स्त्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्त्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 8 मार्च 2026

799. स्त्रियाँ (10 हाइकु)

स्त्रियाँ

*** 

1.
स्त्रियों के हिस्से
परख-आकलन
यही चलन।

2.
स्त्रियाँ हैं फूल
दामन में हैं काँटें
दुःख क्या बाँटे।

3.
स्त्रियाँ-अंगार
आजीवन चलती
नहीं जलती।

4.
स्त्री के बिना
सूना है घर-बार
माने संसार।

5.
स्वयं सींचती
आजीवन पालती
जीव के पौधे।

6.
थाती में मिली
बेबसी व घुटन
स्त्री है बेचारी।

7.
स्त्रियाँ हैं काली
ज़रूरत पड़े तो
करे विध्वंस।

8.
फ़र्ज़ निभाती
मिला कंधे से कन्धा
पुरुष की स्त्री।

9.
आँचल गीला
हँसके पिए पीड़ा
स्त्री का जीवन।

10.
भूखी होती स्त्री
प्यार व सम्मान की
नहीं धन की।

-जेन्नी शबनम (8.3.2026)
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 
__________________

शनिवार, 8 मार्च 2025

789. एक सवाल

एक सवाल 

***

भार्या होने का दण्ड 
बार-बार भोगती रही
अपमान का घूँट पीती रही
और तुम सभी नज़रें झुकाए 
कायर बने बैठे तमाशा देखते रहे
तुम सभी के पुरुष होने पर
तुम सभी के योद्धा होने पर 
ऐसे वचन पर
ऐसे धर्म पर 
लानत है 
एक सवाल है मेरा  
मेरी जगह तुम्हारी पुत्री होती तो?
क्या फिर भी उसे दाँव पर लगा देते?
क्या उसे भी पाँच पुरुषों में बाँट देते?
भरी सभा में निर्वस्त्र होने देते?
मेरी हँसी नाजाएज़ सही
पर क्या ये जाएज़ है?
पाँच पतियों के होते हुए मैं असहाय रही   
रक्षा करने धर्म-भाई आया 
क्या तुम में से कोई वचन तोड़ नहीं सकता था?
पति का धर्म निभा नहीं सकता था?
पत्नी की रक्षा न कर सकने वाले तुम पाँचों पुरुष  
तुम सभी पर लानत है। 

-जेन्नी शबनम (8.3.25)
(महिला दिवस)
________________ 

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

772. स्त्री जानती है

स्त्री जानती है 

***

उलझनें मिलती हैं, पर कम उलझती है 
स्त्री ये जानती है, स्त्री सब समझती है 
कब कहाँ कितना बोलना है
कब कहाँ कितना छुपाना है
क्या दिल में दफ़्न करना है 
क्या दुनिया को कहना है 
बेबाक़ बातें स्त्री नहीं कर सकती
मन की हर बात नहीं कह सकती
लग जाएँगे बेहयाई के इल्ज़ाम 
हो जाएगी अपने ही घर में बदनाम
जान चली जाए पर मन खोल सकती नहीं  
झूठ कहती नहीं, सच अक्सर बोल सकती नहीं  
उम्र बीत जाए पर मनचाहा नहीं कर सकती
फूल उगा सकती है, पर तितलियाँ नहीं पकड़ सकती 
अपने मन की बातें अपने मन तक
अपने दुख अपने एहसास अपने तक
रिश्ते समेटते-समेटते ख़ुद बिखरती है
कोई नहीं समझता स्त्री कितना टूटती है, मरती है 
हज़ारों शोक, मगर स्त्री के आँसू नापसन्द हैं
हँसती-खिलखिलाती स्त्री सबकी पसन्द है
जन्म से मिली इस विरासत को ढोना है
स्त्री को इन्सान नहीं केवल स्त्री होना है 
और स्त्री की स्त्री होने की यह अकथ्य पीड़ा है।

-जेन्नी शबनम (8.3.2024)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
____________________

गुरुवार, 21 दिसंबर 2023

770. हँसती हुई नारी (चोका- 19)

हँसती हुई नारी 

***

लगती प्यारी
हँसती हुई नारी
घर-संसार
समृद्धि भरमार
रिश्तों की गूँज
पसरी अनुगूँज
चहके घर
सुवासित आँगन
बच्चों का प्यार
पुरुष से सम्मान
पाकर के स्त्री
चहकती रहती,
खिलखिलाती
सम्बन्धों की फ़सल
लहलहाती
नाचती हैं ख़ुशियाँ
प्रेम-बग़िया
फूलती व फलती,
पाकर प्रेम
पाके अपनापन
भर उमंग
करती निछावर
तन व मन
सूरज-सा करती
निश्छल कर्म
स्त्री सदैव बनती
मददगार
अपने या पराए
चाँद-सी बन
ठण्डक बरसाती
नहीं सोचती
सिर्फ़ अपने लिए
करती पूर्ण
वह हर कर्तव्य
ममत्व-भरा
नारी है अन्नपूर्णा
बड़ी संयमी
मान-प्यार-दुलार
नारी-मन का सार।

-जेन्नी शबनम (7.12.2023)
____________________

बुधवार, 21 जून 2023

760. हरदी गुरदी

हरदी गुरदी 

*******


कभी-कभी जी चाहता है   

इतना जिऊँ इतना जिऊँ इतना जिऊँ

कि ज़िन्दगी कहे-

अब बस! थक गई! अब और नहीं जी सकती! 

हरदी गुरदी! हरदी गुरदी! हरदी गुरदी!

पर सोचती हूँ

मैं ज़िन्दा भी हूँ क्या?

जो इतना जिऊँ इतना जिऊँ इतना जिऊँ

क्यों जियूँ, कैसे जियूँ, कितना जियूँ?

मैं तो कब की मर चुकी 

कभी भाला कभी तीर व तलवार से

सदियों सदियों सदियों से

अभी तेज़ाब आग बलात्कार और चुन्नी के फन्दों से

इसी सदी में इसी सदी में इसी सदी में

आज खून से लथपथ चीख रही हूँ 

अभी अभी अभी

न तब किसी ने सुना न देखा न जाना

न अब। 

दिन महीने साल व सदियाँ 

आपस में कानाफूसी करते रहते-

ये ज़िन्दा क्यों रहती है?

ये मरकर हर बार जी क्यों जाती है?

मौत इसको छूकर लौट क्यों आती है 

ये औरतें भी न अजीब चीज़ हैं 

कितना भी मारो 

जीना नहीं छोड़ती। 

सोचती हूँ 

मैं हँसती हूँ तो प्रश्न

प्रेम करती हूँ तो प्रश्न

अकेलेपन को भोगती हूँ तो प्रश्न

आबरू बचाने के लिए जूझती हूँ तो प्रश्न 

हिम्मत दिखाती हूँ तो प्रश्न 

हार जाती हूँ तो प्रश्न 

अधिकार माँगती हूँ तो प्रश्न 

प्रश्न प्रश्न प्रश्न। 

उफ!

मेरी ज़ात ज़िन्दा है

यह प्रश्न है

बहुत बहुत बहुत जीना चाहती

यह भी प्रश्न है। 

प्रश्नों से घिरी मैं 

इतना इतना इतना जिऊँगी

कि ज़िन्दगी कहे-

जीना सीखो इससे

फिर कभी न कहना-

हरदी गुरदी! हरदी गुरदी! हरदी गुरदी!


- जेन्नी शबनम (21.6.2023)

______________________________

मंगलवार, 8 मार्च 2022

740. एक दिन मुक्ति के नाम

एक दिन मुक्ति के नाम 

*** 

कभी अधिकार के लिए शुरु हुई लड़ाई   
हमारी ज़ात को ज़रा-सा हक़ दे गई   
बस एक दिन, राहत की साँसें भर लूँ   
ख़ूब गर्व से इठलाऊँ, ख़ूब तनकर चलूँ   
मेरा दिन है, आज बस मेरा ही दिन है   
पर रात से पहले, घर लौट आऊँ।
   
बैनर, पोस्टर, हर जगह छा गई स्त्री    
लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ   
लड़की-लड़की, महिला-महिला    
बहन, बेटी, माँ, प्रेमिका अच्छी   
मानो आज देवी बन गई स्त्री    
रोज़ जो होती थी वह कोई और है   
आज है कोई नई स्त्री।
   
एक पूरा दिन करके स्त्री के नाम   
छीन ली गई सोचने की आज़ादी   
बारह मास की ग़ुलामी   
और बदले में बस एक दिन   
जिसमें समेटना है साल का हर दिन।
   
कभी जीती थी हर बाज़ी   
पर हार गई स्त्री    
सदियों से लड़ती रही   
पर हार गई स्त्री!
   
अब किसे लानत भेजी जाए?   
उन गिनी-चुनी स्त्रियों को   
जिनके सफ़र सुहाने थे   
जिनके ज़ख़्मों पर मलहम लगे   
इतिहास के कुछ पन्ने जिनके नाम सजे   
और बाक़ियों को उन 'कुछ' की एवज़ में   
यह कहकर मानसिक बन्दी बनाया गया-   
तुमने क्रान्ति की, देखो कितनी आज़ाद हो   
कभी किताबें तो पढ़कर देखो   
तुम केवल अक्षरों को याद हो   
लड़कों की तरह तुम्हारी परवरिश होती है   
देखो तुम्हारे हक़ में कितने कानून हैं   
तुम्हें विधान से इतनी ताक़त मिली   
जब चाहे हमें फँसा सकती हो   
तुम्हारे सामने हमारी क्या औक़ात   
हे देवी! हम पुरुषों पर दया करो! 
  
आज महिला दिवस है   
पूरी दुनिया की स्त्रियाँ जश्न मनाएँगी   
पर यह भी सच है आज के दिन   
कई स्त्रियों की जिस्म लुटेगा, बाज़ार में बिकेगा   
आग और तेज़ाब में जलेगा   
कइयों को माँ की कोख में मार दिया जाएगा   
बैनरों-पोस्टरों के साथ   
स्त्री की काग़ज़ी जीत पर नारा बुलन्द होगा   
छल-प्रपंच का तमाचा   
अन्ततः हमारे ही मुँह पर पड़ेगा।
   
कोई कुतिया कहकर   
बदन नोच-नोचकर खाएगा   
कोई डायन कहकर   
ज़मीन पर पटक-पटककर मार डालेगा   
रंडी बनाकर उसका सगा ही कमाई उड़ाएगा   
बेटी जनने वाली पापिन कहकर   
उसका आदमी ही उसे घर से निकालेगा   
या ब्याह दी जाएगी उसके साथ   
जो रोज़ जबरन भोगेगा   
या ज़ेवरों से लादकर आजीवन हुक़्म चलाएगा। 
  
आज के दिन मैं इतराऊँगी   
स्त्री होने पर फ़ख़्र करूँगी   
क़र्ज़ सही, ख़ैरात सही   
एक दिन जो मिला   
हम स्त्रियों को मुक्ति के नाम। 
  
क्यों आज अपनी हर साँसों के लिए   
किसी मर्द से फ़रियाद की जाए   
सौ बरस तक साँसें लें   
और बस एक दिन की ज़िन्दगी जी जाए।
   
मैं ख़ुद को धिक्कारती हूँ   
क्यों बस एक दिन की भीख माँगती हूँ   
क्यों नहीं होता हर दिन   
स्त्री-पुरुष का बराबर दिन!

-जेन्नी शबनम (8.3.2022)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
__________________

शुक्रवार, 18 जून 2021

727. एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है

*** 

उम्र के सारे वसन्त वार दिए   
रेगिस्तान में फूल खिला दिए   
जद्दोजहद चलती रही एक अदद घर की   
रिश्तों को सँवारने की   
हर डग पर चाँदनी बिखराने की   
हर कण में सूरज उगाने की। 
   
अन्ततः मकान तो घर बना   
परन्तु किसी कोने पर मेरा कोई रंग न चढ़ा   
कोई भी कोना महफ़ूज़ न रहा   
न मेरे मन का, न घर का   
कोई कोना नहीं जहाँ सुकून बरसे   
सूरज, चाँद, सितारे आकर बैठें   
हमसे बतकहियाँ करते हुए जीवन को निहारें। 
   
धीरे-धीरे हर रिश्ता दरकता गया   
घर मकान में बदलता रहा   
सब बिखरा और पतझर आकर टिक गया 
अब यहाँ न फूल है, न पक्षियों के कलरव   
न हवा नाचती है, न गुनगुनाती है   
कभी भटकते हुए आ जाए   
तो सिर्फ़ मर्सिया गाती है। 
   
अब न सपना कोई, न अपना कोई   
मन में पसरा अकथ्य गाथा का वादा कोई   
धीरे-धीरे वीरानियों से बहनापा बढ़ा   
जीवन पार से बुलावा आया   
पर न जाने क्यों   
न इस पार, न उस पार   
कहीं कोई कोना शेष न रहा। 
   
जाने की आतुरता को किसी ने बढ़कर रोक लिया   
और मेरा गुलमोहर भी गुम हो गया   
जो हौसला देता था 
विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का   
साहस और हौसला को ख़ाली मन में भरने का। 
   
अब न रिश्ते, न घर, न गुलमोहर   
न इस पार, न उस पार कोई ठौर   
जीवन के इस पतझर में   
एक गुलमोहर का इन्तिज़ार है।   

-जेन्नी शबनम (18.6.2021)
____________________

बुधवार, 9 जून 2021

725. पुनर्जीवित

पुनर्जीवित 

*** 

मैं पुनर्जीवित होना चाहती हूँ   
अपने मन का करना चाहती हूँ   
छूटते सम्बन्ध, टूटते रिश्ते   
वापस पाना चाहती हूँ   
वह सब, जो निषेध रहा   
अब करना चाहती हूँ। 
   
आख़िरी पड़ाव पर पहुँचने के लिए   
अपने साये के साथ नहीं   
आँख मूँद किसी हाथ को थाम   
तेजी से चलना चाहती हूँ   
शिथिल शिराओं में थका रक्त   
दौड़ने की चाह रखता है। 
   
जीते-जीते कब जीने की चाह मिटी   
हौसले ने कब दम तोड़ा   
कब ज़िन्दगी से नाता टूटा   
चुप्पी ओढ़ बदन को ढोती रही   
एक अदृश्य कोने में रूह तड़पती रही। 
   
स्त्री हूँ 
शुरू और अन्त के बीच   
कुछ पल जी लेना चाहती हूँ   
कुछ देर को अमृत पीना चाहती हूँ   
मैं फिर से जीना चाहती हूँ   
मैं पुनर्जीवित होना चाहती हूँ।   

-जेन्नी शबनम (9.6.2021) 
___________________

सोमवार, 8 मार्च 2021

711. अब नहीं हारेगी औरत

अब नहीं हारेगी औरत

******* 

जीवन के हर जंग में हारती है औरत   
ख़ुद से लड़ती-भिड़ती हारती है औरत   
सुख समेटते-समेटते हारती है औरत   
दुःख छुपाते-छुपाते हारती है औरत   
भावनाओं के जाल में उलझी हारती है औरत   
मन पर पैबंद लगाते-लगाते हारती है औरत   
टूटे रिश्तों को जोड़ने में हारती है औरत   
परायों से नहीं अपनों से हारती है औरत   
पति-पत्नी के रिश्तों में हारती है औरत   
पिता-पुत्र के अहं से हारती है औरत   
बेटा-बेटी के द्वन्द्व से हारती है औरत   
बहु-दामाद के छद्म से हारती है औरत   
दुनियादारी के संघर्ष से हारती है औरत   
दुनिया की भीड़ में गुम हारती है औरत   
अपनी चुप्पी से ही सदा हारती है औरत   
तोहमतों के बाज़ार से हारती है औरत   
ख़ुद सपनों को तोड़के हारती है औरत   
ख़ुद को साबुत रखने में हारती है औरत   
जीवन भर हँस-हँसकर हारती है औरत   
जाने क्यों मरकर भी हारती है औरत   
जीवन के हर युद्ध में हारती है औरत।   
अब हर हार को जीत में बदलेगी औरत   
किसी भी युद्ध में अब नहीं हारेगी औरत।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2021)
_______________________________

रविवार, 13 दिसंबर 2020

701. पत्थर या पानी

पत्थर या पानी 

***  

मेरे अस्तित्व का प्रश्न है  
मैं पत्थर बन चुकी या पानी हूँ?
   
पत्थरों से घिरी, मैं जीवन भूल चुकी हूँ   
शायद पत्थर बन चुकी हूँ   
फिर हर पीड़ा मुझे रुलाती क्यों है? 
  
हर बार पत्थरों को धकेलकर   
जिधर राह मिले, बह जाती हूँ   
शायद पानी बन चुकी हूँ   
फिर अपनी प्यास से तड़पती क्यों हूँ? 
  
हर बार, बार-बार   
पत्थर और पानी में बदलती मैं   
नहीं जानती, मैं कौन हूँ।   

-जेन्नी शबनम (12.12.2020)
_____________________

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

700. स्त्री हूँ (10 क्षणिका)

स्त्री हूँ 

******* 

1.
स्त्री हूँ 
*** 
स्त्री हूँ, वजूद तलाशती   
अपना एक कोना ढूँढती   
अपनों का ताना-बाना जोड़ती   
यायावरता मेरी पहचान बन गई है  
शनै-शनै मैं खो रही हूँ मिट रही हूँ   
पर मिटना नहीं चाहती   
स्त्री हूँ, स्त्री बनकर जीना चाहती हूँ।  

2.
अकेली   
*** 
रह जाती हूँ   
बार-बार हर बार   
बस अपने साथ   
मैं, नितांत अकेली।   

3. 
भूल जाओ 
*** 
सपने तो बहुत देखे   
पर उसे उगाने के लिए   
न ज़मीन मिली न मैंने माँगी   
सपने तो सपने हैं सच कहाँ होते हैं   
बस देखो और भूल जाओ।   

4.
छलाँग 
*** 
आसमान की चाहत में   
एक ऊँची छलाँग लगाई मैंने   
भर गया आसमान मुट्ठी में   
पाँव के नीचे लेकिन ज़मीं ना रही।   

5. 
ज़िन्दगी जी ली 
*** 
ज़िंदा रहने के लिए   
सपनों का मर जाना बेहद ख़तरनाक है   
मालूम है फिर भी एक-एककर   
सारे सपनों को मार दिया   
ख़ुद ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारी   
और ज़िन्दगी जी ली मैंने।   


6..  
हँस पड़ी वह 
*** 
वह हँसी, वह बोली   
इतना दंभ, इतनी हिमाक़त   
उसे मर्यादित होना चाहिए   
उसे क्षमाशील होना चाहिए   
उसकी जाति का यही धर्म है  
पर अब अधर्मी होना स्वीकार है   
यही एक विकल्प है   
आज फिर हँस पड़ी मैं।   


7.
जर्जर 
*** 
आख़िरकार मैं घबराकर   
घुस गई कमरे के भीतर   
तूफ़ान आता, कभी जलजला   
हर बार ढहती रही, बिखरती रही   
पर जब भी खिड़की से बाहर झाँका   
साबुत होने के दम्भ के साथ   
खंडहर नहीं छुपा सकता, काल के चक्र को   
अंततः सबने देखा झरोखे से झाँकती, जवान काया   
जो अब डरावनी और जर्जर है।   


8. 
बाँझ 
*** 
मन में अब कुछ नहीं उपजता   
न स्वप्न न कामना   
किसी अपने ने पीछे से वार किया   
हर रोज़ बार-बार हज़ार बार   
कोमल मन खंजर की वार से बंजर हो गया है   
मेरा मन अब बाँझ है।   


9.
खुदाई 
*** 
जाने क्यों, ज़माना बार-बार खुदाई करता है   
गहरी खुदाई पर, मन ने हरकत कर ही दी   
दिल पर खुदी दर्द की तहरीर   
ज़माने ने पढ़ ली और अट्टहास किया   
जाने कितनी सदियों से, सब कुछ दबा था   
अँधेरी गुफ़ाओं में, तहख़ाने के भीतर   
अब आँसुओं का सैलाब है   
जो झील बन चुका है।   


10.
जबरन 
*** 
अतीत की बेवकूफ़ियाँ   
मन का पछतावापन   
गाहे-बगाहे, चाहे न चाहे   
वक़्त पाते ही बेधड़क घुस आता है   
उन सभासदों की तरह जबरन   
जिनका उस क्षेत्र में प्रवेश-निषेध है   
न हँसने देता है न रोने देता है   
और झिंझोड़कर रख देता है   
पूरा का पूरा वजूद!   

 - जेन्नी शबनम (2. 12. 2020)
______________________ 

बुधवार, 25 नवंबर 2020

699. दागते सवाल

दागते सवाल 

*** 

यही तो कमाल है   
सात समंदर पार किया, साथ समय को मात दी   
फिर भी कहते हो-   
हम साथ चलते नहीं हैं।   

हर स्वप्न को बड़े जतन से ज़मींदोज़ किया   
टूटने की हद तक ख़ुद को लुटा दिया   
फिर भी कहते हो-   
हम साथ देते नहीं हैं।   

अविश्वास की नदी अविरल बह रही है   
दागते सवाल, मुझे झुलसा रहे हैं   
मेरे अन्तस् का ज्वालामुखी अब धधक रहा है   
फिर भी कहते हो-   
हम जलते क्यों नहीं हैं।   

हाँ! यह सत्य अब मान लिया 
सारे उपक्रम धाराशायी हुए   
धधकते सवालों की चिनगारी 
कलेजे को राख बना चुकी है   
साबुत मन तरह-तरह के सामंजस्य में उलझा   
चिन्दी-चिन्दी बिखर चुका है।   

बड़ी जुगत से चाँदनी वस्त्रों में लपेटकर   
जिस्म के मांस की पोटली बनाई है   
दागते सवालों से झुलसी पोटली 
सफ़र में साथ है   
ज़रा-सा थमो   
जिस्म की यह पोटली 
दिल की तरह खुलकर   
अब बस बिखरने को है।  

-जेन्नी शबनम (25.11.2020) 
_____________________

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

692. दड़बा

दड़बा 

*** 

ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ, अपने-अपने दड़बे में   
अपने-अपने परों को सँभालो   
एक दूसरे को अपनी-अपनी चोंच से लहूलुहान करो। 
  
कटना तो तुम सबको है, एक-न-एक दिन   
अपनों द्वारा या ग़ैरों द्वारा   
सीख लो लड़ना 
ख़ुद को बचाना 
दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध। 
  
दड़बे के बाहर की दुनिया 
क़ातिलों से भरी है   
जिनके पास शब्द के भाले हैं 
बोली की कटारें हैं   
जिनके देह और जिह्वा को 
तुम्हारे मांस और लहू की प्यास है   
पलक झपकते ही झपट ली जाओगी   
चीख भी न पाओगी।
   
दड़बे के भीतर, कितना भी लिख लो तुम   
बहादुरी की गाथाएँ, हौसलों की कथाएँ   
पर बाहर की दुनिया, जहाँ पग-पग पर भेड़िए हैं    
जो मानव-रूप धरकर, तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहे हैं   
भेड़िए के सामने मेमना नहीं, ख़ुद भेड़िया बनना है   
टक्कर सामने से देना है, बराबरी पर देना है। 
  
ऐ लड़कियो!   
जीवन की रीत, जीवन का संगीत, जीवन का मन्त्र   
सब सीख लो तुम   
न जाने कब किस घड़ी 
समय तुमसे क्या माँगे।   

-जेन्नी शबनम (24.10.2020)
______________________

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

683. परी

परी

******* 

दुश्वारियों से जी घबराए   
जाने क़यामत कब आ जाए   
मेरे सारे राज़, तुम छुपा लो जग से   
मेरा उजड़ा मन, बसा लो मन में।   
पूछे कोई कि तेरे मन में है कौन   
कहना कि एक थी परी, ग़ुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई   
किसी से न कहना, उस परी की कहानी   
जो एक रोज़ मिली तुमको, डरती हुई   
खोकर आज़ादी तड़पती हुई।   
लहू से लथपथ, जीवन से विरक्त   
किसी ने छला था, बड़ा उसका मन   
पंख थे दोनों उसके कतरे हुए   
आँखें थीं बंद, पर आँसू लुढ़कते रहे   
होठों पे चुप्पी और सिसकी थमती नहीं   
उफ़! बदहवास, बड़ी थी बदहाल   
उसके मन में थे ढेरों मलाल   
कह गई मुझसे वो अपना हाल   
जीवन बीता था बनकर सवाल   
ले लिया वादा कि लेना न नाम।   
परी थी वो, मगर थी ग़ुलाम   
अपनों ने छीने थे सारे अरमान   
साँसों पर बंदिश, सपनों पर पहरे   
ऐसे में भला, कोई कैसे जीए?   
ज़ख़्मी तन और घायल मन   
फ़ना हो गई, हर राज़ कहकर   
रह गई मेरे मन में कहानी बनकर   
सच उसका, मुझे कहना नहीं   
वो दे गई, ये कैसी मज़बूरी।   
हाँ! सच है, वो परी न थी   
न किसी के सपनों की रानी   
वह थी थकी-हारी, टूटी एक नारी   
जो सदा रही सबके लिए बेमानी   
नहीं है कोई अब उसकी निशानी।   
ओह! उसने कहा था राज़ न खोलना   
उसकी इज़्ज़त अपने तक रखना,   
ना-ना वो थी परी,ग़ुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई।   

- जेन्नी शबनम (3. 9. 2020)
____________________

सोमवार, 1 जून 2020

668. सीता की पीर (10 हाइकु)

सीता की पीर (10 हाइकु)

******* 

1. 
राह अगोरे  
शबरी-सा ये मन,  
कब आओगे?  

2. 
अहल्या बनी  
कोई राम न आया  
पाषाण रही।  

3. 
चीर-हरण,  
द्रौपदी का वो कृष्ण  
आता न अब।  

4. 
शुचि द्रौपदी  
पाँच वरों में बँटी,  
किसका दोष?  

5. 
कर्ण का दान  
कवच व कुंडल,  
कुंती बेकल।  

6. 
सीता है स्तब्ध  
राम का तिरस्कार  
भूमि की गोद।  

7. 
सीता की पीर  
माँ धरा ने समेटी  
दो फाँक हुई।  

8. 
स्पंदित धरा  
फटा धरा का सीना  
समाई सीता।  

9. 
त्रिदेव शिशु,  
सती अनसूइया  
आखिर हारे।  

10. 
सती का कुंड  
अब भी प्रज्वलित,  
कोई न शिव।  

- जेन्नी शबनम (31. 5. 2020)
_____________________



शुक्रवार, 1 मई 2020

659. गँवारू लड़की

गँवारू लड़की

***   

एक गाँव की लड़की   
शहर में पनाह ढूँढती रही   
अपना नाम बताकर अपना पता पूछती रही   
अपने हिस्से के कुछ क़िस्से लेकर   
सबके मन के द्वार खटखटाती थी   
थोड़ा अपनापन माँगती थी 
मुट्ठी भर ज़मीन चाहती थी। 
  
कभी किसी ने उसकी परवाह न की   
पर अब वह ख़ुद भी बेपरवाह हो चुकी है   
न घर मिला, न मन मिला, न मान मिला   
न ठौर, न ठिकाना मिला   
सबने कहा, वह गँवारू है, किसी काम की नहीं   
न शहर के लायक़, न किसी घर के लायक़   
पर अब वह उदास नहीं रहती 
अब उसकी चुप्पी टूट चुकी है   
वह पलायन न करेगी, ढीठ होकर बढ़ेगी। 
   
वह देसी बोली बोलती है 
उसे गर्व है अपनी बोली पर   
वह गाँव की गँवार है 
उसे गर्व है, अपने गँवारूपन पर   
कम-से-कम उसने सोंधी मिट्टी को तो चूमा है   
अपनी बोली में सपनों को पाला है   
शहर आकर भी, जो गाँव से लाई थी 
सब सँभाला है   
पेड़-पौधों को दुलराया है   
वह हाथ से खाती है, तो अन्न को पहचानती है   
धड़कनों से बात करती है, तो मन को पहचानती है   
खेतों-डरेरों पर कूदती-फाँदती 
पशु-पक्षियों से यारी निभाई है   
वह सारे रिश्ते जीकर शहर आई है। 
   
हाँ! वह शहरी नहीं, शहर के लिए पराई है   
पर वो बहुत प्यारे गाँव से आई है   
शायद इसलिए वह अबतक कंक्रीट पहन नहीं पाई   
मोम को ओढ़कर बैठी है, पत्थर बन नहीं पाई   
इस जंगल में खो नहीं पाई   
अच्छा है, शहर की हो नहीं पाई   
वह गाँव की लड़की गँवारू है   
मगर अब शहर की नब्ज़ और शहरियों का शातिरपना 
पहचान गई है   
ख़ुद को समझने लगी है
शहर को जान गई है।   

-जेन्नी शबनम (1.5.2020)
___________________

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

625. परम्परा (क्षणिका)

परम्परा   

*******   

मन के अवसाद को   
चूड़ियों की खनक, बिन्दी के आकार   
होठों की लाली और मुस्कुराहट में दफ़नाकर 
खिलखिलाकर दूर करना परम्परा है,   
स्त्रियाँ परम्परा बड़े मन से निभाती हैं।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2019)   
_____________________ 

रविवार, 24 मार्च 2019

610. परम्परा

परम्परा   

*******   
  
मैं उदासी नहीं चाहती थी   
मैं तो खिलखिलाना चाहती थी   
आज़ाद पंक्षियों-सा उड़ना चाहती थी   
हर रोज़ नई धुन गुनगुनाना चाहती थी   
और यह सब अनकहा भी न था   
हर अरमान चादर-सा बिछा दिया था तुम्हारे सामने   
तुमने सहमति भी जताई थी कि तुम साथ दोगे   
लेकिन जाने यह क्योंकर हुआ   
पर मैं वक़्त को दोष न दूँगी   
वक़्त ने तो बहुत साथ दिया   
पर तुम बिसुर गए सब   
एक-एककर मेरे सपनों को   
होलिका के साथ तुमने जला दिया   
मुझसे कहा कि यह परम्परा है   
मैं उदास हुई पर इंकार न किया   
तुम्हारा कहा सिर माथे पर।   

- जेन्नी शबनम (9.3.2019)   
__________________

शनिवार, 1 सितंबर 2018

585. फ़ॉर्मूला (पुस्तक 65)

फ़ॉर्मूला   

*******   

मत पूछो ऐसे सवाल   
जिसके जवाब से तुम अपरिचित हो   
तुम स्त्री-से नहीं हो   
समझ न सकोगे स्त्री के जवाब   
तुम समझ न पाओगे, स्त्री के जवाब में   
जो मुस्कुराहट है, जो आँसू है   
आख़िर क्यों है,   
पुरूष के जीवन का गणित और विज्ञान   
सीधा और सहज है   
जिसका एक निर्धारित फ़ॉर्मूला है   
मगर स्त्रियों के जीवन का गणित और विज्ञान   
बिलकुल उलट है   
बिना किसी तर्क का   
बिना किसी फ़ॉर्मूले का,   
उनके आँसुओं के ढेरों विज्ञान हैं    
उनकी मुस्कुराहटों के ढेरों गणित हैं   
माँ, पत्नी, पुत्री या प्रेमिका   
किसी का भी जवाब तुम नहीं समझ सकोगे   
क्योंकि उनके जवाब में अपना फ़ॉर्मूला फिट करोगे,   
तुम्हारे सवाल और जवाब, दोनों सरल हैं   
पर स्त्री का मन, देवताओं के भी समझ से परे है   
तुम तो महज़ मानव हो   
छोड़ दो इन बातों को   
मत विश्लेषण करो स्त्रियों का   
समय और समझ से दूर   
एक अलग दुनिया है स्त्रियों की   
जहाँ किसी का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं, न ही वर्जित है   
परन्तु शर्त एक ही है   
तुम महज़ मानव नहीं, इंसान बनकर प्रवेश करो   
फिर तुम भी जान जाओगे   
स्त्रियों का गणित   
स्त्रियों का विज्ञान   
स्त्रियों के जीवन का फ़ॉर्मूला   
फिर सारे सवाल मिट जाएँगे   
और जवाब तुम्हें मिल जाएगा।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2018)   
___________________

शनिवार, 18 अगस्त 2018

583. खिड़की स्तब्ध है

खिड़की स्तब्ध है

*******   

खिड़की, महज़ एक खिड़की नहीं   
वह एक एहसास है, संभावना है   
भीतर और बाहर के बीच का भेद   
वह बख़ूबी जानती है   
इस पार छुपा हुआ संसार है   
जहाँ की आवोहवा मौन है   
उस पार विस्तृत संसार है   
जहाँ बहुत कुछ मनभावन है   
खिड़की असमंजस में है   
खिड़की सशंकित है   
कैसे पाट सकेगी   
कैसे भाँप सकेगी   
दोनों संसार को   
एक जानदार है   
एक बेजान है,   
खिड़की स्तब्ध है!   

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2018)
____________________