गुरुवार, 18 जुलाई 2019

620. जीवन-युद्ध

जीवन-युद्ध 
  
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यादों के गलियारे से गुज़रते हुए   
मुमकिन है यादों को धकेलते हुए   
जीवन के पार तो आ गई    
पर राहों में पड़ी छोटी-छोटी यादें   
मायूसी-से मेरी राह तकती दिखीं 
कि ज़रा थमकर याद कर लो उन लम्हों को   
जो दोबारा नहीं आएँगे।   

जब एक नन्ही बच्ची ने   
पहली बार छोटी-छोटी रोटी बना   
अपने पापा को खिलाई थी   
उस बच्ची ने माँ को देखकर   
झाड़ू की सींक पर पहली बार   
ऊन से फंदा डालना सीखा था   
उसने दादी से सीखा था   
सिलबट्टे पर हल्दी पीसना और जाँता पर दाल दरना   
भैया के साथ खेले बचपन के खेल थे-   
डॉक्टर-डॉक्टर, लुका-छिपी   
राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघन   
लूडो, पिट्टो और बैडमिन्टन   
उसने भैया से सीखा था साइकिल चलाना   
भैया से कभी जो झगड़ लेती   
फिर उसे ख़ूब मारती और भैया हँसकर मार खाता   
रूठ जाती थी वह बच्ची अक्सर   
उसके पापा बड़े प्यार से उसे गोद में बिठाकर मनाते   
कैसे-कैसे प्यारे-प्यारे दिन थे, जीवन में जो गुज़रे।   

जाने अतीत पीछा क्यों करता है   
फिर से बच्ची बन पापा की गोद में बैठने का मन करता है   
गाँव की पगडंडियों पर हवाई चप्पल पहन बेवजह भागना   
बोरिंग की तेज़ धार पर हौज़ में कूदना   
बाढ़ में सारा दिन पानी में घुसकर   
पापा के साथ गाँव भर की ख़बर लेना   
बीमार होने पर मिट्टी की पट्टी   
मट्ठा, सूप और नीम्बू-पानी पीना   
पथ्य में उबले आटे की रोटी और घिऊरा की तरकारी खाना   
सुबह चार बजे से पापा की गोदी में बैठकर   
दुनिया भर की जानकारी पाना।   

माँ से सीखा घर चलाना   
घर का बजट बनाना, कम पैसे में जीवन जीना   
पापा के जाने के बाद माँ का कमज़ोर पड़ना   
और धीरे-धीरे समाज से कटना   
फिर आत्मविश्वास का थोड़ा जगना   
दादी का सम्बल   
और फिर हमारा जीवन-युद्ध में भिड़ना।   

सारे लम्हे याद आते हैं   
हर एक बात पर याद आते हैं   
पर ठहरना नहीं चाहती वहाँ पर   
जब भी रुकी हूँ, आँखें नम होती हैं    
फिर तलाशती हूँ, कोई कोना अपना   
जहाँ निर्बाध हँस सकूँ, रो सकूँ   
पापा की यादों को जी सकूँ   
किसी से कुछ कह सकूँ 
थोड़ा-सा मन का कर सकूँ   
ख़ुद के साथ थोड़ा रह सकूँ।   

-जेन्नी शबनम (18.7.2019)   
(पापा की 41वीं पुण्यतिथि पर)
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सोमवार, 15 जुलाई 2019

619. वर्षा (10 ताँका)

वर्षा (10 ताँका)   

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1.
तपती धरा   
तन भी तप उठा   
बदरा छाए   
घूम-घूम गरजे   
मन का भौंरा नाचे।   

2.   
कूकी कोयल   
नाचे है पपीहरा   
देख बदरा   
चहके है बगिया   
नाचे घर अँगना।   

3.   
ओ रे बदरा   
कितना तड़पाया   
अब तू माना   
तेरे बिना अटकी   
संसार की मटकी।   

4.   
गाए मल्हार   
घनघोर घटाएँ   
नभ मुस्काए   
बूँदें खूब झरती   
रिमझिम फुहार।   

5.   
बरसा पानी   
याद आई है नानी   
है अस्त व्यस्त   
जीवन की रफ्तार   
जलमग्न सड़कें।   

6.   
पौधे खिलते   
किसान हैं हँसते   
वर्षा के संग   
मन मयूरा नाचे   
बूंदों के संग-संग।   

7.   
झूमती धरा   
झूमता है गगन   
आई है वर्षा   
लेकर ठंडी हवा   
खिल उठा चमन।   

8.   
घनी प्रतीक्षा   
अब जाकर आया   
मेघ पाहुन   
चाय संग पकौड़ी   
पहुना संग खाए।   

9.   
पानी बरसा   
झर-झर झरता   
जैसे झरना,   
सुन मेरे बदरा   
मन हुआ बावरा।   

10.   
हे वर्षा रानी   
यूँ रूठा मत करो   
आ जाया करो   
रवि से लड़कर   
बरसो जमकर।   

- जेन्नी शबनम (6. 7. 2019)   

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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

618. जीवन-पथ (चोका - 12)

जीवन-पथ (चोका)   

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जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से 
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अन्धेरा   
डर-डर के   
कदम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
खुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता !   

- जेन्नी शबनम (8. 6. 2019) 

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सोमवार, 1 जुलाई 2019

617. सरमाया (क्षणिका)

सरमाया   

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ये कैसा दौर आया है, पहर-पहर भरमाया है   
कुछ माँगूँ तो ईमान मरे, न माँगूँ तो ख़्वाब मरे   
क़िस्मत से धक्का-मुक्की, पोर-पोर घबराया है   
जद्दोज़हद में युग बीते, यही मेरा सरमाया है।   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2019)   
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