शनिवार, 30 मई 2020

668. नीरवता

नीरवता 

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मन के भीतर   
एक विशाल जंगल बस गया है 
जहाँ मेरे शब्द चीखते-चिल्लाते हैं 
ऊँचे वृक्षों-सा मेरा अस्तित्व 
थककर एक छाँव ढूँढता है 
लेकिन छाँव कहीं नहीं है   
मैंने ख़ुद वृक्षों का क़त्ल किया था,   
इस बीहड़ जंगल से अब मन डरने लगा है   
ढूँढती हूँ, पुकारती हूँ   
पर कहीं कोई नहीं है   
मैंने इस जंगल में आने का न्योता   
कभी किसी को दिया ही नहीं था,   
मन में ये कैसा कोलाहल ठहर गया है?   
जानवरों के जमावड़े का ऊधम है 
या मेरे सपने टकरा रहे हैं?   
कभी मैंने अपनी सभी ख़्वाहिशों को   
ताक़त के रूप में बाँटकर, आपस में लड़ा दिया था   
और जो बच गए थे, उन्हें आग में जला डाला   
अब तो सब लुप्त हो चुके हैं   
मगर शोर है कि थमता ही नहीं,   
मन का यह जंगल, न आग लगने से जलता है   
न आँधियों में उजड़ता है   
नीरवता व्याप्त है, जंगल थरथरा रहा है   
अब क़यामत आने को है।   

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2020)
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सोमवार, 25 मई 2020

667. मंत्र

मंत्र

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अपनी पीर छुपाकर जीना   
मीठे कह के आँसू पीना   
ये दस्तूर निभाऊँ कैसे   
जिस्म है घायल छलनी सीना   
रिश्ते नाते अब निभते कहाँ   
शिकवे शिकायत किससे भला   
गली चौबारे खुद में सिमटे   
दरख़्त भी हुए टुकड़े-टुकड़े   
संवेदनाओं की बली चढ़ाकर   
मतलबपरस्त हो गई दुनिया   
खिदमत में मिट जाओ भी गर   
किस्मत सोई कहेगी दुनिया   
साथ नहीं कोई ब्रह्म बाबा   
पीर-पैगम्बर का नहीं सहारा   
पीर पराई समझे कब कोई   
मर-मर कर जीना छोड़े हर कोई   
खतम न हो ताल्लुकात सारा   
जीने का यह मंत्र दोहराना।  

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 22 मई 2020

666. स्वाद / बेस्वाद (10 क्षणिकाएँ)

स्वाद / बेस्वाद

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1. 
तेरे इश्क का स्वाद   
मीठे पानी के झरने-सा   
प्यास से तड़पते राही को   
इक घूँट भर भी मिल जाए   
पीर-पैगंबर की दुआ   
कुबूल हो जाए।   

2. 
एक घूँट इश्क   
और तेरा स्वाद   
अस्थि-मज्जा में जा घुला   
जिसके बिना   
जीवन नामुमकिन।   

3. 
उस रोज़ नथुनों में समा गई   
रजनीगंधा की खुश्बू   
जो तेरे बदन को छूती हुई   
मुझसे आकर लिपट गई थी   
और मेरी साँसों में तू ठहर गया था   
रजनीगंधा की खुश्बू अब भी आती है   
और मुझे छूकर गुजर जाती है   
पर कोई और खुश्बू अब मुझे भाती नहीं   
तेरा स्वाद मेरे मन ने   
एक बार चख जो लिया है।   

4. 
तेरी बातें तेरी मर्जी   
तेरी दीद तेरी मनमर्जी   
तेरी मर्जी तेरी मनमर्जी   
इसमें कहाँ मेरी मर्जी   
तेरी मर्जी का स्वाद   
बड़ा ही तीखा   
भा गई मुझको तेरी मर्जी   
अब तेरी मर्जी मेरी मर्जी।   

5. 
जीवन का स्वाद   
मैंने घूँट-घूँट पीकर लिया   
एक घूँट तेरे वास्ते बचा कर रखा है   
गर मिलो कभी तुम   
वह घूँट तुम पी लेना   
मेरी ज़िन्दगी की कड़वाहट   
तुम भी जी लेना।   

6. 
कुछ खट्टी कुछ मीठी   
स्वाद से भरी मेरी ज़िन्दगी   
थोड़ी नरम थोड़ी गरम   
गुलगुले-सी मेरी ज़िन्दगी   
आओ थोड़ा तुम भी चख लो   
एक और स्वाद का मजा ले लो।   

7. 
तेरा स्वाद बदन में घुल गया था   
जब इश्क का जाम पिया मैंने   
अब सब बेस्वाद हो गया है   
जब से तेरा इश्क   
कहीं और आबाद हुआ है।   

8. 
झामे से खुरच-खुरच कर   
पूरे बदन को छील दिया है   
कि रिसते लहू के साथ   
तेरे इश्क का स्वाद बह जाए।   

9. 
तेरे इश्क का स्वाद   
कितना कसैला है   
जब-जब तेरी याद आई   
उबकाई-सी आती है।   

10. 
कैसी कसक थी   
झिझक में जीती रही   
कहने की बेताबी   
मगर कभी कह न सकी   
दर्दे ए एहसास नहीं रेशमी   
मेरे अल्फ़ाज़ हो गए कागजी   
जाने किस चूल्हे पर पकी किस्मत   
जो ज़िन्दगी का स्वाद कसैला हुआ।   

- जेन्नी शबनम (22. 5. 2020) 
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बुधवार, 20 मई 2020

665. कहा-सुनी जारी है

कहा-सुनी जारी है

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पल-पल समय के साथ, कहा-सुनी जारी है   
वो कहता रहता है, मैं सुनती रहती हूँ,   
अरेब-फ़रेब, जो उसका मन, बोलता रहता है   
कान में पिघलता सीसा, उड़ेलता रहता है   
मैं हुंकारी भरती रहती हूँ, मुस्कुराती रहती हूँ   
अपना अपनापा दिखाती रहती हूँ।   
नहीं याद क्या-क्या सुनती रहती हूँ   
नहीं याद क्या-क्या बिसराती जाती हूँ   
जितना मेरा मन किया, उतना ही सुनती हूँ   
बहुत कुछ अनसुना करती हूँ।   
न उसे पता कि मैंने क्या-क्या न सुना   
न मुझे पता कि उसने मुझे कितना-कितना धिक्कारा   
कितना-कितना दुत्कारा।   
फिर भी सब कहते हैं   
हमारे बीच बड़ा प्यारा संबंध है   
न हम लड़ते-झगड़ते दिखते हैं   
न कभी कहा-सुनी होती है   
बहुत प्यार से हम जीते हैं।   
यह हर कोई जानता है   
कहा-सुनी में दोनों को बोलना पड़ता है   
अपना-अपना कहना होता है   
दूसरों का सुनना होता है।   
पर समय और मेरे बीच   
अजब-सा नाता है   
वो कहता जाता है, मै सुनती जाती हूँ   
और कहा-सुनी जारी रहती है।   
कहा-सुनी जारी है।

 - जेन्नी शबनम (20. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 15 मई 2020

664. लॉकडाउन

लॉकडाउन

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लॉकडाउन से जब शहर हुए हैं वीरान   
बढ़ चुकी है मन के लॉकडाउन की भी मियाद   
अनजाने भय से मन वैसे ही भयभीत रहता है 
जैसे आज महामारी से पूरी दुनिया डरी हुई है   
मन को हजारों सवाल बेहिसाब तंग करते हैं   
जैसे टी वी पर चीखते खबरनवीसों के कुतर्क असहनीय लगते हैं   
कितना कुछ बदल दिया इस नन्हे-से विषाणु ने   
मानव को उसकी औक़ात बता दी, इस अनजान शत्रु ने,   
आज ताकत के भूखे नरभक्षी, अपने बनाए गढ्ढे में दफ़न हो रहे हैं   
भात-छत के मसले, वोटों की गिनती में जुट रहे हैं   
सैकड़ों कोस चल-चल कर, कोई बेदम हो टूट रहा है   
बदहवास लोगों के ज़ख्मों पर, कोई अपनी रोटी सेंक रहा है   
पेट-पाँव झुलस रहे हैं, आत्माएँ सड़कों पर बिलख रही हैं   
रूह कँपाती खबरें हैं, पर अधिपतियों को व्याकुल नहीं कर रही हैं   
अफ़वाहों के शोर में, घर-घर पक रहे हैं तोहमतों के पकवान   
दिल दिमाग दोनों त्रस्त हैं, चारों तरफ है त्राहि-त्राहि कोहराम,   
मन की धारणाएँ लगातार चहलक़दमी कर रही हैं   
मंदिर-मस्ज़िद के देवता लम्बी छुट्टी पर विश्राम कर रहे हैं   
इस लॉकडाउन में मन को सुकून देती पक्षियों की चहचहाहट है   
जो सदियों से दब गई थी मानव की चिल्ला-चिल्ली में   
खुला-खुला आसमान, खिली-खिली धरती है   
सन्न-सन्न दौड़ती हवा की लहरें हैं   
आकाश को पी-पीकर ये नदियाँ नीली हो गई हैं   
संवेदनाएँ चौक-चौराहों पर भूखे का पेट भर रही हैं   
ढेरों ख़ुदा आसमान से धरती पर उतर आए हैं अस्पतालों में   
ख़ाकी अपने स्वभाव के विपरीत मानवीय हो रही है   
सालों से बंद घर फिर से चहक रहा है   
अपनी-अपनी माटी का नशा नसों में बहक रहा है,   
बहुत कुछ भला-भला-सा है, फिर भी मन बुझा-बुझा-सा है   
आँखें सब देख रहीं हैं, पर मन अपनी ही परछाइयों से घबरा रहा है   
आसमाँ में कहकशाँ हँस रही है, पर मन है कि अँधेरों से निकलता नहीं   
जाने यह उदासियों का मौसम कभी जाएगा कि नहीं,   
तय है, शहर का लॉकडाउन टूटेगा   
साथ ही लौटेंगी बेकाबू भीड़, बदहवास चीखें   
लौटेगा प्रदूषण, आसमान फिर ओझल होगा   
फिर से कैद होंगी पशु-पक्षियों की जमातें,   
हाँ, लॉकडाउन तो टूटेगा, पर अब नहीं लौटेगी पुरानी बहार   
नहीं लौटेंगे वे जिन्होंने खो दिया अपना संसार   
सन्नाटों के शहर में अब सब कुछ बदल जाएगा   
शहर का सारा तिलिस्म मिट जाएगा   
जीने का हर तरीका बदल जाएगा   
रिश्ते, नाते, प्रेम, मोहब्बत का सलीका बदल जाएगा,   
यह लॉकडाउन बहुत-बहुत बुरा है   
पर थोड़ा-थोड़ा अच्छा है   
यह भाग-दौड़ से कुछ दिन आराम दे रहा है   
चिन्ताओं को ज़रा-सा विश्राम दे रहा है,   
यह समय कुदरत के स्कूल का एक पाठ्यक्रम है   
जीवन और संवेदनाओं को समझने का पाठ पढ़ा रहा है!   

- जेन्नी शबनम (15. 5. 2020) 
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बुधवार, 13 मई 2020

663. अलविदा

अलविदा  

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तपती रेत पर, पाँव के नहीं   
जलते पाँव के ज़ख्मों के निशान हैं,   
मंज़िल दूर, बहुत दूर दिख रही है  
पाँव थक चुके हैं, पाँव और मन जल चुके हैं  
हौसला देने वाला कोई नहीं  
साँसें सँभालने वाला कोई नहीं।   
यह तय है, ज़िन्दगी वहाँ तक नहीं पहुँच पाएगी   
जहाँ पाँव-पाँव चले थे, जहाँ सपनों को पंख लगे थे  
जहाँ से ज़िन्दगी को सींचने, बहुत दूर निकल पड़े थे।   
आह! अब और सहन नहीं होता  
तलवे ही नहीं आँतें भी जल गई हैं  
जल की एक बूँद भी नहीं  
जिससे अंतिम क्षण में तालू तर हो सके,  
उम्मीद की अंतिम तीली बुझने को है  
आख़िरी साँस अब उखड़ने को है।   
सलाम उन सबको   
जिनके पाँव ने उनका साथ दिया,  
मेरे उन सपनों, उन अपनों, उन यादों को अलविदा।   

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 8 मई 2020

662. अनुभूतियों का सफ़र

अनुभूतियों का सफ़र 

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अनुभूतियों के सफ़र में   
संभावनाओं को ज़मीन न मिली,   
हताश हूँ, परेशान हूँ   
मगर, हार की स्वीकृति, मन को नहीं सुहाती।   
फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए   
पुरज़ोर कोशिश करती हूँ    
कड़वे-कसैले से कुछ अल्फ़ाज़ मन को बेधते हैं   
फिर-फिर जीने की तमन्ना में   
हौसलों की बाग़वानी करती हूँ,  
सँभलने और स्थिरता की मियाद   
पूरी नहीं होती, कि सब ध्वस्त हो जाता है।   
जाने कौन-सा गुनाह था, या किसी जन्म का शाप   
अनुभूतियों के सफ़र में, महज़ कुछ फूल मिले   
शेष काँटे ही काँटे   
जो वक़्त-बेवक्त चुभते रहे, मन को बेधते रहे।   
पर अब, संभावनाओं को जिलाना होगा   
उसे ज़मीन में उगाना होगा   
थके हों क़दम, मगर चलना होगा   
आसमान छिन जाए, मगर   
ज़मीन को पकड़ना होगा।   
जीवन की अनुभूतियाँ संबल हैं और   
जीवन की संभावना भी।

- जेन्नी शबनम (7. 5. 2020) 
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मंगलवार, 5 मई 2020

661. सरेआम मिलना

सरेआम मिलना 

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अकेले मिलना अब हो नहीं सकता  
जब भी मिलना है सरेआम मिलना   

मेरे रंजों ग़म उन्हें भाते नहीं
फिर क्या मिलना और क्योंकर मिलना   

नहीं होती है रुतबे से यारी
इनसे दूरी भली फ़िज़ूल मिलना   

कब मिटते हैं नाते उम्र भर के
कभी आना अगर तो जीभर मिलना।   

काश! ऐसा मिलना कभी हो जाए
ख़ुद से मिलना और ख़ुदा से मिलना।   

ऐसा मिलना कभी तो हम सीखेंगे  
रूह से मिलना और दिल से मिलना   

ऐसा हुनर अब भी नहीं हम सीख पाए  
जो चुभाए नश्तर उससे अदब से मिलना   

रोज़ गुम होते रहे भीड़ में हम  
आसान नहीं होता ख़ुद से मिलना।   

जीस्त की यादें अब सोने नहीं देती  
यूँ जाग-जाग कर किससे मिलना?   

सच्ची बातें हैं चुभती बर्छी-सी  
'शब' तुम चुप रहना किसी से न मिलना।  

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2020) 

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शुक्रवार, 1 मई 2020

660. गँवारू लड़की

गँवारू लड़की

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एक गाँव की लड़की   
शहर में पनाह ढूँढती रही   
अपना नाम बता के अपना पता पूछती रही   
अपने हिस्से के कुछ किस्से लेकर   
सबके मन के द्वार खटखटाती थी   
थोड़ा अपनापन माँगती थी, मुट्ठी भर जमीन चाहती थी  
कभी किसी ने उसकी परवाह न की   
पर अब वह खुद भी बेपरवाह हो चुकी है   
न घर मिला न मन मिला न मान मिला   
न ठौर न ठिकाना मिला   
सबने कहा वह गँवारू है किसी काम की नहीं   
न शहर के लायक न किसी घर के लायक   
पर अब वह उदास नहीं रहती, अब उसकी चुप्पी टूट चुकी है   
वह पलायन न करेगी, ढ़ीठ होकर बढ़ेगी   
वह देसी बोली बोलती है, उसे गर्व है अपनी बोली पर   
वह गाँव की गँवार है, उसे गर्व है अपने गँवारूपन पर   
कमसे कम उसने सोंधी मिट्टी को तो चूमा है   
अपनी बोली में सपनों को पाला है   
शहर आ के भी जो गाँव से लाई थी, सब सँभाला है   
पेड़ पौधों को दुलराया है   
वह हाथ से खाती है, तो अन्न को पहचानती है   
धड़कनों से बात करती है, तो मन को पहचानती है   
खेतों डरेरों पर कूदती फाँदती, पशु पक्षियों से यारी निभाई है   
वो सारे रिश्ते जी के शहर आई है   
हाँ वह शहरी नहीं शहर के लिए पराई है   
पर वो बहुत प्यारे गाँव से आई है   
शायद इसलिए वह अबतक कंक्रीट पहन नहीं पाई   
मोम को ओढ़ के बैठी है, पत्थर बन नहीं पाई   
इस जंगल में खो नहीं पाई   
अच्छा है शहर की हो नहीं पाई   
वह गाँव की लड़की गँवारू है   
मगर अब शहर की नब्ज और शहरियों का शातिरपना पहचान गई है   
खुद को समझने लगी है शहर को जान गई है।   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2020)  
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