सोमवार, 27 जुलाई 2009

76. उजाला पी लूँ (क्षणिका) / Ujaala pee loon (kshanika)

उजाला पी लूँ 

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चाहती हूँ 
दिन के उजाले की कुछ किरणें
मुट्ठी में बंद कर लूँ
जब घनी काली रातें
लिपटकर डराती हों मुझे
मुट्ठी खोल, थोड़ा उजाला पी लूँ
थोड़ी-सी, ज़िन्दगी जी लूँ

- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 2003)
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Ujaala pee loon

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chaahti hoon 
din ke ujaale kee kuchh kirneyen
mutthi mein band kar loon
jab ghani kaalee raateyen 
lipatkar daraati hon mujhey
mutthi khol, thoda ujaala pee loon
thodi-see, zindagi jee loon.

- Jenny Shabnam (November, 2003)
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

75. काश! कोई ज़ंजीर होती (क्षणिका) / kaash! koi zanjeer hotee (kshanika)

काश! कोई ज़ंजीर होती 

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वीरान राहों पर
तन्हा, ख़ामोश, चल रही हूँ
थक गई हूँ, टूट गई हूँ,
न जाने कैसी राह है, ख़त्म नहीं होती
समय की कैसी बेबसी है
एक पल को थम नहीं पाती,
काश! कोई ज़ंजीर होती
वक़्त और ज़िन्दगी के पाँव जकड़ देती

- जेन्नी शबनम (24. 7. 2009)
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kaash! koi zanjeer hotee 

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veeraan raahon par
tanha, khaamosh, chal rahee hoon
thak gaee hoon, toot gaee hoon,
na jaane kaisee raah hai, khatm nahin hoti
samay kee kaisee bebasi hai
ek pal ko tham nahin paatee,
kaash! koi zanjeer hotee
waqt aur zindagi ke paanv jakad detee.

- Jenny Shabnam (24. 7. 2009)
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बुधवार, 22 जुलाई 2009

74. शमा बुझ रही (तुकान्त)

कुछ शेर हैं नज़्म-सा सही, नाम क्या दूँ ये पता भी नहीं,
जो नाम दें आपकी मर्ज़ी, पेश है शमा पर मेरी एक अर्ज़ी

शमा बुझ रही

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शमा बुझ रही, आओ जल जाओ, है नशीली सुरूर मयकशी
मिट गई तो फिर करनी होगी, उम्र तन्हा बसर, ऐ परवानों 

बुझने से पहले हर शमा, है धधकती बेइंतिहा दिलकशी
बुझ रही शमा तो आ पहुँचे, फिर क्यों मगर, ऐ जलनेवालों

सहर होने से पहले है बुझना, फिर क्यों भला छायी मायूसी
ढूँढ़ लो अब कोई हसीन शमा, बदलकर डगर, ऐ मतवालों

जाओ लौट जाओ हमदर्द मुसाफ़िरों, अब हुई साँस आख़िरी
फ़िजूल ही ढल गया, जाने क्यों उम्र का हर पहर, ऐ सफ़रवालों

मिज़ाज अब क्या पूछते हो, बस सुन लो उसकी बेबस ख़ामोशी
जल रही थी जब तड़पकर, तब तो न लिए ख़बर, ऐ शहरवालों

सलीक़ा बताते हो मुद्दतों जीने का क्यों, है ये वक़्त-ए-रुख़सती
बेशक शमा से सीख लो, शिद्दत से मरने का हुनर, ऐ उम्रवालों

शमा की हर साँस तड़प रही जलने को, बुझ जाना है नियति
इल्तिज़ा है, दम टूटने से पहले देख लो एक नज़र, ऐ दिलवालों

जल चुकी दम भर शमा, जान लो 'शब', है ये दस्तूर-ए-ज़िन्दगी
ख़त्म हुआ, अब मान भी लो, इस शमा का सफ़र, ऐ जहाँवालों

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2009)
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शनिवार, 18 जुलाई 2009

73. मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी

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ज़िन्दगी मेरी 
कई रूप में सामने आती है
ज़िन्दगी को पकड़ सकूँ
दौड़ती हूँ, भागती हूँ, झपटती हूँ
साबूत न सही
कुछ हिस्से तो पा लूँ  

हर बार ज़िन्दगी हँसकर
छुप जाती है
कभी यूँ भाग जाती है 
जैसे मुँह चिढ़ा रही हो
कभी कुछ हिस्से नोच भी लूँ
तो मुट्ठी से फिसल जाती है 

जाने जीने का शऊर नहीं मुझको
या हथेली छोटी पड़ जाती है
न पकड़ में आती, न सँभल पाती है 
मुझसे मेरी ज़िन्दगी 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2009)
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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

72. नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए

नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए

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नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए
फिर आस खोई तो क्या हुआ?
सपनों के बिना भी हम जी लेंगे
मेरा दिल टूटा तो क्या हुआ?

मुसकान तुम्हारी, मेरा चहकना
फिर हँसी रोई तो क्या हुआ?
यक़ीन हम पर न तुम कर पाए
मेरा दंभ हारा तो क्या हुआ?

ख़्वाबों में भी जो तुम आ जाओ
तन्हा रात मिली तो क्या हुआ?
मन का पिंजरा, अब भी है खुला
मेरा तन हारा तो क्या हुआ?

तुम तक पहुँचती, सब राहों पर
अंगारे बिछे भी तो क्या हुआ?
इरादा किया, तुम तक है पहुँचना
पाँव ज़ख़्मी मेरा तो क्या हुआ?

मुक़द्दर का ये खेल देखो
फिर मात मिली तो क्या हुआ?
अजनबी तुम बन गए, अब तो
फिर आघात मिला तो क्या हुआ?

मुश्किल है, फिर भी है जीना
ज़िन्दगी सौग़ात मिली तो क्या हुआ?
उम्मीद की उदासी, रुख़सत होगी
अभी वक़्त है ठहरा तो क्या हुआ ?

- जेन्नी शबनम (24. 5. 2009)
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71. कोई बात बने (तुकान्त)

कोई बात बने

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ज़ख़्म गहरा हो औ ताज़ा मिले, तो कोई बात बने
थोड़ी उदासी से, न कोई ग़ज़ल, न कोई बात बने

दस्तूर-ए-ज़िन्दगी, अब मुझको, न बताओ यारों
एक उम्र जो फिर मिल जाए, तो कोई बात बने 

मौसम की तरह हर रोज़, बदस्तूर बदलते हैं वो
गर अब के जो न बदले मिज़ाज, तो कोई बात बने 

रूठने-मनाने की उम्र गुज़र चुकी, अब मान भी लो
एक उम्र में जन्म दूजा मिले, तो कोई बात बने 

उनके मोहब्बत का फ़न, बड़ा ही तल्ख़ है यारों
फ़क़त तसव्वुर में मिले पनाह, तो कोई बात बने 

रख आई 'शब' अपनी  ख़ाली हथेली उनके हाथ में
भर दें वो लकीरों से तक़दीर, तो कोई बात बने

- जेन्नी शबनम (15. 7. 2009)
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

70. बुरी नज़र (क्षणिका)

बुरी नज़र 

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कुछ ख़ला-सी रह गई ज़िन्दगी में
जाने किसकी बददुआ लग गई मुझको
कहते थे सभी कि ख़ुद को बचा रखूँ बुरी नज़र से
हमने तो रातों की स्याही में ख़ुद को छुपा रखा था

- जेन्नी शबनम (10. 7. 2009)
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रविवार, 5 जुलाई 2009

69. 'शब' की मुराद (तुकान्त)

'शब' की मुराद
('ज़ख़्म' फिल्म से प्रेरित नज़्म)

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'शब' जब 'शव' बन जाए, उसको कुछ वक़्त रहने देना
बेदस्तूर सही, सहर होने तक ठहरने देना

उम्र गुज़ारी है 'शब' ने अँधेरों में
रोशनी की एक नज़र पड़ने देना

डरती है बहुत 'शब' आग में जलने से
दुनियावालों, उसे दफ़न करने देना 

मज़हब का सवाल जो उठने लगे तो
सबको वसीयत 'शब' की पढ़ने देना 

ढक देना माँग की सिंदूरी लाली को
वज़ह-ए-वहशत 'शब' को न बनने देना

जगह नहीं दे मज़हबी जब दफ़नाने को
घर में अपने, 'शब' की क़ब्र बनने देना

तमाम ज़िन्दगी बसर हुई तन्हा 'शब' की
जश्न भारी औ मज़मा भी लगने देना

अश्क़ नहीं फूलों से सजाना 'शब' को
'शब' के मज़ार को कभी न ढहने देना

'शब' की मुराद, पूरी करना मेरे हमदम
'शब' के लिए, कोई मर्सिया न पढ़ने देना

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शब - रात (एक काल्पनिक नाम)
शव - लाश 
वज़ह-ए-वहशत - भय / आतंक का कारण
मर्सिया - मृत्यु पर शोकगान
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- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 1998)
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शनिवार, 4 जुलाई 2009

68. आज़माया हमको (तुकान्त)

आज़माया हमको

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बेख़याली ने कहाँ-कहाँ न भटकाया हमको
होश आया तो तन्हाई ने तड़पाया हमको

इस बाज़ार की रंगीनियाँ लुभाती नहीं अब  
नन्ही आँखों की उदासी ने रुलाया हमको

उन अनजान-सी राहों पर यूँ चल तो पड़े हम  
असूफ़ों और फ़रिश्तों ने आज़माया हमको

वज़ह-ए-निख्वत उनकी दूर जो गए हम
मिले कभी फिर तो गले भी लगाया हमको

रुसवाइयों से उनकी तरसते ही रहे हम
इश्क की हर शय ने बड़ा सताया हमको

दर्द दुनिया का देखके घबराई बहुत 'शब'
ऐ ख़ुदा ऐसा ज़माना क्यों दिखाया हमको

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असूफ़ - दुष्ट
वजह-ए-निख्वत - अंहकार के कारण
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- जेन्नी शबनम (4. 7. 2009)
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

67. मुमकिन नहीं है (तुकान्त)

मुमकिन नहीं है

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परों को क़तर देना अब तो ख़ुद ही लाज़िमी है
वरना उड़ने की ख़्वाहिश, कभी मरती नहीं है। 

कोई अपना कहे, ये चाहत तो बहुत होती है
पर अपना कोई समझे, तक़दीर ऐसी नहीं है। 

अपना कहूँ, ये ज़िद तुम्हारी, बड़ा तड़पाती है
अब मुझसे मेरी ज़िन्दगी भी, सँभलती नहीं है। 

तुम ख़फा होकर चले जाओ, मुनासिब तो है
मैं तेरी हो सकूँ, कभी मुमकिन ही नहीं है

ग़ैरों के दर्द में, सदा रोते उसे है देखा 
'शब' अपनी व्यथा, कभी किसी से कहती नहीं है।

- जेन्नी शबनम (3. 7. 2009)
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