Thursday, 1 August 2019

622. उधार

उधार   

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कुछ रंग जो मेरे हिस्से में नहीं थे   
मैंने उधार लिए मौसम से   
पर न जाने क्यों ये बेपरवाह मौसम मुझसे लड़ रहा है   
और माँग रहा है अपना उधार वापस   
जिसे मैंने खर्च दिया उन दिनों   
जब मेरे पास जीने को कोई रंग न था   
सफेद स्याह रंगों का जो एक कोलाज बचा था मेरे पास   
वह भी धुक-धुक साँसें ले रहा था   
ज़िन्दगी से रूठा वह कोलाज   
मुझे भी जीवन से पलायन के रास्ते बता रहा था   
पर मुझे जीना था, अपने लिए जीना था   
बहुत ज्यादा जीना था, हद से ज्यादा जीना था   
हाँ, जानती हूँ उधार लेना और उधार पर जीना गैर वाज़िब है   
जानती हूँ कि मैं कर्ज़दार हूँ और चुकाने में असमर्थ भी   
फिर भी मैं शर्मसार नहीं !   

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2019)

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2 comments:

सहज साहित्य said...

उधार दिल को बहुत गहरे तक छूने वाली कविता है , जिसमें आपने जीवन की सच्छाई पिरो दी है। हार्दिक बधाई ! _रामेश्वर काम्बोज

प्रीति अग्रवाल said...

जेन्नी जी ठीक किया अपने, गीता में लिखा है आज जो तुम्हारा है कल किसी और का था, और कल किसी और का होगा.....फिर कैसे उधार!:)