदा का असंवेदनशील   
न पापा के समय मेरे लिए रूका   
न मम्मी के लिए   
अपनी मनमानी कर गया   
मम्मी चली गई   
बिना कुछ कहे चली गई   
तारों में गुम हो गई।   
अब कोई नहीं जो मेरा मन समझेगा   
अब कोई नहीं जो मेरा ग़म बाँटेगा   
मेरे हर दर्द पर मुझसे ज़्यादा तड़पेगा   
मेरी फ़िक्र में हर समय बेहाल रहेगा   
न पापा थे न मम्मी है   
दोनों अलविदा कह गए   
जिनको जाते वक़्त मैंने न सुना न देखा।   
काश! तुम दोनों तारों के झुरमुट में मिल जाओ   
एक बार गले लगा जाओ   
पापा के बिना जीने का हौसला तुमने दिया था   
अब तुम्हारे बिना जीने का हौसला कौन देगा मम्मी?   
दुआ करो मैं हवा या धुआँ बन जाऊँ   
एक बार तुमसे मिल आऊँ   
अपनी फ़रियाद किसे सुनाऊँ   
क्या करूँ कि हवा या धुआँ बन जाऊँ   
एक बार तुमसे मिल आऊँ   
बस एक बार।   
मेरी मम्मी 
- जेन्नी शबनम (18. 3. 2021)  
_______________________________________ 

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

713. रिश्ते हैं फूल (रिश्ता पर 20 सेदोका)

रिश्ते हैं फूल 
(रिश्ता पर 20 सेदोका)
******* 

1. 
रिश्ते हैं फूल   
भौतिकता ने छीने   
रिश्तों के रंग-गंध   
मुरझा गए   
नहीं कोई उपाय   
कैसे लौटे सुगंध।   

2. 
रिश्ते हैं चाँद   
समय है बादल   
ओट में जाके छुपा   
समय स्थिर   
ओझल हुए रिश्ते   
अमावस पसरी।   

3. 
पावस रिश्ते   
वक़्त ने किया छल   
छिन्न-भिन्न हो गए   
मिटी है आस   
मन का प्रदूषण   
तिल-तिल के मारे।   

4. 
कुंठित मन   
रिश्ते हो गए ध्वस्त   
धीरे-धीरे अभ्यस्त   
वापसी कैसे?   
जेठ की धूप जैसे   
कठोर जिद्दी मन।   

5. 
रिश्तों का कत्ल   
रक्त बिखरा पड़ा   
अपने ही क़ातिल,   
रोते ही रहे   
कैसे दे पाते सज़ा   
अपराधी अपने।   

6. 
टोना-टोटका   
किसी ने तो है किया   
मृतप्राय है रिश्ता,   
ओझा भी हारा   
झाड़-फूँक है व्यर्थ   
हम हैं असमर्थ।   

7. 
मन आहत   
वक़्त का काला जादू   
रिश्ते बने बोझिल,   
वक़्त मिटाए   
नज़र का डिठौना   
औघड़ निरूपाए।   

8. 
बावरा मन   
रिश्तों की बाट जोहे   
दे करके दुहाई,   
आस का पंछी   
अब भी है जीवित   
शायद प्राण लौटें।   

9. 
रिश्ते पखेरू,   
उड़के चले गए   
दाना-पानी न मिला   
खो गए रिश्ते,   
चुगने नहीं आते   
कितना भी बुलाओ।   

10. 
जिलाके रखो   
मन भर दुलारो   
कभी खोए न रिश्ते   
मर जो गए   
कितने भी जतन   
लौटते नहीं रिश्ते।   

11. 
वाणी का तीर   
मन हुआ छलनी   
घायल हुए रिश्ते   
मन की पीर   
कोई कहे किससे   
दिल गया है छील।   

12. 
दुर्गम रास्ते   
चल सको अगर   
सँभलकर चलो   
रिश्ते सँभालो,   
पाँव छिले, लगा लो   
रिश्तों के मलहम।   

13. 
घायल रिश्ता   
लहूलुहान पड़ा   
ज्यों पर कटा पक्षी,   
छटपटाए   
पर उड़ न पाए   
आजीवन तड़पे।   

14. 
अजब दौर   
बँट गई दीवारें   
ज्यों रिश्ते हों कटारें,   
भेज न पाएँ   
मन की पीर-पाती   
बंद हो गए द्वारे।   

15. 
रिश्ते दरके   
रिस-रिसके बहे   
नस-नस के आँसू,   
मन घायल   
संवेदना है मौन   
समझे भला कौन?   

16. 
बादल रिश्ते   
जमकर बरसे   
प्रेम के फूल खिले,   
मन भँवरा   
प्रेम की फूलवारी   
सुगंध से अघाए।   

17. 
मौसम स्तब्ध   
रिश्ते की मौत हुई   
आसमाँ भी रो पड़ा,   
नज़र लगी   
हँसी भी रूठ गईं   
मातम है पसरा।   

18. 
खिलते रिश्ते   
साथ जो हैं चलते   
खनकती है हँसी   
साथ जो रहें   
कोई कभी न तन्हा   
आए आँधी या तूफाँ।   

19. 
गाछ-से रिश्ते   
कभी तो हरियाए   
कभी तो मुरझाए   
प्रीत-बरखा   
बरसते जो रहे   
गाछ उन्मुक्त जिए।   

20. 
रिश्तों की डोर   
कभी मत तू छोड़   
रख मुट्ठी में जोड़   
हाथ से छूटे   
कटी गुड्डी-से रिश्ते   
साबुत नहीं मिले।   

- जेन्नी शबनम (29. 1. 2021)   
______________________   

 

सोमवार, 8 मार्च 2021

712. अब नहीं हारेगी औरत

अब नहीं हारेगी औरत

******* 

जीवन के हर जंग में हारती है औरत   
ख़ुद से लड़ती-भिड़ती हारती है औरत   
सुख समेटते-समेटते हारती है औरत   
दुःख छुपाते-छुपाते हारती है औरत   
भावनाओं के जाल में उलझी हारती है औरत   
मन पर पैबंद लगाते-लगाते हारती है औरत   
टूटे रिश्तों को जोड़ने में हारती है औरत   
परायों से नहीं अपनों से हारती है औरत   
पति-पत्नी के रिश्तों में हारती है औरत   
पिता-पुत्र के अहं से हारती है औरत   
बेटा-बेटी के द्वन्द्व से हारती है औरत   
बहु-दामाद के छद्म से हारती है औरत   
दुनियादारी के संघर्ष से हारती है औरत   
दुनिया की भीड़ में गुम हारती है औरत   
अपनी चुप्पी से ही सदा हारती है औरत   
तोहमतों के बाज़ार से हारती है औरत   
ख़ुद सपनों को तोड़के हारती है औरत   
ख़ुद को साबुत रखने में हारती है औरत   
जीवन भर हँस-हँसकर हारती है औरत   
जाने क्यों मरकर भी हारती है औरत   
जीवन के हर युद्ध में हारती है औरत।   
अब हर हार को जीत में बदलेगी औरत   
किसी भी युद्ध में अब नहीं हारेगी औरत।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2021)
_______________________________

बुधवार, 27 जनवरी 2021

711. भोर की वेला (भोर पर 7 हाइकु)

भोर की वेला 

******* 

1. 
माँ-सी जगाएँ   
सुनहरी किरणें   
भोर की वेला।   

2. 
पाखी की टोली   
भोरे-भोरे निकली   
कर्म निभाने।   

3. 
किरणें बोलीं -   
जाओ, काम पे जाओ   
पानी व पाखी।   

4. 
सूरज जागा   
आँख मिचमिचाता   
जग भी जागा।   

5. 
नया जीवन,   
प्रभात रोज़ देता   
शुभ संदेश।   

6. 
मन सोचता -   
पंछी-सा उड़ पाता   
छूता अंबर।   

7. 
रोज रँगता   
प्रकृति चित्रकार   
अद्भुत छटा।   

- जेन्नी शबनम (24. 1. 2021) 
________________________

बुधवार, 20 जनवरी 2021

710. बात इतनी सी है

बात इतनी सी है 

******* 


चले थे साथ बात इतनी सी है   
जिए पर तन्हा बात इतनी सी है।   

वे मसरूफ़ रहते तो बात न थी   
मग़रूर हुए बात इतनी सी है।   

मुफ़लिसी के दिन थे पर कपट न की   
ग़ैरतमंद हूँ बात इतनी सी है।   

झूठे भ्रम में जीया जीवन मैंने   
कोई न अपना बात इतनी सी है।   

हमदर्द नहीं होता कोई यहाँ   
सब है छलावा बात इतनी सी है।   

ख़ुद से हर ग़म बाँटा ऐ मेरे ख़ुदा   
तुम भी हो ग़ैर बात इतनी सी है।   

सोच समझके अब तुम बोलना ‘शब‘   
जग है पराया बात इतनी सी है।   

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2021) 
_________________________

सोमवार, 11 जनवरी 2021

709. आकुल (5 माहिया)

आकुल 

******* 

1. 
जीवन जब आकुल है   
राह नहीं दिखती   
मन होता व्याकुल है।   

2. 
हर बाट छलावा है   
चलना ही होगा   
पग-पग पर लावा है।   

3. 
रूठे मेरे सपने   
अब कैसे जीना   
भूले मेरे अपने।   

4. 
जो दूर गए मुझसे   
सुध ना ली मेरी   
क्या पीर कहूँ उनसे।   

5. 
जीवन एक झमेला   
सब कुछ उलझा है   
यह साँसों का खेला।   

- जेन्नी शबनम (10. 1. 2021)
_______________________

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

708. कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर

कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर 

******* 


कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर   
जोखिमों की लम्बी क़तार को   
बच-बचाकर लाँघ जाना,   
क्या इतना आसान है   
बिना लहूलुहान पार करना?   
हर एक लम्हा संघर्ष है   
क़दम-क़दम पर द्वेष है   
यकीन करना बेहद कठिन है   
विश्वास पल-पल दम तोड़ता है   
सरेआम लुट जाते हैं सपने   
ग़ैरों से नहीं अपनों से मिलते हैं धोखे   
कोई कैसे कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर आए?   
कम्फ़र्ट ज़ोन की सुविधाएँ   
नि:संदेह   
कमज़ोर बनाती हैं   
अवरोध पैदा करती हैं   
मन के विस्तार को जकड़ती हैं   
संभावनाओं को रोकती हैं।   
परन्तु कम्फ़र्ट ज़ोन के बाहर   
एक विस्तृत संसार है   
जहाँ संभावनाओं के ढेरों द्वार हैं   
कल्पनाओं की सीढ़ियाँ हैं   
उत्कर्ष पर पहुँचने के रास्ते हैं।   
चुनने की समझदारी विकसित कर   
शह मात से निडर होकर   
चलनी है हर बाज़ी,   
विफलता मिले तो रुकना नहीं   
ठोकरों से डरना नहीं   
बेख़ौफ़ चलते जाना है,   
रास्ता अनजान है मगर   
संसार को परखना है   
ख़ुद को समझना है   
ताकि रास्ता सुगम बने,   
कामनाओं की फुलवारी से   
मनमाफ़िक फूल चुनना है   
जो जीवन को सुगंधित करे।   
अब वक़्त आ गया है   
कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर आकर   
दुनिया को अपनी शर्तों से   
मुट्ठी में समेटकर   
जीवन में खुशबू भरना है   
कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर आना है।   
याद रहे एक कम्फ़र्ट ज़ोन से   
निकल जाओ जब   
दूसरा कम्फ़र्ट ज़ोन स्वयं बन जाता है   
पर किसी कम्फ़र्ट ज़ोन को   
स्थाई मत होने दो। 

- जेन्नी शबनम (7. 1. 2021)

(अपनी पुत्री के 21 वें जन्मदिन पर)
_______________________________ 

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

707. कहानियाँ (5 क्षणिकाएँ)

कहानियाँ  

*******

1.
छोटे-छोटे लम्हों में   
यादों की ढेरों कतरन हैं   
सबको इकट्ठाकर   
छोटी-छोटी कहानी रचती हूँ   
अकेलेपन में   
यादों से कहानियाँ निकल   
मेरे चेहरे पे खिल जाती हैं।   

2. 
मेरे युग के प्रारम्भ से   
मेरे युग के अंत तक की   
कथा लिख दी किसी ने,   
किसने, यह नहीं मालूम   
न भाषा मालूम न लिखावट   
पर इतना मालूम है   
कहानी मेरी है।

3.
रात के धागे में हर रोज़   
यादों के मोती पिरोती हूँ   
हर मोती एक कहानी   
हर कहनी मेरी ज़िन्दगी   
अब सब चाँद के लॉकर में   
रख दिया है संजोकर   
जीवन के अमावस में   
जरूरत पड़ेगी।   

4. 
बचपन की कहानी बड़ी निराली   
दो पंक्तियों में पूरी कहानी   
एक था राजा एक थी रानी   
दोनों मर गए ख़तम कहानी   
तब मालूम कहाँ था   
जीने और मरने के बीच बनती है   
जीवन की असली कहानी।   

5.
कहानी में मैं   
मुझमें ही कहानी   
कहता कौन सुनता कौन   
पन्नों पर रच दी कहानी   
मैं बन गई इतिहास।

- जेन्नी शबनम (5. 1. 2021)
________________________________

 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

706. नूतन वर्ष (10 हाइकु)

नूतन वर्ष

*******

1. 
दसों दिशाएँ   
करती हैं स्वागत   
नूतन वर्ष।   

2. 
देकर दुःख   
बीता पुराना साल   
बेवफ़ा जैसे।   

3. 
आई द्वार पे   
उम्मीद की किरणें   
नया बरस।   

4. 
विस्मृत करें   
बीते साल की चालें   
मन के छाले।   

5. 
डर से भागा,   
आया जो नव वर्ष   
पुराना वर्ष।   

6. 
बीता बरस   
चला गया निर्मोही   
यादें देकर।   

7. 
याद आएगा   
सुख-दु:ख का साथी   
साल पुराना।   

8. 
वर्ष ज्यों बीता   
वक्त के पिंजड़े से   
फुर्र से उड़ा।   

9.
बड़ा सताया   
किसी को न बिसरा   
गुज़रा साल।   

10. 
आशा का दीप   
लेकर आया साल   
मन सजाओ। 

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2021)

________________________