गुरुवार, 13 अगस्त 2020

681. विदा

विदा 

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उम्र के बेहिसाब लम्हे   
जाने कैसे ख़र्च हो गए    
बदले में मिले ज़िन्दगी के छल   
एकांत के अनेकों कठोर पल   
जब न सुनने वाला कोई, न समझाने वाला कोई   
न पास आने वाला, न दूर जाने वाला कोई   
न संगी न साथी, न रिश्ते न रिश्तेदारी   
अपनी नीरवता में ख़ुद के साथ   
सिमटे हुए दोनों खुले हाथ   
और यूँ धीरे-धीरे   
विदा हो रही है ज़िन्दगी।   

- जेन्नी शबनम (12. 8. 2020) 
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