जीवन-पथ
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जीवन-पथ
उबड़-खाबड़-से
टेढ़े-मेढ़े-से
गिरते-पड़ते भी
होता चलना,
पथ कँटीले सही
पथरीले भी
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ
लाखों बाधाएँ
अकेले हों मगर
होता चलना,
नहीं कोई अपना
न कोई साथी
फैला घना अँधेरा
डर-डर के
क़दम हैं बढ़ते
गिर जो पड़े
खुद ही उठकर
होता चलना,
ख़ुद पोंछना आँसू
जग की रीत
समझ में तो आती;
पर रुलाती
दर्द होता सहना
चलना ही पड़ता।
-जेन्नी शबनम (8.6.2019)
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