Friday, 18 March 2011

222. आदम और हव्वा...

आदम और हव्वा...

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कुदरत की कारस्तानी है
मर्द-औरत की कहानी है,
फल खाकर आदम-हव्वा ने
की गज़ब नादानी है !

चालाकी कुदरत की या
आदम हव्वा की मेहरबानी है,
बस गई छोटी सी दुनिया जैसे
अंतरिक्ष में चूहेदानी है !

कुदरत ने बसाया ये संसार
जिसमें आदम है हव्वा है,
उन्होंने खाया एक सेब मगर
संतरे-सी छोटी ये दुनिया है !

सोचती हूँ
काश...
एक दो और
आदम-हव्वा आए होते,
आदम-हव्वा ने
बस दो फल तो खाए होते,
दुनिया थोड़ी तो बड़ी होती
गहमा गहमी और बढ़ जाती !

दुनिया दोगुनी लोग दोगुने होते
हर घर में एक ही जगह पर दो आदमी होते,
न कोई अकेला उदास होता
न कोई अनाथ होता,
न कहीं तन्हाई होती
न तन्हा मन कोई रोता !

न सुनसान इलाका होता
हर तरफ इक रौनक होती,
कहीं आदम के ठहाके तो
कहीं चूड़ी की खनक होती !

हर जगह आदम जात होती
जवानों का मदमस्त जमघट होता,
कहीं बच्चों की चहचहाती जमात होती
कहीं बुजुर्गों की ख़ुशहाल टोली होती,
कहीं श्मशान पर शवों का रंगीन कारवाँ होता
क्या न होता और क्या-क्या होता !

सोचो ज़रा ये भी तुम
होता नहीं कोई गुमसुम,
मृत्यु पर भी लोग ग़मगीन न होते
गीत मौत का पुरलय होता,
जीवन-मृत्यु दोनों ही जश्न होता
वहाँ (स्वर्गलोक) के अकेलेपन का भय न होता,
कहीं कोई बिनब्याहा बेसहारा न होता
कहीं कोई निर्वंश बेचारा न होता,
एक नहीं दो डॉक्टर आते
कोई एक अगर बीमार होता !

क्या रंगीन फ़िज़ा होती
क्या हसीन समा होता,
हर जगह काफ़िला होता
हर तरफ त्योहार होता !

सोचती हूँ
काश !
एक और आदम होता
एक और हव्वा होती,
उन्होंने एक और फल खाया होता
दुनिया तरबूज सी बड़ी होती,
सूरज से न डरी होती
तरबूज सी बड़ी होती !

- जेन्नी शबनम (16. 3. 2011)
(होली के अवसर पर)
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10 comments:

रश्मि प्रभा... said...

दुनिया दोगुनी लोग दोगुने होते
हर घर में एक हीं जगह पर दो आदमी होते,
न कोई अकेला उदास होता
न कोई अनाथ होता,
न कहीं तन्हाई होती
न तन्हा मन कोई रोता !
bahut sahi kaha, holi ki shubhkamnayen

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर रचना!
--
उनको रंग लगाएँ, जो भी खुश होकर लगवाएँ,
बूढ़ों और असहायों को हम, बिल्कुल नहीं सताएँ,
करें मर्यादित हँसी-ठिठोली।
आओ हम खेलें हिल-मिल होली।।
--
होलिकोत्सव की सुभकामनाएँ!

Unknown said...

शवों का रंगीन काफिला होता

इस पंक्ति मुझे सबसे अच्छी लगी

पाठकों पर अत्याचार ना करें ब्लोगर

mridula pradhan said...

bahut achcha likhi hain.....

kshama said...

Holee mubarak ho!

सहज साहित्य said...

बहन आज के दिन के लिए आपका यह नया चिन्तन मन मोह गया ; लेकिन गनीमत है उन्होंने एक ही फल खाया । अधिक खाते तो आज कुछ लोग जितना सताते हैं , उससे ज़्यादा सताने वाले आ जाते । अगर ऐसा होता तो बचाने वाले भी तो ज़रूर आते। बधाइयां भी ज़्यादा ही मिलती , फिर तो सचमुच हम सबकी बांछे खिलती ।

दर्शन कौर धनोय said...

अच्छा हुआ जो हव्वा ने एक ही फल खाया--
वरना बेरोजगारी डबल होती;
भष्ट नेता हजारो होते--
हम तुम दो पतियों के -
बोझ तले कुछ और दब गए होते--!
इस बढती हुई जनसंखया पर
और अधिक जनसंख्या होती --
अच्छा है जो हव्वा ने एक ही फल से अपनी प्यास बुझाई ..

बेहतरीन शब्द ! बेहतरीन जज्बात! राजीव जी ने आपकी तारीफ यु ही नही की --आप इसके काबिल भी है बधाई ..

Rajendra Rathore said...

बहुत सुन्दर रचना! आपको अनेकानेक शुभकामनायें

संजय भास्‍कर said...

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|
कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

Anubhooti said...

bahut sundar likha hai kash aisa ho jata
dher sari shubhkamnaiye