जीवन मेरा
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मेरे हिस्से में
ये कैसा सफ़र है
रात व दिन
चलना जीवन है,
थक जो गए
कहीं ठौर न मिला
चलते रहे
बस चलते रहे,
कहीं न छाँव
कहीं मिला न ठाँव
बढ़ते रहे
झुलसे मेरे पाँव,
चुभा जो काँटा
पीर सह न पाए
मन में रोए
सामने मुस्कुराए,
किसे पुकारें
मन है घबराए
अपना नहीं
सर पे साया नहीं,
सुख व दु:ख
आँखमिचौली खेले
रोके न रुके
तंज हमपे कसे,
अपना सगा
हमें छला हमेशा
हमारी पीड़ा
उसे लगे तमाशा,
कोई पराया
जब बना अपना
पीड़ा सुनके
संग-संग वो चला,
किसी का साथ
जब सुकून देता
पाँव खींचने
ज़माना है दौड़ता,
हमसफ़र
काश! कोई तो होता
राह आसान
सफ़र पूरा होता,
शाप है हमें
कहीं न पहुँचना
अनवरत
चलते ही रहना
यही जीवन मेरा।
-जेन्नी शबनम (26.3.2019)
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