मंगलवार, 20 अगस्त 2019

623. क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)

क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)   

1.
चुटकी   

*******   

एक चुटकी नमक   
एक चुटकी सिन्दुर   
एक चुटकी ज़हर   
मुझे औरत करते रहे   
ज़िन्दगी भर।   


2. 
विद्रोही औरतें   

*******   

यूँ मुस्कुराना   
ख़ुद से विद्रोह सा लगता है   
पर समय के साथ चुपचाप   
विद्रोही बन जाती हैं औरतें   
अपने उन सवालों से घिरी हुई   
जिनके जवाब वे जानती हैं   
और वक्त पर देती हैं   
विद्रोही औरतें।   


3. 
समीकरण   

*******   

जीवन का समीकरण   
अनुभवों का जोड़   
उम्र का घटाव   
भावनाओं का गुना भाग   
अंतत: जीवन शून्य।   


4.
ताना-बाना   

*******   

जीवन का ताना-बाना   
उल्टा पुल्टा चलता रहा   
समय यूँ ही सधता रहा   
कभी कुछ उलझा   
कभी कुछ सुलझा   
कभी कुछ टूट कर गिरता रहा   
समय सब समझता रहा।   


5. 
मैना   

*******   

महल का एक अदना खिलौना   
सोने का एक पिंजरा   
पिंजरे में रहती थी एक मैना   
वो रूठे या हँसे परवाह किसे   
दाना पानी मिलता था जीभर   
फुर्र फुर्र उड़कर करतब दिखाती   
इतनी ही है बस उसकी कहानी   
सब कहते वह बड़ी तकदीरवाली।   


6.
बेशऊर   

******   

छोटी छोटी डिब्बियों में भर कर   
सीलबंद कर दिए सारे हुनर   
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी   
पर अब संतोष है   
सारा हुनर ओझल है सबसे   
अब उसका अपमान नहीं होता।   


7.
दिठौना   

*******   

दिठौना तो हर रोज लगाई   
भूले से भी कभी न चूकी   
नजरें तो झुकी ही रही   
औरतपना कभी न बिसरी   
फिर ये काली परछाईं कैसी   
काला जादू हुआ ये कैसे   
ओह! मर्द औरत में   
दिठौने ने फर्क किया।  


8.
शाइस्ता   

*******   

कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ वो शाइस्ता   
जो खिदमत करे मगर शिकवा नहीं   
बेशअउरी, बेअदबी तुम्हे पसंद नहीं   
और अदब में रह कर जुल्म सहना   
इस जमाने की फितरत नहीं।   

(शाइस्ता - सभ्य / सुसंकृत)   


9.
पिछली रोटी   

*******   

पहली रोटी भैया की   
अंतिम रोटी अम्मा की   
यही हमारी रीत है भैया   
यही मिली इक सीख है भैया   
बहुत पुराना वादा है   
कूल की ये मर्यादा है   
ये बेटी का सत है भैया   
ये औरतों का पथ है भैया।   


10.
वापसी   

*******   

खुदा जाने क्या हो   
चीजो को भूलते भूलते   
कहीं खुद को न भूला बैठूँ   
यूँ किसी ने मुझे याद रखा भी नहीं   
अपनी याद तो खुद ही रखी अबतक   
अब जो खुद को भुला दिया   
फिर वापसी कैसे?   


- जेन्नी शबनम (20. 8. 2019)

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गुरुवार, 1 अगस्त 2019

622. उधार

उधार   

*******   

कुछ रंग जो मेरे हिस्से में नहीं थे   
मैंने उधार लिए मौसम से   
पर न जाने क्यों ये बेपरवाह मौसम मुझसे लड़ रहा है   
और माँग रहा है अपना उधार वापस   
जिसे मैंने खर्च दिया उन दिनों   
जब मेरे पास जीने को कोई रंग न था   
सफेद स्याह रंगों का जो एक कोलाज बचा था मेरे पास   
वह भी धुक-धुक साँसें ले रहा था   
ज़िन्दगी से रूठा वह कोलाज   
मुझे भी जीवन से पलायन के रास्ते बता रहा था   
पर मुझे जीना था, अपने लिए जीना था   
बहुत ज्यादा जीना था, हद से ज्यादा जीना था   
हाँ, जानती हूँ उधार लेना और उधार पर जीना गैर वाज़िब है   
जानती हूँ कि मैं कर्ज़दार हूँ और चुकाने में असमर्थ भी   
फिर भी मैं शर्मसार नहीं !   

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2019)

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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

621. जीवन-युद्ध

जीवन-युद्ध   

*******   

यादों के गलियारे से गुज़रते हुए   
मुमकिन है यादों को धकेलते हुए   
पार तो आ गई जीवन के   
पर राहों में पड़ी छोटी-छोटी यादें   
मायूसी-से मेरी राह तकती दिखीं कि  
ज़रा थम कर याद कर लो उन लम्हों को   
जो दुबारा नहीं आएँगे।   

जब एक नन्ही बच्ची ने   
पहली बार छोटी-छोटी रोटी बना   
अपने पापा को खिलाई थी   
उस बच्ची ने माँ को देखकर   
झाड़ू की सींक पर पहली बार   
ऊन से फंदा डालना सीखा था   
उसने दादी से सीखा था   
सिलबट्टे पर हल्दी पीसना और जाँता पर दाल दरना   
भैया के साथ खेले बचपन के खेल थे -   
डॉक्टर-डॉक्टर, लुका-छिपी   
राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न   
लूडो, पिट्टो और बैडमिन्टन   
उसने भैया से सीखा था साइकिल चलाना   
भैया से कभी जो झगड़ लेती   
फिर उसे खूब मारती और भैया हँसकर मार खाता   
रूठ जाती थी वो बच्ची अक्सर   
उसके पापा बड़े प्यार से उसे गोद में बिठाकर मनाते   
कैसे-कैसे प्यारे-प्यारे दिन थे जीवन में जो गुज़रे।   

जाने अतीत पीछा क्यों करता है   
फिर से बच्ची बन पापा की गोद में बैठने का मन करता है   
गाँव की पगडंडियों पर हवाई चप्पल पहन बेवज़ह भागना   
बोरिंग की तेज़ धार पर हौज़ में कूदना   
बाढ़ में सारा दिन पानी में घुसकर   
पापा के साथ गाँव भर की खबर लेना   
बीमार होने पर मिट्टी की पट्टी   
मट्ठा, सूप और नीम्बू पानी पीना   
पथ्य में उबले आटे की रोटी और घिऊरा की तरकारी खाना   
सुबह चार बजे से पापा की गोदी में बैठकर   
दुनिया भर की जानकारी पाना।   

माँ से सीखा घर चलाना   
घर का बजट बनाना, कम पैसे में जीवन जीना   
पापा के जाने के बाद माँ का कमजोर पड़ना   
और धीरे-धीरे समाज से कटना   
फिर आत्मविश्वास का थोड़ा जगना   
दादी का संबल   
और फिर हमारा जीवन- युद्ध से भिड़ना।   

सारे लम्हे याद आते हैं   
हर एक बात पर याद आते हैं   
पर ठहरना नही चाहती वहाँ पर   
जब भी रुकी हूँ, आँखें नम होती है   
फिर तलाशती हूँ कोई कोना अपना   
जहाँ निर्बाध हँस सकूँ, रो सकूँ   
पापा की यादों को जी सकूँ   
किसी से कुछ कह सकूँ 
थोड़ा-सा मन का कर सकूँ   
खुद के साथ थोड़ा रह सकूँ।   

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2019)   
(पापा की 41 वीं पुण्यतिथि पर)
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सोमवार, 15 जुलाई 2019

620. वर्षा (10 ताँका)

वर्षा (10 ताँका)   

*******   

1.
तपती धरा   
तन भी तप उठा   
बदरा छाए   
घूम-घूम गरजे   
मन का भौंरा नाचे।   

2.   
कूकी कोयल   
नाचे है पपीहरा   
देख बदरा   
चहके है बगिया   
नाचे घर अँगना।   

3.   
ओ रे बदरा   
कितना तड़पाया   
अब तू माना   
तेरे बिना अटकी   
संसार की मटकी।   

4.   
गाए मल्हार   
घनघोर घटाएँ   
नभ मुस्काए   
बूँदें खूब झरती   
रिमझिम फुहार।   

5.   
बरसा पानी   
याद आई है नानी   
है अस्त व्यस्त   
जीवन की रफ्तार   
जलमग्न सड़कें।   

6.   
पौधे खिलते   
किसान हैं हँसते   
वर्षा के संग   
मन मयूरा नाचे   
बूंदों के संग-संग।   

7.   
झूमती धरा   
झूमता है गगन   
आई है वर्षा   
लेकर ठंडी हवा   
खिल उठा चमन।   

8.   
घनी प्रतीक्षा   
अब जाकर आया   
मेघ पाहुन   
चाय संग पकौड़ी   
पहुना संग खाए।   

9.   
पानी बरसा   
झर-झर झरता   
जैसे झरना,   
सुन मेरे बदरा   
मन हुआ बावरा।   

10.   
हे वर्षा रानी   
यूँ रूठा मत करो   
आ जाया करो   
रवि से लड़कर   
बरसो जमकर।   

- जेन्नी शबनम (6. 7. 2019)   

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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

619. जीवन-पथ (चोका)

जीवन-पथ (चोका)   

*******   

जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से   
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अन्धेरा   
डर-डर के   
कदम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
खुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता !   

- जेन्नी शबनम (8. 6. 2019) 

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सोमवार, 1 जुलाई 2019

618. सरमाया

सरमाया   

*******   

ये कैसा दौर आया है   
पहर-पहर भरमाया है   
कुछ माँगू तो ईमान मरे   
न माँगू तो ख़्वाब मरे   
किस्मत से धक्का मुक्की   
पोर-पोर घबराया है   
जद्दोज़हद में युग बीते   
यही मेरा सरमाया है।   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2019)   

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सोमवार, 17 जून 2019

617. कड़ी

कड़ी   

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अतीत की एक कड़ी   
मैं खुद हूँ   
मन के कोने में, सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने पिता को जीवित रखा है   
जब-जब हारती हूँ   
जब-जब अपमानित होती हूँ   
अँधेरे में सुबकते हुए, पापा से जा लिपटती हूँ   
खूब रोती हूँ, खूब गुस्सा करती हूँ   
जानती हूँ पापा कहीं नहीं   
थक कर ख़ुद ही चुप हो जाती हूँ   
यह भूलती नहीं, कि रोना मेरे लिए गुनाह है   
चेहरे पे मुस्कान, आँखों पर चश्मा   
सब छुप जाता है जमाने से   
पर हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा   
सिमटती जा रही हूँ, मिटती जा रही हूँ   
जीने की आरज़ू, जीने का हौसला   
सब शेष हो चुका है   
न रिश्ते साथ देते हैं, न रिश्ते साथ चलते हैं   
दर्द की ओढ़नी, गले में लिपटती है   
पिता की बाँहें, कभी रोकने नहीं आतीं   
नितांत अकेली मैं   
अपनों द्वारा कतरे हुए परों को, सहलाती हूँ   
कभी-कभी चुपचाप   
फेविकोल से परों को चिपकाती हूँ   
जानती हूँ, यह खेल है, झूठी आशा है   
पर मन बहलाती हूँ   
हार अच्छी नहीं लगती मुझे   
इसलिए जोर से ठहाके लगाती हूँ   
जीत का झूठा सच सबको बताती हूँ   
बस अपने पापा को सब सच बताती हूँ   
जोर से ठहाके लगाती हूँ   
मन बहलाती हूँ!   

- जेन्नी शबनम (17. 6. 2019)   
(पितृ-दिवस पर) 
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गुरुवार, 13 जून 2019

616. यूँ ही आना यूँ ही जाना

यूँ ही आना यूँ ही जाना   

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अपनी पीर छुपाकर जीना   
मीठे कह के आँसू पीना   
ये दस्तूर निभाऊँ कैसे   
जिस्म है घायल छलनी सीना।   

रिश्ते नाते निभ नहीं पाते   
करें शिकायत किस की किस से   
गली चौबारे खुद में सिमटे   
दरख़्त हुए सब टुकड़े-टुकड़े।   

मृदु भावों की बली चढ़ाकर   
मतलबपरस्त हुई ये दुनिया   
खिदमत में मिट जाओ भी गर   
कहेगी किस्मत सोई ये दुनिया।   

बेगैरत हूँ कहेगी दुनिया   
खिदमत न कर खुद को सँवारा   
साथ नहीं कोई ब्रम्ह या बाबा   
पीर पैगम्बर नहीं सहारा।   

पीर पराई कोइ न समझे   
मर-मर के छोड़े कोई जीना   
ख़त्म करो अब हर ताल्लुक को   
मंत्र ये जीवन का दोहराना   
यूँ ही अब दुनिया में रहना   
यूँ ही अब दुनिया से जाना   
ख़त्म करो अब हर ताल्लुक को   
मंत्र ये जीवन का दोहराना।   

- जेन्नी शबनम (12. 6. 2019)   

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शुक्रवार, 7 जून 2019

615. नहीं आता

नहीं आता   

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ग़ज़ल नहीं कहती   
यूँ कि मुझे कहना नहीं आता   
चाहती तो हूँ मगर   
मन का भेद खोलना नहीं आता।   

बसर तो करनी है पर   
शहर की आवो हवा बेगानी लगती   
रूकती हूँ समझती हूँ   
पर दम भर कर रोना नहीं आता।   

सफर में अब जो भी मिले   
मुमकिन है मंजिल मिले न मिले   
परवाह नहीं पाँव छिल गए   
दमभर भी हमें ठहरना नहीं आता।   

मायूसी मन में पलती रही   
अपनों से जख्म जब भी गहरे मिले   
कोशिश की थी कि तन्हा चलूँ   
पर अपने साथ जीना नहीं आता।   

यादों के जंजाल में उलझ के   
बिसुराते रहे हम अपने आज को   
हँस-हँस के गम को पीना होता   
पर 'शब' को यूँ हँसना नहीं आता।   

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2019)   

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शनिवार, 1 जून 2019

614. नज़रबंद

नज़रबंद   

*******   

ज़िन्दगी मुझसे भागती रही   
मैं दौड़ती रही, पीछा करती रही   
एक दिन आख़िर वो पकड़ में आई   
खुद ही जैसे मेरे घर में आई   
भागने का सबब पूछा मैंने   
झूठ बोल बहला दिया मुझे,   
मैं अपनी खामी ढूँढती रही   
आख़िर ऐसी क्या कमी थी   
जो जिन्दगी मुझसे कह गई   
मेरी सोच मेरी उम्र या फिर जीने का शऊर   
हाँ! भले मैं बेशऊरी   
पर वक्त से जो सीखा वैसे ही तो जिया मैंने   
फिर अब ?   
आजीज आ गई ज़िन्दगी   
एक दिन मुझे प्रेम से दुलारा, मेरे मन भर मुझे पुचकारा   
हाथों में हाथ लिए मेरे, चल पड़ी झील किनारे   
चाँद तारों की बात, फूल और खूश्बू थी साथ   
भूला दिया मैंने उसका छल   
आँखें मूँद काँधे पे उसके रख दिया सिर   
मैं जिन्दगी के साथ थी   
नहीं-नहीं मैं अपने साथ थी   
फिर हौले से उसने मुझे झिंझोड़ा   
मैंने आँख मूँदे मुस्कुरा कर पूछा -   
बोलो ज़िन्दगी, अब तो सच बताओ   
क्यों भागती रहीं तुम तमाम उम्र   
मैं तुम्हारा पीछा करती रही ताउम्र   
जब भी तुम पकड में आई   
तुमने स्वप्नबाग दिखा मुझसे पीछा छुड़ाया,   
फिर ज़िन्दगी ने मेरी आँखों में देखा   
कहा कि मैं झील की सुन्दरता देखूँ   
अपना रूप उसमें निहारूँ,   
मैं पागल फिर से छली गई   
आँखें खोल झील में खुद को निहारा   
मेरी ज़िन्दगी ने मुझे धकेल दिया   
सदा के लिए उस गहरी झील में   
बहुत प्रेम से बड़े धोखे से,   
अब मैं झील में नज़रबंद हूँ   
ज़िन्दगी की बेवफाई से रंज हूँ   
अब न ज़िन्दगी का कारोबार होगा   
न ज़िन्दगी से मुलाकात होगी   
अब कौन सुनेगा मुझको कभी   
न किसी से बात होगी !   

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2019)   

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बुधवार, 1 मई 2019

613. अधिकार और कर्त्तव्य

अधिकार और कर्त्तव्य   

*******   

अधिकार है तुम्हें   
कर सकते हो तुम   
हर वह काम जो जायज नहीं है   
पर हमें इजाजत नहीं कि   
हम प्रतिरोध करें,   
कर्तव्य है हमारा   
सिर्फ वह बोलना   
जिससे तुम खुश रहो   
भले हमारी आत्मा मर जाए,   
इस अधिकार और कर्तव्य को   
परिभाषित करने वाले तुम   
हमें धर्म का वास्ता देते हो   
और स्वयं अधर्म करते रहते हो।   
तुम्हारे अहंकार के बाण से   
हमारी साँसें छलनी हो चुकी हैं   
हमारी रगों का रक्त   
जमकर काला पड़ गया है   
तुम्हारा पेट भरने वाले हम   
तुम्हारे सामने हाथ जोड़े, भूख से मर रहे हैं   
और तुम हो कि हमसे धर्म-धर्म खेल रहे हो   
हमें आपस में लड़ा कर सत्ता-सत्ता खेल रहे हो।   
तुमने बतलाया था कि   
मुक्ति मिलेगी हमें, पूर्व जन्म के पापों से   
गर मंदिर मस्जिद को हम, अपना देह दान करें   
तुम्हारे बताए राहों पर चलकर, तुम्हारा सम्मान करें।   
अब हमने सब कुछ है जाना   
सदियों बाद तुम्हें है पहचाना   
हमें मुक्ति नहीं मिली   
न रावण वध से   
न गीता दर्शन से   
न तुम्हारे सम्मान से   
न अपने आत्मघात से।   
युगों-युगों से त्रासदी झेलते हम   
तुम्हारे बतलाए धर्म को अब नकार रहे हैं   
तुमने ही सारे विकल्प छीने हैं हमसे   
अब हम अपना रुख़ मोड़ रहे हैं,   
बहुत सहा है अपमान हमने   
नहीं है अब कोई फरियाद तुमसे   
तुम्हारे हर वार का अब जवाब होगा   
जुड़े हाथों से अब वार होगा।   
हमारे बल पर जीने वाले   
अब अपना तुम अंजाम देखो   
तुम होशियार रहो, तुम तैयार रहो   
अब आर या पार होगा   
जो भी होगा सरेआम होगा।   
इंकलाब का नारा है   
सिर्फ तुम्हारा नहीं   
हिन्दुस्तान हमारा है।   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2019)   
(मज़दूर दिवस)
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रविवार, 31 मार्च 2019

612. प्रकृति (20 हाइकु)

प्रकृति 
(20 हाइकु)   

*******   

1.   
प्यार मिलता   
तभी खिलखिलाता   
प्रकृति-शिशु।   

2.   
अद्भुत लीला   
प्रकृति प्राण देती   
संस्कृति जीती।   

3.   
प्रकृति हँसी   
सुहावना मौसम   
खिलखिलाया।   

4.   
धोखा पाकर   
प्रकृति यूँ ठिठकी   
मानो लड़की।   

5.   
कृत संकल्प   
प्रकृति का वंदन   
स्वस्थ जीवन।   

6.   
मत रूलाओ,   
प्रकृति का रूदन   
ध्वस्त जीवन।   

7.   
प्रकृति क्रुद्ध,   
प्रलय है समीप   
हमारा कृत्य।   

8.   
रंग बाँटती   
प्रकृति रंगरेज़   
मनभावन।   

9.   
मौसमी हवा   
नाचती गाती चली   
प्रकृति ख़ुश।   

10.   
घना जंगल   
लुभावना मौसम   
प्रकृति नाची।   

11.   
धूल व धुआँ   
थकी हारी प्रकृति   
बेदम साँसें।   

12.   
साँसें उखड़ी   
अधमरी प्रकृति,   
मानव दैत्य।   

13.   
खंजर भोंका   
मर गई प्रकृति   
मानव खूनी।   

14.   
खेत बेहाल   
प्रकृति का बदला   
सूखा तालाब।   

15.   
सुकून देती   
गहरी साँस देती   
प्रकृति देवी।   

16.   
बड़ा सताया   
कलंकित मानव,   
प्रकृति रोती।   

17.   
सखी सहेली   
ऋतुएँ व प्रकृति   
दुख बाँटती।   

18.   
हरी ओढ़नी   
भौतिकता ने छीनी   
प्रकृति नंगी।   

19.   
किससे बाँटें   
मुरझाई प्रकृति   
अपनी व्यथा।   

20.
जी भरके लूटा
प्रकृति को दुत्कारा
लोभी मानव।   

- जेन्नी शबनम (29. 3. 2019)   

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गुरुवार, 28 मार्च 2019

611. जीवन मेरा (चोका)

जीवन मेरा (चोका)   

*******   

मेरे हिस्से में   
ये कैसा सफ़र है   
रात और दिन   
चलना जीवन है,   
थक जो गए   
कहीं ठौर न मिला   
चलते रहे   
बस चलते रहे,   
कहीं न छाँव   
कहीं मिला न ठाँव   
बढते रहे   
झुलसे मेरे पाँव,   
चुभा जो काँटा   
पीर सह न पाए   
मन में रोए   
सामने मुस्कुराए,   
किसे पुकारें   
मन है घबराए   
अपना नहीं   
सर पे साया नहीं,   
सुख व दु:ख   
आँखमिचौली खेले   
रोके न रुके   
तंज हमपे कसे,   
अपना सगा   
हमें छला हमेशा   
हमारी पीड़ा   
उसे लगे तमाशा,   
कोई पराया   
जब बना अपना   
पीड़ा सुन के   
संग-संग वो चला,   
किसी का साथ   
जब सुकून देता   
पाँव खींचने   
जमाना है दौड़ता,   
हमसफर   
काश ! कोई होता   
राह आसान   
सफर पूरा होता,   
शाप है हमें   
कहीं न पहुँचना   
अनवरत   
चलते ही रहना।   
यही जीवन मेरा।   

- जेन्नी शबनम (26. 3. 2019)   

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रविवार, 24 मार्च 2019

610. परम्परा

परम्परा   

*******   
  
मैं उदासी नहीं चाहती थी   
मैं तो खिलखिलाना चाहती थी   
आजाद पंक्षियों-सा उड़ना चाहती थी   
हर रोज नई धुन गुनगुनाना चाहती थी   
और यह सब अनकहा भी न था   
हर अरमान चादर-सा बिछा दिया था तुम्हारे सामने   
तुमने सहमति भी जताई थी कि तुम साथ दोगे   
लेकिन जाने यह क्योंकर हुआ   
पर मैं वक्त को दोष न दूँगी   
वक्त ने तो बहुत साथ दिया   
पर तुम बिसुर गए सब   
एक-एक कर मेरे सपनों को   
होलिका के साथ तुमने जला दिया   
मुझसे कहा कि यह परम्परा है   
मैं उदास हुई पर इंकार न किया   
तुम्हारा कहा सिर माथे पर।   

- जेन्नी शबनम (9.3.2019)   

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गुरुवार, 21 मार्च 2019

609. रंगों की होली (10 हाइकु)

रंगों की होली 
(10 हाइकु)   

*******   

1.   
रंगो की होली   
गाँठ मन की खोली   
प्रीत बरसी।   

2.   
पावन होली   
मन है सतरंगी   
सूरत भोली।   

3.   
रंगों की झोली   
आसमान ने फेंकी   
धरती रँगी।   

4.   
हवा में घुले   
रंग भरे जज़्बात   
होली के साथ।   

5.   
होली रंग में   
दर्द के रंग घुले   
मन निश्छल।   

6.   
होली पहुँची   
छोटे पग धरके   
इस बसंत।   

7.   
पाहुन होली   
ज़रा देर ठहरी   
चलती बनी।   

8.   
रंग गुलाल   
सर-सर गिरते   
खेले कबड्डी।   

9.   
न पी, न पाई    
ये कैसी होली आई   
फीकी मिठाई।   

10.   
रंगो का मेला   
नहीं कोई पहरा   
गुम चेहरा।   

- जेन्नी शबनम (20. 3. 2019)   

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मंगलवार, 19 मार्च 2019

608. स्वीकार (क्षणिका)

स्वीकार   

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मैं अपने आप से मिलना नहीं चाहती   
जानती हूँ खुद से मिलूँगी तो   
जी नहीं पाऊँगी   
जीवित रहने के लिए   
मैंने उन सभी अनुबंधों को स्वीकार किया है   
जिसे मेरा मन नहीं स्वीकारता है   
विकल्प दो ही थे मेरे पास -   
जीवित रहूँ या   
खुद से मिलूँ!   

- जेन्नी शबनम (19. 3. 2019)   

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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

607. पानी और स्त्री

पानी और स्त्री 

*******   

बचपन में पढ़ा -   
पानी होता है रंगहीन गंधहीन   
जिसे जहाँ रखा उस साँचे में ढला    
खूब गर्म किया भाप बन उड़ गया   
खूब ठंडा किया बर्फ बन जम गया   
पानी के साथ उगता है जीवन   
पनपती हैं सभ्यताएँ   
पानी गर हुआ लुप्त   
संसार भी हो जाएगा विलुप्त।   
फिर भी पानी के साथ होता है खिलवाड़   
नहीं होता उसका सम्मान   
नहीं करते उसका बचाव   
न ही करते उसका संरक्षण   
न ही करते उसका प्रबंधन   
जबकि जानते हैं पानी नहीं तो दुनिया नहीं।   
बचपन में जो था पढ़ा   
अब जीवन ने है समझा   
स्त्रियाँ पानी हैं   
वक्त ने जहाँ चाहा उस साँचे में ढाल दिया   
कभी आरोपों से जम गई   
तो व्याकुलता से लिपट कर भाप-सी पिघल गई   
स्त्रियों ने किया सृजन   
नवजीवन का किया पोषण   
फिर भी मानी गई सब पर बोझ   
सभी चाहते नहीं मिले उसको कोख   
पानी-सी न की गई सुरक्षित   
पानी-सी न हुई संरक्षित   
पानी बिन होता अकाल   
स्त्री बिन मिट जाएगा संसार।   
पानी-सी स्त्री है   
स्त्री-सा पानी है   
सीरत अलग मगर   
स्त्री और पानी जीवन है।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2019)   

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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

606. आँख (आँख पर 20 हाइकु)

आँख 
(आँख पर 20 हाइकु)   

*******   

1.   
पट खोलती   
दुनिया निहारती   
आँखें झरोखा।   

2.   
आँखों की भाषा   
गर समझ सको   
मन को जानो।   

3.   
गहरी झील   
आँखों में है बसती   
उतरो जरा।   

4.   
आँखों का नाता   
जोड़ता है गहरा   
मन से नाता।   

5.   
आँख का पानी   
मरता व गिरता   
भेद समझो।   

6.   
बड़ी लजाती   
अँखियाँ भोली भाली   
मीत को देख।   

7.   
शर्म व हया   
आँखें करती बयाँ   
उनकी भाषा।   

8.   
नन्ही आँखों में   
विस्तृत जग सारा   
सब समाया।   

9.   
खूब देखती   
सुन्दर-सा संसार   
आँखें दुनिया।   

10.   
छल को देख   
होती है शर्मसार   
आँखें क्रोधित।   

11.   
खूब पालती   
मनचाहे सपने   
दुलारी आँखें।   

12.   
स्वप्न छिपाती   
कितनी है गहरी   
अँखिया झील।   

13.   
बिना उसके   
अँधियारा पसरा   
अँखिया ज्योति।   

14.   
जी भर देखो   
रंग बिरंगा रूप   
आँखें दर्पण।   

15.   
मूँदी जो आँखें   
जग हुआ ओझल   
साथ है स्वप्न।   

16.   
जीवन खत्म   
संसार से विदाई   
अँखियाँ बंद।   

17.   
आँख में पानी   
बड़ा गहरा भेद   
आँख का पानी।   

18.   
भेद छुपाते 
सुख-दुख के साथी 
नैना हमारे।   

19.   
मन की भाषा   
पहचाने अँखियाँ   
दिखाती आशा।   

20.   
आँखियाँ मूंदी   
दिख रहा अतीत   
मन है शांत।   

- जेन्नी शबनम (19. 2. 2019)   

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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

605. बसन्त (क्षणिका)

बसन्त   

*******   

मेरा जीवन मेरा बंधु   
फिर भी निभ नहीं पाता बंधुत्व   
किसकी चाकरी करता नित दिन   
छुट गया मेरा निजत्व   
आस उल्लास दोनों बिछुड़े   
हाय ! जीवन का ये कैसा बसंत ! 

- जेन्नी शबनम (12. 2. 2019)

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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

604. काला जादू

काला जादू...   

*******   

जब भी, दिल खोल कर हँसती हूँ   
जब भी, दिल खोल कर जीती हूँ   
जब भी, मोहब्बत के आगोश में साँसें भरती हूँ   
जब भी, संसार की सुन्दरता को, दामन में समेटती हूँ   
न जाने कब, मैं खुद को नजर लगा देती हूँ   
मुझे मेरी ही नजर लग जाती है   
हँसना, जीना, अचानक गुम हो जाता है   
मुहब्बत के आसमान से, जमीन पर, पटक दी जाती हूँ   
जिन फूलों को थामे थी, उनमें काँटें उग जाते हैं   
और मेरी ऊँगलियाँ ही नहीं   
तक़दीर की लकीरें भी, लहूलुहान हो जाती हैं   
दौड़ती हूँ, भागती हूँ, छटपटाती हूँ   
चौकन्ना होकर, चारों तरफ निहारती हूँ   
मैंने किसी का, कुछ भी तो न छीना, न बिगाड़ा   
फिर मेरे जीवन में, रेगिस्तान कहाँ से पनप जाता है   
कैसे आँखों में, आँसू की जगह, रक्त-धार बहने लगती है   
कौन पलट देता है, मेरी किस्मत   
कौन है, जो काला जादू करता है   
कोई तो इतना अपना नहीं, किसी से कोई रंजिश भी नहीं   
फिर यह सब कैसे?   
हाँ ! शायद मुझे मेरी ही नजर लग जाती है   
मैंने ही खुद पर काला जादू किया है   
अल्लाह ! कोई इल्म बता   
कोई कारामात कर दे   
मिटने से पहले चाहती हूँ   
हँसना जीना मुहब्बत   
बस एक बार   
बस एक बार !   

- जेन्नी शबनम (2. 2. 2019)

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सोमवार, 28 जनवरी 2019

603.वक़्त (चोका - 10)

वक़्त (चोका)   

*******   

वक्त की गति   
करती निर्धारित   
मन की दशा   
हो मन प्रफुल्लित   
वक़्त भागता   
सूर्य की किरणों-सा   
मनमौजी-सा   
पकड़ में न आता   
मन में पीर   
अगर बस जाए   
बीतता नहीं   
वक़्त थम-सा जाता   
जैसे जमा हो   
हिमालय पे हिम   
कठोरता से   
पिघलना न चाहे,   
वक़्त सजाता   
तोहफ़ों से ज़िन्दगी   
निर्ममता से   
कभी देता है सज़ा   
बिना कुसूर   
वक़्त है बलवान   
उसकी मर्ज़ी   
जिधर ले के चले   
जाना ही होता   
बिना किए सवाल   
बिना दिए जवाब !   

- जेन्नी शबनम (28. 1. 2019)   

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शनिवार, 26 जनवरी 2019

602. प्रजातंत्र

प्रजातंत्र...   

*******   

मुझपर इल्जाम है उनकी ही तरह   
जो कहते हैं कि   
देश के माहौल से डर लगता है   
हाँ ! मैं मानती हूँ मुझे भी अब डर लगता है   
सिर्फ अपने लिए नहीं   
अपनों के लिए डर लगता है।   
उन्हें मेरे कहे पर आपत्ति है   
उनके कहे पर आपत्ति है   
वे कहते हैं चार सालों से   
न कहीं बम विस्फोट हो रहे हैं   
न उन दिनों की तरह इमरजेंसी है   
जब बेकसूरों को पकड़ कर जेल भेजा जाता था   
न इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद का   
सिख विरोधी दंगा है   
जब हर एक सिख असुरक्षित था और डरा हुआ कि   
न जाने कब उनकी हत्या कर दी जाए।   
वे कहते है   
यह डर उन्हें क्यों   
जिनके पास धन भरपूर है   
जो जब चाहे देश छोड़ कर   
कहीं और बस सकते हैं   
यह डर उन्हें क्यों   
जो 1975 और 1984 में खामोश रहे   
तब क्यों नहीं कुछ कहा   
तब क्यों नहीं डर लगा?   
मैं स्वीकार करती हूँ कि   
यह सब दुर्भाग्यपूर्ण था   
परन्तु सिर्फ इन वजहों से   
1989 का भागलपुर दंगा   
2002 का गुजरात दंगा   
या अन्य दंगा-फसाद   
जायज नहीं हो सकता।   
मॉब लिंचिग   
बलात्कार   
एसिड अटैक   
हत्या   
और न जाने कितने अपराध   
हर रोज़ कुछ नए अपराध   
क्या इसके खिलाफ बोलना गुनाह है?   
डर और खौफ़ के साये में जी रही है प्रजा   
क्या यही प्रजातंत्र है?   
जुर्म के खिलाफ बोलना   
अगर गुनाह है   
तो मैं गुनाह कर रही हूँ   
समाज में शांति चाहना   
अगर गुनाह है   
तो मैं गुनाह कर रही हूँ।   
मैं खुलेआम कबूल कर रही हूँ   
हाँ ! मुझे डर लगता है   
मुझे आज के माहौल से डर लगता है !   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2019)   
(गणतंत्र दिवस पर)
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रविवार, 20 जनवरी 2019

601. फ़रिश्ता (क्षणिका)

फ़रिश्ता     

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सुनती हूँ कि कोई फ़रिश्ता है 
जो सब का हाल जानता है 
पर मेरा? 
ना-ना मेरा नहीं है वह 
मुझे नहीं जानता वह 
पर तुम? 
तुम मुझे जानते हो 
जीने का हौसला देते हो 
जाने किस जन्म में, तुम मेरे कौन थे 
जो अब मेरे फ़रिश्ते हो! 

- जेन्नी शबनम (19. 1. 2019)   

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बुधवार, 9 जनवरी 2019

600. अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ)

अंतर्मन (15 क्षणिकाएँ) 

*******   

1.   
मेरे अंतर्मन में पड़ी हैं   
ढेरों अनकही कविताएँ   
तुम मिलो कभी   
तो फ़ुर्सत में सुनाऊँ तुम्हें।   

2.   
हजारों सवाल हैं मेरे अंतर्मन में   
जिनके जवाब तुम्हारे पास हैं   
तुम आओ गर कभी   
फ़ुर्सत में जवाब बताना।   

3.   
मेरा अंतर्मन   
मुझसे प्रश्न करता है -   
आख़िर कैसे कोई भूल जाता है   
सदियों का नाता 
पल भर में   
उसके लिए   
जो कभी अपना नहीं था   
न कभी होगा।   

4.   
हमारे फ़ासले की मियाद   
जाने किसने तय की है   
मैंने तो नहीं,   
क्या तुमने?   

5.   
क्षण-क्षण कण-कण   
तुम्हें ढूँढ़ती रही   
जानती हूँ   
मैं अहल्या नहीं कि   
तुमसे मिलना तय हो।   

6.   
कुछ तो हुआ ऐसा    
जो दरक गया मन   
गर वापसी भी हो तुम्हारी   
टूटा ही रहेगा तब भी यह मन।   

7.   
रात का अँधेरा   
अब नहीं डराता मुझे   
उसकी सारी कारस्तानियाँ   
मुझसे हार गई   
मैंने अकेले जीने की   
आदत जो पाल ली।   

8.   
ढूँढ़कर थक चुकी   
दिन का सूरज   
रात का चाँद   
दोनों के साथ   
लुकाचोरी खेल रही थी   
वे दगा दे गए   
छल से मुझे तन्हा छोड़ गए।   

9.   
अब आओ, तो चलेंगे   
उन यादों के पास   
जिसे हमने छुपाया था   
समय से माँगी हुई तिजोरी में   
शायद कई जन्मों पहले।   

10.   
सोचा न था   
ऐसे तजुर्बे भी होंगे   
दुनिया की भीड़ में   
सदा हम तन्हा ही रहेंगे।   

11.   
चुप-से दिन   
चुप-सी रातें   
चुप-से नाते   
चुप-सी बातें   
चुप है ज़िन्दगी   
कौन करे बातें   
कौन तोड़े सघन चुप्पी !   

12.   
तुमसे मिलकर जाना   
यह जीवन क्या है   
बेवजह गुस्सा थी   
खुद को ही सता रही थी   
तुम्हारी एक हँसी   
तुम्हारा एक स्पर्श   
तुम्हारे एक बोल   
मैं जीवन को जान गई।   

13.   
वक्त बस एक क्षण देता है   
बन जाएँ या बिगड़ जाएँ   
जी जाएँ या मर जाएँ,   
उस एक क्षण को   
मुट्ठी में समेटना है   
वर्तमान भी वही   
भविष्य भी वही,   
बस एक क्षण   
जो हमारा है   
सिर्फ हमारा !   

14.   
नजदीकियाँ   
पाप-पुण्य से परे होती हैं   
फिर भी   
कभी-कभी   
फ़ासलों पे रहकर   
जीनी होती है ज़िन्दगी।   

15.   
चाहती हूँ   
धूप में घुसकर   
तुम आ जाओ छत पर   
बडे दिनों से   
मुलाकात न हुई   
जीभर कर बात न हुई   
यूँ भी सुबह की धूप   
देह के लिए जरूरी है   
और तुम   
मेरे मन के लिए।   

- जेन्नी शबनम (9. 1. 2019)  

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मंगलवार, 8 जनवरी 2019

599. हे नव वर्ष (नव वर्ष पर 5 हाइकु)

हे नव वर्ष (नव वर्ष पर 5 हाइकु)   

*******   

1.   
हे नव वर्ष   
आखिर आ ही गए,   
पर जल्दी क्यों?   

2.   
उम्मीद जगी -   
अच्छे दिन आएँगे   
नव वर्ष में।   

3.   
मन से करो   
इस्तकबाल करो   
नव वर्ष का।   

4.   
पिछला साल   
भूलना नहीं कभी,   
मिली जो सीख।   

5.   
प्रेम ही प्रेम   
नव वर्ष कामना,   
सब हों सुखी।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2019)

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