सोमवार, 2 दिसंबर 2019

640. कुछ सवाल

कुछ सवाल 

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1.   
कुछ सवाल ठहर जाते हैं मन में 
माकूल जवाब मालूम है 
मगर कहने की हिमाकत नहीं होती 
कुछ सवालों को 
सवाल ही रहने देना उचित है 
जवाब आँधियाँ बन सकती हैं। 

2. 
खुद से एक सवाल है - 
कौन हूँ मैं? 
क्या एक नाम? 
या कुछ और भी? 

3. 
सवालों का सिलसिला 
तमाम उम्र पीछा करता रहा 
इनमें उलझकर 
मन लहूलुहान हुआ 
पाँव भी छिले चलते-चलते 
आखिरी साँस ही आखिरी सवाल होंगे। 

4. 
कुछ सवाल समुद्र की लहरें हैं 
उठती गिरती 
अनवरत तेज कदमों से चलती हैं 
काले नाग-सी फुफकारती हैं 
दिल की धड़कनें बढ़ाती हैं 
मगर कभी रूकती नहीं 
बेहद डराती हैं। 

5. 
सवालों की उम्र 
कभी छोटी क्यों नहीं होती 
क्यों ज़िन्दगी के बराबर होती है 
जवाब न मिले तो चुपचाप मर क्यों नहीं जाते 
सवालों को भी ऐसी ही खत्म हो जाना चाहिए 
जैसे साँसे थम जाए तो उम्र खत्म होती है। 

- जेन्नी शबनम (2. 12. 2019)   

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शनिवार, 16 नवंबर 2019

639. धरोहर

धरोहर   

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मेरी धरोहरों में कई ऐसी चीज़ें हैं   
जो मुझे बयान करती हैं   
मेरी पहचान करती हैं   
कुछ पुस्तकें जिनमें लेखकों के हस्ताक्षर   
और मेरे लिए कुछ संदेश है   
कुछ यादगार कपड़े जिसे मैंने   
किसी ख़ास वक़्त पर लिए या पहने हैं   
कुछ छोटी-छोटी परची जिनपर   
मेरे बच्चों की आड़ी तिरछी लकीरों में   
मेरा बचपन छुपा हुआ है   
अनलिखे में गुज़रा कल लिखा हुआ है   
कुछ नाते जिसे किस्मत ने छीने   
उनकी यादों का दिल में ठिकाना है   
कुछ अपनों का छल भी है   
जिससे मेरा सीना छलनी है   
कुछ रिश्ते जो मेरे साथ तब भी होते हैं   
जब हार कर मेरा दम टूटने को होता है   
साँसों से हाथ छूटने को होता है   
कुछ वक़्त जब मैंने जीभर कर जिया है   
बहुत शिद्दत से प्रेम किया है   
यूँ तब भी अँधेरों का राज था   
पर ख़ुद पर यक़ीन किया था   
ये धरोहरें मेरे साथ विदा होंगी जब कजा आएगी   
मेरे बाद न इनका संरक्षक होगा   
न कोई इनका ख़्वाहिशमंद होगा   
मेरे सिवा किसी को इन से मुहब्बत नहीं होगी   
मेरी किसी धरोहर की वसीयत नहीं होगी   
मेरी धरोहरें मेरी हैं बस मेरी   
मेरे साथ ही विदा होंगी।   

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2019)   

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गुरुवार, 7 नवंबर 2019

638. महज़ नाम

महज़ नाम 

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कभी लगता था कि किसी के आँचल में   
हर वेदना मिट जाती है   
मगर भाव बदल जाते हैं   
जब संवेदना मिट जाती है   
न किसी प्यार का ना अधिकार का नाम है   
माँ संबंध नहीं   
महज पुकार का एक नाम है   
तासीर खो चुका है   
बेकार का नाम है   
माँ संबंध नहीं   
महज पुकार का एक नाम है!   

- जेन्नी शबनम (7. 11. 2019)   

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बुधवार, 6 नवंबर 2019

637. रेगिस्तान

रेगिस्तान 

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आँखें अब रेगिस्तान बन गई हैं 
यहाँ अब न सपने उगते हैं न बारिश होती है 
धूलभरी आँधियाँ चल रही हैं 
रेत पे गढ़े वे सारे हर्फ मिट गए हैं 
जिन्हें सदियों पहले 
किसी ऋषि ने लिख दिया था कि 
कभी कोई दुष्यंत सब विस्मृत कर दे तो 
शंकुतला यहाँ आकर सारा अतीत याद दिलाए 
पर अब कोई स्रोत शेष न रहा 
जो जीवन को वापस बुलाए 
कौन किसे अब क्या याद दिलाए ! 

- जेन्नी शबनम (6. 11. 2019)
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रविवार, 27 अक्तूबर 2019

636. दिवाली (दिवाली पर 7 हाइकु)

दिवाली 
(दिवाली पर 7 हाइकु)   

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1.   
सुख समृद्धि   
हर घर पहुँचे   
दीये कहते।   

2.   
मन से देता   
सकारात्मक ऊर्जा   
माटी का दीया।   

3.   
दीयों की जोत   
दसों दिशा उर्जित   
मन हर्षित।   

4.   
अमा की रात   
जगमगाते दीप   
ज्यों हो पूर्णिमा !   

5.   
धरा ने ओढ़ा   
रोशनी का लिहाफ़   
जलते दीये।   

6.   
दिवाली दिन   
सजावट घर-घर   
फैला उजास।   

7.   
बंदनवार   
स्वागत व सत्कार   
लक्ष्मी प्रसन्न।   

- जेन्नी शबनम (26. 10. 2010)   

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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2019

635. दंगा

दंगा...   

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किसी ने कहा ये हिन्दु मरा   
कोई कहे ये मुसलमान था   
अपने-अपने दड़बे में कैद   
बँटा सारा हिन्दुस्तान था !   

थरथराते जिस्मों के टुकड़े 
मगर जिह्वा पे रहीम-ओ-राम था   
कोई लाल लहू कोई हरा लहू   
रंगा सारा हिन्दुस्तान था !   

घूँघट और बुर्क़ा उघड़ा   
कटा जिस्म कहाँ बेजान था   
नौनिहालों के शव पर   
रोया सारा हिन्दुस्तान था !   

दसों दिशाओं में चीख़ पुकार   
ख़ौफ़ से काँपा आसमान था   
दहशत और अमानवीयता से   
डरा सारा हिन्दुस्तान था !   

मंदिर बने कि मस्ज़िद गिरे   
अवाम नहीं सत्ता का ये खेल था   
मंदिर-मस्जिद के झगड़े में   
मरा सारा हिन्दुस्तान था !   

- जेन्नी शबनम (24. 10. 2019)   
(भागलपुर दंगा के 30 साल होने पर)
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शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

634. चाँद (चाँद पर 10 हाइकु)

चाँद (चाँद पर 10 हाइकु)   

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1.   
बिछ जो गई   
रोशनी की चादर   
चाँद है खुश।   

2.   
सबका प्यारा   
कई रिश्तों में दिखा   
दुलारा चाँद।   

3.   
सह न सका   
सूरज की तपिश   
चाँद जा छुपा।   

4.   
धुँधला दिखा   
प्रदूषण से हारा   
पूर्णिमा चाँद।   

5.   
चंदा ओ चंदा   
घर का संदेशा ला   
याद सताती।   

6.   
रौशन जहाँ   
शबाब पर चाँद   
पूनम रात।   

7.   
चाँदनी गिरी   
अमृत है बरसा   
पूर्णिमा रात।   

8.   
पूनो की रात   
चंदा ने खूब किया   
अमृत वर्षा।   

9.   
मुख मलिन   
प्रकाश प्रदूषण   
तन्हा है चाँद।   

10.   
दिख न पाया   
बिजली भरमार   
चाँद का मुख।   

- जेन्नी शबनम (18. 10. 2019)   

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सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

633. रिश्ते (रिश्ते पर 10 हाइकु)

रिश्ते
(रिश्ते पर 10 हाइकु) 

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1.   
कौन समझे   
मन की संवेदना   
रिश्ते जो टूटे।   

2.   
नहीं अपना   
कौन किससे कहे   
मन की व्यथा।   

3.   
दीमक लगी   
अंदर से खोखले   
सारे ही रिश्ते।   

4.   
कोई न सुने   
कारूणिक पुकार   
रिश्ते मृतक।   

5.   
मन है टूटा   
रिश्तों के दाँव-पेंच   
नहीं सुलझे।   

6.   
धोखे ही धोखे   
रिश्तों के बाज़ार में   
मुफ़्त में मिले।   

7.   
नसीब यही   
आसमान से गिरे   
धोखे थे रिश्ते।   

8.   
शिकस्त देते   
अपनों की खाल में   
फरेबी रिश्ते।   

9.   
जाल में फाँसे   
बहेलिए-से रिश्ते   
कत्ल ही करें।   

10.   
झूठ-फरेब   
कैसे करें विश्वास   
छलावा रिश्ते।   

- जेन्नी शबनम (1. 10. 2019)   

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गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

632. जीवन की गंध

जीवन की गंध   

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यहाँ भी कोई नहीं   
वहाँ भी कोई नहीं 
नितान्त अकेले तय करना है 
तमाम राहों को पार करना है, 
पाप और पुण्य, सुख और दुख 
मन की अवस्था, तन की व्यवस्था 
समझना ही होगा 
सँभालना ही होगा   
यह जीवन और जीवन की गंध। 

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2019)   

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बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

631. जादुई नगरी

जादुई नगरी   

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तुम प्रेम नगर के राजा हो   
मैं परी देश की हूँ रानी   
पँखों पर तुम्हें बिठा कर मैं   
ले जाऊँ सपनो की नगरी।   

मन चाहे तोड़ो जितना   
फूलों की है मीलों क्यारी   
कभी शेष नहीं होती है   
फूलों की यह फूलवारी।   

झुलाएँ तुम्हे अपना झूला   
लता पुष्पों से बने ये झूले   
बासंती बयार है इठलाती   
धरा गगन तक जाएँ झूले।   

कल-कल बहता मीठा झरना   
पाँव पखारे और भींगे तन मन   
मन की प्यास बुझाता है यह   
बिना उलाहना रहता है मगन।   

जादुई नगरी में फैली शाँति   
आओ यहीं बस जाएँ हम   
हर चाहत को पूरी कर लें   
जीवन को दें विश्राम हम।   

उत्सव की छटा है बिखरी   
रोम-रोम हुआ है सावन   
आओ मुट्ठी में भर लें हम   
मौसम-सा यह सुन्दर जीवन।   

- जेन्नी शबनम (9. 10. 2019)   

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सोमवार, 30 सितंबर 2019

630. साँझ (साँझ पर 10 हाइकु)

साँझ (साँझ पर 10 हाइकु)   

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1.   
साँझ पसरी   
''लौट आ मेरे चिड़े !''   
अम्मा कहती।   

2.   
साँझ की वेला   
अपनों का संगम   
रौशन नीड़।   

3.   
क्षितिज पर   
सूरज आँखें मींचे   
साँझ निहारे।   

4.   
साँझ उतरी   
बेदम होके दौड़ी   
रात के पास।   

5.   
चाँद व तारे   
साँझ की राह ताके   
चमकने को।   

6.   
धुँधली साँझ   
डूबता हुआ सूर्य   
तप से जागा।   

7.   
घर को चली   
साँझ होने को आई   
धूप बावरी।   

8.   
नभ से आई   
उतरकर साँझ   
दीए जलाती।   

9.   
गगन हँसा   
बेपरवाह धूप   
साँझ से हारी।   

10.   
संध्या उदास   
क्या करे दीया बाती   
साथ न कोई।   

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2019)   



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गुरुवार, 26 सितंबर 2019

629. गुम सवाल

गुम सवाल   

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ज़िन्दगी जब भी सवालों में उलझी   
मिल न पाया कोई माकूल जवाब   
फिर ठठाकर हँस पड़ी   
और गुम कर दिया सवालों को   
जैसे वादियों में कोई पत्थर उछाल दे।   

- जेन्नी शबनम (26. 9. 2019)

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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

628. तमाशा

तमाशा 

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सच को झूठ और झूठ को सच कहती है दुनिया   
इसी सच-झूठ के दरमियाँ रहती है दुनिया   
खून के नाते हों या किस्मत के नाते   
फ़रेब के बाज़ार में सब ख़रीददार ठहरे   
सहूलियत की पराकाष्ठा है   
अपनों से अपनों का छल   
मन के नातों का कत्ल   
कोखजायों की बदनीयती   
सरेबाजार शर्मसार है करती   
दुनिया को सिर्फ नफ़रत आती है   
दुनिया कब प्यार करती है   
धन-बल के लोभ में इंसानियत मर गई है   
धन के बाजार में सबकी बोली लग गई है   
यकीन और प्रेम गौरैया-सी फ़ुर्र हुई   
तमाम जंगल झुलस गए   
कहाँ नीड़ बसाए परिन्दा   
कहाँ तलाशे प्रेम की बगिया   
झूठ-फरेब के चीनी माँझे में उलझ के   
लहूलुहान हो गई है ज़िन्दगी   
ऐसा लगता है खो गई है ज़िन्दगी   
देखो मिट रही है ज़िन्दगी   
मौत की बाहों में सिमट रही है ज़िन्दगी   
आओ-आओ तमाशा देखो  
रिश्ते नातों का तमाशा देखो   
पैसों के खेल का तमाशा देखो   
बिन पैसों का तमाशा देखो।   

- जेन्नी शबनम (19. 9. 2019)   

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शनिवार, 14 सितंबर 2019

627. क्षणिक बहार

क्षणिक बहार   

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आज वह खूब चहक रही है   
मन ही मन में बहक रही है 
साल भर से जो वो कच्ची थी 
उस का दिन है तो पक रही है। 

आज वह निरीह नहीं सबल है 
आज वह दुखी नहीं मगन है 
आज उस के नाम धरती है 
आज उस का ही ये गगन है। 

जहाँ देखो सब उसे बुला रहे हैं 
हर महफ़िल में उसे सजा रहे हैं 
किसी ने क्या खूब वरदान दिया है 
एक पखवारा उसके नाम किया है। 

आज सज धज के निकलेगी 
आज बहुरिया-सी दमकेगी 
हर तरफ होगी जय जयकार 
हर कोई दिखाए अपना प्यार 
हर किसी को इस का ख्याल 
परम्परा मनेगी सालों साल। 

पखवारा बीतने पर मलीन होगी 
धीरे-धीरे फिर गमगीन होगी 
मंच पर आज जो बैठी है 
फर्श पर तब आसीन होगी 
क्षणिक बहार आज आई है 
फिर साल भर अँधेरी रात होगी। 

हर साल आता है यह त्योहार 
एक पखवारे का जश्ने बहार 
उस हिन्दी की परवाह किसे है 
राजभाषा तक सिकोड़ा जिसे है 
जो भी अब संगी साथी इसके हैं 
सालों भर साथ-साथ चलते हैं। 

भले अंग्रेजी सदा अपमान करे 
हिन्दी का साथ हमसे न छूटे 
प्रण लो हिन्दी बनेगी राष्ट्रभाषा 
यह है हमारा अधिकार और भाषा 
हिन्दी को हम से है बस यही आशा 
हम देंगे नया जीवन नयी परिभाषा। 

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2019) 

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मंगलवार, 3 सितंबर 2019

626. परम्परा (क्षणिका)

परम्परा   

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मन के अवसाद को   
चूड़ियों की खनक, बिन्दी के आकार   
होठों की लाली और मुस्कुराहट में दफन कर 
खिलखिलाकर दूर करना 
परम्परा है   
स्त्रियाँ परम्परा को   
बड़े मन से निभाती हैं।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2019)   

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शनिवार, 31 अगस्त 2019

625. कश

कश   

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"मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया   
हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया" 
रफी साहब ने बस गा दिया 
देवानंद ने चित्रपट पर निभा दिया 
पर मैं ? मैं क्या करूँ ? 
कैसे जियूँ ?  कैसे मरुँ ? 
हर कश में एक-एक फ़िक्र को फेंकती हूँ 
मैं ऐसे ही मेरे ज़ख्मों को सेंकती हूँ   
मेरी फ़िक्र तो धुँए के छल्ले के साथ 
मेरे पास वापस लौट आती है 
जाने क्यों धुएँ के साथ आसमान में नहीं जाती है 
मेरी ज़िन्दगी का साथी है फ़िक्र 
और फ़िक्र को भगाने का जरिया है 
जलती सिगरेट और धुँए का जो छल्ला है 
जो बादलों-सा होठों से निकलता है 
हवाओं में गुम होकर मेरे पास लौटता है 
साँस लेने का सबब भी है और साँस लेने से रोकता है 
हाँ मालूम है हर छल्ले के साथ   
वक़्त और उम्र का चक्र भी घूम रहा है 
मुझे नशा नहीं हुआ और लम्हा-लम्हा झूम रहा है   
जल्दी ही धुँआ लील लेगा मेरी ज़िन्दगी 
ज़िन्दगी लम्बी न सही छोटी सही 
हर साँस में नई कसौटी सही   
मैं हर फ़िक्र को धुँए में समेट बुलाती रही 
इस तरह ज़िन्दगी का साथ निभाती रही ! 

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2019) 

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मंगलवार, 27 अगस्त 2019

624. अकेले हम (5 हाइकु)

अकेले हम (5 हाइकु)   

*******   

1.
ज़िन्दगी यही   
चलना होगा तन्हा   
अकेले हम।   

2.
राहें ख़ामोश   
सन्नाटा है पसरा   
अकेले हम।   

3.
हज़ारों बाधा   
थका व हारा मन   
अकेले हम।   

4.   
किरणें फूटीं   
भले अकेले हम   
नहीं संशय।   

5.   
उबर आए,   
गुमराह अँधेरा   
अकेले हम।   

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2019)   

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मंगलवार, 20 अगस्त 2019

623. क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)

क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)   

1.
चुटकी   

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एक चुटकी नमक   
एक चुटकी सिन्दुर   
एक चुटकी ज़हर   
मुझे औरत करते रहे   
ज़िन्दगी भर।   


2. 
विद्रोही औरतें   

*******   

यूँ मुस्कुराना   
ख़ुद से विद्रोह सा लगता है   
पर समय के साथ चुपचाप   
विद्रोही बन जाती हैं औरतें   
अपने उन सवालों से घिरी हुई   
जिनके जवाब वे जानती हैं   
और वक्त पर देती हैं   
विद्रोही औरतें।   


3. 
समीकरण   

*******   

जीवन का समीकरण   
अनुभवों का जोड़   
उम्र का घटाव   
भावनाओं का गुना भाग   
अंतत: जीवन शून्य।   


4.
ताना-बाना   

*******   

जीवन का ताना-बाना   
उल्टा पुल्टा चलता रहा 
समय यूँ ही सधता रहा   
कभी कुछ उलझा 
कभी कुछ सुलझा 
कभी कुछ टूट कर गिरता रहा   
समय सब समझता रहा।   


5. 
मैना   

*******   

महल का एक अदना खिलौना   
सोने का एक पिंजरा   
पिंजरे में रहती थी एक मैना   
वो रूठे या हँसे परवाह किसे   
दाना पानी मिलता था जीभर   
फुर्र फुर्र उड़कर करतब दिखाती   
इतनी ही है बस उसकी कहानी   
सब कहते वह बड़ी तकदीरवाली।   


6.
बेशऊर   

******   

छोटी छोटी डिब्बियों में भर कर   
सीलबंद कर दिए सारे हुनर   
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी   
पर अब संतोष है   
सारा हुनर ओझल है सबसे   
अब उसका अपमान नहीं होता।   


7.
दिठौना   

*******   

दिठौना तो हर रोज लगाई   
भूले से भी कभी न चूकी   
नजरें तो झुकी ही रही   
औरतपना कभी न बिसरी   
फिर ये काली परछाईं कैसी   
काला जादू हुआ ये कैसे   
ओह! मर्द औरत में   
दिठौने ने फर्क किया।  


8.
शाइस्ता   

*******   

कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ वो शाइस्ता   
जो खिदमत करे मगर शिकवा नहीं   
बेशअउरी, बेअदबी तुम्हे पसंद नहीं   
और अदब में रह कर जुल्म सहना   
इस जमाने की फितरत नहीं।   

(शाइस्ता - सभ्य / सुसंकृत)   


9.
पिछली रोटी   

*******   

पहली रोटी भैया की   
अंतिम रोटी अम्मा की   
यही हमारी रीत है भैया   
यही मिली इक सीख है भैया   
बहुत पुराना वादा है   
कूल की ये मर्यादा है   
ये बेटी का सत है भैया   
ये औरतों का पथ है भैया।   


10.
वापसी   

*******   

खुदा जाने क्या हो   
चीजो को भूलते भूलते   
कहीं खुद को न भूला बैठूँ   
यूँ किसी ने मुझे याद रखा भी नहीं   
अपनी याद तो खुद ही रखी अबतक   
अब जो खुद को भुला दिया   
फिर वापसी कैसे?   


- जेन्नी शबनम (20. 8. 2019)

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गुरुवार, 1 अगस्त 2019

622. उधार

उधार   

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कुछ रंग जो मेरे हिस्से में नहीं थे   
मैंने उधार लिए मौसम से   
पर न जाने क्यों ये बेपरवाह मौसम मुझसे लड़ रहा है   
और माँग रहा है अपना उधार वापस   
जिसे मैंने खर्च दिया उन दिनों   
जब मेरे पास जीने को कोई रंग न था   
सफेद स्याह रंगों का जो एक कोलाज बचा था मेरे पास   
वह भी धुक-धुक साँसें ले रहा था   
ज़िन्दगी से रूठा वह कोलाज   
मुझे भी जीवन से पलायन के रास्ते बता रहा था   
पर मुझे जीना था, अपने लिए जीना था   
बहुत ज्यादा जीना था, हद से ज्यादा जीना था   
हाँ, जानती हूँ उधार लेना और उधार पर जीना गैर वाज़िब है   
जानती हूँ कि मैं कर्ज़दार हूँ और चुकाने में असमर्थ भी   
फिर भी मैं शर्मसार नहीं !   

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2019)

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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

621. जीवन-युद्ध

जीवन-युद्ध   

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यादों के गलियारे से गुज़रते हुए   
मुमकिन है यादों को धकेलते हुए   
पार तो आ गई जीवन के   
पर राहों में पड़ी छोटी-छोटी यादें   
मायूसी-से मेरी राह तकती दिखीं कि  
ज़रा थम कर याद कर लो उन लम्हों को   
जो दुबारा नहीं आएँगे।   

जब एक नन्ही बच्ची ने   
पहली बार छोटी-छोटी रोटी बना   
अपने पापा को खिलाई थी   
उस बच्ची ने माँ को देखकर   
झाड़ू की सींक पर पहली बार   
ऊन से फंदा डालना सीखा था   
उसने दादी से सीखा था   
सिलबट्टे पर हल्दी पीसना और जाँता पर दाल दरना   
भैया के साथ खेले बचपन के खेल थे -   
डॉक्टर-डॉक्टर, लुका-छिपी   
राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न   
लूडो, पिट्टो और बैडमिन्टन   
उसने भैया से सीखा था साइकिल चलाना   
भैया से कभी जो झगड़ लेती   
फिर उसे खूब मारती और भैया हँसकर मार खाता   
रूठ जाती थी वो बच्ची अक्सर   
उसके पापा बड़े प्यार से उसे गोद में बिठाकर मनाते   
कैसे-कैसे प्यारे-प्यारे दिन थे जीवन में जो गुज़रे।   

जाने अतीत पीछा क्यों करता है   
फिर से बच्ची बन पापा की गोद में बैठने का मन करता है   
गाँव की पगडंडियों पर हवाई चप्पल पहन बेवज़ह भागना   
बोरिंग की तेज़ धार पर हौज़ में कूदना   
बाढ़ में सारा दिन पानी में घुसकर   
पापा के साथ गाँव भर की खबर लेना   
बीमार होने पर मिट्टी की पट्टी   
मट्ठा, सूप और नीम्बू पानी पीना   
पथ्य में उबले आटे की रोटी और घिऊरा की तरकारी खाना   
सुबह चार बजे से पापा की गोदी में बैठकर   
दुनिया भर की जानकारी पाना।   

माँ से सीखा घर चलाना   
घर का बजट बनाना, कम पैसे में जीवन जीना   
पापा के जाने के बाद माँ का कमजोर पड़ना   
और धीरे-धीरे समाज से कटना   
फिर आत्मविश्वास का थोड़ा जगना   
दादी का संबल   
और फिर हमारा जीवन- युद्ध से भिड़ना।   

सारे लम्हे याद आते हैं   
हर एक बात पर याद आते हैं   
पर ठहरना नही चाहती वहाँ पर   
जब भी रुकी हूँ, आँखें नम होती है   
फिर तलाशती हूँ कोई कोना अपना   
जहाँ निर्बाध हँस सकूँ, रो सकूँ   
पापा की यादों को जी सकूँ   
किसी से कुछ कह सकूँ 
थोड़ा-सा मन का कर सकूँ   
खुद के साथ थोड़ा रह सकूँ।   

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2019)   
(पापा की 41 वीं पुण्यतिथि पर)
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सोमवार, 15 जुलाई 2019

620. वर्षा (10 ताँका)

वर्षा (10 ताँका)   

*******   

1.
तपती धरा   
तन भी तप उठा   
बदरा छाए   
घूम-घूम गरजे   
मन का भौंरा नाचे।   

2.   
कूकी कोयल   
नाचे है पपीहरा   
देख बदरा   
चहके है बगिया   
नाचे घर अँगना।   

3.   
ओ रे बदरा   
कितना तड़पाया   
अब तू माना   
तेरे बिना अटकी   
संसार की मटकी।   

4.   
गाए मल्हार   
घनघोर घटाएँ   
नभ मुस्काए   
बूँदें खूब झरती   
रिमझिम फुहार।   

5.   
बरसा पानी   
याद आई है नानी   
है अस्त व्यस्त   
जीवन की रफ्तार   
जलमग्न सड़कें।   

6.   
पौधे खिलते   
किसान हैं हँसते   
वर्षा के संग   
मन मयूरा नाचे   
बूंदों के संग-संग।   

7.   
झूमती धरा   
झूमता है गगन   
आई है वर्षा   
लेकर ठंडी हवा   
खिल उठा चमन।   

8.   
घनी प्रतीक्षा   
अब जाकर आया   
मेघ पाहुन   
चाय संग पकौड़ी   
पहुना संग खाए।   

9.   
पानी बरसा   
झर-झर झरता   
जैसे झरना,   
सुन मेरे बदरा   
मन हुआ बावरा।   

10.   
हे वर्षा रानी   
यूँ रूठा मत करो   
आ जाया करो   
रवि से लड़कर   
बरसो जमकर।   

- जेन्नी शबनम (6. 7. 2019)   

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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

619. जीवन-पथ (चोका)

जीवन-पथ (चोका)   

*******   

जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से   
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अन्धेरा   
डर-डर के   
कदम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
खुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता !   

- जेन्नी शबनम (8. 6. 2019) 

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सोमवार, 1 जुलाई 2019

618. सरमाया

सरमाया   

*******   

ये कैसा दौर आया है   
पहर-पहर भरमाया है   
कुछ माँगू तो ईमान मरे   
न माँगू तो ख़्वाब मरे   
किस्मत से धक्का मुक्की   
पोर-पोर घबराया है   
जद्दोज़हद में युग बीते   
यही मेरा सरमाया है।   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2019)   

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सोमवार, 17 जून 2019

617. कड़ी

कड़ी   

*******

अतीत की एक कड़ी   
मैं खुद हूँ   
मन के कोने में, सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने पिता को जीवित रखा है   
जब-जब हारती हूँ   
जब-जब अपमानित होती हूँ   
अँधेरे में सुबकते हुए, पापा से जा लिपटती हूँ   
खूब रोती हूँ, खूब गुस्सा करती हूँ   
जानती हूँ पापा कहीं नहीं   
थक कर ख़ुद ही चुप हो जाती हूँ   
यह भूलती नहीं, कि रोना मेरे लिए गुनाह है   
चेहरे पे मुस्कान, आँखों पर चश्मा   
सब छुप जाता है जमाने से   
पर हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा   
सिमटती जा रही हूँ, मिटती जा रही हूँ   
जीने की आरज़ू, जीने का हौसला   
सब शेष हो चुका है   
न रिश्ते साथ देते हैं, न रिश्ते साथ चलते हैं   
दर्द की ओढ़नी, गले में लिपटती है   
पिता की बाँहें, कभी रोकने नहीं आतीं   
नितांत अकेली मैं   
अपनों द्वारा कतरे हुए परों को, सहलाती हूँ   
कभी-कभी चुपचाप   
फेविकोल से परों को चिपकाती हूँ   
जानती हूँ, यह खेल है, झूठी आशा है   
पर मन बहलाती हूँ   
हार अच्छी नहीं लगती मुझे   
इसलिए जोर से ठहाके लगाती हूँ   
जीत का झूठा सच सबको बताती हूँ   
बस अपने पापा को सब सच बताती हूँ   
जोर से ठहाके लगाती हूँ   
मन बहलाती हूँ!   

- जेन्नी शबनम (17. 6. 2019)   
(पितृ-दिवस पर) 
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गुरुवार, 13 जून 2019

616. यूँ ही आना यूँ ही जाना

यूँ ही आना यूँ ही जाना   

*******   

अपनी पीर छुपाकर जीना   
मीठे कह के आँसू पीना   
ये दस्तूर निभाऊँ कैसे   
जिस्म है घायल छलनी सीना।   

रिश्ते नाते निभ नहीं पाते   
करें शिकायत किस की किस से   
गली चौबारे खुद में सिमटे   
दरख़्त हुए सब टुकड़े-टुकड़े।   

मृदु भावों की बली चढ़ाकर   
मतलबपरस्त हुई ये दुनिया   
खिदमत में मिट जाओ भी गर   
कहेगी किस्मत सोई ये दुनिया।   

बेगैरत हूँ कहेगी दुनिया   
खिदमत न कर खुद को सँवारा   
साथ नहीं कोई ब्रम्ह या बाबा   
पीर पैगम्बर नहीं सहारा।   

पीर पराई कोइ न समझे   
मर-मर के छोड़े कोई जीना   
ख़त्म करो अब हर ताल्लुक को   
मंत्र ये जीवन का दोहराना   
यूँ ही अब दुनिया में रहना   
यूँ ही अब दुनिया से जाना   
ख़त्म करो अब हर ताल्लुक को   
मंत्र ये जीवन का दोहराना।   

- जेन्नी शबनम (12. 6. 2019)   

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शुक्रवार, 7 जून 2019

615. नहीं आता

नहीं आता   

*******   

ग़ज़ल नहीं कहती   
यूँ कि मुझे कहना नहीं आता   
चाहती तो हूँ मगर   
मन का भेद खोलना नहीं आता।   

बसर तो करनी है पर   
शहर की आवो हवा बेगानी लगती   
रूकती हूँ समझती हूँ   
पर दम भर कर रोना नहीं आता।   

सफर में अब जो भी मिले   
मुमकिन है मंजिल मिले न मिले   
परवाह नहीं पाँव छिल गए   
दमभर भी हमें ठहरना नहीं आता।   

मायूसी मन में पलती रही   
अपनों से जख्म जब भी गहरे मिले   
कोशिश की थी कि तन्हा चलूँ   
पर अपने साथ जीना नहीं आता।   

यादों के जंजाल में उलझ के   
बिसुराते रहे हम अपने आज को   
हँस-हँस के गम को पीना होता   
पर 'शब' को यूँ हँसना नहीं आता।   

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2019)   

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शनिवार, 1 जून 2019

614. नज़रबंद

नज़रबंद   

*******   

ज़िन्दगी मुझसे भागती रही   
मैं दौड़ती रही, पीछा करती रही   
एक दिन आख़िर वो पकड़ में आई   
खुद ही जैसे मेरे घर में आई   
भागने का सबब पूछा मैंने   
झूठ बोल बहला दिया मुझे,   
मैं अपनी खामी ढूँढती रही   
आख़िर ऐसी क्या कमी थी   
जो जिन्दगी मुझसे कह गई   
मेरी सोच मेरी उम्र या फिर जीने का शऊर   
हाँ! भले मैं बेशऊरी   
पर वक्त से जो सीखा वैसे ही तो जिया मैंने   
फिर अब ?   
आजीज आ गई ज़िन्दगी   
एक दिन मुझे प्रेम से दुलारा, मेरे मन भर मुझे पुचकारा   
हाथों में हाथ लिए मेरे, चल पड़ी झील किनारे   
चाँद तारों की बात, फूल और खूश्बू थी साथ   
भूला दिया मैंने उसका छल   
आँखें मूँद काँधे पे उसके रख दिया सिर   
मैं जिन्दगी के साथ थी   
नहीं-नहीं मैं अपने साथ थी   
फिर हौले से उसने मुझे झिंझोड़ा   
मैंने आँख मूँदे मुस्कुरा कर पूछा -   
बोलो ज़िन्दगी, अब तो सच बताओ   
क्यों भागती रहीं तुम तमाम उम्र   
मैं तुम्हारा पीछा करती रही ताउम्र   
जब भी तुम पकड में आई   
तुमने स्वप्नबाग दिखा मुझसे पीछा छुड़ाया,   
फिर ज़िन्दगी ने मेरी आँखों में देखा   
कहा कि मैं झील की सुन्दरता देखूँ   
अपना रूप उसमें निहारूँ,   
मैं पागल फिर से छली गई   
आँखें खोल झील में खुद को निहारा   
मेरी ज़िन्दगी ने मुझे धकेल दिया   
सदा के लिए उस गहरी झील में   
बहुत प्रेम से बड़े धोखे से,   
अब मैं झील में नज़रबंद हूँ   
ज़िन्दगी की बेवफाई से रंज हूँ   
अब न ज़िन्दगी का कारोबार होगा   
न ज़िन्दगी से मुलाकात होगी   
अब कौन सुनेगा मुझको कभी   
न किसी से बात होगी !   

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2019)   

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बुधवार, 1 मई 2019

613. अधिकार और कर्त्तव्य

अधिकार और कर्त्तव्य   

*******   

अधिकार है तुम्हें   
कर सकते हो तुम   
हर वह काम जो जायज नहीं है   
पर हमें इजाजत नहीं कि   
हम प्रतिरोध करें,   
कर्तव्य है हमारा   
सिर्फ वह बोलना   
जिससे तुम खुश रहो   
भले हमारी आत्मा मर जाए,   
इस अधिकार और कर्तव्य को   
परिभाषित करने वाले तुम   
हमें धर्म का वास्ता देते हो   
और स्वयं अधर्म करते रहते हो।   
तुम्हारे अहंकार के बाण से   
हमारी साँसें छलनी हो चुकी हैं   
हमारी रगों का रक्त   
जमकर काला पड़ गया है   
तुम्हारा पेट भरने वाले हम   
तुम्हारे सामने हाथ जोड़े, भूख से मर रहे हैं   
और तुम हो कि हमसे धर्म-धर्म खेल रहे हो   
हमें आपस में लड़ा कर सत्ता-सत्ता खेल रहे हो।   
तुमने बतलाया था कि   
मुक्ति मिलेगी हमें, पूर्व जन्म के पापों से   
गर मंदिर मस्जिद को हम, अपना देह दान करें   
तुम्हारे बताए राहों पर चलकर, तुम्हारा सम्मान करें।   
अब हमने सब कुछ है जाना   
सदियों बाद तुम्हें है पहचाना   
हमें मुक्ति नहीं मिली   
न रावण वध से   
न गीता दर्शन से   
न तुम्हारे सम्मान से   
न अपने आत्मघात से।   
युगों-युगों से त्रासदी झेलते हम   
तुम्हारे बतलाए धर्म को अब नकार रहे हैं   
तुमने ही सारे विकल्प छीने हैं हमसे   
अब हम अपना रुख़ मोड़ रहे हैं,   
बहुत सहा है अपमान हमने   
नहीं है अब कोई फरियाद तुमसे   
तुम्हारे हर वार का अब जवाब होगा   
जुड़े हाथों से अब वार होगा।   
हमारे बल पर जीने वाले   
अब अपना तुम अंजाम देखो   
तुम होशियार रहो, तुम तैयार रहो   
अब आर या पार होगा   
जो भी होगा सरेआम होगा।   
इंकलाब का नारा है   
सिर्फ तुम्हारा नहीं   
हिन्दुस्तान हमारा है।   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2019)   
(मज़दूर दिवस)
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रविवार, 31 मार्च 2019

612. प्रकृति (20 हाइकु)

प्रकृति 
(20 हाइकु)   

*******   

1.   
प्यार मिलता   
तभी खिलखिलाता   
प्रकृति-शिशु।   

2.   
अद्भुत लीला   
प्रकृति प्राण देती   
संस्कृति जीती।   

3.   
प्रकृति हँसी   
सुहावना मौसम   
खिलखिलाया।   

4.   
धोखा पाकर   
प्रकृति यूँ ठिठकी   
मानो लड़की।   

5.   
कृत संकल्प   
प्रकृति का वंदन   
स्वस्थ जीवन।   

6.   
मत रूलाओ,   
प्रकृति का रूदन   
ध्वस्त जीवन।   

7.   
प्रकृति क्रुद्ध,   
प्रलय है समीप   
हमारा कृत्य।   

8.   
रंग बाँटती   
प्रकृति रंगरेज़   
मनभावन।   

9.   
मौसमी हवा   
नाचती गाती चली   
प्रकृति ख़ुश।   

10.   
घना जंगल   
लुभावना मौसम   
प्रकृति नाची।   

11.   
धूल व धुआँ   
थकी हारी प्रकृति   
बेदम साँसें।   

12.   
साँसें उखड़ी   
अधमरी प्रकृति,   
मानव दैत्य।   

13.   
खंजर भोंका   
मर गई प्रकृति   
मानव खूनी।   

14.   
खेत बेहाल   
प्रकृति का बदला   
सूखा तालाब।   

15.   
सुकून देती   
गहरी साँस देती   
प्रकृति देवी।   

16.   
बड़ा सताया   
कलंकित मानव,   
प्रकृति रोती।   

17.   
सखी सहेली   
ऋतुएँ व प्रकृति   
दुख बाँटती।   

18.   
हरी ओढ़नी   
भौतिकता ने छीनी   
प्रकृति नंगी।   

19.   
किससे बाँटें   
मुरझाई प्रकृति   
अपनी व्यथा।   

20.
जी भरके लूटा
प्रकृति को दुत्कारा
लोभी मानव।   

- जेन्नी शबनम (29. 3. 2019)   

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गुरुवार, 28 मार्च 2019

611. जीवन मेरा (चोका)

जीवन मेरा (चोका)   

*******   

मेरे हिस्से में   
ये कैसा सफ़र है   
रात और दिन   
चलना जीवन है,   
थक जो गए   
कहीं ठौर न मिला   
चलते रहे   
बस चलते रहे,   
कहीं न छाँव   
कहीं मिला न ठाँव   
बढते रहे   
झुलसे मेरे पाँव,   
चुभा जो काँटा   
पीर सह न पाए   
मन में रोए   
सामने मुस्कुराए,   
किसे पुकारें   
मन है घबराए   
अपना नहीं   
सर पे साया नहीं,   
सुख व दु:ख   
आँखमिचौली खेले   
रोके न रुके   
तंज हमपे कसे,   
अपना सगा   
हमें छला हमेशा   
हमारी पीड़ा   
उसे लगे तमाशा,   
कोई पराया   
जब बना अपना   
पीड़ा सुन के   
संग-संग वो चला,   
किसी का साथ   
जब सुकून देता   
पाँव खींचने   
जमाना है दौड़ता,   
हमसफर   
काश ! कोई होता   
राह आसान   
सफर पूरा होता,   
शाप है हमें   
कहीं न पहुँचना   
अनवरत   
चलते ही रहना।   
यही जीवन मेरा।   

- जेन्नी शबनम (26. 3. 2019)   

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रविवार, 24 मार्च 2019

610. परम्परा

परम्परा   

*******   
  
मैं उदासी नहीं चाहती थी   
मैं तो खिलखिलाना चाहती थी   
आजाद पंक्षियों-सा उड़ना चाहती थी   
हर रोज नई धुन गुनगुनाना चाहती थी   
और यह सब अनकहा भी न था   
हर अरमान चादर-सा बिछा दिया था तुम्हारे सामने   
तुमने सहमति भी जताई थी कि तुम साथ दोगे   
लेकिन जाने यह क्योंकर हुआ   
पर मैं वक्त को दोष न दूँगी   
वक्त ने तो बहुत साथ दिया   
पर तुम बिसुर गए सब   
एक-एक कर मेरे सपनों को   
होलिका के साथ तुमने जला दिया   
मुझसे कहा कि यह परम्परा है   
मैं उदास हुई पर इंकार न किया   
तुम्हारा कहा सिर माथे पर।   

- जेन्नी शबनम (9.3.2019)   

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गुरुवार, 21 मार्च 2019

609. रंगों की होली (10 हाइकु)

रंगों की होली 
(10 हाइकु)   

*******   

1.   
रंगो की होली   
गाँठ मन की खोली   
प्रीत बरसी।   

2.   
पावन होली   
मन है सतरंगी   
सूरत भोली।   

3.   
रंगों की झोली   
आसमान ने फेंकी   
धरती रँगी।   

4.   
हवा में घुले   
रंग भरे जज़्बात   
होली के साथ।   

5.   
होली रंग में   
दर्द के रंग घुले   
मन निश्छल।   

6.   
होली पहुँची   
छोटे पग धरके   
इस बसंत।   

7.   
पाहुन होली   
ज़रा देर ठहरी   
चलती बनी।   

8.   
रंग गुलाल   
सर-सर गिरते   
खेले कबड्डी।   

9.   
न पी, न पाई    
ये कैसी होली आई   
फीकी मिठाई।   

10.   
रंगो का मेला   
नहीं कोई पहरा   
गुम चेहरा।   

- जेन्नी शबनम (20. 3. 2019)   

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मंगलवार, 19 मार्च 2019

608. स्वीकार (क्षणिका)

स्वीकार   

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मैं अपने आप से मिलना नहीं चाहती   
जानती हूँ खुद से मिलूँगी तो   
जी नहीं पाऊँगी   
जीवित रहने के लिए   
मैंने उन सभी अनुबंधों को स्वीकार किया है   
जिसे मेरा मन नहीं स्वीकारता है   
विकल्प दो ही थे मेरे पास -   
जीवित रहूँ या   
खुद से मिलूँ!   

- जेन्नी शबनम (19. 3. 2019)   

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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

607. पानी और स्त्री

पानी और स्त्री 

*******   

बचपन में पढ़ा -   
पानी होता है रंगहीन गंधहीन   
जिसे जहाँ रखा उस साँचे में ढला    
खूब गर्म किया भाप बन उड़ गया   
खूब ठंडा किया बर्फ बन जम गया   
पानी के साथ उगता है जीवन   
पनपती हैं सभ्यताएँ   
पानी गर हुआ लुप्त   
संसार भी हो जाएगा विलुप्त।   
फिर भी पानी के साथ होता है खिलवाड़   
नहीं होता उसका सम्मान   
नहीं करते उसका बचाव   
न ही करते उसका संरक्षण   
न ही करते उसका प्रबंधन   
जबकि जानते हैं पानी नहीं तो दुनिया नहीं।   
बचपन में जो था पढ़ा   
अब जीवन ने है समझा   
स्त्रियाँ पानी हैं   
वक्त ने जहाँ चाहा उस साँचे में ढाल दिया   
कभी आरोपों से जम गई   
तो व्याकुलता से लिपट कर भाप-सी पिघल गई   
स्त्रियों ने किया सृजन   
नवजीवन का किया पोषण   
फिर भी मानी गई सब पर बोझ   
सभी चाहते नहीं मिले उसको कोख   
पानी-सी न की गई सुरक्षित   
पानी-सी न हुई संरक्षित   
पानी बिन होता अकाल   
स्त्री बिन मिट जाएगा संसार।   
पानी-सी स्त्री है   
स्त्री-सा पानी है   
सीरत अलग मगर   
स्त्री और पानी जीवन है।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2019)   

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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

606. आँख (आँख पर 20 हाइकु)

आँख 
(आँख पर 20 हाइकु)   

*******   

1.   
पट खोलती   
दुनिया निहारती   
आँखें झरोखा।   

2.   
आँखों की भाषा   
गर समझ सको   
मन को जानो।   

3.   
गहरी झील   
आँखों में है बसती   
उतरो जरा।   

4.   
आँखों का नाता   
जोड़ता है गहरा   
मन से नाता।   

5.   
आँख का पानी   
मरता व गिरता   
भेद समझो।   

6.   
बड़ी लजाती   
अँखियाँ भोली भाली   
मीत को देख।   

7.   
शर्म व हया   
आँखें करती बयाँ   
उनकी भाषा।   

8.   
नन्ही आँखों में   
विस्तृत जग सारा   
सब समाया।   

9.   
खूब देखती   
सुन्दर-सा संसार   
आँखें दुनिया।   

10.   
छल को देख   
होती है शर्मसार   
आँखें क्रोधित।   

11.   
खूब पालती   
मनचाहे सपने   
दुलारी आँखें।   

12.   
स्वप्न छिपाती   
कितनी है गहरी   
अँखिया झील।   

13.   
बिना उसके   
अँधियारा पसरा   
अँखिया ज्योति।   

14.   
जी भर देखो   
रंग बिरंगा रूप   
आँखें दर्पण।   

15.   
मूँदी जो आँखें   
जग हुआ ओझल   
साथ है स्वप्न।   

16.   
जीवन खत्म   
संसार से विदाई   
अँखियाँ बंद।   

17.   
आँख में पानी   
बड़ा गहरा भेद   
आँख का पानी।   

18.   
भेद छुपाते 
सुख-दुख के साथी 
नैना हमारे।   

19.   
मन की भाषा   
पहचाने अँखियाँ   
दिखाती आशा।   

20.   
आँखियाँ मूंदी   
दिख रहा अतीत   
मन है शांत।   

- जेन्नी शबनम (19. 2. 2019)   

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