सफ़र का क़िस्सा
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मेरे सफ़र की हर शय ग़ुलाम है
मन के कफ़स में हर लम्हा क़ैद है
तन की ज़रूरत कब बढ़ी-घटी
मन से मन की बात कब कही
यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं
पिघलते रहे मन के जज़्बात
छुप न सकी कोई भी बात
सन्नाटे में बैठी रही आँखें मूँद
लरजती रही आँसुओं की बूँद
कौन समझे ग़ैरों के एहसास
अब रहा नहीं कोई आस-पास
मेरे जीवन के सफ़र का क़िस्सा
ज़माने का बना अब रोचक हिस्सा।
तन की ज़रूरत कब बढ़ी-घटी
मन से मन की बात कब कही
यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं
पिघलते रहे मन के जज़्बात
छुप न सकी कोई भी बात
सन्नाटे में बैठी रही आँखें मूँद
लरजती रही आँसुओं की बूँद
कौन समझे ग़ैरों के एहसास
अब रहा नहीं कोई आस-पास
मेरे जीवन के सफ़र का क़िस्सा
ज़माने का बना अब रोचक हिस्सा।
-जेन्नी शबनम (26.2.2026)
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