शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

693. दड़बा

दड़बा 

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ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ अपने-अपने दड़बों में   
अपने-अपने परों को सँभालो   
एक दूसरे को अपने-अपने चोंचों से लहूलुहान करो।   
कटना तो तुम सबको है, एक न एक दिन   
अपनों द्वारा या ग़ैरों द्वारा,   
सीख लो लड़ना, ख़ुद को बचाना, दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध।   
दड़बे के बाहर की दुनिया, क़ातिलों से भरी है   
जिनके पास, शब्द के भाले हैं, बोली की कटारें हैं   
जिनके देह और जिह्वा को, तुम्हारे माँस और लहू की प्यास है   
पलक झपकते ही, झपट ली जाओगी   
चीख भी न पाओगी।   
दड़बे के भीतर, कितना भी लिख लो तुम   
बहादूरी की गाथाएँ, हौसलों की कथाएँ   
पर बाहर की दुनिया, जहाँ पग-पग पर भेड़िया है   
मानव रूप धरकर, तुम्हारा इंतजार कर रहा है   
भेड़िए के सामने मेमना नहीं, खुद भेड़िया बनना है   
टक्कर सामने से देना है, बराबरी पर देना है।   
ऐ लड़कियों!   
जीवन की रीत, जीवन का संगीत, जीवन का मंत्र   
सब सीख लो तुम,   
न जाने कब किस घड़ी   
समय तुमसे क्या माँगे।   

- जेन्नी शबनम (24. 10. 2020)
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बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

692. देहाती

देहाती 

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फ़िक्रमंद हूँ, उन सभी के लिए   
जिन्होंने सूरज को हथेली में नहीं थामा   
चाँद के माथे को नहीं चूमा   
वर्षा में भीग-भीगकर न नाचा न खेला   
माटी को मुट्ठी में भरकर, बदन पर नहीं लपेटा।   
दुःख होता है उनके लिए   
जिन्हें नहीं पता कि मुंडेर क्या होती है   
मूँज से चटाई कैसे बनती है   
अँगना लीपने के बाद कैसा दिखता है   
ढेंकी और जाँता की आवाज़ कैसी होती है।   
उन्होंने कभी देखा नहीं, गाय-बैल का रँभाना   
बाछी का पगहा तोड़, माँ के पास भागना   
भोरे-भोरे खेत में रोपनी, खलिहान में धान की ओसौनी   
आँधियों में आम की गाछी में टिकोला बटोरना   
दरी बिछाकर ककहरा पढ़ना, मास्टर साहब से छड़ी खाना।   
कितने अनजान हैं वे, कितना कुछ खोया है उन्होंने  
यूँ वे सभी अति-सुशिक्षित हैं, चाँद और मंगल की बातें करते हैं   
एक ऊँगली के स्पर्श से, दुनिया का ज्ञान बटोर लेते हैं।   
पर, हाँ! सच ही कहते हैं वे, हम देहाती हैं   
भात को चावल नहीं कहते, रोटी को चपाती नहीं कहते   
तरकारी को सब्ज़ी नहीं कहते, पावरोटी को ब्रेड नहीं कहते   
हम गाँव-जबार की बात करते हैं, वे अमेरिका-इंग्लैंड की बात करते हैं।   
नहीं-नहीं! कोई बराबरी नहीं, हम देहाती ही भले   
पर उन सबों के लिए निराशा होती है, जो अपनी माटी को नहीं जानते   
अपनी संस्कृति और समाज को नहीं पहचानते   
तुमने बस पढ़कर सुना है सब   
हमने जीकर जाना है सब। 
- जेन्नी शबनम (20. 10. 2020)
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रविवार, 18 अक्तूबर 2020

691. चलते ही रहना (चोका - 14)

चलते ही रहना 

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जीवन जैसे   
अनसुलझी हुई   
कोई पहेली   
उलझाती है जैसे   
भूल भूलैया,   
कदम-कदम पे   
पसरे काँटें   
लहूलुहान पाँव   
मन में छाले   
फिर भी है बढ़ना   
चलते जाना,   
जब तक हैं साँसें   
तब तक है   
दुनिया का तमाशा   
खेल दिखाए   
संग-संग खेलना   
सब सहना,   
इससे पार जाना   
संभव नहीं   
सारी कोशिशें व्यर्थ   
कठिन राह   
मन है असमर्थ,   
मगर हार   
कभी मानना नहीं   
थकना नहीं   
कभी रुकना नहीं   
झुकना नहीं   
चलते ही रहना   
न घबराना   
जीवन ऐसे जीना   
जैसे तोहफ़ा   
कुदरत से मिला   
बड़े प्यार से   
बड़ी हिफाज़त से   
सँभाल कर जीना!   

- जेन्नी शबनम (18. 10. 2020)

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गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

690. इकीगाई

 इकीगाई 


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ज़िन्दगी चल रही थी, जिधर राह मिली मुड़ रही थी   
कहाँ जाना है क्या पाना है, कुछ भी करके बस जीना है   
न कोई पड़ाव न कोई मंज़िल, वक़्त के साथ मैं गुज़र रही थी,   

ज़िन्दगी घिसट रही थी, या यूँ कि मैं धकेल रही थी   
पर जब-जब मन भारी हुआ, जब-जब रास्ता बोझिल लगा   
अंतर्मन में हूक उठी, और पन्नों पर हर्फ पिरोती रही   
जो किसी से न कहा लिखती रही,   

सदियों बाद जाने कैसे उसका एक पन्ना उड़ गया   
जा पहुँचा वहाँ जहाँ किसी ने उसे पढ़ा   
उसने रोककर मुझे कहा -   
अरे यही तो तुम्हारी राह थी   
जिसपर तुम छुप-छुप कर रुक रही थी   
इस लिए तुम बढ़ी नहीं   
जहाँ से शुरू की वहीं पर तुम खड़ी रही   
जाओ बढ़ जाओ इस राह पर   
पन्नों को बिखरा दो क़ायनात में   
कोई झिझक न रखो अपनी बात में,   

मैं हतप्रभ, अब तक क्यों न सोचा   
मेरे लिए यही तो एक रास्ता था   
जिसपर चलकर सुकून मिलना था   
जीवन को संतुष्टि और सार्थकता का बोध होना था   
पर अब समझ गई हूँ   
पन्नो पर रची तहरीर   
मेरा इकीगाई है।  

(इकीगाई - जापानी अवधारणा - जीवन जीने की वजह या जीवन का मूल्य) 

- जेन्नी शबनम (15. 10. 2020)
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शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

689. चार लाइन भावाभिव्यक्तियाँ

चार लाइन भावाभिव्यक्तियाँ  

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1. 
उम्र भर चले जलती धूप में   
पाँव के छाले अब क़दम है रोके   
कभी जो छाँव कोई, दमभर मिली   
तुम कहते कि एहसान तेरा हुआ!   

2. 
मेरे साथी! तुम तब थे कहाँ   
ज़ख़्मों से जब हम थे घायल हुए   
इक तीर था निशाने पे लगा   
तन-मन मेरा जब ज़ख़्मी हुआ!   

3. 
ख़्वाहिशों की लम्बी क़तारें थीं   
फफोले-से सपने फूटते रहे   
जब दर्द पर मेरे हँसती थी दुनिया   
तू कहाँ था, मेरे साथी बता!   

4. 
जब भटकते रहे थे हम दरबदर   
मंदिर-मस्ज़िद सब हमसे बेख़बर   
घाव पर नमक छिड़कती थी दुनिया   
मेरा दर्द भला क्यों पराया हुआ!   

5. 
फूल और खार दोनों बिछे थे   
सारे खार क्यों मेरे हिस्से   
दुखती रगों को छेड़कर तुमने   
हँस के थे सुनाए मेरे क़िस्से!   

6. 
लो अब ये कहानी ख़त्म हो गई   
ज़िन्दगी अब नाफ़रमानी हो गई   
गर वापस तुम आओ तो देखना   
हम तो हारे, तुमने भी कुछ न जीता।   

7. 
सीले-सीले से जीवन में नहीं रौशनी   
चाँद और सूरज भी तो तेरा ही था   
शब के रातों की नमी मेरी तक़दीर   
उजालों का सौदा तुमने ही किया!   

8. 
नफ़रतों की दीवार गहरी हुई   
ढ़ह न सकी, उम्र भले ठिठकी रही   
हो सके तो एक सुराख़ करना   
जमाने की ख़ातिर लाज रखना!   

9. 
जब-जब जीवन से हारती रही   
आँखें तुमको ही ढूँढती रही   
अपनी दुनिया में उलझे रहे तुम   
बता तेरी दुनिया में हम थे कहाँ!   

10. 
शब के आँसू आसमाँ के आँसू   
दिन के आँसू ये किसने भरे   
धुँधली नज़रें किसकी मेहरबानी   
कभी तो पूछते तुम अपनी ज़ुबानी!   

11. 
दरम्याने ज़िन्दगी ये कैसा वक़्त आया है   
ज़िन्दगी की तड़प भी और मौत की चाहत है   
लफ्ज़-लफ्ज़ बिखरे हुए, अधरों पर ख़ामोशी है   
ज्यों छिन रही हो ज़िन्दगी, मन में यूँ उदासी है!   

12. 
अब जो लौटो तुम तो हम क्या करें   
ज़ख्म सारे रिस-रिस के अब नासूर बने   
तेरे क़र्ज़ के तले है जीवन बीता   
ऐ साथी मिलेंगे कभी अलविदा-अलविदा!

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2020) 
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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

688. बापू हमारे (बापू पर 10 हाइकु)

 बापू हमारे 


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1.

एक सिपाही   

अंग्रेजों पर भारी,   

मिला स्वराज।


2.

देश की शान   

जन-जन के प्यारे   

बापू हमारे।


3.

कत्ल हो गया   

अहिंसा का पुजारी,   

अभागे हम।


4.

बापू का मान   

हमारा अभिमान,   

अब तो मानो।


5.

अस्सी थी उम्र,   

अंग्रेजों को भगाया   

निडर काया।


6.

मिली आज़ादी   

साथ मिला संताप   

शोक में बापू।


7.

माटी का पूत   

माटी में मिल गया   

दिला के जीत।


8.

निहत्था लड़ा   

अस्सी साल का बूढ़ा,   

कभी  हारा।


9.

अकेला बढ़ा   

कारवाँ साथ चला   

आख़िर जीता।


10.

सादा जीवन   

कड़ा अनुशासन   

बापू की सीख।


- जेन्नी शबनम (2. 10. 2020)

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