Thursday, 28 October 2010

184. पहला और आख़िरी वरदान...

पहला और आख़िरी वरदान...

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वो हठी ये क्या कर गया
विष माँगी मैं
वो अमृत चखा गया
एक बूंद अमृत
हलक में उतार गया
आह !
ये कैसा ज़ुल्म कर गया !

उस दिन कहा था वो
वक़्त को ललकारा तुमने
मृत्यु माँगी असमय तुमने
इसलिए है ये शाप -
सदा जीवित तुम रहो अब
अमरता का है वरदान तुमको !

अब तो निर्भय जीवन
अविराम चलायमान जीवन
जीवित रहना है
जाने और कितनी सदी 
कभी नहीं होगी मृत्यु
कभी नहीं होगी मुक्ति
तड़प-तड़प कर जीना
शायद तब तक
जब तक नष्ट न हो
समस्त कायनात !

लाख़ करूँ प्रार्थना
नहीं होता कोई तोड़
चख भी लो जो अमृत
मुमकिन नहीं
होना कभी मृत !

खौफ़ बढ़ता जा रहा
ये मैंने क्या कर लिया ?
क्यों उसके छल में आ गई ?
क्यों चख लिया अमृत ?
क्यों माँगा था विष ?
क्यों वक़्त से पहले मृत्यु चाही ?
क्यों ? क्यों ? क्यों ?

जानती थी कि वो देवदूत है
दे रहा मुझे पहला और
आख़िरी वरदान है,
फिर क्यों अपने लिए
ज़िन्दगी नहीं
मैंने मौत माँग ली !

माँगना था तो
प्रेमपूर्ण दुनिया माँगती,
जबतक जियूँ बेफिक्र जियूँ,
सभी अपनों का प्रेम पाऊँ
कहीं कोई दुखी न हो
सर्वत्र सुख हो
आनंद हो !

चूक मेरी भूल मेरी,
ज़िन्दगी नहीं मौत की चाह की,
अब मौत नहीं बस जीना है,
कोई न होगा मेरा
सब चले जाएँगे,
मैं कभी शाप मुक्त न हूँगी,
न शाप मुक्त करने वाला
कोई होगा !

- जेन्नी शबनम (28. 10. 2010)

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5 comments:

Anonymous said...

बहुत ही बेहतरीन रचना,,...
काफी सारा अर्थ छुपा है इसमें, बार बार पढने योग्य..

POOJA... said...

kuchh kavitaye baar-baar padhne ka man hota hai, aur jitnee baar padho utni baar uski gahraai badhtee jaati hai... ye kavita unme se ek hai... bahut sundar rachna...

Udan Tashtari said...

बहुत शानदार...वाह!

मुकेश कुमार सिन्हा said...

मांगना था तो
प्रेमपूर्ण दुनिया मांगती,
जबतक जियूं
बेफिक्र जियूं,
सभी अपनों का प्रेम पाऊं
कहीं कोई दुखी न हो
सर्वत्र सुख हो
आनंद हो !


itna mangne se sab kuchh paripurn ho jata hai......:)

ek umda rachna......dil ke kareeb!!

रश्मि प्रभा... said...

चूक मेरी
भूल मेरी,
ज़िन्दगी नहीं मौत की
चाह की,
अब मौत नहीं बस
जीना है,
कोई न होगा मेरा
सब चले जायेंगे,
मैं कभी
शाप मुक्त न हूँगी,
न शाप मुक्त करने वाला
कोई होगा !
bahut sare arth samete hue hai yah rachna ...