Monday, 4 April 2011

228. हाथ और हथियार...

हाथ और हथियार...

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भूख़ से कुलबुलाता पेट
हाथ और हथियार की भाषा भूल गया,
नहीं पता किससे छीने
अपना भी ठौर ठिकाना भूल गया !
मर गया था छोटका जब
मार दिया था ख़ुद को तब,
अब तो बस बारी है
पेट की ख़ातिर आग लगानी है !
नहीं चाहिए कोई घर
जहाँ पल-पल जीना था दूभर,
अब तो खून से खेलेगा
अब किसी का छोटका नहीं मरेगा !
बड़का अब भर पेट खाएगा
जोरू का बदन कोई न नोच पाएगा,
छुटकी अब पढ़ पाएगी
हाथ में कलम उठाएगी !
अब तो जीत लेनी है दुनिया
हथियार ने हर ली हर दुविधा,
अब भूख़ से पेट नहीं धधकेगी
आग-आग-आग बस आग लगेगी !
यूँ भी तो मर ही जाना था
सब अपनों की बलि जब चढ़ जाना था,
अब दम नहीं कि कोई उलझे
हाथ में है हथियार
जब तक दम न निकले !

- जेन्नी शबनम (30. 3. 2011)

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3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत खूब!
सुन्दर रचना!
आपकी कामनाएँ पूर्ण हो!

Unknown said...

आशा की नीव रखती कविता, बेहतरीन भावो का सम्मिश्रण बधाई

सहज साहित्य said...

एकदम अलग तेवर की कविता ।जुझारूपन को रेखांकित ही नहीं करती वरन् उसे प्रोत्साहित भी करती है ताकि शोषण से पीड़ित व्यक्ति मुकाबला करके शोषण से मुक्ति पा सके ।बहन जेनी शबनम जी बहुत बधाई !