Thursday, 13 October 2011

292. क़र्ज़ अदाएगी...

क़र्ज़ अदाएगी...

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तुमने कभी स्पष्ट कहा नहीं
शायद संकोच हो
या फिर
सवालों से घिर जाने का भय
जो मेरी बेदख़ली पर तुमसे किये जाएँगे -
जो इतनी नज़दीक
वो ग़ैर कैसे ?
पर हर बार तुम्हारी बेरुखी
इशारा करती है कि
ख़ुद अपनी राह बदल लूँ
तुम्हारे लिए मुश्किल न बनूँ,
अगर कभी मिलूँ भी तो उस दोस्त की तरह
जिससे महज़ फ़र्ज़ अदायगी-सा वास्ता हो
या कोई ऐसी परिचित
जिससे सिर्फ दुआ सलाम का नाता हो !
जानती हूँ
दूर जाना ही होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदायगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

- जेन्नी शबनम ( अक्टूबर 10, 2011)

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19 comments:

Kailash Sharma said...

दूर जाना हीं होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

.....बहुत सुन्दर संवेदनशील अभिव्यक्ति..रचना के भाव अंतस को छू जाते हैं..

रश्मि प्रभा... said...

जानती हूँ
दूर जाना हीं होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !...aur udhaar rakhna meri niyti nahin

sushma verma said...

सशक्त अभिवयक्ति.....

Rajesh Kumari said...

thode pal aur kuch sapne udhaar diye the tumne....bhaavpoorn panktiyan.bahut umda rachna.

SAJAN.AAWARA said...

अगर कभी मिलूँ भी तो उस दोस्त की तरह
जिससे महज़ फ़र्ज़ अदायगी सा वास्ता हो
या कोई ऐसी परिचित
जिससे सिर्फ दुआ सलाम का नाता हो !
bahut khub
jai hind jai bharat

***Punam*** said...

तुमने कभी स्पष्ट कहा नहीं
शायद संकोच हो
या फिर
सवालों से घिर जाने का भय
जो मेरी बेदख़ली पर तुमसे किये जायेंगे,
जो इतनी नज़दीक
ग़ैर कैसे ?
पर हर बार तुम्हारी बेरुखी
इशारा करती है कि
ख़ुद अपनी राह बदल लूँ
तुम्हारे लिए मुश्किल न बनूँ,


सही कहा...
कई बार सामने वाला
खुद को बचाने के लिए
यही हथियार अख्तियार करता है...!!

Vivek Jain said...

बहुत सुंदर,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

mridula pradhan said...

क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !
bahut bhawpoorn likhi hain......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत उम्दा!

Maheshwari kaneri said...

बहुत बढ़िया |
बधाई ||

***Punam*** said...

तुमने कभी स्पष्ट कहा नहीं
शायद संकोच हो
या फिर
सवालों से घिर जाने का भय
जो मेरी बेदख़ली पर तुमसे किये जायेंगे,
जो इतनी नज़दीक
ग़ैर कैसे ?
***********************
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

इतना ही काफी है.....!!
बेहद खूबसूरत........

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

'थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !'
............भावपूर्ण , सुन्दर प्रस्तुति

रजनीश तिवारी said...

एक रिश्ते का मार्मिक चित्रण ...सुंदर रचना

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...




आदरणीया जेन्नी शबनम जी

बहुत अच्छा लिखा है -
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरित करती प्रभावशाली रचना हेतु साधुवाद !

त्यौंहारों के इस सीजन सहित
आपको सपरिवार
दीपावली की अग्रिम बधाइयां !
शुभकामनाएं !
मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Santosh Kumar said...

दूर जाना हीं होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने...

अपने आत्मीय से बिचादने के भाव की बेहद सशक्त और भावुक अभिव्यक्ति.

Santosh Kumar said...

दूर जाना हीं होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने...

अपने आत्मीय से बिचादने के भाव की बेहद सशक्त और भावुक अभिव्यक्ति.

त्रिवेणी said...

अगर कभी मिलूँ भी तो उस दोस्त की तरह
जिससे महज़ फ़र्ज़ अदायगी सा वास्ता हो
या कोई ऐसी परिचित
जिससे सिर्फ दुआ सलाम का नाता हो !
-इन पंक्तियों में निहित विवशता बहुत व्यथित करने वाली है । जिन रिश्तों को व्यक्ति बहुत नज़दीक मानता है , उनकी निरर्थकता इन पंक्तियों में ध्वनित होती है।

Sunil Kumar said...

थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !
बहुत सुन्दर संवेदनशील अभिव्यक्ति.

Rakesh Kumar said...

दूर जाना हीं होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

आपकी प्रस्तुति की सादगी और
सुन्दर भावों की अदायगी की प्रशंसा
करने के लिए शब्द नही हैं मेरे पास.

आपको बहुत बहुत बधाई और
हार्दिक शुभकामनाएँ.